संबिधान महँ मेटि जूँ बहिर भीत के भेद |
रेख धरे पुनि नाउ के सीवाँ गई बिभेद || ३५२१ ||
भावार्थ : - संविधान ने ज्योंहि बाह्य व् आंतरिकता में परस्पर भिन्नता का अभाव किया त्योंहि भारत की सीमा रेखा विभेद्य होकर नाममात्र की रह गई |
तादात्मए सहुँ बिभेदि सीँव रेख के संग |
देस भेस परिबेस कइँ गइँ मरियादा भंग || ३५२ २ ||
भावार्थ : - तादात्म्य अर्थात दो भिन्न वस्तु, व्यक्ति अथवा व्यक्तियों का समुदाय के परस्पर अभिन्न होने के भाव द्वारा विभेदित सीमारेखा के साथ इस देश की उसके परिवेश की उसकी वेशभूषा उसकी भाषा उसके आचार-विचार, आहार-विहार की मर्यादाएं भी भंग होती चली गईं |
देस मान मरयाद जौ जुग लग रहैँ अभेद |
संबिधान के लेखि अस छन महुँ गइँ छतछेद || ३५२३ ||
भावार्थ : - युगों तक अभेद्य मर्यादाओं के कारण विश्वभर में जो इस देश की प्रतिष्ठा थी संविधान के निर्मित होते ही क्षत-विक्षत होकर वह क्षणमात्र में ही धूमिल हो गई |
धर्म संस्कृति आपुनी रच्छत अपुनी बान |
देस भूमि हुँत जौ बीर दियउ प्रान बलिदान || ३५२ ४ ||
भावार्थ : - अपनी धर्म -संस्कृति अपनी अस्मिता अपनी देशभूमि के लिए जिन वीरों ने प्राणों का बलिदान दिया था |
देस रिपु अपनाई गए बिसर गयो सो बीर |
सुरते नीलम लाल सों सुरते मोती हीर || ३५२५ ||
भावार्थ : - देश के शोषणकर्ता शत्रु अपनाए गए देश पर बलिदान होने वाले उन शूरवीरों को विस्मृत कर दिया गया | सत्ता में विराजित स्वार्थपरता को स्मरण रहा तो केवल हीरे मोती का रहा, लाल और नीलम का रहा |
देस बिभागा करत पुनि तासु पीठ दे भारु |
बिधि बिधान तैं पोषि गए पुनि हितु सोषन हारु || ३५२६ ||
भावार्थ : - (इस प्रकार )देश का विभाजन कर पुनश्च उन्हें शेष देश की पीठ पर भारभूत करते हुवे स्वहित हेतु दूसरों के हित का शोषण करने वाले देश से भिन्न उक्त दुष्ट समुदाय को संविधान द्वारा पुष्ट किया गया |
देस भाष पुनि भाषते बसत पास प्रतिबेस |
अंतर भीत ब्यापते गह गह करिअ प्रबेस || ३५२६ ||
भावार्थ : - देश की वेशभूषा उसकी भाषा का अपहरण कर अब तक पास पड़ोस में वसवासित वह शोषणकर्ता शनै शनै देश के आतंरिक भागों में भी व्याप्त होते चले गए फिर तो गृह गृह में उनका प्रवेश होने लगा |
निज परिहार पराए की सीखि सिखाई बात |
पाषानु पथ पद दिये कहत गय ए अधुनात || ३५२७ ||
भावार्थ : - अपनी आधुनिक व् उन्नत सामाजिक व्यवस्था का तिरष्कार करके परायों की पाषाणपंथी बातों में आकर सत्ताधारी इस देश के चरण को पाषाणपंथ की ओर बढ़ाते चले गए यह कहते हुवे कि यह आधुनिकता है | क्या धर्म-जाति से विहीन पाषाणयुगी मनुष्य आधुनिक है ?
जो मानस के हंस रहँ याके फेरे फेर |
अधबर तौ तीत्तर भए अध्बर भयो बटेर || ३५२८ ||
भावार्थ : - इनका द्वारा भारतीय समाज का इस भांति परिवर्तन हुवा कि जो मानस के कल हंस थे वह आधे हंस और आधे बगुले भी न होकर आधे तीतर आधे बटेर हो गए | अर्थात इनके सामाजिक परिवर्तन से एक संगठित सामाजिक व्यवस्था विघटित होती चली गई |
जनमानस परि एहि भाँति थापत निजी बिचार |
जनमत संग्रह बिनु कहत सब कहुँ अंगीकार || ९३५२ -क ||
गहत सिँहासन आपहीं रचित गए संबिधान |
ताहि संगत अनजानत भारत की संतान || ३५२९ -ख ||
भावार्थ : - इस प्रकार अपने निजी विचारों को देश पर थोपकर जनमत संग्रह के बिना ही उसे अंगीकार कहते हुवे भारत की मूलभूत संतान को अँधेरे में रखकर स्वयं सत्ताधारी दल द्वारा संविधान निर्मित किया गया |
हम भारत के लोग ते संगत भारत बासि |
अधीनकर्ता देस के कीन्हि देस निबासि || ३५३० ||
भावार्थ : -'' हम भारत के लोग'' इस एक वाक्य से भारत के मूलभूत निवासियों के संगत इस देश के अधीनकर्ता बहिर्देशीय समुदाय को भी देश का निवासी घोषित किया गया ||
रेख धरे पुनि नाउ के सीवाँ गई बिभेद || ३५२१ ||
भावार्थ : - संविधान ने ज्योंहि बाह्य व् आंतरिकता में परस्पर भिन्नता का अभाव किया त्योंहि भारत की सीमा रेखा विभेद्य होकर नाममात्र की रह गई |
तादात्मए सहुँ बिभेदि सीँव रेख के संग |
देस भेस परिबेस कइँ गइँ मरियादा भंग || ३५२ २ ||
भावार्थ : - तादात्म्य अर्थात दो भिन्न वस्तु, व्यक्ति अथवा व्यक्तियों का समुदाय के परस्पर अभिन्न होने के भाव द्वारा विभेदित सीमारेखा के साथ इस देश की उसके परिवेश की उसकी वेशभूषा उसकी भाषा उसके आचार-विचार, आहार-विहार की मर्यादाएं भी भंग होती चली गईं |
देस मान मरयाद जौ जुग लग रहैँ अभेद |
संबिधान के लेखि अस छन महुँ गइँ छतछेद || ३५२३ ||
भावार्थ : - युगों तक अभेद्य मर्यादाओं के कारण विश्वभर में जो इस देश की प्रतिष्ठा थी संविधान के निर्मित होते ही क्षत-विक्षत होकर वह क्षणमात्र में ही धूमिल हो गई |
धर्म संस्कृति आपुनी रच्छत अपुनी बान |
देस भूमि हुँत जौ बीर दियउ प्रान बलिदान || ३५२ ४ ||
भावार्थ : - अपनी धर्म -संस्कृति अपनी अस्मिता अपनी देशभूमि के लिए जिन वीरों ने प्राणों का बलिदान दिया था |
देस रिपु अपनाई गए बिसर गयो सो बीर |
सुरते नीलम लाल सों सुरते मोती हीर || ३५२५ ||
भावार्थ : - देश के शोषणकर्ता शत्रु अपनाए गए देश पर बलिदान होने वाले उन शूरवीरों को विस्मृत कर दिया गया | सत्ता में विराजित स्वार्थपरता को स्मरण रहा तो केवल हीरे मोती का रहा, लाल और नीलम का रहा |
देस बिभागा करत पुनि तासु पीठ दे भारु |
बिधि बिधान तैं पोषि गए पुनि हितु सोषन हारु || ३५२६ ||
भावार्थ : - (इस प्रकार )देश का विभाजन कर पुनश्च उन्हें शेष देश की पीठ पर भारभूत करते हुवे स्वहित हेतु दूसरों के हित का शोषण करने वाले देश से भिन्न उक्त दुष्ट समुदाय को संविधान द्वारा पुष्ट किया गया |
देस भाष पुनि भाषते बसत पास प्रतिबेस |
अंतर भीत ब्यापते गह गह करिअ प्रबेस || ३५२६ ||
भावार्थ : - देश की वेशभूषा उसकी भाषा का अपहरण कर अब तक पास पड़ोस में वसवासित वह शोषणकर्ता शनै शनै देश के आतंरिक भागों में भी व्याप्त होते चले गए फिर तो गृह गृह में उनका प्रवेश होने लगा |
निज परिहार पराए की सीखि सिखाई बात |
पाषानु पथ पद दिये कहत गय ए अधुनात || ३५२७ ||
भावार्थ : - अपनी आधुनिक व् उन्नत सामाजिक व्यवस्था का तिरष्कार करके परायों की पाषाणपंथी बातों में आकर सत्ताधारी इस देश के चरण को पाषाणपंथ की ओर बढ़ाते चले गए यह कहते हुवे कि यह आधुनिकता है | क्या धर्म-जाति से विहीन पाषाणयुगी मनुष्य आधुनिक है ?
जो मानस के हंस रहँ याके फेरे फेर |
अधबर तौ तीत्तर भए अध्बर भयो बटेर || ३५२८ ||
भावार्थ : - इनका द्वारा भारतीय समाज का इस भांति परिवर्तन हुवा कि जो मानस के कल हंस थे वह आधे हंस और आधे बगुले भी न होकर आधे तीतर आधे बटेर हो गए | अर्थात इनके सामाजिक परिवर्तन से एक संगठित सामाजिक व्यवस्था विघटित होती चली गई |
जनमानस परि एहि भाँति थापत निजी बिचार |
जनमत संग्रह बिनु कहत सब कहुँ अंगीकार || ९३५२ -क ||
गहत सिँहासन आपहीं रचित गए संबिधान |
ताहि संगत अनजानत भारत की संतान || ३५२९ -ख ||
भावार्थ : - इस प्रकार अपने निजी विचारों को देश पर थोपकर जनमत संग्रह के बिना ही उसे अंगीकार कहते हुवे भारत की मूलभूत संतान को अँधेरे में रखकर स्वयं सत्ताधारी दल द्वारा संविधान निर्मित किया गया |
हम भारत के लोग ते संगत भारत बासि |
अधीनकर्ता देस के कीन्हि देस निबासि || ३५३० ||
भावार्थ : -'' हम भारत के लोग'' इस एक वाक्य से भारत के मूलभूत निवासियों के संगत इस देश के अधीनकर्ता बहिर्देशीय समुदाय को भी देश का निवासी घोषित किया गया ||
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