कालि कलुषि कलीसाई जद्यपि चरन बहोरि |
कारि रैनी कारि रही भई नहीं परि भोरि || ३५४१ ||
भावार्थ : - यद्यपि अंग्रेज ईसाई अपनी दासत्व की कालिमा के साथ लौट गए थे किन्तु स्वाधीनता की भोर नहीं हुई नियम व् नीतियों के अभाव की अँधेरी रात्रि जस का तस रही |
देस चाक पुनि चलि परे पीछु परायो कंत |
ढँकत बुराईं आपनी रचत गयउ षड्जंत्र || ३५४२ ||
भावार्थ : - देश का चक्र पुनश्च चल पड़ा इस बार सम्मुख न होकर पश्च भाग में बहिर्देशी का स्वामित्व था अपनी त्रुटियों के ढकाव हेतु यह षड़यंत्र रचता गया |
चारन रथपथ राजसी नाउ दियो जनतंत्र |
कहत मंतब सोइ रहै कहए मंत्रि जौ मंत्र || ३५४३ ||
भावार्थ : - जनतंत्र का नाम देकर जन संचालन के रथ व् उसका पथ को राजसी किया गया यह कहते हुवे कि अब मंत्री जो मंत्रणाएं करेंगे वह प्रजावर्ग को मान्य होंगी |
सासनहर कीन्हे जौ कहतब सो सबु नीक |
चरत लीक को आपुना कहते पुरानि लीक || ३५४४ ||
भावार्थ : - पराए कंत के दिखाए पाषाणपंथ पर अग्रसर होते अब सत्ताधारी जो कहते वह सब आधुनिक कहलाता जो कोई अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं का अनुशरण करता उसे वह पुराणपंथी कहते |
स्वत्वाधिकार संगत जहँ जन होत बिहीन |
जहाँ न प्रभुता आपनी सो तो देस अधीन || ३५४५ ||
भावार्थ : - जहाँ का जनमानस संपत्ति पर से स्वामित्व के अधिकार से विहीन हो जहाँ अपना सम्प्रभुत्व न हो वह देश पराधीन होता है |
सम्पदा परि स्वत्व करि रहे नहीं अधिकार |
सम्प्रभुता भइँ नाउ की खात पराई मार || ३५४६ ||
भावार्थ : - सम्पति पर स्वामित्व का अधिकार छीन लिया गया, देश की मौलिकता पर बहिर्देशीय के संघात से राष्ट्र की सम्प्रभुता भी नाममात्र की रह गई |
सनै सनै सासनतंत्र भयऊ बरचस्बान |
जन सधारन होत गए सासक महमहिमान || ३५४७ ||
भावार्थ : - धीरे धीरे शासनतंत्र अधिकाधिक शक्तिशाली होता चला गया, शासक वर्ग महानता को प्राप्त होकर असाधारण होते चले गए जन मानस 'साधारण' कहा जाने लगा |
रचत बिधि कछु आन कहे रजत भयउ कछु आन |
भोग बिलासी बान किए बैसे ऊँच मचान || ३५४८ ||
भावार्थ : - संविधान निर्मित करते समय कुछ और कहा गया जब इन शासकों का राज आया तब कुछ और ही कहा जाने लगा समानता की बात करने वाले भोग विलासिता की बानि वरण कर ऊँची आसंदी पर जा बैठे |
लोकतंत्र जो देहि तौ आतम बिधिहि बिधान |
न्याउ हरिदै देस है मूलभूत हैं प्रान || ३५४९ ||
भावार्थ : - लोकतंत्र यदि शरीर है तो संविधान उसकी आत्मा है, न्याय उसका हृदयदेश है तत्संबंधित राष्ट्र के मूलभूत उसके प्राण है |
मूलभूत बिनसाइ के तासों होत बिहीन |
मरनासन्न होत जात तंत्र प्रान ते हीन || ३५५० ||
भावार्थ : - अपने मूलभूत को विनष्ट कर मौलिकता से विहीन कोई लोकतंत्र प्राणहीन होकर अवश्य ही मृत्यु के निकट होता है |
कारि रैनी कारि रही भई नहीं परि भोरि || ३५४१ ||
भावार्थ : - यद्यपि अंग्रेज ईसाई अपनी दासत्व की कालिमा के साथ लौट गए थे किन्तु स्वाधीनता की भोर नहीं हुई नियम व् नीतियों के अभाव की अँधेरी रात्रि जस का तस रही |
देस चाक पुनि चलि परे पीछु परायो कंत |
ढँकत बुराईं आपनी रचत गयउ षड्जंत्र || ३५४२ ||
भावार्थ : - देश का चक्र पुनश्च चल पड़ा इस बार सम्मुख न होकर पश्च भाग में बहिर्देशी का स्वामित्व था अपनी त्रुटियों के ढकाव हेतु यह षड़यंत्र रचता गया |
चारन रथपथ राजसी नाउ दियो जनतंत्र |
कहत मंतब सोइ रहै कहए मंत्रि जौ मंत्र || ३५४३ ||
भावार्थ : - जनतंत्र का नाम देकर जन संचालन के रथ व् उसका पथ को राजसी किया गया यह कहते हुवे कि अब मंत्री जो मंत्रणाएं करेंगे वह प्रजावर्ग को मान्य होंगी |
सासनहर कीन्हे जौ कहतब सो सबु नीक |
चरत लीक को आपुना कहते पुरानि लीक || ३५४४ ||
भावार्थ : - पराए कंत के दिखाए पाषाणपंथ पर अग्रसर होते अब सत्ताधारी जो कहते वह सब आधुनिक कहलाता जो कोई अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं का अनुशरण करता उसे वह पुराणपंथी कहते |
स्वत्वाधिकार संगत जहँ जन होत बिहीन |
जहाँ न प्रभुता आपनी सो तो देस अधीन || ३५४५ ||
भावार्थ : - जहाँ का जनमानस संपत्ति पर से स्वामित्व के अधिकार से विहीन हो जहाँ अपना सम्प्रभुत्व न हो वह देश पराधीन होता है |
सम्पदा परि स्वत्व करि रहे नहीं अधिकार |
सम्प्रभुता भइँ नाउ की खात पराई मार || ३५४६ ||
भावार्थ : - सम्पति पर स्वामित्व का अधिकार छीन लिया गया, देश की मौलिकता पर बहिर्देशीय के संघात से राष्ट्र की सम्प्रभुता भी नाममात्र की रह गई |
सनै सनै सासनतंत्र भयऊ बरचस्बान |
जन सधारन होत गए सासक महमहिमान || ३५४७ ||
भावार्थ : - धीरे धीरे शासनतंत्र अधिकाधिक शक्तिशाली होता चला गया, शासक वर्ग महानता को प्राप्त होकर असाधारण होते चले गए जन मानस 'साधारण' कहा जाने लगा |
रचत बिधि कछु आन कहे रजत भयउ कछु आन |
भोग बिलासी बान किए बैसे ऊँच मचान || ३५४८ ||
भावार्थ : - संविधान निर्मित करते समय कुछ और कहा गया जब इन शासकों का राज आया तब कुछ और ही कहा जाने लगा समानता की बात करने वाले भोग विलासिता की बानि वरण कर ऊँची आसंदी पर जा बैठे |
लोकतंत्र जो देहि तौ आतम बिधिहि बिधान |
न्याउ हरिदै देस है मूलभूत हैं प्रान || ३५४९ ||
भावार्थ : - लोकतंत्र यदि शरीर है तो संविधान उसकी आत्मा है, न्याय उसका हृदयदेश है तत्संबंधित राष्ट्र के मूलभूत उसके प्राण है |
मूलभूत बिनसाइ के तासों होत बिहीन |
मरनासन्न होत जात तंत्र प्रान ते हीन || ३५५० ||
भावार्थ : - अपने मूलभूत को विनष्ट कर मौलिकता से विहीन कोई लोकतंत्र प्राणहीन होकर अवश्य ही मृत्यु के निकट होता है |
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