बुधवार, 2 जनवरी 2019

-----॥ धर्मो रक्षति रक्षित: ॥ -----



बसे देस बवनाए जो , रहि सो अपने ठाट ।
एक एक कह सबहि  कछु करिया बारह बाट ॥ ३२६१ ॥ 
भावार्थ : -- जो पराए हैं और वासी बने इस देश में बसे हैं इनके कारण जब से इस देश का एकीकरण हुवा तब से इस देश की  सस्कृति छिन्न भिन्न हो गई और यह सर्वतस् नष्ट-भ्रष्ट हो गया । " हम सब एक हैं" हमारे  रक्त का रंग एक है" ईश्वर अल्ला एक है" " क्या काला  क्या सफ़ेद सब एक हैं"  इनमें कोई भेद नहींहै । गौमाता का तो क्या ये भ्रूण का भी भक्षण करते हैं और कहते हैं हमारा खान-पान एक है, बेबे ( बहन )  कब बीबी  बन जाती है पता नहीं चलता और  कहते हमारी संस्कृति एक है ॥ है ? 

 ऐसा कुत्सित एकीकरण कर इन्होने इस देश का बारह बाट कर दिया.....

बारह बाट : -- मोह, दीनता, भय, ह्रास, हानि, ग्लानि, क्षुधा, तृषा, क्षोभ, व्यथा, मृत्यु और अपकीर्ति ये बारह बाट हैं

बिगड़ा था घर आपना कुलाचार परिहाए । 
तापर लूट मचाए के पड़िया आन  पराए ॥ ३२६२ ॥ 
भावार्थ : -  कुलगत रीति-नीति का  परित्याग कर कोई गृह यदि पुरस्तात्  कुमार्गगामी हो उसपर बिगड़ैल  परिपंथ  वहां आकर अधिकार संपन्न हो जाए  तब सन्मार्गी की भी कुमार्गी होने की संभावना बनी रहती है ॥

यह देस सो देस जहां रहँ सब जीअ सुखारि । 
राम रमे बन बन तहाँ कुञ्ज कुञ्ज गिरधारि ॥ ३२६३॥ 
भावार्थ : -- यह देश वह देश है जहाँ संसार के सभी जीवंतकों को जीवन का अधिकार है । यहां वन वन में भगवान श्री राम का व कुञ्ज कुञ्ज में गिरधारी का वास हुवा ॥ 

खेत करन कस होइया धारत धारिहि धुर कस धारि । 
जेहि देस परबोधिया कहत केहि तल बारि ॥ ३२ ६४ ॥ 
 भावार्थ : -- कोई स्थान सीमाबद्ध कैसे होता है इसकी सुरक्षा कौन करता है सेना क्या होती है । शस्त्र शास्त्र क्या है यह भारत द्वारा विदित हुवा । 

देस  दुरग कोष दल पति मात सुहरिदै संग । 

केहि राज प्रबंधन के जे सब साधक अंग ॥ ३२६५ ।। 
भावार्थ : -- राज्य , दुर्ग, कोष, दल, पति, अमात्य व् साथ में सुहृदय । राज्य  प्रबंधन के ये साधक अंग हैं ॥ 


कतहुँ सुलिखित लेख कतहुँ चित्रवत चित्र बिन्यास । 
रन करम सों ए  देस के भरे परे इतिहास ॥३२६६ ॥ 

भावार्थ : - कही न सुलिखित लेख हैं कहीं अद्भुत चित्र- विन्यास हैं । जो यह उल्लेखित करते हैं कि भारत का इतिहास युद्ध संकुलता से भरा हुवा है जितने युद्ध इस देश में हुवे उतने कहीं नहीं हुवे ॥  



सीख सीख एहि देस के  भयउ छतर छत्तीस । 
देस दासा होइ रहे ता  सहुँ अवनत सीस ॥ ३२६७ ॥ 
भावार्थ : -- इस देश के इतिहास से सीख लेकर छत्तीसों राष्ट्र बने । शताब्दियों की दासता के कारण उन रंगरूटों के  सम्मुख इसका शीश झुका रहा ॥ 

पति पताकिनी  होत  का हरिदय कवन सनेहि । 
अब हम ता सों जानिहैं कहत पताका केहि ॥ ३२६८ ॥ 
भावार्थ : -- पति कैसे बनाते हैं, पताकिनी कहाँ से आती है हृदय का स्नेहि किसे होना चाहिए ॥  इन अनपढ़ नेताओं के कारण अब यह सब हमें इन छत्र -छत्तीसों से सीखना पड़ता है इन्हें पढ़ना आता तो अपने देश का इतिहस पढ़कर संविधान लिखते । इसको पताका बोलते हैं अब यह वे हमें बताते हैं ॥ 

ई देखो बम......तुहार बम तुहरे ही सिर पर फोड़ न दें तो हमरे नाम बदल दीजो । 

प्रथम प्रक्षेपण पुरुष  = अस्वत्थामा 

भाग भाग कर देस के भागमभागा होइ । 
गयो गयो सब कोइ कहँ गया न कतहूँ कोइ ॥ ३२६९ ॥ 
भावार्थ : -- जब इस अखण्ड देश को खण्ड खण्ड करते विभाजित किया गया । तब एक भागम-  भाग  सी हुई थी । सबने कहा प्रवासी भाग गए पर गया कोई नहीं ॥  यह देश वारंवार विभाजित होता गया, सत्ता के  लालचियों ने कारण अब तक स्पष्ट नहीं किया.....

आन बसे परबासिया किए एहि देस अधीन । 
राजा सो कस होइआ अहँ जो राज बिहीन ॥ ३२७० ॥ 
भावार्थ : -- राष्ट्र  के बिना राज प्रबंधन के साधक अंगों की कल्पना नहीं की जा सकती । जो प्रवासी हों किसी देश में जा बसे हों कालान्तर में जिन्होंने छल से लूट से उस देश को अधीन कर उसपर अत्याचार किया वे राष्ट्रिक कैसे हो सकते हैं । जब वे राष्ट्रिक नहीं हो सकते तो फिर वे किसी राष्ट्र के स्वामी कैसे हुवे ? क्यों हुवे ?

कलह न जानब छोट करि  कलह कठिन परिनाम । 
लगति अगनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम ॥ 
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- लड़ाई को अनदेखा नहीं करना । लड़ाई का परिणाम बहुंत भयंकर होता है ।  निर्धन की झोपड़ी में लगी आग बड़े बड़े धनिकों के धन धाम को भस्म कर देती है.....


भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज । 
रावन हो कि रामराज, जमन कि आँगलि राज ।३२४६ । 
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज जमन राज हो या फिर अंगेरजी राज,  सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥

अजहुँ त हाथ पसार के माँग रहे हैं न्याय । 
 न तरु खेत करि मेलिबो,  और न कोउ उपाय ॥ ३२ ४७ ॥ 
भावार्थ : -- अभी यह समय हाथ पसारे न्याय मांग रहा है । दे दो ! अन्यथा संग्राम के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न होगा ॥

है धर्म संग्राम येह, नहि कायर का  काम । 
सीस माँगे सीस दियो चाम माँगे त चाम ॥ ३२४८ ॥ 
भावार्थ : -- यह धर्म संग्राम होगा इसमें कायरों का कुछ काम न होगा । ये सीस मांगेगा सीस देना पड़ेगा, चाम मांगेगा चाम देना पड़ेगा ॥

यहां निबासी कौन है कौन इहाँ परबासि । 
रन भूमि के तीर खड़ा पूछेगा मुठि कासि ॥ ३२५१ ॥ 


भावार्थ : -- इस देश के निवासी कौन हैं ? प्रवासी कौन है ? रण-भूमि के मुहाने पर खड़े होकर यह प्रश्न करते हुवे उसकी मुट्ठियाँ कसी होंगी ॥  

करे करम का लेखनी लिखे भाग के लेख ॥
तेरे सिर तलबारि अरि, देख सके तो देख ॥ ३२५२ ।
भावार्थ : -- किए कर्मों की लेखनी से ही यह हस्त भाग्य के लेख लिखता है । रे संसार के शत्रु  तेरी लेखनी तेरे भाग्य में शीश पर तलवार लिख रही है देख सके तो देख ॥ 

आया जो घर छोड़ के बहोरि सो फिरि जाए ॥
धरम केर संग्राम में न त रहु सीस बिनाए ॥ ३२५३ ॥
भावार्थ : --  जो अपना घर छोड़ आया है वह लौट जाए । अन्यथा इस धर्म- संग्राम में वे शीश से रहित हो जाएगा॥  


हित करिया बस आपना किया न कासों हेत ।
सूर बीर के हाथ चढ़ कटेगा सोए खेत ॥ ३२५५॥
भावार्थ : -- जिसने केवल स्वयं के प्रयोजनों को सिद्ध किया । जिसको  किसी पर दया  नहीं आई जिसने किसी से प्रेम नहीं किया, किसी का कल्याण नहीं किया । सूर वीर के हत्थे चढ़ खेत में वही कटेगा  ॥ 

मैं पूछा रे काल कूँ करन चला संग्राम ॥
तू करता तू कारना करिया मेरा नाम ॥ ३२५६॥
भावार्थ : - मैं ने पूछा हे काल ! तुम युद्ध क्यूँ चाहते हो ? काल ने उत्तर दिया रण- कर्त्ता  तुम ही हो कारण भी तुम ही हो मैं निमित्त मात्र हूँ तुमने नाम मेरा कर दिया युद्ध में नहीं तुम चाहते हो । 

कारन जहाँ जन्माया  जोधन जनिआ तहहिं। 
तुम कारन मति जामियो जोधन होउ न कहहिं ॥ ३२५७॥ 

भावार्थ : -- कार्य बिना कारण के नहीं होता । कारणों की व्युतपत्ती से ही युद्ध उत्पन्न होता है  । तुम कारण उत्पन्न मत करो युद्ध कहीं नहीं होगा । 

जो मुख साँचा बोलिये अगजग बैरी होए । 
पड़िया लोहा लेवना औरु उपाय न कोए ॥ ३२ ५८॥ 
भावार्थ : --यदि कोई सत्य कहे तो संसार उसका विरोधी हो जाता हैं । ऐसी स्थिति में लोहा लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहता ॥ 


बँधे कसाई खूँट जो सीस देत जिअ जाहि । 
रोक  सके तो रोक ले जो को बिघन न चाहि ॥ ३२५९ ॥ 
भावार्थ : -- जो कसाई के खूंटे बंध के शीश और चर्म का बलिदान कर रहे हैं । युद्ध न चाहने वाले शान्ति प्रिय लोग नृसंस हत्या करते उन क्रूर नपुंसक  कसाइयों को रोके ॥ 

पाल पराया पोषिया बासन दिया पड़ोस । 
सींउ पारगत झूझिया वका को न दोष ॥ ३२६० ॥ 
भावार्थ : - जिन परायों ने इस देश को लूट उन्हें पाल पोष कर मुस्टंडे कर दिया और बसने को पड़ोस भी दे दिया । मर्यादाओं का उल्लंघन कर नित्य विध्वंश हेतु उतारू रहने वालों को रोक सको तो रोको ॥ 

अपने देस बिसारिया अपने देसाचार । 
धर्महु दुत्कृत होइहि त रहिहि कवनि आधार ॥ ३२२१ ॥ 

भावार्थ : -- अधुनातन भारत के आचार-विचार, आहार-विहार इस देश में ही तिरष्कृत होने लगे हैं । यदि यहाँ प्रवर्तित धर्मों को भी दुत्कारा जाएगा तब वे कहाँ अवस्थित होंगे ?

अपने तीज तिहार  सों अपने देसाचार। 
सुरसदन सदा सोहिआ अपने देस द्वार ॥ ३२२२ ॥ 
भावार्थ : -- अपने आचार- व्यवहार, अपने तीज त्यौहार, अपने देवालय अपने देश में ही अच्छे लगते हैं । धर्म का प्रसार हो उपासना पद्धतियों का नहीं.....

अधर्मी जनम जगत कर पापन के परिनाम । 
दान धरम सतकर्म सों अवतरे कोउ राम ॥ ३२२३ ॥ 
भावार्थ : -- दुष्ट का जन्म जन मानस के पापों का परिणाम है  राम जैसे ईश्वर का अवतरण उसके दान-धर्म व सत्कर्मों की परिणिति है ॥

जगज जीवन जेन्ह के जन्में जेहि निबासु । 
सुर सदन तीरथ पुरी कहत तेहि के तासु ॥ ३२२४॥ 
भावार्थ : --  जिस धर्मानुयायी के इष्ट देव ने जहाँ जन्म लिया है वह स्थान उसी का तीर्थ स्थान अथवा सुर सदन कहलाता है किसी अन्य का नहीं ॥

आन देस जा बासिया जाके देस बिरान । 
जहँ जहँ तीर्थ पुरिन तहँ करष बढ़ावै जान ॥ ३२२५ ॥ 
भावार्थ : --  फिर किसी अन्य देश का वंशज किसी अन्य  देश में जा बसता हो और जहां जहां उसके तीर्थ स्थान हैं वहां वह व्यर्थ ही विवाद उपस्थित करता हो तब उसका क्या किया जाए ?

आए ब्याज भेस भरी करि करि सींवा पार । 
बस्तु धरत एहि  देस पर करे तहाँ अधिकार ॥ ३२२९ ॥ 
भावार्थ : -- सीमाओं का अतिक्रमण कर कपट वेश धारण किए म्लेच्छ भारत में आए और आते रहे । मस्जिद अथव गिरिजाघर रूपी वस्तु को जहाँ तहाँ  रखते हुए ये इस देश पर आधिपत्य निरूपित करते गए इस प्रकार विश्व में इनका प्रभुत्व स्थापित होता चला गया ॥ 

आन भूमि भगनाए के रचे देस पर देस । 
अजहुँ त भारत सेष ते हॉट जाएँ अवशेष ॥ ३२३० ॥ 
भावाथ : -- दूसरों की भूमि भवन पर बलात आधिपत्य स्थापित कर उसे विभाजित करते हुवे इनके  देश पर देश बनते गए  ऐसे अपाराधिक ( यौद्धिक नहीं ) साम्राज्य वाद के कारण  भारत व भारतीय अब शेष से अवशेष होते  जा रहें है, जो चिंतनीय है ॥

धरम माहि प्रतीति रहे जगहितकारी नीति । 
प्रभुता कबहु न परिहरै जहाँ भली सब रीति ॥ ३२०१ ॥ 
भावार्थ : -- जिस देश में धर्म पर विश्वास दृढ रहे और नीतियां विश्व के लिए हितकारी हों जहाँ प्रथाएं व् परम्परा हानिप्रद न होकर स्वस्थ हो उस देश को प्रभुता त्याज्य नहीं करती ॥ 

रीझि बूझि पर आपनी बवहिं नवहिं निज काज । 
बिचार हीन के धारे बिनसे देस समाज ॥ ३२०२ ॥ 
भावार्थ : --अपनी समझ पर ही मन्त्र मुग्ध होने वाले स्वार्थ सिद्धि हेतु जहाँ तहाँ सिर झुकाने वाले निर्बुद्धि की बुद्धि से देश व् समाज विलुप्त होते हैं ॥ 



भीत भीत बिदेस बसे करिअ सेष अवसेष । 
जोइ सिँहासन धारिया सोइ लुटावै देस ॥ ३२० ५ ॥  
भावार्थ : --  हंस विवेक की किञ्चितता के कारण ही अद्यावधि भारत भीतर ही भीतर खंड खंड हो गया है ये खंड छोटे बड़े  विदेश बन गए हैं कहीं इस्लाम का राज चलता है तो कहीं ईसाई का तो कहीं अन्यान्य का । सत्ताधारियों में तो जैसे देश को लूटने और लुटाने की होड़ लगी है ॥ 

यह नदी यह नग निर्झर देख लखे सब काल । 
बेद रचि घन बन मुनिगन चहुँ पुर फिरिहि ब्याल ॥३२०६॥ 
भावार्थ : -- भारत की इन नदियों ने इन झरनों के इन पर्वतों ने सभी काल देखे हुवे हैं । वह वैदिक काल भी जब घने वनों से आच्छादित यह देश मुनिगण द्वारा वेदों की रचना में लयलीन था हिंसक पशु इसके चारों ओर विचरण किया करते थे ॥ 

सुरग अवतरित सुर सरित यह गिरि राज बिसाल । 
जहां बिराजित सिउ संभु कंठ गहे अहि माल ॥ ३२०७ ॥ 
भावार्थ : -- स्वर्ग से अवतरित यह सुरसरित यह हिमालय का विशाल क्षेत्र । जहाँ कंठ में अहिमाल ग्रहण किये भगवान शिव शम्भु विराजित हैं ॥ 

मूर्धाभिषेक सरूप येह कलस केदार । 
प्राच रूप प्राग् अभिमत जुग जुग धरे सँभार ॥ ३२०८॥ 

भावार्थ : -- भारत  वर्ष का मूर्द्धन्याभिषेक स्वरूप यह केदारनाथ धाम है । जिसने प्राग चिन्हों सहित प्राचीन काल से चले आ रहे धार्मिक मत को युगों युगों से संजो रखा है ॥ कोई धार्मिक मत जहाँ होगा मतावलम्बी वहां नहीं होंगे तो कहाँ होंगे । 


पुराकल्प कृत पुरी यह जगत बिदित जग नाथ । 
अस्थापित हरि मूर्ति जगनमई के साथ ॥ ३२०९ ॥ 

भावार्थ : - धर्मावलम्बियों को मर्यादित करती जगत प्रसिद्ध यह जगन्नाथ पुरी है जो आद्य काल की कृति है । जहाँ जगन्मयी के साथ भगवान जगन्नाथ विराजित हैं  इसकी मर्यादा भंग करने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है ॥  


भारत बरस का द्वार यह द्वारिका धाम । 
धर्मोपदेस दय  यहॉँ बिराजित घन स्याम ॥ ३२१० ॥ 
भावार्थ : - भारत वर्ष के द्वार को दर्शाता यह द्वारिका धाम है काबा नहीं है  । धर्म का उपदेश देने वाले भगवान कृष्ण यहां विराजमान हैं ।

जमन जूह एहि  देस में भरे अधिकाधिकाए । 
सुर सदनिन तीरथ पुरिन तापर एकहू नाए ॥ ३२११ ॥ 

भावार्थ : - कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश में मुसलमानों का एक भी तीर्थ नहीं है ॥



स्वाध्ययन सत्योधन धरम करम करताए ।
संतापित तापस चरन बिहनै सुख बरधाए ॥ ३२१३-ख ॥  

----- ॥ विदूर नीति ॥ -----
भावार्थ : - आवृत्ति पूर्वक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म व् संतप्त तपस्या से अंत में सुख की वृद्धि होती है ॥ 

 न्याय संगत बितर्कन बिधि सम्मत परमान । 
साखी दिरिस अवमति दिए नेति जोग अवज्ञान ॥ ३२१४॥ 
भावार्थ : -- न्याय संगत तर्क, विधि- सम्मत साक्ष्य, साक्षाद्दृश्य को तिरोहित कर दिया गया निर्णय अवज्ञा के योग्य होता है.....

धर्माधारित संहिता यह श्रुति वेद पुरान । 
भारत की संतान के अभिलेखित परमान ॥ ३२१५॥ 
भावार्थ : -- ये श्रुति, वेद, उपनिषद, पुराणादी संहिताएं वैदिक धर्म का प्रमाणिक आधार है भारत के वंशजों का अभिलेखित साक्ष्य हैं ॥ यहां इस्लाम स्वयं को भारत का मूल सिद्ध करने पर तुला है ॥  

धर्माधारित संहिता भारत के एहि नीवँ । 
अन्यान्य दरसाइया लिखे ए देस के सीवँ ॥३२१६॥ 
भावार्थ : -- ये धर्माधारित संहिताएं राष्ट्र के रूप में भारत का निरूपण करती हैं (पद्मपुराण )। अन्य देशों के सह इनमें इस देश की सीमाओं का भी उल्लेख है । भिन्न देश के अन्य धार्मिक संप्रदाय के अनुयायि  अपनी सीमाओं का साक्ष्य प्रस्तुत करें ॥ 

देखे लोचन साखिता यह सरजू के तीर । 
भव तारन कलिमल हरन प्रगसे जग रघुबीर ॥ ३२१७॥ 
भावार्थ : -- यह सरयू नदी उस समय की प्रत्यक्ष साक्षी है जब संसार से पार उतारने कलयुग के पापों को हरण करने भगवान श्री राम ने जन्म लिया ॥ 


अपने अपने धर्म  में आस्था के अधिकार को धार्मिक आस्था का अधिकार कहते हैं  वैदिक धर्मावलम्बियों से यह अधिकार छीना जा रहा  है ।  अन्य सम्प्रदायों के इष्ट का जहाँ जन्म हुवा वहां यदि कोई मंदिर बने तो कैसा लगेगा ?






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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...