रविवार, 10 मार्च 2019

--- ॥ दोहा-दशम ३५९॥ -----

छाज चकरबरति सी गह छतरधारि सी धाज |
प्रजा तंत्र माहि मंत्री भयो राजाधिराज || ३५९१ || 
भावार्थ : - चक्रवर्ती राजाओं जैसी साजसज्जा व् छत्रधारियों जैसी चमक-दमक ग्रहण किए प्रजातंत्र में अब मंत्री राजाधिराज हो चले थे |

मान राजा आपनु पुनि पहिर पंचु परिधान | 
अवनि न आवत उड़ि फिरे बैसे बहुरि बिमान || ३५९२ || 
भावार्थ : - तदनन्तर स्वयं को राजा मानकर ये पंचपरिधान धारण किए विमान में विराजित होकर गगन में उड़ते फिरते चुनाव के समय चलने वाले इनके त्राणहीन चरण अब धरती पर ही नहीं पड़ते ||

जनजन केरि करनिधि के आपहु भयो निधान | 
भाषन माहि निपजायउ अजहुँ असन धन धान || ३५९३  || 
भावार्थ : - जन जन की कर निधि के ये स्वयं ही निधान बन बैठे अब भोजन, वस्त्र, धन, धान खेत में उत्पन्न न होकर इनके भाषणों में उत्पन्न होने लगे |

भागबिधाता देस के बहुरि आपुनो जान | 
नेम बिहुने औरन हुँत रचेउ नेम बिधान || ३५९४ || 
भावार्थ : - स्वयं को देश का भाग्यविधाता संज्ञान करते हुवे नियम व् मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले अब औरों के लिए नियम व् मर्यादाएं निर्मित करने लगे |

पाए सिन्हासन पुनि पुनि भरेउ अस मद मान | 
बुद्धि संगत बिनसायो बिबेक सोंहि  ग्यान || ३५९५ || 
भावार्थ : - वारंवार सिंहासन प्राप्त होने पर शासनकर्ता मद व् अभिमान से भर गए इस अभिमान ने सत्ताधारी की बुद्धि के साथ उसके ज्ञान व् विवेक को भी विनष्ट कर दिया |

कवन रिपु को सौ हरिदय अपुना कवन बिरान | 
भरम भरे मन मानसा तासु रहे नहि भान || ३५९६ || 
भावार्थ : - कौन शत्रु है कौन मित्र है कौन अपना कौन पराया है भ्रम के वशीभूत मनोमस्तिष्क को इसका ज्ञान न हुवा |

जो अहिती कहि जोग नहि कहे तासु निज भाइ | 
निज हिती हुँते देस कहुँ करत गयउ अहिताइ || ३५९७ || 
भावार्थ : - जो शत्रु कहने के भी योग्य नहीं थे उन चीनियों को भाई कहा | अपने हितैषियों के हित के लिए ये शासनकर्ता देश का अहित करते चले गए |

नगर अँधेरा छाए जब  चौपट रहे दुआर | 
पहरारु जब सोए रहे जगे रहे संसार || ३५९८ ||
भावार्थ : - नियम व् नीतियों के अभाव में जब देश के द्वार चौपट हो चुके थे जब प्रहरी गहरी निद्रा में थे किन्तु संसार जागृत था |

धर्म बिरोधि भुआलु जब फिरतब गालु बजाइ | 
मतिहीन तिन्ह जानि तब पडोसि किअउ चढ़ाइ || ३५९९ || 
भावार्थ : - धर्म विरोधी होकर शासक जब विश्व में आत्मश्लाघा करते फिर रहे थे तब उसे बुद्धिहीन संज्ञानकर प्रतिवेशी ने देश पर आक्रमण कर दिया |

कोपत आनि सैन चतुरंगा | साज संग्रामु समाजु संगा  ||
रहँ सीउँ अस तासु रनरंगा | फुकरेउ जिमि सरोष भुजंगा ||
समस्त संग्राम सामग्रियों से सजी शत्रु की चतुरंगिणी सेना कोप करते हुवे सम्मुख आ डटी | सीमारेखा पर उसके उत्साह का प्रदर्शन ऐसा था मानो रोष से भरे सर्प फुफकार रहे हों | 

बहोरि दुहु पुर तैं बरबंडा | गहि प्रलयंकर अगन प्रचंडा ||
छाडत चलि गै गोला गोली | धसे भूधर धरनिहि डोली ||
फिर तो दोनों पालियों के वीर प्रलयंकारी अग्नि ग्रहण किए हुवे गोले और गोलियां छोड़ते चले गए इस घमासान से धरती डोल  उठी लगी और भूधर राज हिमालय धंसने लगा | 

रिपुहु अपरबल बल अस भयऊ | बार बिफल सब होतब गयऊ ||
करत बीर पुनि हाहाकारा | कीन्हिसि त्राहि त्राहि पुकारा ||
शत्रु के प्रचंड बल ऐसा था  देश की सेना के सभी प्रहार विफल होते चले गए तदनन्तर शूरवीर हाहाकार करते हुवे रक्षा की पुकार करने लगे | 

लह अधुनातन आजुध नाना | बरत बिधा बहुतेर बिधाना ||
बुद्धि ग्यान बिबेक बिहीना  | बली होतब भयउ बलहीना ||
नाना आधुनिक अस्त्र-शास्त्रों से युक्त होकर उनके संचालन की विधाओं का विभिन्न प्रकार से उपयोग करते हुवे वह शूरवीर बली होते हुवे भी बुद्धि ज्ञान विवेक की हीनता के कारण बलहीन सिद्ध हुवे | 

भोगत राजु भरे रहे सासनहर मन भरम | 
भई पराजय रिपु तईं भेद गयो पुनि मरम || ३६०० || 
सत्ता का उपभोग करते सत्ताधारी का मन  भ्रमों से परिपूरित था  ( पडोसी तो हमारे भोलेभाले भाई हैं वह युद्ध नहीं करेंगे ) और फिर यह रहस्य उद्घाटित हुवा कि देश की सेना शत्रु के हाथों परास्त हो गई | 



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