रविवार, 10 फ़रवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५ ८ ॥ -----,

जुगलगि लमनिहि दासिता कर्यो दीन मलीन से | 
काज बिहुने जनजन पुनि होतब गै अरु दीन से || ३५ ८१ || 
भावार्थ : - सहस्त्र वर्षों तक की लम्बी दासता ने भारत के जनमानस को अभावग्रस्त कर दरिद्र कर दिया था विभाजित देश में जीविकाविहीन होकर वह और अधिक दरिद्र होता चला गया |

गहे देस अस दुरदिबस दिसा दरसि नहि कोइ | 
रहिअउ सोई दुर्दसा रहिअ दासिता सोइ || ३५ ८२ || 
भावार्थ : - देश में ऐसी अन्धेरा व्याप्त था कि उसे कोई दिशा ही दर्शित नहीं हुई दिशाहीन देश की दशा फिर वहीँ रही और दासता भी वही रही |

उद्या न को नेम नभस न दिसा न कतहुँ प्रकास | 
देस भुईँ बँटि गइ रु जन रहउ दास के दास || ३५८३ || 
भावार्थ : - न नियमों का ही सूर्योदय हुवा न कहीं प्रकाश होता दर्शित नहीं हुवा, देश की भूमि भी विभक्त हो गई और जनमानस दास का दास बना रहा |

अंधड़ भई दारिद की सुरसा मुखी समास | 
चरन चरन जलजान दए बूड़न केर अभास || ३५ ८४ ||
भावार्थ : - दरिद्रता की सुरसाके मुख सी यह विकराल समस्या राष्ट्र रूपी जलयान हेतु अंधड़ सिद्ध हुई जो चरण-चरण पर राष्ट्र रूपी जलयान को डूबने का आभास कराती |

दुरदरस दर्पन पाछे सत्ता दियो अँधेरि | 
ता अंधड़ आनि बहोरि पग पग लेईं अबघेरि || ३५ ८५ || 
भावार्थ : - चकाचौंध उत्पन्न करने वाली सत्ता रूपी दर्पण की मलिनता ने देश के साथ छल किया  उसपर यह दरिद्र की विकराल समस्या उसे चरण चरण पर घेरने लगी |

घात देस बिस्बास |
साँस साँस उछ्बास दिए भए सब आस निरास ||

सत्तासीत स्वारथी मारएँ ऐसो मंत्र | 
जनमानस रहेउ नहीं कहाँ जोग परतंत्र || ३५ ८६ || 
भावार्थ : - स्वार्थी सत्ताधारीयों ने ऐसा मंत्र फूंका कि जनसामान्य देश परतंत्र है यह कहने योग्य भी नहीं रहा  |

जबु आगत चुनाउ चरे चरनी पहन बिहीन  |
आपु दीनानाथ करे जन नाथन कहु दीन || ३५ ८७ -क || 

रहनी पहनी बिलगु किए कहनी करनी हीन | 
चढ़न सिहासन चरफरे अस बिनु जल जस मीन || ३५ ८७-ख || 
 भावार्थ : - देस में आमचुनाव के आते गए यह सत्ताधारी चलनी को त्राणहीन करते हुवे स्वयं को दीनबंधु प्रदर्शित करते दीनबन्धुओं को दारिद्र करते गए चुनाव के समय इनकी पहनी इनकी रहनी से विलग होती और  कथनी को करनी से रहित कर ये सिंहासन प्राप्त करने हेतु जल बिन मीन के जैसे तड़पने लगते |

चरपरनिहि बत कहत फिरे कृत नित नउ षड़यंत्र | 
राजा गए रानि गइ है अब तो परजातन्त्र || ३५ ८८ || अज्ञात || 
भावार्थ : - चिकनीचुपड़ी बातें कर नित नव षड़यंत्र करते हुवे वह कहते फिरते ''राजा गए रानी गई अब तो  प्रजातंत्र है'' |

माँगत मत अति बिनइबत घर घर चरबाँक | 
गेह दुआरिहि पट दिए त कहे झरोखे झाँक || ३५ ८९ || 
भावार्थ : - अत्यंत विनयानवत होकर वह घर घर में चतुराई पूर्वक मतों की मांग करते | जिसके घर की दुआरी पटाच्छादित होती तो वह झरोखों से झांकर कहते ''प्रजातंत्र है'' |

कर जोरि सिरुनत परत रे जन जन के पाउ | 
देइ गारी हनत चपत चढ़त चुनाबी नाउ || ३५९० || 
भावार्थ : - पहले ये हथजोड़े सिरोनत किए मत हेतु जन जन के चरण स्पर्श करते | चुनाव की नाव में चढ़ते ही अपशब्दों का प्रयोग करते हुवे उसके गालों पर थप्पड़ मारकर चल पड़ते ||


शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५७ ॥ -----


अपनी सुलटी जान के भरे दम्भ अभिमान |
सत्तारूढ़ि दल रहैं तब भबितब ते अनजान || ३५७१ ||
भावार्थ : - अपने विचारों को ही  राष्ट्र के अनुकूल मानने वाले दम्भ और अहंकार से परिपूर्ण तात्कालिक सत्ताधारी तब भविष्य से अनभिज्ञ थे  |

लोकतंत्र के अर्थ ए जनजन करे चुनाउ |
सासनकारज हेतु मन जाके सेवा भाउ  || ३५७२ ||
भावार्थ : - भारतीय लोकतंत्र का यह अर्थ था कि देश का जनमानस शासनसंचालन हेतु उसका चुनाव करे जिसके मन में देश सेवा का भाव हो |

खेवट खेवा में रहे सेवा गइँ बिसराइ |
खेवाई कर देइ पुनि पथिक चलें बोहाइ || ३५७३ ||
भावार्थ : - किन्तु राष्ट्र रूपी जलयान का संचालन करने वाले सेवा को विस्मृत कर स्वार्थ पूर्ति में संलग्न हो गए और भारत का जनमानस करसिद्धि भी देकर बहता चला गया (मूर्ख बना रहा )|

काटि कूट कुठार सरिस  देस धर्म संजात  |
तिनके कुण्ठ बिचार अस  चले मूरि बिनसात || ३५७४ ||
भावार्थ : - उनके कुण्ठ विचार कुल्हाड़ी के समान  देश में व्युत्पन धर्म और उसके जातकों को उनकी मौलिकता से पृथक करते हुवे उन्हें समूल नष्ट करते चले गए |

मुख मण्डल परि आभ दिए बरनत कुटिल सुभाउ | 
जनजन के मन मानसा छाड़त गयउ प्रभाउ || ३५७५ || 
भावार्थ : - कुटिल स्वभाव वरणकर मुख पर एक विशेष आभामंडल लिए ये सत्ताधारी जनमानस के मनोमष्तिष्क को प्रभावित करते चले |

जन जन के धन कोष कहुँ चरन चरन कृत सोष | 
बाहिर जग जगरात गए गोपत अंतर दोष || ३५७६ || 
 भावार्थ : - जनमानस के  परिश्रम से अर्जित कर कोष के चरण-चरण पर शोषण द्वारा बाह्य जगत उज्ज्वलित करते हुवे यह अपने अव्यवस्थित अंतर्जगत के दोषों को गोपित करते चले |

चकाचौंध निज संग लिए जब जन जन समुहाए | 
प्रगसेउ भगवन सबु अस पर्सन होड़ मचाए  ||३५७७ ||
भावार्थ : - अपने इस बाह्यजगत की चकाचौंध के साथ जब यह जनमानस के सम्मुख होते तब उनमें उन्हें स्पर्श करने की ऐसी प्रतिस्पर्धा होती जैसे नगर में साक्षात भगवान प्रकट हुवे हैं उनके स्पर्श मात्र से वह समस्यामुक्त हो जाएंगे ||

मुख मंडल दीपितमई कर कौसल ते हीन | 
दर्पन दमकत दरस जस पाछे दरस मलीन || ३५७८ || 
 भावार्थ : - जैसे दर्पण का सम्मुख दैदीप्यमान दर्शित होता है किन्तु उसके पृष्ठ में मलीनता दर्शित होती है उसी प्रकार यह संविधान निर्माता सत्तासीन भी सम्मुख तो दीप्तिमय दर्प से युक्त थे किन्तु उनका पार्श्व नीति व् नियमों की कार्यकुशलता से विहीन था |

कर्म मर्यादा सँग रहे रहे धरम मैं नीठ | 
ता दोष तिन्ह दरस्यो जाकी ग्यान दीठ || ३५७९ || 
भावार्थ : -  अपनी जाति की मर्यादा का पालन करने वाले जिन धर्मनिष्ठों के पास ज्ञानदृष्टि थी उन्हें दर्पण रूपी यह दोष दृष्टिगत हो जाता |

सासन बकुला होइ के चला मराली चाल | 
सुरसा मुख सी होइ चलि जन समास बिकराल ||३५८० || 
भावार्थ : - राम की बगुला भक्ति से प्राप्त सत्ताधारियों का शासन हंस की चाल चला  किन्तु इसकी चालचलनि से जनसमस्याएं सुरसा के मुख सी विकराल होती चली गईं |


मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५६ ॥ -----,

पथिकहु अन्धानुहारत भयउ नैन ते हीन | 
ताहि संगत लेइ चले जिनके रहे अधीन || ३५६१ || 
भावार्थ : - यात्री भी नेत्रविहीन होकर उक्त विचारधारा का अंधानुकरण करने लगे और भारभूत होते हुवे समुद्र के उन लुटेरों को अपना साथ ले चले जिन्होंने इस जलयान को अपने अधीन किया था |

जहाँ अल्पतम आपने पराए बहु अधिकाए | 
ताहि बहुमत पाए तहाँ हथ बाँसन बँसनाए || ३५६२ ||  
भावार्थ : - लोकतंत्र का दोष यह है कि जब किसी राष्ट्र में उसके मूलभूत की संख्या अल्पतम हो जाए और बहिर्देशियों की संख्या बहुलता को प्राप्त हो जाए तब ऐसे बाहुल्य के बहुमत से उक्त रष्ट्र की सम्प्रभुता पर बहिर्देशियों का अधिकार स्थापित हो जाता है |

उदाहरण के लिए : - जम्मू व् कश्मीर
टिप्पणी : - संविधान के द्वारा शासन का अधिकार मूलभूत को प्रदान कर ऐसे दोष का निवारण किया जा सकता है |

सासन के अधिकार गह  दुहरावत इतिहास | 
मूलभूत पुनि दासकृत निज निवास निर्बास || ३५६३ || 
भावार्थ : -शासन का अधिकार से संपन्न ये इतिहास को दोहराते हुवे (भविष्य में) इस राष्ट्र के मूलभूत को उनके अपने निवास से निष्कासित कर दास वृत्ति को विवश करेंगे |

एक धर्मि संग मिलत तब करतब एकै कगार | 
एक जान करि मिलहेंगे अधार संग अधार || ३५६४ || 
भावार्थ : - तदनन्तर इस राष्ट्र रूपी जलयान के आधार से आधार मिलाते वह बहिर्देशी एकधर्मी समुदाय सम्मिलित होकर अपनी सीमाओं का एकीकरण कर लेंगें |

दास रूप अनुपालिते वाके नेम बिधान | 
सो देस अस बूड़तेसि बूड़त जस जलजान || ३५६५ || 
भावार्थ : - दास रूप में फिर उन बहिर्देशियों के संविधान का अनुपालन करते हुवे यह राष्ट्र ऐसे अवगाहित हो जाएगा जैसे कोई जलयान अवगाहित होता है |

अधुनै देस को चाहिए सो संबिधिक सुधार | 
मूलभूत कर देइ जो शासन के अधिकार || ३५६६ || 
भावार्थ : - विद्यमान भारत को ऐसे संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता है जो मूलभूत निवासियों को ही शासन का अधिकार प्रदान करे |

बिचार धार होतब तब देस बाद प्रतिकूल | 
बहिर बरग बहुलाए सो करत अलपतम मूल || ३५६७ || 
भावार्थ : - शासनतंत्र की विचारधारा राष्ट्रवाद के प्रतिकूल होती है जब वह बाह्यवर्ग को बहुलतम कर मूलभूत समुदाय को अल्पतम कर देती है |

करनधार बिनु देस तब होतब राम भरोस | 
बहिर बरग के बहुल ते गह बहुमत कहुं दोष || ३५६८ || 
भावार्थ : -  नियम व् नीतियों से रहित लोकतांत्रिक राष्ट्र तब रामभरोसे होता है जब वह बहुलित बहिर्देशीय समुदाय के बहुमत का दोष ग्रहण करता है |

सींव संग बिरोधि होत जब बिचार करि धार | 
 मूलभूत बिनसाए सो बिंधत जान अधार  | ३५६९  || 
भावार्थ : - शासनतंत्र की विचारधारा जब सीमावाद के विरुद्ध होती हैं राष्ट्र रूपी जलयान के आधार को छिद्रित कर उसके मूलभूत को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है |

देसबाद नुकूल होत जौ बिचार करि धार | 
चरत अबिरत करतब पक्खर जान अधार || ३५७० || 
भावार्थ : -  राष्ट्रवाद के अनुकूल विचारधारा से युक्त राष्ट्र रूपी जलयान अपने आधार को सुदृढ़ कर जगत में अविरत प्रचालन करता है |

होत कुसल जब जान करि करनधार करतार | 
निज पथिक संग लए चले करतब सबहि कगार || ३५७१ || 
भावार्थ : -  यदि नीति-नियम निर्धारित करने वाला कुशल हो तब राष्ट्र विरोधी शक्तियों को एक किनारे लगाकर वह राष्ट्र रूपी जलयान अपने मूलभूत पथिकों के साथ सतत रूप में संचालित रहता है |




------ ॥ दोहा-दशम ३५५ ॥ -----,

देस जौ बिटप रूप है मौली वाके मूर | 
साख तासु समुदाय है  अरु सम्पद फल फूर || ३५५१ || 
भावार्थ : - कोई राष्ट्र यदि वृक्ष स्वरूप है उसके मूल निवासी ही उसके मूल हैं राष्ट्र में प्रादुर्भूत समुदाय ही उसकी शाखा-प्रशाखाएं हैं फल फूल उसकी सम्पदा है |

मूरि ते फलीभूत भए गह धन सम्पद कोष | 
बिटप सुखाए आपुना पराए को परिपोष || ३५५२ || 
भावार्थ : - मूल निवासियों से फलीभूत राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा का अधिग्रहण कर फिर उससे अपने वृक्ष को शुष्क कर पराई सम्प्रदायों का परिपोषण किया जाने लगा |

सिंहासन बिराजित भए बिहुरत जोइ बिदेसि | 
अजहुँ बिरोधि भाव संग बैरन लगे सुदेसि || ३५५३ || 
भावार्थ : - विदेशी का बहिष्कार स्वदेशी अपनाने के आह्वान से सत्ता को प्राप्त हुवे शासको अब विरोधी भाव लिए स्वदेशी में दोष दर्शाने लगे |

निज भाषा निज संस्कृति निज भूषा निज भेष  | 
अबरहि बर मानत तासु भए हितकारि बिसेष || ३५५४ || 
भावार्थ : - अपनी भेष भूषा अपनी भाषा अपनी संस्कृति से भिन्न देशों की भाषा  व् संस्कृति को श्रेष्ठ व्  सर्वोपरि मानकर वह उनके विशेष हितकारी हो चले |

समुझत कोबिद आपुनो पढ़िकेँ पढ़नि पराइ | 
सत्ताधारी किन्हेसि सोइ जोइ मन आइ || ३५५५ || 
भावार्थ : - विदेशी शैक्षणिक संस्थानों से शिक्षित सत्ताधारी स्वयं को महा विद्वान संज्ञानकर अपनी इच्छानुसार कार्य करने लगे |

जो प्रतिकूल बात कहे ताको संग बिबाद | 
अधिनायक तंत्र सहुँ अस निपजे सत्तावाद || ३५५६ ||
भावार्थ : - जो इस स्वेच्छाचारिता के प्रतिकूल वचन कहता वह विवादित हो जाता इस प्रकार अधिनायकतंत्र के साथ सत्तावाद प्रादुर्भूत हुवा |

नीतिनेम बिनु देस बिनु करनधार जलजान | 
अपुना जहाँ न आपुना राजएँ तहाँ बिरान || ३५५७ || 
भावार्थ : - नीति नियम से रहित राष्ट्र कर्णधार से रहित जलयान के समान होता है |  जहाँ स्वत्व पर अपना अधिकार नहीं होता वहां उस पोत के पति पराए हो जाते हैं |

पथिक पटतर देसज जन जगत पयोधि अपार | 
काज पाल रौता बात बहतीं धार बिचार || ३५५८ || 
भावार्थ : -मूलभूत संतान ही उस राष्ट्ररूपी जलयान के यात्री होते हैं शासन  पाल और  शासनव्यवस्था वायु स्वरूप व् उसकी विचारधारा ही धाराओं के सदृश्य होती हैं |

देसबाद बिरोधजनक पुनि बिचार की धार | 
चढ़त जगत बोहत ताहि बूड़त पाए न पार  || ३५५९ || 
भावार्थ : - जब विचारों की ये धाराएं राष्ट्रवाद अथवा सीमावाद हेतु विरोध व्युत्पन्न करने वाली होती हैं तब वह तट रूपी सीमाओं की पहुँच से विहीन हो जाता है जिससे विश्वभर के यात्री उसपर आरूढ़ हो जाते हैं और फिर असहनीय भार उस जलयान को डूबो देता है  |

अजहुँ रजत रौताइ के भए ऐसोइ बिचार | 
समय बिरतत पातु चले बोहत भार अपार ||३५६० || 
भावार्थ : -  इस समय तात्कालिक सत्तारूढ़ शासकवर्ग की विचारधारा भी ऐसी ही थी, इन विचारों के परिणाम स्वरूप कालान्तर में भारत रूपी जलयान असहनीय भार लेकर चला |


----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...