देस जौ बिटप रूप है मौली वाके मूर |
साख तासु समुदाय है अरु सम्पद फल फूर || ३५५१ ||
भावार्थ : - कोई राष्ट्र यदि वृक्ष स्वरूप है उसके मूल निवासी ही उसके मूल हैं राष्ट्र में प्रादुर्भूत समुदाय ही उसकी शाखा-प्रशाखाएं हैं फल फूल उसकी सम्पदा है |
मूरि ते फलीभूत भए गह धन सम्पद कोष |
बिटप सुखाए आपुना पराए को परिपोष || ३५५२ ||
भावार्थ : - मूल निवासियों से फलीभूत राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा का अधिग्रहण कर फिर उससे अपने वृक्ष को शुष्क कर पराई सम्प्रदायों का परिपोषण किया जाने लगा |
सिंहासन बिराजित भए बिहुरत जोइ बिदेसि |
अजहुँ बिरोधि भाव संग बैरन लगे सुदेसि || ३५५३ ||
भावार्थ : - विदेशी का बहिष्कार स्वदेशी अपनाने के आह्वान से सत्ता को प्राप्त हुवे शासको अब विरोधी भाव लिए स्वदेशी में दोष दर्शाने लगे |
निज भाषा निज संस्कृति निज भूषा निज भेष |
अबरहि बर मानत तासु भए हितकारि बिसेष || ३५५४ ||
भावार्थ : - अपनी भेष भूषा अपनी भाषा अपनी संस्कृति से भिन्न देशों की भाषा व् संस्कृति को श्रेष्ठ व् सर्वोपरि मानकर वह उनके विशेष हितकारी हो चले |
समुझत कोबिद आपुनो पढ़िकेँ पढ़नि पराइ |
सत्ताधारी किन्हेसि सोइ जोइ मन आइ || ३५५५ ||
भावार्थ : - विदेशी शैक्षणिक संस्थानों से शिक्षित सत्ताधारी स्वयं को महा विद्वान संज्ञानकर अपनी इच्छानुसार कार्य करने लगे |
जो प्रतिकूल बात कहे ताको संग बिबाद |
अधिनायक तंत्र सहुँ अस निपजे सत्तावाद || ३५५६ ||
भावार्थ : - जो इस स्वेच्छाचारिता के प्रतिकूल वचन कहता वह विवादित हो जाता इस प्रकार अधिनायकतंत्र के साथ सत्तावाद प्रादुर्भूत हुवा |
नीतिनेम बिनु देस बिनु करनधार जलजान |
अपुना जहाँ न आपुना राजएँ तहाँ बिरान || ३५५७ ||
भावार्थ : - नीति नियम से रहित राष्ट्र कर्णधार से रहित जलयान के समान होता है | जहाँ स्वत्व पर अपना अधिकार नहीं होता वहां उस पोत के पति पराए हो जाते हैं |
पथिक पटतर देसज जन जगत पयोधि अपार |
काज पाल रौता बात बहतीं धार बिचार || ३५५८ ||
भावार्थ : -मूलभूत संतान ही उस राष्ट्ररूपी जलयान के यात्री होते हैं शासन पाल और शासनव्यवस्था वायु स्वरूप व् उसकी विचारधारा ही धाराओं के सदृश्य होती हैं |
देसबाद बिरोधजनक पुनि बिचार की धार |
चढ़त जगत बोहत ताहि बूड़त पाए न पार || ३५५९ ||
भावार्थ : - जब विचारों की ये धाराएं राष्ट्रवाद अथवा सीमावाद हेतु विरोध व्युत्पन्न करने वाली होती हैं तब वह तट रूपी सीमाओं की पहुँच से विहीन हो जाता है जिससे विश्वभर के यात्री उसपर आरूढ़ हो जाते हैं और फिर असहनीय भार उस जलयान को डूबो देता है |
अजहुँ रजत रौताइ के भए ऐसोइ बिचार |
समय बिरतत पातु चले बोहत भार अपार ||३५६० ||
भावार्थ : - इस समय तात्कालिक सत्तारूढ़ शासकवर्ग की विचारधारा भी ऐसी ही थी, इन विचारों के परिणाम स्वरूप कालान्तर में भारत रूपी जलयान असहनीय भार लेकर चला |
साख तासु समुदाय है अरु सम्पद फल फूर || ३५५१ ||
भावार्थ : - कोई राष्ट्र यदि वृक्ष स्वरूप है उसके मूल निवासी ही उसके मूल हैं राष्ट्र में प्रादुर्भूत समुदाय ही उसकी शाखा-प्रशाखाएं हैं फल फूल उसकी सम्पदा है |
मूरि ते फलीभूत भए गह धन सम्पद कोष |
बिटप सुखाए आपुना पराए को परिपोष || ३५५२ ||
भावार्थ : - मूल निवासियों से फलीभूत राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा का अधिग्रहण कर फिर उससे अपने वृक्ष को शुष्क कर पराई सम्प्रदायों का परिपोषण किया जाने लगा |
सिंहासन बिराजित भए बिहुरत जोइ बिदेसि |
अजहुँ बिरोधि भाव संग बैरन लगे सुदेसि || ३५५३ ||
भावार्थ : - विदेशी का बहिष्कार स्वदेशी अपनाने के आह्वान से सत्ता को प्राप्त हुवे शासको अब विरोधी भाव लिए स्वदेशी में दोष दर्शाने लगे |
निज भाषा निज संस्कृति निज भूषा निज भेष |
अबरहि बर मानत तासु भए हितकारि बिसेष || ३५५४ ||
भावार्थ : - अपनी भेष भूषा अपनी भाषा अपनी संस्कृति से भिन्न देशों की भाषा व् संस्कृति को श्रेष्ठ व् सर्वोपरि मानकर वह उनके विशेष हितकारी हो चले |
समुझत कोबिद आपुनो पढ़िकेँ पढ़नि पराइ |
सत्ताधारी किन्हेसि सोइ जोइ मन आइ || ३५५५ ||
भावार्थ : - विदेशी शैक्षणिक संस्थानों से शिक्षित सत्ताधारी स्वयं को महा विद्वान संज्ञानकर अपनी इच्छानुसार कार्य करने लगे |
जो प्रतिकूल बात कहे ताको संग बिबाद |
अधिनायक तंत्र सहुँ अस निपजे सत्तावाद || ३५५६ ||
भावार्थ : - जो इस स्वेच्छाचारिता के प्रतिकूल वचन कहता वह विवादित हो जाता इस प्रकार अधिनायकतंत्र के साथ सत्तावाद प्रादुर्भूत हुवा |
नीतिनेम बिनु देस बिनु करनधार जलजान |
अपुना जहाँ न आपुना राजएँ तहाँ बिरान || ३५५७ ||
भावार्थ : - नीति नियम से रहित राष्ट्र कर्णधार से रहित जलयान के समान होता है | जहाँ स्वत्व पर अपना अधिकार नहीं होता वहां उस पोत के पति पराए हो जाते हैं |
पथिक पटतर देसज जन जगत पयोधि अपार |
काज पाल रौता बात बहतीं धार बिचार || ३५५८ ||
भावार्थ : -मूलभूत संतान ही उस राष्ट्ररूपी जलयान के यात्री होते हैं शासन पाल और शासनव्यवस्था वायु स्वरूप व् उसकी विचारधारा ही धाराओं के सदृश्य होती हैं |
देसबाद बिरोधजनक पुनि बिचार की धार |
चढ़त जगत बोहत ताहि बूड़त पाए न पार || ३५५९ ||
भावार्थ : - जब विचारों की ये धाराएं राष्ट्रवाद अथवा सीमावाद हेतु विरोध व्युत्पन्न करने वाली होती हैं तब वह तट रूपी सीमाओं की पहुँच से विहीन हो जाता है जिससे विश्वभर के यात्री उसपर आरूढ़ हो जाते हैं और फिर असहनीय भार उस जलयान को डूबो देता है |
अजहुँ रजत रौताइ के भए ऐसोइ बिचार |
समय बिरतत पातु चले बोहत भार अपार ||३५६० ||
भावार्थ : - इस समय तात्कालिक सत्तारूढ़ शासकवर्ग की विचारधारा भी ऐसी ही थी, इन विचारों के परिणाम स्वरूप कालान्तर में भारत रूपी जलयान असहनीय भार लेकर चला |
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