शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५७ ॥ -----


अपनी सुलटी जान के भरे दम्भ अभिमान |
सत्तारूढ़ि दल रहैं तब भबितब ते अनजान || ३५७१ ||
भावार्थ : - अपने विचारों को ही  राष्ट्र के अनुकूल मानने वाले दम्भ और अहंकार से परिपूर्ण तात्कालिक सत्ताधारी तब भविष्य से अनभिज्ञ थे  |

लोकतंत्र के अर्थ ए जनजन करे चुनाउ |
सासनकारज हेतु मन जाके सेवा भाउ  || ३५७२ ||
भावार्थ : - भारतीय लोकतंत्र का यह अर्थ था कि देश का जनमानस शासनसंचालन हेतु उसका चुनाव करे जिसके मन में देश सेवा का भाव हो |

खेवट खेवा में रहे सेवा गइँ बिसराइ |
खेवाई कर देइ पुनि पथिक चलें बोहाइ || ३५७३ ||
भावार्थ : - किन्तु राष्ट्र रूपी जलयान का संचालन करने वाले सेवा को विस्मृत कर स्वार्थ पूर्ति में संलग्न हो गए और भारत का जनमानस करसिद्धि भी देकर बहता चला गया (मूर्ख बना रहा )|

काटि कूट कुठार सरिस  देस धर्म संजात  |
तिनके कुण्ठ बिचार अस  चले मूरि बिनसात || ३५७४ ||
भावार्थ : - उनके कुण्ठ विचार कुल्हाड़ी के समान  देश में व्युत्पन धर्म और उसके जातकों को उनकी मौलिकता से पृथक करते हुवे उन्हें समूल नष्ट करते चले गए |

मुख मण्डल परि आभ दिए बरनत कुटिल सुभाउ | 
जनजन के मन मानसा छाड़त गयउ प्रभाउ || ३५७५ || 
भावार्थ : - कुटिल स्वभाव वरणकर मुख पर एक विशेष आभामंडल लिए ये सत्ताधारी जनमानस के मनोमष्तिष्क को प्रभावित करते चले |

जन जन के धन कोष कहुँ चरन चरन कृत सोष | 
बाहिर जग जगरात गए गोपत अंतर दोष || ३५७६ || 
 भावार्थ : - जनमानस के  परिश्रम से अर्जित कर कोष के चरण-चरण पर शोषण द्वारा बाह्य जगत उज्ज्वलित करते हुवे यह अपने अव्यवस्थित अंतर्जगत के दोषों को गोपित करते चले |

चकाचौंध निज संग लिए जब जन जन समुहाए | 
प्रगसेउ भगवन सबु अस पर्सन होड़ मचाए  ||३५७७ ||
भावार्थ : - अपने इस बाह्यजगत की चकाचौंध के साथ जब यह जनमानस के सम्मुख होते तब उनमें उन्हें स्पर्श करने की ऐसी प्रतिस्पर्धा होती जैसे नगर में साक्षात भगवान प्रकट हुवे हैं उनके स्पर्श मात्र से वह समस्यामुक्त हो जाएंगे ||

मुख मंडल दीपितमई कर कौसल ते हीन | 
दर्पन दमकत दरस जस पाछे दरस मलीन || ३५७८ || 
 भावार्थ : - जैसे दर्पण का सम्मुख दैदीप्यमान दर्शित होता है किन्तु उसके पृष्ठ में मलीनता दर्शित होती है उसी प्रकार यह संविधान निर्माता सत्तासीन भी सम्मुख तो दीप्तिमय दर्प से युक्त थे किन्तु उनका पार्श्व नीति व् नियमों की कार्यकुशलता से विहीन था |

कर्म मर्यादा सँग रहे रहे धरम मैं नीठ | 
ता दोष तिन्ह दरस्यो जाकी ग्यान दीठ || ३५७९ || 
भावार्थ : -  अपनी जाति की मर्यादा का पालन करने वाले जिन धर्मनिष्ठों के पास ज्ञानदृष्टि थी उन्हें दर्पण रूपी यह दोष दृष्टिगत हो जाता |

सासन बकुला होइ के चला मराली चाल | 
सुरसा मुख सी होइ चलि जन समास बिकराल ||३५८० || 
भावार्थ : - राम की बगुला भक्ति से प्राप्त सत्ताधारियों का शासन हंस की चाल चला  किन्तु इसकी चालचलनि से जनसमस्याएं सुरसा के मुख सी विकराल होती चली गईं |


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