पथिकहु अन्धानुहारत भयउ नैन ते हीन |
ताहि संगत लेइ चले जिनके रहे अधीन || ३५६१ ||
भावार्थ : - यात्री भी नेत्रविहीन होकर उक्त विचारधारा का अंधानुकरण करने लगे और भारभूत होते हुवे समुद्र के उन लुटेरों को अपना साथ ले चले जिन्होंने इस जलयान को अपने अधीन किया था |
जहाँ अल्पतम आपने पराए बहु अधिकाए |
ताहि बहुमत पाए तहाँ हथ बाँसन बँसनाए || ३५६२ ||
भावार्थ : - लोकतंत्र का दोष यह है कि जब किसी राष्ट्र में उसके मूलभूत की संख्या अल्पतम हो जाए और बहिर्देशियों की संख्या बहुलता को प्राप्त हो जाए तब ऐसे बाहुल्य के बहुमत से उक्त रष्ट्र की सम्प्रभुता पर बहिर्देशियों का अधिकार स्थापित हो जाता है |
उदाहरण के लिए : - जम्मू व् कश्मीर
टिप्पणी : - संविधान के द्वारा शासन का अधिकार मूलभूत को प्रदान कर ऐसे दोष का निवारण किया जा सकता है |
सासन के अधिकार गह दुहरावत इतिहास |
मूलभूत पुनि दासकृत निज निवास निर्बास || ३५६३ ||
भावार्थ : -शासन का अधिकार से संपन्न ये इतिहास को दोहराते हुवे (भविष्य में) इस राष्ट्र के मूलभूत को उनके अपने निवास से निष्कासित कर दास वृत्ति को विवश करेंगे |
एक धर्मि संग मिलत तब करतब एकै कगार |
एक जान करि मिलहेंगे अधार संग अधार || ३५६४ ||
भावार्थ : - तदनन्तर इस राष्ट्र रूपी जलयान के आधार से आधार मिलाते वह बहिर्देशी एकधर्मी समुदाय सम्मिलित होकर अपनी सीमाओं का एकीकरण कर लेंगें |
दास रूप अनुपालिते वाके नेम बिधान |
सो देस अस बूड़तेसि बूड़त जस जलजान || ३५६५ ||
भावार्थ : - दास रूप में फिर उन बहिर्देशियों के संविधान का अनुपालन करते हुवे यह राष्ट्र ऐसे अवगाहित हो जाएगा जैसे कोई जलयान अवगाहित होता है |
अधुनै देस को चाहिए सो संबिधिक सुधार |
मूलभूत कर देइ जो शासन के अधिकार || ३५६६ ||
भावार्थ : - विद्यमान भारत को ऐसे संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता है जो मूलभूत निवासियों को ही शासन का अधिकार प्रदान करे |
बिचार धार होतब तब देस बाद प्रतिकूल |
बहिर बरग बहुलाए सो करत अलपतम मूल || ३५६७ ||
भावार्थ : - शासनतंत्र की विचारधारा राष्ट्रवाद के प्रतिकूल होती है जब वह बाह्यवर्ग को बहुलतम कर मूलभूत समुदाय को अल्पतम कर देती है |
करनधार बिनु देस तब होतब राम भरोस |
बहिर बरग के बहुल ते गह बहुमत कहुं दोष || ३५६८ ||
भावार्थ : - नियम व् नीतियों से रहित लोकतांत्रिक राष्ट्र तब रामभरोसे होता है जब वह बहुलित बहिर्देशीय समुदाय के बहुमत का दोष ग्रहण करता है |
सींव संग बिरोधि होत जब बिचार करि धार |
मूलभूत बिनसाए सो बिंधत जान अधार | ३५६९ ||
भावार्थ : - शासनतंत्र की विचारधारा जब सीमावाद के विरुद्ध होती हैं राष्ट्र रूपी जलयान के आधार को छिद्रित कर उसके मूलभूत को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है |
देसबाद नुकूल होत जौ बिचार करि धार |
चरत अबिरत करतब पक्खर जान अधार || ३५७० ||
भावार्थ : - राष्ट्रवाद के अनुकूल विचारधारा से युक्त राष्ट्र रूपी जलयान अपने आधार को सुदृढ़ कर जगत में अविरत प्रचालन करता है |
होत कुसल जब जान करि करनधार करतार |
निज पथिक संग लए चले करतब सबहि कगार || ३५७१ ||
भावार्थ : - यदि नीति-नियम निर्धारित करने वाला कुशल हो तब राष्ट्र विरोधी शक्तियों को एक किनारे लगाकर वह राष्ट्र रूपी जलयान अपने मूलभूत पथिकों के साथ सतत रूप में संचालित रहता है |
ताहि संगत लेइ चले जिनके रहे अधीन || ३५६१ ||
भावार्थ : - यात्री भी नेत्रविहीन होकर उक्त विचारधारा का अंधानुकरण करने लगे और भारभूत होते हुवे समुद्र के उन लुटेरों को अपना साथ ले चले जिन्होंने इस जलयान को अपने अधीन किया था |
जहाँ अल्पतम आपने पराए बहु अधिकाए |
ताहि बहुमत पाए तहाँ हथ बाँसन बँसनाए || ३५६२ ||
भावार्थ : - लोकतंत्र का दोष यह है कि जब किसी राष्ट्र में उसके मूलभूत की संख्या अल्पतम हो जाए और बहिर्देशियों की संख्या बहुलता को प्राप्त हो जाए तब ऐसे बाहुल्य के बहुमत से उक्त रष्ट्र की सम्प्रभुता पर बहिर्देशियों का अधिकार स्थापित हो जाता है |
उदाहरण के लिए : - जम्मू व् कश्मीर
टिप्पणी : - संविधान के द्वारा शासन का अधिकार मूलभूत को प्रदान कर ऐसे दोष का निवारण किया जा सकता है |
सासन के अधिकार गह दुहरावत इतिहास |
मूलभूत पुनि दासकृत निज निवास निर्बास || ३५६३ ||
भावार्थ : -शासन का अधिकार से संपन्न ये इतिहास को दोहराते हुवे (भविष्य में) इस राष्ट्र के मूलभूत को उनके अपने निवास से निष्कासित कर दास वृत्ति को विवश करेंगे |
एक धर्मि संग मिलत तब करतब एकै कगार |
एक जान करि मिलहेंगे अधार संग अधार || ३५६४ ||
भावार्थ : - तदनन्तर इस राष्ट्र रूपी जलयान के आधार से आधार मिलाते वह बहिर्देशी एकधर्मी समुदाय सम्मिलित होकर अपनी सीमाओं का एकीकरण कर लेंगें |
दास रूप अनुपालिते वाके नेम बिधान |
सो देस अस बूड़तेसि बूड़त जस जलजान || ३५६५ ||
भावार्थ : - दास रूप में फिर उन बहिर्देशियों के संविधान का अनुपालन करते हुवे यह राष्ट्र ऐसे अवगाहित हो जाएगा जैसे कोई जलयान अवगाहित होता है |
अधुनै देस को चाहिए सो संबिधिक सुधार |
मूलभूत कर देइ जो शासन के अधिकार || ३५६६ ||
भावार्थ : - विद्यमान भारत को ऐसे संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता है जो मूलभूत निवासियों को ही शासन का अधिकार प्रदान करे |
बिचार धार होतब तब देस बाद प्रतिकूल |
बहिर बरग बहुलाए सो करत अलपतम मूल || ३५६७ ||
भावार्थ : - शासनतंत्र की विचारधारा राष्ट्रवाद के प्रतिकूल होती है जब वह बाह्यवर्ग को बहुलतम कर मूलभूत समुदाय को अल्पतम कर देती है |
करनधार बिनु देस तब होतब राम भरोस |
बहिर बरग के बहुल ते गह बहुमत कहुं दोष || ३५६८ ||
भावार्थ : - नियम व् नीतियों से रहित लोकतांत्रिक राष्ट्र तब रामभरोसे होता है जब वह बहुलित बहिर्देशीय समुदाय के बहुमत का दोष ग्रहण करता है |
सींव संग बिरोधि होत जब बिचार करि धार |
मूलभूत बिनसाए सो बिंधत जान अधार | ३५६९ ||
भावार्थ : - शासनतंत्र की विचारधारा जब सीमावाद के विरुद्ध होती हैं राष्ट्र रूपी जलयान के आधार को छिद्रित कर उसके मूलभूत को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है |
देसबाद नुकूल होत जौ बिचार करि धार |
चरत अबिरत करतब पक्खर जान अधार || ३५७० ||
भावार्थ : - राष्ट्रवाद के अनुकूल विचारधारा से युक्त राष्ट्र रूपी जलयान अपने आधार को सुदृढ़ कर जगत में अविरत प्रचालन करता है |
होत कुसल जब जान करि करनधार करतार |
निज पथिक संग लए चले करतब सबहि कगार || ३५७१ ||
भावार्थ : - यदि नीति-नियम निर्धारित करने वाला कुशल हो तब राष्ट्र विरोधी शक्तियों को एक किनारे लगाकर वह राष्ट्र रूपी जलयान अपने मूलभूत पथिकों के साथ सतत रूप में संचालित रहता है |
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