सोमवार, 21 जनवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५१ ॥ -----,

दासकरिता बदली ते बदले नहि जो देस  | 
बिगरी न बानी बान न बिगरी नहि परिबेस || ३५११ || 

भावार्थ : - शब्ताब्दियों तक के दासकर्ता से अन्य दासकर्ता की अधीन होने के पश्चात भी  जिस देश की वेशभूषा जिसका परिवेश विकृत नहीं हुवा ,  परिवर्तित अधीनता के पश्चात भी यह  देश अपरिवर्तित रहा  |

बहिर देस के जनित पुनि होत गयउ एकदेस | 
बिगड़े भूषा भाष सों बिगड़त गए परिबेस || ३५१२ || 
भावार्थ :  (फिर विभाजन के पश्चात जब )बहिर्देश के मूल और इस देश के मूलभूत जब एक ही देश के कहलाने लगे तब  इस देश की विकृत हुई वेशभूषा के साथ इसका पावन परिवेश ( आहार-विहार, आचार-विचार )भी विकृत होता चला गया |

धरमी धरम बिहून भए बरनी बरन बिहीन | 
दूजे मेले मेलि के होतब गयउ मलीन || ३५१३ || 
भावार्थ : - दूसरों की मलिनता के मिलावट से मलीन होकर इस देश में प्रादुर्भूत धर्मानुयायी धर्म से विहीन हो गए, वर्ण धारण करने वाले वर्णी वर्ण से विहीन हो गए |  और यह भारत इंडिआ होता चला गया  |

राजत जुग लगि देस परि खायउ लूट खसौट | 
संबध तिन्हनि आपुने सासनहर दिएँ ओट || ३५१४ || 
भावार्थ : - शताब्दियों तक देश पर राज कर उसका आर्थिक शोषण करने वाले बहिर्देशीय शत्रु समुदाय से सत्ताधारी ने आत्मीय सबंध स्थापित किया और देश स्वतन्त्र होने के पश्चात उन्हें अपना सरंक्षण देते गए  |

बहिर देसिअ बरग संग जाके जुगे सँजोग | 
पूछे जन जन कहु कहा रहँ प्रधान के जोग || ३५१५ || 
भावार्थ : - वर्तमान का जनमानस प्रश्न करता रहा, बहिर्देशीय शत्रु समुदाय से जिस व्यक्ति के आत्मीय सम्बन्ध थे क्या वह इस देश के प्रधान पद के योग्य था ?

अस सत्तारूढ़ि दल तैं बिरचित गै सँबिधान | 
देस हुँत दुर्भाग लिखे तिनके हुँत कल्यान || ३५१६ || 
भावार्थ : -  जो दासकर्ता को संरक्षण दे ऐसे सत्तारूढ़ दल के द्वारा देश का संविधान निर्मित हुवा, और संविधान में सत्ताधारी के इन आत्मीय जनों के भाग्य में सुख -सौभाग्य और भारतवासियों के भाग्य में दुर्भाग्य लिखा गया |

गहे जो दल सिन्हासन रचे सोइ सँविधान | 
कहा ए उचित अकि ए हुँत को परिषद्  कृत आन || ३५१७ || 
भावार्थ : - क्या किसी सत्ताधारी दल द्वारा ही किसी राष्ट्र का संविधान निर्माण करना न्यायसंगत है ? अथवा इस हेतु कोई स्वतन्त्र स्वायत्त संस्था अथवा समिति गठित नहीं होनी चाहिए थी.....?

सत्ताधारि सोंहि बिबस अबरउ लेखनहार | 
ता प्रियजनहि हुँत एहि बिधि लिखेउ गै अधिकार || ३५१८  || 
भावार्थ : - (कदाचित) सत्ताधारी की आज्ञा से विवश होकर संविधान के अन्य रचनाकारों ने भारत के दासकर्ता किन्तु उनके प्रियजनों हेतु अधिकार लिखकर उन्हें देश की सम्प्रभुता से संपन्न किया गया |

गेह भया कि देस भया दुनहु लहैं मर्याद | 
बहिर चरन को लँघे नहि सोई सीवाँ वाद || ३५१ ९ || 
भावार्थ : -  गृह हो अथवा कोई देश हो दोनों की अपनी अपनी मर्यादाएं होती हैं कोई बाह्य तत्व इसका उल्लंघन  न करे यही राष्ट्रवाद अथवा सीमावाद है |

राष्ट्रवादसों वासिन , के का हो परिमान । 
जथोचित नेम संग बँध रहें स्थित थितमान ।२११८ । 
भावार्थ : -- राष्ट्रवाद किसे कहना चाहिए : -- "जो राष्ट्र-निवासी यथोचित विधि-विधान के आदेश का पालन करने में संलग्न हों एवं स्थित सीमाओं के अंतर्गत कृत-संकल्प होकर स्थितिमान् रहें वह  राष्ट्र वाद है....."

देस संग को सीँव हैं सीँव संग को देस | 
देस जनित के सहित जौ रखै तासु परिबेस || ३५२० || 
भावार्थ : - किसी राष्ट्र से ही उसकी उस सीमा का अस्तित्व हैं उस सीमा से किसी राष्ट्र का अस्तित्व हैं जो उसके मूल निवासियों सहित उसकी भूमि पर प्रादुर्भूत धर्म-संस्कृति,आचार-विचार व् उसके आहार-विहार की रक्षा करे | 

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