बुधवार, 15 मई 2019

---- ॥ दोहा-दशम ३६१ ॥ -----,

गइ उद्यमहि नीति असि लेखे | खैंचि गईं  दारिद नीच रेखे ||
दरिद्र धनी बिच खंदत खाई | चार बरन कहुँ बहुरि रचाई ||
उद्योग नीति ही ऐसी निश्चित की गई थी कि उसइ पार्श्व प्रभाव से देश में दरिद्रता की रेखा खींचती चली गई | इस रेखा ने दरिद्र व् धनाढ्यों के मध्य खाई खोद दी और देश पुनश्च चार वर्ग में विभाजित हो गया | 

जाति अपर गह अर्थ अधारा | पुर्बल केर दोषु अनुहारा ||
 दारिद परसत धनि अन्हावै | राज सदन परबेस न पावै |
यह वर्गीकरण जातियता से अन्यथा आर्थिक आधार  आधारित था  पूर्व के वर्गीकरण में व्याप्त दोषों का अनुशरण किया | अब दरिद्र के स्पर्श करने से धनि स्नान करने लगे लोकतंत्र के भवन में उसका प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया | 

दीन दसा रु मलिन बसबासा | दास बिरति सहुँ कवन बिकासा ||
अगन तैल बिनु दीप अधारे | कहु कतहुँ कहुँ होत उजियारा ||
जिसकी दशा दयनीय हो जिसका निवास मलिन हो ऐसी दासवृत्ति से भला किसकी उन्नति हुई है | अग्नि व् सार से रहित दीपक से भी क्या कहीं उजाला होता है | 

अर्थ प्रधान कियौ जब  तंत्रा  | कर्म कार भयऊ कल जंत्रा | 
कीन्हेसि सो लूटि हथौड़े |  हाथ अतीक काज बहु थोड़े || 
जनसंचालन तंत्र में अर्थ की प्रधानता को अंगीकार करने का परिणाम यह हुवा कि अब कल यंत्रों ने श्रमिकों का स्थान ग्रहण कर लिया | इस स्थानापन्न ने श्रमकों के हाथों से हथोड़े छीन कर उनकी आजीविका न्यून कर दिया अब हाथ अधिक थे और काम किंचित थे | 

कर्मकार कहुँ काम बिनु कियो धनिक के दास |
धरिआ खंदत खेह खन  दियो बाका नाउ बिकास ||
श्रमिकों को आजीविका विहीन कर  उन्हें धनिकों का बंधुआ बनाया गया और खेतों तथा खनिज खण्डों के  उत्खादन को विकास नाम दिया गया | 

बसनासन बासन बिनु बासिहि | देस प्रधान भासनहि भासिहि ||
बैस आपु अति ऊँच पदासन | नीच हुँत बुहा ढाई अँसुअन ||
निवासी भोजन वस्त्र व् आवास से वंचित हो चले प्रधानमंत्री भाषण में ही समस्त समस्याओं का निवारण कर दिया करते |  स्वयं ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित होकर नीच की निचाई हेतु घड़ियाल के आंसू बहाते | 

जनसेबक सों भएउ  भुआला | रँगे चोंच बक चलै मराला ||
रचत नेम नै धरम बिरोधी | कहि आपुनो परम परबोधी ||
जन सेवा के संकल्प से सत्ता  प्राप्त की और सेवा तिरोहित कर वह राजा बनकर राज करने लगे |  स्वभाव बगुले का स्वभाव किए  हंस की सी चाल चलते | धर्म विरोधी नियम रचते और स्वयं को धर्म का प्रकांड 'पंडित' कहते | 

रीति परथा बात सबु बीती | कहत बिरथा पुरातन रीती ||
अपुनी सबहि कहए अधुनाई | भलि अलप अति गहै बुराई ||
 हुवे भारत के सांस्कृतिक समृद्धि की प्रतिक पुरानी रीतियों, प्रथाओं, परिपाटियों व् ज्ञान परक वचनों को व्यर्थ कहते |अपनी सभी रीतियों व् प्रथाओं को आधुनिक कहते जिनमें भलमनसाई अत्यल्प व् बुराई अत्यधिक थी |

दया धर्म बिरोधी अस भयऊ सत्तासीन  | 
अगजग सो पथ चालिआ जो पथ पहुँच विहीन || १० ||
भावार्थ : -  इस प्रकार दया और धर्म का विरोध करने वाले सत्ता पर आसीन हो गए हैं, इनका अनुशरण करते हुवे अब लोग उस पथ पर चल पड़े हैं जो पथ कहीं नहीं जाता | 

पुनि जान कहँ चरन चले छूटत  साँचे पंथ  |
सत्धर्म दूरत पाछे बिलुपित गै सद ग्रन्थ ||
फिर देस के चरण जाने किस ओर चल पड़े सभी सन्मार्ग छूट गए , सद्धर्म से दूर होते इस देश से सद्ग्रन्थ भी पीछे कहीं ओझल होते चले गए | 

टूटत आपुनि साखि सौं बिहुरत अपना मूर |
पाछे न बहुर सकै गै निकसत ऐतक दूर ||
अपनी शाखाओं से टूटे अपनी मौलिकता से से पृथक हुवे वह चरण इतनी दूर निकल गए कि जहाँ से पीछे अपनी जड़ों की ओर लौटना संभव नहीं था | 

पंडित जी तो चलै गए रह गइ वाकी रीत |
रही नहि मरयाद अजहुँ रही न प्रीत प्रतीत ||
पंडित जी तो दिवंगत हो गए किन्तु उनकी रीति यहीं रह गई | इस रीति  का अनुशरण करते हुवे अब देश में कहीं मर्यादा रही न प्रेम और विश्वास ही रहा | 

रही पवन नहि पावनी रहे न निर्मल नीर |
पंडत के उद्जोग गए मलिन करत सबु तीर ||
अब पवन पावन न होकर दूषित हो गई जल निर्मल होकर मलीन हो गया पंडत के उद्योग सभी तटों को दोषसे परिपूर्ण करते गए | 


भास् पराई बोलते भरे परायो भेस |
रहे न लोग सो लोग न रहे देस सो देस ||
पराई भाषा भाषते पराई विभूषा आभरित करते अब लोग वैसे लोग नहीं रहे देश वैसा देश नहीं रहा जैसा वह हुवा करता था  | 

बैसे अजाति बाद अधुनै ऊँची पीठ अस  |
सुभाउ ते मनुजाद दीन धर्म निरपेख जौ || ||
भावार्थ : - विद्यमान समय में गणमान्य, धनाढ्य, लब्धप्रतिष्ठित, व् उच्च पद पर अजाति वाद विराजित हो गया है यह वर्ग संकरता ( हाइब्रिड) जनित दुर्गुणों से युक्त है |  दुर्दशाग्रस्त विश्व, देश व् समाज से खिन्न व् दया दान तप व् सत्य से उदासीन होते हुवे जो कीट भक्षी, तमचूर भक्षी, गोभक्षी, भ्रूणभक्षी, नरभक्षी स्वरूप मनुष्य को मारकर खाने वाले आसुरी स्वभाव का है || 

पंडत जी कहुँ जुग बिरताओ | पाए कछुक बहु गयउ गवायों ||

तासु बिगत अस भयो गगन गत | गहि धुर धुर अरु कछु नहि बिलखत ||
पंडत जी के काल का समापन हुवा  इस समाप्ति से देश ने जो खोया वह अत्यधिक था और जो प्राप्त किया वह अत्यल्प था | पंडित जी के दिवंगत होने से गगन धूल से व्याप्त होकर जैसे दुर्दशा को प्राप्त हो चला था और नेत्रों को कुछ भी दर्शित नहीं हो रहा था | 

दिगंत दिरिस दरस अस होई | धावत दुति गति गए जस कोई| ||
धूम संहति ते चहुँ दिसि धुँधर  | दिसि  न दरसिहिं नहि दरसिहिं डगर ||
छितिज का दृश्य इस प्रकार दर्श रहा था मानो कोई द्रुतगति से दौड़ता हुवा गया हो | धूम्रराशि से चारों दिशाऐं धुंधली हो उठी थीं जनमानस को अब न तो कोई दिशा ही दिखाई दे रही थी न कोई मार्ग ही दिखाई दे रहा था | 


लोक ब्यापि रहे जो देसा | खँडरत होत गयउ सो सेसा ||
बहोरि अनुसासत सो सेषा | भए नायक ता दलहि बिसेषा ||
जो देश समस्त विश्व में व्याप्त था वह खंड-खंड होकर शेष हो चुका था | तदनन्तर देश के अनुशासक दल विशेष के जो नायक हुवे - 

कहयउ लाल बहादुर  नावा | देस परधान पद पधरावा ||
 पुर्बल प्रधान देत सब दोसिहि  || बारम्बार लोग सब कोसिहि |  
उनका नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था फिर उन्होंने देश के प्रधानमंत्री पद का कार्यभार ग्रहण कर लिया | दिवंगत पूर्व प्रधान मंत्री पर दोषारोपण कर लोग उन्हें वारंवार कोसते | 


देखु अँधमति चलिअ कस चाला || करिते गोठि बैस चोपाला | 
निज हित हुँत पालत पोसिहि | जेहिं बसाइहिं पास पड़ोसिहि | |
चौपालों में विराजकर गोष्ठी करते हुवे वह कहते देखो ! उनकी अन्धबुद्धि ने कैसी कुटिल चाल चली |  स्वयं के कल्याण को परिलक्षित कर जिन्हें पालते पोषते देश व् देश के प्रतिवेश में वासित कर रखा 


भू भूति भरपूरत सो औरु औरु करि आस |
बैर परत बैरी करत गए  रिपु निज संकास ||
वह बहिरवर्ग भूमि सहित संसार के समस्त ऐश्वर्य से युक्त हो गए थे  तथापि वह अधिकाधिक की प्रत्याशा
में शत्रुता करते हुवे अपने प्रतिवेशियों को भी इस देश का शत्रु बनाते चले गए | 

किन्ही अँध बिस्बास सुहरिदय तिन्ह जान अस |
जल धरनिहि आगास चारिहुँ पुर रिपु दरसें ||
 उन्हें अपना सौहृदय संज्ञान कर ऐसा अंधविश्वास किया कि  जल क्या धरती आकाश क्या अब तो सभी ओर शत्रु ही शत्रु दृष्टिगत हो रहे हैं | 

को गह भीतर को बहियारे | भेदत घरि घरि सींव पचारें |
नगर अँधेरु सुझै कछु नाही | तापर  धूसर कछु नहि दरसाही ||
कोई गृह के भीतर तो कोई बाहर बैठा है | सीमाओं का उल्लंघन कर ये घडी घडी ललकार उठते हैं | नियम व् नीतियों के अभाव से कुछ संज्ञात नहीं हो रहा उसपर देस के कुमार्ग गमन का यह धूसर कुछ दर्शा नहीं रहा | 

अस चिंतत घरि पलक न  लागे | सोए न राति भोर रहँ जागे || 
एहि भारत केर सोइ संताना || जासु देस ए भयो जग जाना || 
ऐसा चिंतन कर घडी भर को भी उन्हें निद्रासुख प्राप्त नहीं होता, रात्रि शयन बिना वह भोर होने तक जागृत रहते |  यह भारत की वह संतान थी जिससे यह देश विश्व विख्यात हुवा था |   
     
 पुर्बल गह गह रह ससि साला | बिकसत उद्यम परे अकाला ||
उद्योग बृहत् इत  बिनसत ससि | लखिमिहि निकसावत माया बसि ||
पूर्वकाल में इस देश का गृह गृह शस्यशील हुवा करता था | उद्योगिक विकास होते ही यहाँ जैसे अकाल पड़ गया | इधर वृहत उद्योग धनधान्य को नष्ट करते गए घरों में लक्ष्मी का निष्कासन हो गया और उसका  स्थान माया ने ग्रहण कर लिया | 

राजत दल केँ काल बिहाना | रहिअहिं दलपति प्रथम प्रधाना ||
रहहि जैसेउ तासु बिचारा |  करिअ दल तैसोइ अनुहारा ||
पूर्वकाल में देश के प्रथम प्रधानमंत्री सत्ताधारी दल के दलपति थे | दल भी वैसा विचारों का अनुशरण करता होता चला गया जैसे उनके व्यक्तिगत विचार थे | 

ग्यान मनै न बिग्यान इतिहास न बिदमान | 
दल महुँ अजहुँ सोइ मनै जौ बाका अनुमान | 
अब न ज्ञान का कहा मान्य होता न विज्ञान का इतिहास का कहा मान्य न विद्यमान का, दल को वही मान्य होता जो प्रथम प्रधानमंत्री का अनुमान होता | 

बहुरि रचहिं सब  नेम बिधाना | प्रथम प्रधान केर अनुमाना || 
देस बिचार गयउ बिलोपे | तासु बिचार देइ सिरु थोपे || 
 अब संसद में सभी नियम व् विधान प्रथम प्रधानमंत्री के अनुमानों का ही अनुशरण कर रचे जाते | इस प्रकार इस देश के अपने विचार विलुप्त कर संसद  प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जी के निज  विचारों को जनमानस के शीश पर थोपा देता  | 

बहिअ तासों बहुरि अस धारा   | गहियउ देसज धर्म बिकारा ||
अजहुँ देस सो देस न होई | दसा दुसह दुर दिसा न कोई ||
इस थोपीकरण से विचारों की ऐसी धारा बह चली कि जिससे देश के आचार-विचार, आहार-विहार , भाषाभूषा यहाँ तक की उसके मूलगत निवासियों में भी विकृति आ गई | अब यह देश वह देश नहीं रहा दशा दुर्दशा को प्राप्त होकर दुसह हो गई ऐसी अवस्था में उसे कोई  दिशा सूझ नहीं रही थी  | 

प्राग बिरति करतब बिसरावा | देइ देस पुनि नव नउ नावा ||
पीठि बाहिरि बरग करि भारा | झूठ बदनु दए झूठहि नारा ||
ऐतिहासिक घटनाओं को विस्मृत  देश को ने नए नए नाम देकर उसकी पीठ पर बाह्यवर्ग का बोझ लाद दिया गया  और झूठे मुख से झूठे नारे दिए गए | 

हिन्दू मुसलिम सिख ईसाई |आध बहिर देसिअ समुदाई  ||  
भाइ भाइ कर बंचकताई  | अब लगि लोगन्हि समुझ न आई || 
 जिसमें आधा बहिर्देशीय समुदाय था ऐसे हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई के बंधुत्व का मायाजाल लोगों को विद्यमान समय तक समझ नहीं आया  | 

गहै सिहासन अल्पहि काला  | चलिअ दल तैसेउ परिचाला |
कठ पुतरी बस आपु बिहीन | बिनु नय भए अस दलहि अधीना ||
यत्किं चित समय के लिए ग्राह्य हुई सत्ता का शासन काल अत्यल्प था | दल जैसी चालें चलता प्रधान मंत्री भी वैसे ही परिचालन करते | इसप्रकार वह स्वयं के नियमों व् नियंत्रण से रहित संकेतों पर नृत्य करने वाली किसी कठपुतली के समान दल के अधीन थे  

राज किए सो अति अल्पहि काज किए कुल चार |
लाह लहन दल गै तासु कीर्ति करत अपार ||
प्रधानमंत्री लालबहादुर श्रीवास्तव का कार्यकाल अत्यंत अल्प था उनके द्वारा  किए गए कार्य भी यत्किंचित थे | इस यत्किंचित कार्यों का सत्ता की लाभ लब्धि हेतु उसका  अपार प्रचार करते चले | 

सत्ता सूत गहत निज हाथा | भेंट भईं समास कहुँ साथा || 
घनी भूत गनि महुँ बहुतेरी | जनमानस लए चहुँ दिसि घेरी || 

बँधेउ बहुतक संकट पासा | नेम नीति गत कतहुँ निरासा | 
दल कैं भगतिहि दल पद पूजा | दल ते अबरु उपाए न दूजा || 
कहीं बहुंत से संकट पाश की बंध्यता थी तो यही नियम व् नीतिगत निराशा थी दल की भक्ति दलगत पद की पूजा,  दल से भिन्न कोई दूसरी विचारमूलक युक्ति भी नहीं थी | 

सहत  देसजन भाजन दंसू |गहत  बिषम दुःख तासु बिधंसू | 
गाँव बास निज बसति उजारे | बसिहि अगम बन घन अँधियारे ||  
विभाजन के दंश को सहन किए एवं उसके विध्वंश का भीषण दुःख हृदय में लिए देश का जनमानस अपना गांव अपनी बस्तियां अपने गृह को उजाड़े अंधकारमय दुर्गम वनों में जा बसा था  ||  

जासु धान धन रहँ भरपूरे | सो हलधर सहुँ भए हल दूरे || 
धरनिहि संगत बिछुरे बाछर | भयउ रतन कन कंकन बिनु कर || 
जिससे देश में धन धान्य  परिपूर्ण रहता था उस हलधर से हल दूर हो चुके थे धरती से उसके वत्सल दूर हो गए थे अब उसके हस्त रत्नकणों के कंगनों से रहित हो गए थे | 

धेनु पयस गह बहुतहि रोईं | अहहिं न मम पय पायन कोई || 
देसहु कुदसा तासहुँ घेरीं |  कहँ अब कंजन सुर मनि ढेरी || 
पयस ग्रहण किए धेनु रुदन कर कहती अब मेरा स्नेह रस पाने वाला नहीं है | उसके साथ देश को भी बुरी दशाओं ने घेर लिया था अब उसके लिए भी धनधान्य रूपी स्वर्ण व् चिन्तामणियों की ढेरियां स्वप्न हो गई थीं | || 

जुग जुग लगि बिकसाए के गहे रहे जहँ मूरि | 
तासहुँ जोग लगाए पुनि प्रसरत गए बहु दूरि || 
युगों युगों तक जड़ें ग्रहण किए जहाँ वह फलाफूला उन जड़ों से ही संयोजित रहकर वह  प्रस्तारित हुवा  बहुंत दूर चला आया था | 


बिरवा केरि साखि चहे केतक दूरि पसारि | 
मूरि परि जहँ उपजाई तहँ करि गई पुकारि || 
वृक्ष की शाखा चाहे कितनी ही दूर प्रस्तारित हो जाए वह वहीँ की उत्पत्ति कहलाती है जिस मूल से व्युत्पन्न होकर जहाँ वह वृक्ष में परिणित हुई | 

गहरत अबरु  नगर अँधियारा | अजहुँ चहुँ पुर चरन पैसारा | 
जहँ नय  नेम नीति बिनु राजा | बिपति कै तहँ बसत समाजा || 

सासि स्वारथ नीति जहँ करहिं | बिपद जाल जन काहे न परहिं | 
करषि करम परि धरे अधारा | रह देस जौ जगत भरतारा  ||  

भुईँ भुईं अति उर्बरु जहँ की | दरसै न ससि जन दीठि तहँकी || 
हल बिनु हलधर कर बिनु काजा |  अजहुँ भए तहँ रतन सम नाजा | 


ज्यावत जिन्ह   | सो जन भोजन तेउ तरसाए  | 
उलट बरेली बांस अनायो  |  बहिरि देस तब मोल मँगायो   |  

रूसेउ हल तैं जब खलिहाना || हारि गहे रन भट बलबाना ||

जय जुवान जय जय करिसाना | कहिअ उछाहत देस प्रधाना ||


कीन्हे बैरि बैर अतीवा भय गहि सीवाँ 







----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...