सुनि प्रात जब पाखंडित पण्डितान की तान |
मूलभूत गह बहिर किए बैसे भीत बिरान || ३५३१ ||
भावार्थ : - प्रात: फिर पांडित्य का पाखंड करने वाले खंडित पंडित की तान सुनी गई जो देश के मूलभूत थे उन्हें बहिर्गृही कर जो बहिर्देशीय मूल थे उन्हें देश के अंतर्गृही घोषित किया गया |
परबस करिया मूल पुनि चरन साँकरी डार |
चले पाछि करि चलनि अस संबिधान अनुहार || ३५३२ ||
भावार्थ : - भारत की मौलिकता के चरणों में सांकलें देकर उसे पराए मूल के वशीभूत कर फिर संविधान का अनुशरण करते हुवे देश को पश्चिम के चाल चलन में प्रवृत्त किया गया |
डगर डगर रु गाँउ नगर होत मूल दुखिआर |
मारे मारे इत फिरे खात पराई मार || ३५३३ ||
भावार्थ : - हिंसावादी बहिर्देशीय समुदाय के घात पर चढ़ा फिर इधर वह देशीय मूल संकटापन्न होकर मार्गों परके नगरों व् गाँवों में जहाँ-तहाँ भटकने को विवश हो गया |
गेह द्वार लुटाए के कहुँ आसरा न आस |
भूमि भईं पुनि साथरी ओहार दिए अगास || ३५३४ ||
भावार्थ : - घर द्वार लूट लिया गया था, न कहीं आश्रय था कोई आस ही थी | भूमि ही उस मूल की साथरी तो आकाश उसका आच्छादन था |
जुग जुग लगि बिकसाए के गहे रहे जहँ मूरि |
तासहुँ जोग लगाए पुनि प्रसरत गए बहु दूरि || ३५३४ ||
युगों युगों तक जड़ें ग्रहण किए जहाँ वह फलाफूला उन जड़ों से ही संयोजित रहकर वह प्रस्तारित हुवा और बहुंत दूर चला आया था |
बिरवा केरि साखि चहे केतक दूरि पसारि |
मूरि परि जहँ उपजाई तहँ करि गई पुकारि || ३५३४ ||
वृक्ष की शाखा चाहे कितनी ही दूर प्रस्तारित हो जाए वह वहीँ की उत्पत्ति कहलाती है जिस मूल से व्युत्पन्न होकर जहाँ वह वृक्ष में परिणित हुई |
रहब सो बासि जेहि बन जाई | सबहिं भाँति अति सुखद सुहाई ||
बनदेबी बनदेब उदारा | प्रगसिहि सम्पद गहे अपारा ||
वह निवासी फिर जिस वन जाकर रहे वह सभी प्रकार से अतिशय सुखप्रद और सुहावना था | वहां वनदेवी व् वनदेवता अत्यंत उदार ह्रदय थे, वह अपार प्राकृतिक सम्पदा से युक्त होकर प्राकट्य रूप में उपस्थित थे |
बसिअ रहिअ तब तहँ बनबासी | बीच बीच कुटि कलित सुपासी ||
गहिए रहि सबु पुण्य करि पुंजा || कोसु कोसु कृत कौसुम कुंजा ||
वनों के मध्य भागों में कुटिया निर्मित करके वहां वनवासी सुखपूर्वक निवास किया करते थे वह सभी पुण्यों के पूंजी से युक्त थे और प्रत्येक कोस पर उन्होने कुसुम कुञ्ज रचित किए हुवे थे ||
पूछे अगमु मग जबु धरि पाएँ | थकित पथिक कहु कहाँ ते आए ||
जगत भरी कर लै सिरु भारा | बालक संग न कोउ दारा ||
मार्ग दुर्गम था जब उन मार्गों में उन निवासियों के चरण प्रविष्ट होते ही उन्होंने प्रश्न किया : -''अरे श्रमित पथिक ! संसार भर के भार को शीर्ष किए हुवे तुम कहाँ से आए हो ? जबकि तुम्हारे साथ न कोई बालक है और न कोई स्त्री ही हैं ?
नागर भेसु कंठ मनि माला | सीस पटिका तिलक दे भाला ||
कासत कौधनि काछनि काछे | मौलिका बाँधेउ कर पाछे ||
तुम्हारा शिष्ट पुरुषों का भेष है , कंठ में मणिमाल्य है सिर पर पट्टिका बंधी है तिलक चिन्हित मस्तक है | करधनी में काछनी कर्षित की हुई है, कलाई में मौलिका बंधी है |
अहहु त देसु निबासि हमारे | अहहिं कहाँ कौटुम तुम्हारे ||
कवन तुम्ह कहँ तुहरे थाना | कहौ कहँ केर बरे तुअ बाना ||
तुम हमारे देश के निवासी प्रतीत होते हो, तुमकौन हो ? तुम्हारा कौटुम्ब कहाँ है ?तुम्हारा वास स्थान कहाँ है ? कहो तो ये तुम्हारा पहनावा कहाँ का है ?
अहौ कहौ कहँ गाँउ तिहारे | पूछत कौतुक दीठि निहारे ||
कहहु कवन अस कारन होंही | आनि परे इहँ तोहि बटोही ||
कौतुहल मई दीठि किए पेखि पथिक मग जात |
भाखत मधुर भाखा निज पूछि जबहि सकुचात ||
अच्इ कलस भरि पानि बैस छिनुक बट छाँव भलि |
कहइहि मृदुलित बानि प्रीति पूरित प्रिय बचन ए |
हम गौपाल हम करिसाना | बनिज कहत हमहीं जग जाना ||
अजहुँ न हमरे ठाहर ठावाँ | छाँड़ आयउब तिन्हनि गाँवा ||
हम गौपालक हैं हमरा उद्यम कृषिकर्म है हमें वाणिज्यक कहा जाता है | इस समय हमारा ढहरने हेतु कोई स्थान नहीं है इस हेतु हमने उन्हें गाँव में छोड़ दिया है |
कोलाहलु करि चहुँ ओर निसि घन भोर भइ बिनु भोर करे..,
गाँव नगरिहि फिरि डगरि डगरि ढिंढोरची ए ढिंढोर धरे..,
पुर्बल बसिकर्ता बहिरे बरग हुँत भाजत भारत देस रे..,
पर बसिकर सहुँ अजहुँ सुतंत्र भए दीन्हे असि सँदेस रे..,
देस बसे परबसिया एहि भू किन्ही बहुस खनखण्ड रे
आनि षंड षंड महुँ पुनि सोइ उद्दंड भरिए बहु घमंड रे
केहि करतल पाहन गहे त केहि करतल गहे दंड रे
गाँव ठाँव ढहाउ बस्ति दुर्बाद त करत धुनि प्रचंड रे
लूटि मारु धरु धरु कह भीते बहिरावत गह देस धनी |
नगर अँधियारा नेम नीति नहिँ छाइहिं चहुँ दिसि निसि घनी ||
खंग दए खलहान खसौट लए खोदि खंद सबु खेह खनी ||
बारहि बार बहुरि बहुरि कछु दिन परि करिते सोइ करनी ||
नाज पात उपजात कतहुँ कछु त छीनि छीनि लै खावहीं |
क्रुद्ध बिरुद्ध होतेउ कुबुद्ध सो झुण्ड झुण्ड सहुँ आवहीं ||
छाँडत नयन अँगारी बदन सबु अगन कुंड दरसावहीं |
धाए जहँ तहँ हनत महि पटकत धरत जेहिं केहिं पावहीं ||
अरु सो भारति लोग कहँ कहत पचारि पचार |
त्राहि त्राहि पुकारि करत जन जन हाहाकार || ३५३५ ||
संचै सम्पद लुटि लै राखी | चाहें जबहीं दिठावहि आँखी |
खलु दुसठ कैं उद्दंडता के देखि रूप अंतर बल थाके |
गाँव ठेरे बसे तहँ जेते | बोए बिनु रहँ सबहिं के खेते ||
चिंतत मन कछु करम न हाथा | बिरती निसि सब भुज धरि माथा ||
आह बिरंचि भाग कस राच्यो | दारुन दुसह दसा सिरु नाच्यो ||
सोए चन्दा नैन रहँ जागे | जगती जोति पलक न लागे |
खनखंडित होतब एहि देसा | सहत परायन्हि भयउ सेसा ||
सुतंत्रा भई पीट ढिँढोरे | राजे आपु हमरे गह फोरे ||
जन जन कै आहूति लिए सुतंत्रता दिए नाम |
लड़े सो तो स्वारथी सत्ता के संग्राम || ३५३६ ||
देस फुरबारि फूर भए चारहि धरम समूह |
बसि रहे जहँ भाँति भाँति जाति बरग करि जूह || ३५३५ ||
भावार्थ : - चार धर्म के पुष्पसमूह से युक्त ये देश पुष्पवाटिका के सदृश्य था जहाँ विभिन्न प्रकार की जातियों के अन्तर्वर्ग की मंजरियाँ अपने पुष्प समूह की क्यारियों में वसवासित थी |
हाथ को हाथ सुझे नहि चहुँ पुर नगर अँधेर |
बाँट देस पुनि सेष महँ सब कहुँ दियो बखेर || ३५३६ ||
भावार्थ : - सब ओर नीति व् न्याय का घन घोर अभाव कर देश-विभाजन के परिणाम ने एक सुव्यवस्थित सामाजिक तंत्र को शेष भारत में तितर-बितर कर दिया |
जुग लगि पसराए रहेउ मूर गहे बट छाँउ |
जनमदहु जन्माए रहें उजारि दिए सो गाँउ || ३५३७ ||
भावार्थ : - जहाँ जन्मदाताओं के भी जन्मदाता का छायामयी वट वृक्ष अपनी जड़ युगों तक प्रस्तारित किए हुवे था वे गांव उजाड़ दिए गए |
किए हल खेह बिनु त रहा नहीं हाथ कछु काम |
बिधि लेखिते लेखत भए भाग बिधाता बाम || ३५३८ ||
भावार्थ : - हाथों को हल व् खेतों से रहित कर आजीविका छीन ली गई थी | संविधान लिखते लिखते भारत के भाग्य विधाता राष्ट्रविरोधी हो गए |
चरत लीक पूरत रीत निज संस्कृति सँजोए |
कुटिरु बसाए देस बीच बेहढ़ बन के होए || ३५३९ ||
भावार्थ : - अपनी मर्यादाओं, परमपराओं अपनी रीतियों का निर्वाह करते अपनी संस्कृति को सहेजे फिर वह गाँव देश के सघन वनों के मध्य कुटियाओं में निवास करने लगा |
सुवारथ परता उत कर करषत सत्ता सूत |
अमूरि हुँत हितु नीति किए अहित करि मूरि हूँत || ३५४० ||
भावार्थ : - उधर स्वार्थ परायणता सत्ता की शक्तियों का भरपूर दुरूपयोग करते हुवे मौलिकता हेतु हितों का अभाव करते हुवे अमौलिकता हेतु हितकारी नीतियां निर्धारण करने में संलग्न हो गई |
मूलभूत गह बहिर किए बैसे भीत बिरान || ३५३१ ||
भावार्थ : - प्रात: फिर पांडित्य का पाखंड करने वाले खंडित पंडित की तान सुनी गई जो देश के मूलभूत थे उन्हें बहिर्गृही कर जो बहिर्देशीय मूल थे उन्हें देश के अंतर्गृही घोषित किया गया |
परबस करिया मूल पुनि चरन साँकरी डार |
चले पाछि करि चलनि अस संबिधान अनुहार || ३५३२ ||
भावार्थ : - भारत की मौलिकता के चरणों में सांकलें देकर उसे पराए मूल के वशीभूत कर फिर संविधान का अनुशरण करते हुवे देश को पश्चिम के चाल चलन में प्रवृत्त किया गया |
डगर डगर रु गाँउ नगर होत मूल दुखिआर |
मारे मारे इत फिरे खात पराई मार || ३५३३ ||
भावार्थ : - हिंसावादी बहिर्देशीय समुदाय के घात पर चढ़ा फिर इधर वह देशीय मूल संकटापन्न होकर मार्गों परके नगरों व् गाँवों में जहाँ-तहाँ भटकने को विवश हो गया |
गेह द्वार लुटाए के कहुँ आसरा न आस |
भूमि भईं पुनि साथरी ओहार दिए अगास || ३५३४ ||
भावार्थ : - घर द्वार लूट लिया गया था, न कहीं आश्रय था कोई आस ही थी | भूमि ही उस मूल की साथरी तो आकाश उसका आच्छादन था |
जुग जुग लगि बिकसाए के गहे रहे जहँ मूरि |
तासहुँ जोग लगाए पुनि प्रसरत गए बहु दूरि || ३५३४ ||
युगों युगों तक जड़ें ग्रहण किए जहाँ वह फलाफूला उन जड़ों से ही संयोजित रहकर वह प्रस्तारित हुवा और बहुंत दूर चला आया था |
बिरवा केरि साखि चहे केतक दूरि पसारि |
मूरि परि जहँ उपजाई तहँ करि गई पुकारि || ३५३४ ||
वृक्ष की शाखा चाहे कितनी ही दूर प्रस्तारित हो जाए वह वहीँ की उत्पत्ति कहलाती है जिस मूल से व्युत्पन्न होकर जहाँ वह वृक्ष में परिणित हुई |
रहब सो बासि जेहि बन जाई | सबहिं भाँति अति सुखद सुहाई ||
बनदेबी बनदेब उदारा | प्रगसिहि सम्पद गहे अपारा ||
वह निवासी फिर जिस वन जाकर रहे वह सभी प्रकार से अतिशय सुखप्रद और सुहावना था | वहां वनदेवी व् वनदेवता अत्यंत उदार ह्रदय थे, वह अपार प्राकृतिक सम्पदा से युक्त होकर प्राकट्य रूप में उपस्थित थे |
बसिअ रहिअ तब तहँ बनबासी | बीच बीच कुटि कलित सुपासी ||
गहिए रहि सबु पुण्य करि पुंजा || कोसु कोसु कृत कौसुम कुंजा ||
वनों के मध्य भागों में कुटिया निर्मित करके वहां वनवासी सुखपूर्वक निवास किया करते थे वह सभी पुण्यों के पूंजी से युक्त थे और प्रत्येक कोस पर उन्होने कुसुम कुञ्ज रचित किए हुवे थे ||
पूछे अगमु मग जबु धरि पाएँ | थकित पथिक कहु कहाँ ते आए ||
जगत भरी कर लै सिरु भारा | बालक संग न कोउ दारा ||
मार्ग दुर्गम था जब उन मार्गों में उन निवासियों के चरण प्रविष्ट होते ही उन्होंने प्रश्न किया : -''अरे श्रमित पथिक ! संसार भर के भार को शीर्ष किए हुवे तुम कहाँ से आए हो ? जबकि तुम्हारे साथ न कोई बालक है और न कोई स्त्री ही हैं ?
नागर भेसु कंठ मनि माला | सीस पटिका तिलक दे भाला ||
कासत कौधनि काछनि काछे | मौलिका बाँधेउ कर पाछे ||
तुम्हारा शिष्ट पुरुषों का भेष है , कंठ में मणिमाल्य है सिर पर पट्टिका बंधी है तिलक चिन्हित मस्तक है | करधनी में काछनी कर्षित की हुई है, कलाई में मौलिका बंधी है |
अहहु त देसु निबासि हमारे | अहहिं कहाँ कौटुम तुम्हारे ||
कवन तुम्ह कहँ तुहरे थाना | कहौ कहँ केर बरे तुअ बाना ||
तुम हमारे देश के निवासी प्रतीत होते हो, तुमकौन हो ? तुम्हारा कौटुम्ब कहाँ है ?तुम्हारा वास स्थान कहाँ है ? कहो तो ये तुम्हारा पहनावा कहाँ का है ?
अहौ कहौ कहँ गाँउ तिहारे | पूछत कौतुक दीठि निहारे ||
कहहु कवन अस कारन होंही | आनि परे इहँ तोहि बटोही ||
कौतुहल मई दीठि किए पेखि पथिक मग जात |
भाखत मधुर भाखा निज पूछि जबहि सकुचात ||
अच्इ कलस भरि पानि बैस छिनुक बट छाँव भलि |
कहइहि मृदुलित बानि प्रीति पूरित प्रिय बचन ए |
हम गौपाल हम करिसाना | बनिज कहत हमहीं जग जाना ||
अजहुँ न हमरे ठाहर ठावाँ | छाँड़ आयउब तिन्हनि गाँवा ||
हम गौपालक हैं हमरा उद्यम कृषिकर्म है हमें वाणिज्यक कहा जाता है | इस समय हमारा ढहरने हेतु कोई स्थान नहीं है इस हेतु हमने उन्हें गाँव में छोड़ दिया है |
कोलाहलु करि चहुँ ओर निसि घन भोर भइ बिनु भोर करे..,
गाँव नगरिहि फिरि डगरि डगरि ढिंढोरची ए ढिंढोर धरे..,
पुर्बल बसिकर्ता बहिरे बरग हुँत भाजत भारत देस रे..,
पर बसिकर सहुँ अजहुँ सुतंत्र भए दीन्हे असि सँदेस रे..,
देस बसे परबसिया एहि भू किन्ही बहुस खनखण्ड रे
आनि षंड षंड महुँ पुनि सोइ उद्दंड भरिए बहु घमंड रे
केहि करतल पाहन गहे त केहि करतल गहे दंड रे
गाँव ठाँव ढहाउ बस्ति दुर्बाद त करत धुनि प्रचंड रे
लूटि मारु धरु धरु कह भीते बहिरावत गह देस धनी |
नगर अँधियारा नेम नीति नहिँ छाइहिं चहुँ दिसि निसि घनी ||
खंग दए खलहान खसौट लए खोदि खंद सबु खेह खनी ||
बारहि बार बहुरि बहुरि कछु दिन परि करिते सोइ करनी ||
नाज पात उपजात कतहुँ कछु त छीनि छीनि लै खावहीं |
क्रुद्ध बिरुद्ध होतेउ कुबुद्ध सो झुण्ड झुण्ड सहुँ आवहीं ||
छाँडत नयन अँगारी बदन सबु अगन कुंड दरसावहीं |
धाए जहँ तहँ हनत महि पटकत धरत जेहिं केहिं पावहीं ||
अरु सो भारति लोग कहँ कहत पचारि पचार |
त्राहि त्राहि पुकारि करत जन जन हाहाकार || ३५३५ ||
संचै सम्पद लुटि लै राखी | चाहें जबहीं दिठावहि आँखी |
खलु दुसठ कैं उद्दंडता के देखि रूप अंतर बल थाके |
गाँव ठेरे बसे तहँ जेते | बोए बिनु रहँ सबहिं के खेते ||
चिंतत मन कछु करम न हाथा | बिरती निसि सब भुज धरि माथा ||
आह बिरंचि भाग कस राच्यो | दारुन दुसह दसा सिरु नाच्यो ||
सोए चन्दा नैन रहँ जागे | जगती जोति पलक न लागे |
खनखंडित होतब एहि देसा | सहत परायन्हि भयउ सेसा ||
सुतंत्रा भई पीट ढिँढोरे | राजे आपु हमरे गह फोरे ||
जन जन कै आहूति लिए सुतंत्रता दिए नाम |
लड़े सो तो स्वारथी सत्ता के संग्राम || ३५३६ ||
देस फुरबारि फूर भए चारहि धरम समूह |
बसि रहे जहँ भाँति भाँति जाति बरग करि जूह || ३५३५ ||
भावार्थ : - चार धर्म के पुष्पसमूह से युक्त ये देश पुष्पवाटिका के सदृश्य था जहाँ विभिन्न प्रकार की जातियों के अन्तर्वर्ग की मंजरियाँ अपने पुष्प समूह की क्यारियों में वसवासित थी |
हाथ को हाथ सुझे नहि चहुँ पुर नगर अँधेर |
बाँट देस पुनि सेष महँ सब कहुँ दियो बखेर || ३५३६ ||
भावार्थ : - सब ओर नीति व् न्याय का घन घोर अभाव कर देश-विभाजन के परिणाम ने एक सुव्यवस्थित सामाजिक तंत्र को शेष भारत में तितर-बितर कर दिया |
जुग लगि पसराए रहेउ मूर गहे बट छाँउ |
जनमदहु जन्माए रहें उजारि दिए सो गाँउ || ३५३७ ||
भावार्थ : - जहाँ जन्मदाताओं के भी जन्मदाता का छायामयी वट वृक्ष अपनी जड़ युगों तक प्रस्तारित किए हुवे था वे गांव उजाड़ दिए गए |
किए हल खेह बिनु त रहा नहीं हाथ कछु काम |
बिधि लेखिते लेखत भए भाग बिधाता बाम || ३५३८ ||
भावार्थ : - हाथों को हल व् खेतों से रहित कर आजीविका छीन ली गई थी | संविधान लिखते लिखते भारत के भाग्य विधाता राष्ट्रविरोधी हो गए |
चरत लीक पूरत रीत निज संस्कृति सँजोए |
कुटिरु बसाए देस बीच बेहढ़ बन के होए || ३५३९ ||
भावार्थ : - अपनी मर्यादाओं, परमपराओं अपनी रीतियों का निर्वाह करते अपनी संस्कृति को सहेजे फिर वह गाँव देश के सघन वनों के मध्य कुटियाओं में निवास करने लगा |
सुवारथ परता उत कर करषत सत्ता सूत |
अमूरि हुँत हितु नीति किए अहित करि मूरि हूँत || ३५४० ||
भावार्थ : - उधर स्वार्थ परायणता सत्ता की शक्तियों का भरपूर दुरूपयोग करते हुवे मौलिकता हेतु हितों का अभाव करते हुवे अमौलिकता हेतु हितकारी नीतियां निर्धारण करने में संलग्न हो गई |
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