जुगलगि लमनिहि दासिता कर्यो दीन मलीन से |
काज बिहुने जनजन पुनि होतब गै अरु दीन से || ३५ ८१ ||
भावार्थ : - सहस्त्र वर्षों तक की लम्बी दासता ने भारत के जनमानस को अभावग्रस्त कर दरिद्र कर दिया था विभाजित देश में जीविकाविहीन होकर वह और अधिक दरिद्र होता चला गया |
गहे देस अस दुरदिबस दिसा दरसि नहि कोइ |
रहिअउ सोई दुर्दसा रहिअ दासिता सोइ || ३५ ८२ ||
भावार्थ : - देश में ऐसी अन्धेरा व्याप्त था कि उसे कोई दिशा ही दर्शित नहीं हुई दिशाहीन देश की दशा फिर वहीँ रही और दासता भी वही रही |
उद्या न को नेम नभस न दिसा न कतहुँ प्रकास |
देस भुईँ बँटि गइ रु जन रहउ दास के दास || ३५८३ ||
भावार्थ : - न नियमों का ही सूर्योदय हुवा न कहीं प्रकाश होता दर्शित नहीं हुवा, देश की भूमि भी विभक्त हो गई और जनमानस दास का दास बना रहा |
अंधड़ भई दारिद की सुरसा मुखी समास |
चरन चरन जलजान दए बूड़न केर अभास || ३५ ८४ ||
भावार्थ : - दरिद्रता की सुरसाके मुख सी यह विकराल समस्या राष्ट्र रूपी जलयान हेतु अंधड़ सिद्ध हुई जो चरण-चरण पर राष्ट्र रूपी जलयान को डूबने का आभास कराती |
दुरदरस दर्पन पाछे सत्ता दियो अँधेरि |
ता अंधड़ आनि बहोरि पग पग लेईं अबघेरि || ३५ ८५ ||
भावार्थ : - चकाचौंध उत्पन्न करने वाली सत्ता रूपी दर्पण की मलिनता ने देश के साथ छल किया उसपर यह दरिद्र की विकराल समस्या उसे चरण चरण पर घेरने लगी |
घात देस बिस्बास |
साँस साँस उछ्बास दिए भए सब आस निरास ||
सत्तासीत स्वारथी मारएँ ऐसो मंत्र |
जनमानस रहेउ नहीं कहाँ जोग परतंत्र || ३५ ८६ ||
भावार्थ : - स्वार्थी सत्ताधारीयों ने ऐसा मंत्र फूंका कि जनसामान्य देश परतंत्र है यह कहने योग्य भी नहीं रहा |
जबु आगत चुनाउ चरे चरनी पहन बिहीन |
आपु दीनानाथ करे जन नाथन कहु दीन || ३५ ८७ -क ||
रहनी पहनी बिलगु किए कहनी करनी हीन |
चढ़न सिहासन चरफरे अस बिनु जल जस मीन || ३५ ८७-ख ||
भावार्थ : - देस में आमचुनाव के आते गए यह सत्ताधारी चलनी को त्राणहीन करते हुवे स्वयं को दीनबंधु प्रदर्शित करते दीनबन्धुओं को दारिद्र करते गए चुनाव के समय इनकी पहनी इनकी रहनी से विलग होती और कथनी को करनी से रहित कर ये सिंहासन प्राप्त करने हेतु जल बिन मीन के जैसे तड़पने लगते |
चरपरनिहि बत कहत फिरे कृत नित नउ षड़यंत्र |
राजा गए रानि गइ है अब तो परजातन्त्र || ३५ ८८ || अज्ञात ||
भावार्थ : - चिकनीचुपड़ी बातें कर नित नव षड़यंत्र करते हुवे वह कहते फिरते ''राजा गए रानी गई अब तो प्रजातंत्र है'' |
माँगत मत अति बिनइबत घर घर चरबाँक |
गेह दुआरिहि पट दिए त कहे झरोखे झाँक || ३५ ८९ ||
भावार्थ : - अत्यंत विनयानवत होकर वह घर घर में चतुराई पूर्वक मतों की मांग करते | जिसके घर की दुआरी पटाच्छादित होती तो वह झरोखों से झांकर कहते ''प्रजातंत्र है'' |
कर जोरि सिरुनत परत रे जन जन के पाउ |
देइ गारी हनत चपत चढ़त चुनाबी नाउ || ३५९० ||
भावार्थ : - पहले ये हथजोड़े सिरोनत किए मत हेतु जन जन के चरण स्पर्श करते | चुनाव की नाव में चढ़ते ही अपशब्दों का प्रयोग करते हुवे उसके गालों पर थप्पड़ मारकर चल पड़ते ||
काज बिहुने जनजन पुनि होतब गै अरु दीन से || ३५ ८१ ||
भावार्थ : - सहस्त्र वर्षों तक की लम्बी दासता ने भारत के जनमानस को अभावग्रस्त कर दरिद्र कर दिया था विभाजित देश में जीविकाविहीन होकर वह और अधिक दरिद्र होता चला गया |
गहे देस अस दुरदिबस दिसा दरसि नहि कोइ |
रहिअउ सोई दुर्दसा रहिअ दासिता सोइ || ३५ ८२ ||
भावार्थ : - देश में ऐसी अन्धेरा व्याप्त था कि उसे कोई दिशा ही दर्शित नहीं हुई दिशाहीन देश की दशा फिर वहीँ रही और दासता भी वही रही |
उद्या न को नेम नभस न दिसा न कतहुँ प्रकास |
देस भुईँ बँटि गइ रु जन रहउ दास के दास || ३५८३ ||
भावार्थ : - न नियमों का ही सूर्योदय हुवा न कहीं प्रकाश होता दर्शित नहीं हुवा, देश की भूमि भी विभक्त हो गई और जनमानस दास का दास बना रहा |
अंधड़ भई दारिद की सुरसा मुखी समास |
चरन चरन जलजान दए बूड़न केर अभास || ३५ ८४ ||
भावार्थ : - दरिद्रता की सुरसाके मुख सी यह विकराल समस्या राष्ट्र रूपी जलयान हेतु अंधड़ सिद्ध हुई जो चरण-चरण पर राष्ट्र रूपी जलयान को डूबने का आभास कराती |
दुरदरस दर्पन पाछे सत्ता दियो अँधेरि |
ता अंधड़ आनि बहोरि पग पग लेईं अबघेरि || ३५ ८५ ||
भावार्थ : - चकाचौंध उत्पन्न करने वाली सत्ता रूपी दर्पण की मलिनता ने देश के साथ छल किया उसपर यह दरिद्र की विकराल समस्या उसे चरण चरण पर घेरने लगी |
घात देस बिस्बास |
साँस साँस उछ्बास दिए भए सब आस निरास ||
सत्तासीत स्वारथी मारएँ ऐसो मंत्र |
जनमानस रहेउ नहीं कहाँ जोग परतंत्र || ३५ ८६ ||
भावार्थ : - स्वार्थी सत्ताधारीयों ने ऐसा मंत्र फूंका कि जनसामान्य देश परतंत्र है यह कहने योग्य भी नहीं रहा |
जबु आगत चुनाउ चरे चरनी पहन बिहीन |
आपु दीनानाथ करे जन नाथन कहु दीन || ३५ ८७ -क ||
रहनी पहनी बिलगु किए कहनी करनी हीन |
चढ़न सिहासन चरफरे अस बिनु जल जस मीन || ३५ ८७-ख ||
भावार्थ : - देस में आमचुनाव के आते गए यह सत्ताधारी चलनी को त्राणहीन करते हुवे स्वयं को दीनबंधु प्रदर्शित करते दीनबन्धुओं को दारिद्र करते गए चुनाव के समय इनकी पहनी इनकी रहनी से विलग होती और कथनी को करनी से रहित कर ये सिंहासन प्राप्त करने हेतु जल बिन मीन के जैसे तड़पने लगते |
चरपरनिहि बत कहत फिरे कृत नित नउ षड़यंत्र |
राजा गए रानि गइ है अब तो परजातन्त्र || ३५ ८८ || अज्ञात ||
भावार्थ : - चिकनीचुपड़ी बातें कर नित नव षड़यंत्र करते हुवे वह कहते फिरते ''राजा गए रानी गई अब तो प्रजातंत्र है'' |
माँगत मत अति बिनइबत घर घर चरबाँक |
गेह दुआरिहि पट दिए त कहे झरोखे झाँक || ३५ ८९ ||
भावार्थ : - अत्यंत विनयानवत होकर वह घर घर में चतुराई पूर्वक मतों की मांग करते | जिसके घर की दुआरी पटाच्छादित होती तो वह झरोखों से झांकर कहते ''प्रजातंत्र है'' |
कर जोरि सिरुनत परत रे जन जन के पाउ |
देइ गारी हनत चपत चढ़त चुनाबी नाउ || ३५९० ||
भावार्थ : - पहले ये हथजोड़े सिरोनत किए मत हेतु जन जन के चरण स्पर्श करते | चुनाव की नाव में चढ़ते ही अपशब्दों का प्रयोग करते हुवे उसके गालों पर थप्पड़ मारकर चल पड़ते ||