रजत राज गह सूत कृत दबाउनी नै नीति |
बिधि बिधाता रचत गै जग बिपरीतक रीति || ३५० १ ||
भावार्थ : - (इस प्रकार) सत्ता हाथ लगते ही उसकी शक्तियों का दुरूपयोग कर दमनकारी नेतृत्व व् नीतियों की परिकल्पना करते हुवे विधि विधाता विश्वमान्य नियमों के विपरीत नियमों की रचना करते गए |
राज राजना = सत्ता हाथ आना
सत्ता सूत्र = शासन शक्ति
गह = ग्रहण करना
कृत = रचना, परिकल्पना
दबाउनि = दमनकारी
नय नीति = नेतृत्व व् नीति
जग विपरीत = विश्वमान्य नियमों के विपरीत
विहित करतब करत करत बंसागत को जातु |
धरम जात कहुँ संगती धात धात महँ धातु || ३५०२ ||
भावार्थ : - एक निश्चित स्वभाव का पालन कर किसी निश्चित कर्म को करते करते कोई वंशानुगत जातक धर्म व् जाति के संगत अपने रक्त में परिष्कृत धातु धारण करता है | यह एक वैज्ञानिक स्वयं शोध है |
बासन बसन सों जहँ सबु सुख साधन करि जंत्र |
ए अवसिक नहि कि होत तहँ सुदृढ़ समाजिक तंत्र || ३५० ३ ||
भावार्थ : - जो राष्ट्र भोजन वासन वसन के सह समस्त भौतिक संसाधनों से युक्त हो अथवा कोई राष्ट्र या उसकी भूमि की आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ हो तो यह आवश्यक नहीं कि उसकी सामाजिक व्यवस्था भी उतनी ही सुदृढ़ होगी |
होइ सकै ता देस करि सुदृढ़ समाजिक तंत्र |
बासन बसन सों जहँ सबु सुख साधन करि जंत्र || ३५०४ ||
भावार्थ : - किसी राष्ट्र की समाजिक व्यवस्था यदि सुदृढ़ है तो उसकी आर्थिक व्यवस्था भी सुदृढ़ हो सकती है
पाहन जुग कर मानसा लहै धरम नहि जात |
सुघरपन दुराई रहे बन गोचर कहलात ||३५० ५ ||
भावार्थ : - पाषाण युग का मानव इस हेतु पाषाण बुद्धि का था क्योंकि उसने वह मानवोचित धर्म व् जाति धारण नहीं की थी जो उसे पाशविकता से पृथक करती है इसलिए धर्म व् जाति से रहित मनुष्य का स्वभाव असभ्य वनचर के समदृश्य होता है |
पाखन वाद निरुपत गहँ पाहन जुगी बिचार |
पछिआतिकरन देस किए दिए भरि दोषु बिकार ||३५० ६ ||
भावार्थ : - धर्म के नाम पर छल करने वाले पाखंडवाद का निरूपण करते हुवे जाति व् धर्म से रहित उक्त पाषाणयुगी विचारों ने देश की अग्रवर्ती व् सुदृढ़ सामाजिक व्यवस्था का पाश्चात्यीकरण कर उसे दोष व् विकारों से भर दिया |
अपने मैले मेलते बसिते भीत बिरान |
कुलवान एहि देस जनहि करतब गयो मलान ||३५०७ ||
भावार्थ : - देश के अंतर में वसवासित भारतीय बने बहिर्देशीय समुदायों ने अपनी मलिनता के मिलावट से इस देश के कुलवान जनमानस को मलीन करते गए |
पाखंडिक गै जापते राम राम राम हे राम |
पछिआतिकरन के अगहुँ लाह लहे इस्लाम || ३५०८ ||
भावार्थ : - धर्म के नाम पर छल करने वाला पाखंडवादी तो राम राम हे राम कर चल बसा किन्तु आगे इस्लाम ने देश के इस पाश्चात्यीकरण का भरपूर लाभ उठाया |
पछिआति करन देस किए कहै एही अधुनात |
सत्ता वादी जो कहे दिन कहुँ रात त रात || ३५०९ ||
भावार्थ : - देश की अग्रवर्ती सामाजिक व्यवस्था को पश्चवर्ती कर उसे आधुनिक कहा गया | अब देश को सत्तावाद संचालित करने लगा वह दिन को रात कहता तो सभी को मान्य होता |
अधुनातन को भया नहि अहो बांचत अँगरेजि |
को कलीसाई को भए इस्लामिक रँगरेजि || ३५१० ||
भावार्थ : - इस प्रकार पाश्चात्यीकरण से अंग्रेजी बांचता देश आधुनिक तो नहीं हुवा प्रत्युत वह भारत से इंडिया हो गया और भारतीयों में संकरित जाति से संकरित धर्म का जातक होते हुवे कोई ईसाई तो कोई रंगरेज इस्लामिक हो गया |
बिधि बिधाता रचत गै जग बिपरीतक रीति || ३५० १ ||
भावार्थ : - (इस प्रकार) सत्ता हाथ लगते ही उसकी शक्तियों का दुरूपयोग कर दमनकारी नेतृत्व व् नीतियों की परिकल्पना करते हुवे विधि विधाता विश्वमान्य नियमों के विपरीत नियमों की रचना करते गए |
राज राजना = सत्ता हाथ आना
सत्ता सूत्र = शासन शक्ति
गह = ग्रहण करना
कृत = रचना, परिकल्पना
दबाउनि = दमनकारी
नय नीति = नेतृत्व व् नीति
जग विपरीत = विश्वमान्य नियमों के विपरीत
विहित करतब करत करत बंसागत को जातु |
धरम जात कहुँ संगती धात धात महँ धातु || ३५०२ ||
भावार्थ : - एक निश्चित स्वभाव का पालन कर किसी निश्चित कर्म को करते करते कोई वंशानुगत जातक धर्म व् जाति के संगत अपने रक्त में परिष्कृत धातु धारण करता है | यह एक वैज्ञानिक स्वयं शोध है |
बासन बसन सों जहँ सबु सुख साधन करि जंत्र |
ए अवसिक नहि कि होत तहँ सुदृढ़ समाजिक तंत्र || ३५० ३ ||
भावार्थ : - जो राष्ट्र भोजन वासन वसन के सह समस्त भौतिक संसाधनों से युक्त हो अथवा कोई राष्ट्र या उसकी भूमि की आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ हो तो यह आवश्यक नहीं कि उसकी सामाजिक व्यवस्था भी उतनी ही सुदृढ़ होगी |
होइ सकै ता देस करि सुदृढ़ समाजिक तंत्र |
बासन बसन सों जहँ सबु सुख साधन करि जंत्र || ३५०४ ||
भावार्थ : - किसी राष्ट्र की समाजिक व्यवस्था यदि सुदृढ़ है तो उसकी आर्थिक व्यवस्था भी सुदृढ़ हो सकती है
पाहन जुग कर मानसा लहै धरम नहि जात |
सुघरपन दुराई रहे बन गोचर कहलात ||३५० ५ ||
भावार्थ : - पाषाण युग का मानव इस हेतु पाषाण बुद्धि का था क्योंकि उसने वह मानवोचित धर्म व् जाति धारण नहीं की थी जो उसे पाशविकता से पृथक करती है इसलिए धर्म व् जाति से रहित मनुष्य का स्वभाव असभ्य वनचर के समदृश्य होता है |
पाखन वाद निरुपत गहँ पाहन जुगी बिचार |
पछिआतिकरन देस किए दिए भरि दोषु बिकार ||३५० ६ ||
भावार्थ : - धर्म के नाम पर छल करने वाले पाखंडवाद का निरूपण करते हुवे जाति व् धर्म से रहित उक्त पाषाणयुगी विचारों ने देश की अग्रवर्ती व् सुदृढ़ सामाजिक व्यवस्था का पाश्चात्यीकरण कर उसे दोष व् विकारों से भर दिया |
अपने मैले मेलते बसिते भीत बिरान |
कुलवान एहि देस जनहि करतब गयो मलान ||३५०७ ||
भावार्थ : - देश के अंतर में वसवासित भारतीय बने बहिर्देशीय समुदायों ने अपनी मलिनता के मिलावट से इस देश के कुलवान जनमानस को मलीन करते गए |
पाखंडिक गै जापते राम राम राम हे राम |
पछिआतिकरन के अगहुँ लाह लहे इस्लाम || ३५०८ ||
भावार्थ : - धर्म के नाम पर छल करने वाला पाखंडवादी तो राम राम हे राम कर चल बसा किन्तु आगे इस्लाम ने देश के इस पाश्चात्यीकरण का भरपूर लाभ उठाया |
पछिआति करन देस किए कहै एही अधुनात |
सत्ता वादी जो कहे दिन कहुँ रात त रात || ३५०९ ||
भावार्थ : - देश की अग्रवर्ती सामाजिक व्यवस्था को पश्चवर्ती कर उसे आधुनिक कहा गया | अब देश को सत्तावाद संचालित करने लगा वह दिन को रात कहता तो सभी को मान्य होता |
अधुनातन को भया नहि अहो बांचत अँगरेजि |
को कलीसाई को भए इस्लामिक रँगरेजि || ३५१० ||
भावार्थ : - इस प्रकार पाश्चात्यीकरण से अंग्रेजी बांचता देश आधुनिक तो नहीं हुवा प्रत्युत वह भारत से इंडिया हो गया और भारतीयों में संकरित जाति से संकरित धर्म का जातक होते हुवे कोई ईसाई तो कोई रंगरेज इस्लामिक हो गया |
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