पराए भए गह बाहुड़े गेहि भयो बहिआरु |
नित प्रति दिबस होइ रहे गेह सीँउ बिसरारु || ३४७ १ ||
भावार्थ : - पराए गृह के भीतर ही रहे गृह स्वामी बाहर हो गए अब उस गृह की मर्यादाऐं, उसकी सीमाऐं नित्य प्रतिदिवस नष्ट-भ्रष्ट होने लगी |
बँधा बँधाआ बँसोरा बाँटत दियो बखेर |
छाड बसेरा आपुना उड़ि उड़ि चले पखेर || ३४७२ ||
भावार्थ : - सुव्यवस्थित भारत को विभाजन ने बिखेर कर रख दिया पूरा देश अस्तव्यस्त हो चला था पक्षी अपने सदियों के बसे बसाए बसेरों को छोड़ते चले जा रहे थे |
जुग जुग केरा बसउना जुग जग का बसबास |
दोइ पलक में ऊजड़ा सब कहुँ भया बिनास ||३४७३ ||
भावार्थ : - युगों से वसवासित वास, वस्तियां दो ही क्षण में उजाड़ दी गईं इस उजाड़ से सर्वत्र विनाश ही विनाश दृष्टिगत होने लगा |
बिछड़े भुइँ सों बाछड़े बिछड़े हल सों खेह |
रासि बिरानी लागते रीते भए सब गेह || ३४७४ ||
भावार्थ : - भूमियों से उनके वत्सल वियोजित हो गए खेतों से हल वियोजित हो गए भिन्न देशीय समुदाय के अत्याचार से पीड़ित गृह गृहवासियों से रिक्त होते चले गए |
अजहुँ सुभाग सों भया ए सुन्दर सुखद सँजोग |
सुवाधीन ए देस भयो सुतंत्र भए सब लोग || ३४७५ ||
भावार्थ : - सौभाग्यवश ऐसा सुन्दर सुखद संयोग हुवा ये देश अब स्वाधीन हो गया है और सब लोग स्वतन्त्र हो गए हैं |
कहे ढँढोरा पीट के ढिँढ़ोरची सब गाँउ |
पुरजन ते उर मेलि के सब कहुँ देत बधाउ || ३४७६ ||
भावार्थ : - ऐसा कहते उधर उद्घोषक गाँव गाँव में ढिंढोरा पीट कर यह उद्घोषणा कर रहे थे और पुरजनों को ह्रदय से लगाते हुवे व् सब को शुभकामनाएं देते चल रहे थे |
गावहु मंगल गान अरु बारौ घिउ के दीप |
द्वार द्वार देइ के देहर करौ उदीप || ३४७७ ||
भावार्थ : - सब मंगल गान गाओ ''घी के दीपक जलाओ'' और द्वार द्वार पर आधार कर अपनी देहलियों को उद्दीप्त करो |
सुवारथ परता कर अस गहे राज अरु पाट |
सकल देस बवनाए के करतब बारह बाट || ३४७८ ||
भावार्थ : - समूचे राष्ट्र को खंड खंड कर उसके सुव्यवस्थित समाज को अस्तव्यस्त करते इस प्रकार सत्ता सूत्र स्वार्थ परायणता के हाथ लग गया |
अरून चूढ़ के बोल ते होत नही जूँ भोर |
स्वाधीनता मिले नहीं पीटत जगत ढिँढोर || ३४७९ ||
भावार्थ : - जिस प्रकार मुर्गे के बाँग दे देने भर से भोर नहीं होती उसी प्रकार जगत में ढिंढोरे पीटने भर से स्वाधीनता प्राप्त नहीं होती |
भूमि गई बिभूति गईँ गया नहीं परि कोइ |
देस भीत बसबास रहँ अधीनकरिता सोइ || ३४८० ||
भावार्थ : - एक बृहद भूमि खंड विभक्त होकर चला गया उसकी भूसंपदा चली गई किन्तु भाजक नहीं गए | देश के शेष भूमि व् शेष भूसंपदा पर अधिकार स्थापित किए वह भाजक अधीनकर्ता देश में ही निवासित रहे |
नित प्रति दिबस होइ रहे गेह सीँउ बिसरारु || ३४७ १ ||
भावार्थ : - पराए गृह के भीतर ही रहे गृह स्वामी बाहर हो गए अब उस गृह की मर्यादाऐं, उसकी सीमाऐं नित्य प्रतिदिवस नष्ट-भ्रष्ट होने लगी |
बँधा बँधाआ बँसोरा बाँटत दियो बखेर |
छाड बसेरा आपुना उड़ि उड़ि चले पखेर || ३४७२ ||
भावार्थ : - सुव्यवस्थित भारत को विभाजन ने बिखेर कर रख दिया पूरा देश अस्तव्यस्त हो चला था पक्षी अपने सदियों के बसे बसाए बसेरों को छोड़ते चले जा रहे थे |
जुग जुग केरा बसउना जुग जग का बसबास |
दोइ पलक में ऊजड़ा सब कहुँ भया बिनास ||३४७३ ||
भावार्थ : - युगों से वसवासित वास, वस्तियां दो ही क्षण में उजाड़ दी गईं इस उजाड़ से सर्वत्र विनाश ही विनाश दृष्टिगत होने लगा |
बिछड़े भुइँ सों बाछड़े बिछड़े हल सों खेह |
रासि बिरानी लागते रीते भए सब गेह || ३४७४ ||
भावार्थ : - भूमियों से उनके वत्सल वियोजित हो गए खेतों से हल वियोजित हो गए भिन्न देशीय समुदाय के अत्याचार से पीड़ित गृह गृहवासियों से रिक्त होते चले गए |
अजहुँ सुभाग सों भया ए सुन्दर सुखद सँजोग |
सुवाधीन ए देस भयो सुतंत्र भए सब लोग || ३४७५ ||
भावार्थ : - सौभाग्यवश ऐसा सुन्दर सुखद संयोग हुवा ये देश अब स्वाधीन हो गया है और सब लोग स्वतन्त्र हो गए हैं |
कहे ढँढोरा पीट के ढिँढ़ोरची सब गाँउ |
पुरजन ते उर मेलि के सब कहुँ देत बधाउ || ३४७६ ||
भावार्थ : - ऐसा कहते उधर उद्घोषक गाँव गाँव में ढिंढोरा पीट कर यह उद्घोषणा कर रहे थे और पुरजनों को ह्रदय से लगाते हुवे व् सब को शुभकामनाएं देते चल रहे थे |
गावहु मंगल गान अरु बारौ घिउ के दीप |
द्वार द्वार देइ के देहर करौ उदीप || ३४७७ ||
भावार्थ : - सब मंगल गान गाओ ''घी के दीपक जलाओ'' और द्वार द्वार पर आधार कर अपनी देहलियों को उद्दीप्त करो |
सुवारथ परता कर अस गहे राज अरु पाट |
सकल देस बवनाए के करतब बारह बाट || ३४७८ ||
भावार्थ : - समूचे राष्ट्र को खंड खंड कर उसके सुव्यवस्थित समाज को अस्तव्यस्त करते इस प्रकार सत्ता सूत्र स्वार्थ परायणता के हाथ लग गया |
अरून चूढ़ के बोल ते होत नही जूँ भोर |
स्वाधीनता मिले नहीं पीटत जगत ढिँढोर || ३४७९ ||
भावार्थ : - जिस प्रकार मुर्गे के बाँग दे देने भर से भोर नहीं होती उसी प्रकार जगत में ढिंढोरे पीटने भर से स्वाधीनता प्राप्त नहीं होती |
भूमि गई बिभूति गईँ गया नहीं परि कोइ |
देस भीत बसबास रहँ अधीनकरिता सोइ || ३४८० ||
भावार्थ : - एक बृहद भूमि खंड विभक्त होकर चला गया उसकी भूसंपदा चली गई किन्तु भाजक नहीं गए | देश के शेष भूमि व् शेष भूसंपदा पर अधिकार स्थापित किए वह भाजक अधीनकर्ता देश में ही निवासित रहे |
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