सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान
तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||
:-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वयं उनका उल्लंघन करते हैं और देश के जन साधारण से उनके पालन की अपेक्षा करते हैं......
सभागार बैठे रचे थाप बिधेय विधान ।
जन मानस मनाए तिन्ह आप चले मन मान॥२||
:-- संसद में सांसदों ने विधि के विधायनों की थप्पियाँ लगा दी है वह जन मानस से उनके अनुशरण की अपेक्षा कर स्वयं स्वेच्छानुसार आचरण करते है.....
पुरबल बिधि बिधान रचित राखे ऊँच मचान l
सभा सदस बैठे करे नवल नवल निर्मान ll३||
:-- पूर्व में रचे विधि विधेयक रचित हुवे ऊंचे गृहमंचों पर रखे धूलधूसरित हो रहे हैं सांसद महोदय संसद में बैठे पुनः नए नए विधान की रचना हेतु आतुर हो रहे हैं......
"अनपेक्षित नियम विधान का निर्माण जन मानस के धन व समय का अपव्यय है.....
"अपेक्षित नियम विधानों के निर्माण की उपेक्षा सभा सदनों को औचित्यहीन करती है.....
स्वहित साधन हुँति करे सत्ता जब षड़यंत्र ।
तहाँ भरोसा तोड़ता जन गण का यह तंत्र ॥४||
:-- स्वहित साधने हेतु जब सत्ता षडयंत्र करने लगती लोकतांत्रिक गणराज्य के प्रति विश्वास पर जनमानस को संदेह होने लगता है...
राज करके अँग्रेज अब गए भारत को जान ।
याकी लोक समृद्धि को देवें आदर मान ॥५||
:-- भारत पर शासन कर अंग्रेजों ने भारत वर्ष को पहचान लिया है अब वह इसकी लोक समृद्धि का आदर सम्मान करने लगे है .....
:-- भारतं शासनं कृत्वा आङ्ग्लाः भारतं ज्ञातवन्तः अधुना तस्य समृद्धेः आदरं कर्तुं आरब्धाः।
सीवाँ के सैनी अजहुँ चुपे चाप गए बैठ ।
एहि दरसाए देस भीत नहीं घूस की पैठ॥६||
:- - सीमा पर सैनिकों द्वारा मौन का अवलंबन यह दर्शाता है कि अब देश में घूसपैठ नहीं हो रही है.....
:-- यदि घुसपैठ निर्बाध रूप से हो रही है तो सैनिकों का मौनावलंबन क्यूँ है.....?
दोष पराए देस का ताकु ग्रंथ अनुहार l
कही सके तहँ जाए को सुधिजन कहो विचार ll७||
:-- पराए देशों के दोषों को उनके धार्मिक ग्रंथों का उदाहरण देकर उन्हीं के देश में कहने का साहस है ? सुबुद्ध सुज्ञानि जन यह विचार कर कहें... ..
:-- जगत डैडी को कहिए जाकर :-- आपका भगवान कीलों में क्यूँ लटका हुआ है ये कौन सा वाद है..... मनुवाद है या अमनुवाद... .. ?एक आध परमाणु पूछने वाले के सिर में अवश्य फूट जाएगा... ..
देस धर्म सद्ग्रंथ की करतब फिरे बुराए ।
सासन हर को चाहिये ताको अबरोधाएँ॥८||
:-- हमारे देश में प्रादुर्भूत धर्म व उसके सद्ग्रथों की हमारे अपने ही देश में निंदा करते फिर रहें लोगों के ऐसे निंदनिय कृत्य को शासन कर्त्ताओं द्वारा तत्काल प्रतिबंधित करना चाहिए.....
भारत तिन्हनि कारिआ बड़ा पाल कर पोस ।
देय स्वारथ आपने धर्म ग्रंथ को दोष ॥९||
:-- वस्तुतः भारत ने ऐसे लोगों को पाल पोश कर बड़ा किया है जो अपना हित साधने हेतु भारत के धर्म ग्रंथों की निंदाभारत में ही करते फिर रहे हैं......
होत सक्ति ते सामरथ करे नहीं उपयोग ।
हे भारत तव लोग सो नहीं सिंहासन जोग ॥१०||
:-- शक्ति सामर्थ्य होते हुवे भी उसका उपयोग न करते हों तब हे भारत वह सत्ता सूत्र धारी तुम्हारे सिंहासन के योग्य नहीं है.....
देस धर्म निज छाँड़ जो, करत फिरत पाखंड ।
सासन हर दैं ताहि को कठोर बिधि कर दंड ॥११||
:--अपने देश के प्रादुर्भूत धर्म का त्यागकर जो धर्म का पाखंड करतेहुवे दूसरों के धर्मग्रंथों की निंदा करने में संलग्न है शासनकर्त्ता को ऐसे पाखंडियों हेतु विधेय रचितकर कठोरतम दंड केप्रावधान करना चाहिए
सीवाँ के सैनी अजहुँ चुपे चाप गए बैठ।
एहि दरसाए देस भीत नहीं घूस की पैठ॥१२||
:- - सीमा पर सैनिकों द्वारा मौन का अवलंबन यह दर्शाता है कि अब देश में घूसपैठ नहीं हो रही है.....:-- यदि घुसपैठ निर्बाध रूप से हो रही है तो सैनिकों का मौनावलंबन क्यूँ है.....?
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