बहिष्कार पुनि आपुना सम्मुख देख निहार |
दीन दरिदर देस लिखत दियो परायो भार || ३४९१ ||
भावार्थ : - फिर अपने सम्मुख अपना सामाजिक बहिष्कार होते देखकर इन विचारों ने एक दुर्बल व् अकिंचन राष्ट्र के भाग्य में परायों का भार भी लिख दिया |
नगर अँधेरा मेटते भेद भरम करि नास |
न्याय नभ निरनय नभस प्रेसत तबहि प्रकास || ३४९२ ||
भावार्थ : - नियम व् नीतियों का प्रादुर्भाव जब अंतर के दृष्टिभ्रम को नष्ट करता है न्याय के नभ से निर्णयों का सूर्य भी तभी प्रकाश प्रेषित करता है |
भेद दीठि बिहुने रहइँ तिनके रचे बिधान |
खोट खरे रु भले बुरे भए सब एकै समान || ३४९३ ||
भावार्थ : - इनके विधान भेद बुद्धि से रहित थे जो अंतर करने वाली दृष्टि को भ्रमित करते थे इन विधानों की दृष्टि में निकृष्ट-उत्कृष्ट,सत्य-असत्य, हिताहित, अपने-पराए आदि विपरीत स्वभाव एक ही समान थे |
भेद दृष्टि = दो व्यक्ति अथवा वस्तुओं में परस्पर अंतर करने वाली दृष्टि
विहुना = विहीन
देसी रु देसावर महँ अंतर करे न कोइ |
अभारती कहुँ भारती एकै कहैं रहँ दोइ || ३४९४ ||
भावार्थ : - देशी व् विदेशी में कोई अंतर न करने पाए इस हेतु भारत से भिन्न देश के वंशजों को और भारतीय को 'हम सब एक है' का नारा देकर एक ही कहा गया जबकि यह भिन्न हैं |
भरता पेटे भुक लिखे अपने पेटे भोग |
भार गहे अस दास भए बहुर देस के लोग || ३४९५ ||
भावार्थ : - देश की प्रभुता के स्वामी के भाग्य में भूख लिखकर इन विधान निर्माताओं ने अपने भाग्य में भोग और विलासिता लिखी, इस प्रकार क्षुधा के संग बहिर्देशीय दासकर्ता का भार भी वहन किए देशवासी पुनश्च दास बनते चले गए |
न इतिहास न बिदुबान न ग्यान न त बिग्यान |
अजहुँ जन महँ सोइ मने जो तिनके अनुमान || ३४९६ ||
भावार्थ : - न इतिहास की न वर्तमान की, न ज्ञान की न विज्ञान की, अब भारत के जनमानस में वही मान्य होता जो इन सत्ताधारियों की अनुमानित अवधारणा होती |
एक धर्म में कोई वर्ग उपेक्षित हो तो आवश्यक नहीं वह दूसरे धर्म में भी उपेक्षित हो
पर नहीं : - खाता न बही - जो सत्ताधारी कहें वो सही.....
सो बिधि बिनासइता बिधि बिधुंसिक सो बिधान |
नेम बिपर्यासित जोइ होतब बिधुतसमान || ३४९७ ||
भावार्थ : - वह विधि विनाशकारक है वह विधान विध्वंशक है जो नियमों के विपरीत होकर स्वार्थ के आशय से युक्त हो |
मानस हुँत सब नेम बिधि मानस ता हुँत नाहि |
अपुनी जीवा जोगते जोग रखै सब काहि || ३४९८ ||
भावार्थ : - प्रकृति से अन्यथा मनुष्य द्वारा रचित नियम निबंधन मनुष्य हेतु होते हैं मनुष्य उन हेतु नहीं होता एतएव ये परिवर्तन शील होते हैं नियम निबंधन वह हैं जो निज मर्यादाओं की रक्षा करते हुवे अन्यान्य को भी मर्यादित करे |
रजते राजा की कही सके नही को काट |
कबहुँ केहि जो बोलते गहे दंड सो डाँट || ३४९९ ||
भावार्थ : - किन्तु इन सत्ताधारियों के दल द्वारा निर्मित विधान में विहित किए गए नियम अकाट्य थे भविष्य में इन नियमों के विरोधी हेतु तिरष्कार के सह दंड का उपबंध किया गया |
बहिर देसिअ भारा जो कहिते साख पराइ |
काटन खावन धाइहीं देताब धरम दुहाइ || ३५०० ||
भावार्थ : - अब बहिर्देशीय भार को कोई भारत से अन्यथा प्रादुर्भूत धर्म शाखा कहता ये सत्ताधारी धर्म की दुहाई देकर उसे ही काट खाने को दौड़ते |
दीन दरिदर देस लिखत दियो परायो भार || ३४९१ ||
भावार्थ : - फिर अपने सम्मुख अपना सामाजिक बहिष्कार होते देखकर इन विचारों ने एक दुर्बल व् अकिंचन राष्ट्र के भाग्य में परायों का भार भी लिख दिया |
नगर अँधेरा मेटते भेद भरम करि नास |
न्याय नभ निरनय नभस प्रेसत तबहि प्रकास || ३४९२ ||
भावार्थ : - नियम व् नीतियों का प्रादुर्भाव जब अंतर के दृष्टिभ्रम को नष्ट करता है न्याय के नभ से निर्णयों का सूर्य भी तभी प्रकाश प्रेषित करता है |
भेद दीठि बिहुने रहइँ तिनके रचे बिधान |
खोट खरे रु भले बुरे भए सब एकै समान || ३४९३ ||
भावार्थ : - इनके विधान भेद बुद्धि से रहित थे जो अंतर करने वाली दृष्टि को भ्रमित करते थे इन विधानों की दृष्टि में निकृष्ट-उत्कृष्ट,सत्य-असत्य, हिताहित, अपने-पराए आदि विपरीत स्वभाव एक ही समान थे |
भेद दृष्टि = दो व्यक्ति अथवा वस्तुओं में परस्पर अंतर करने वाली दृष्टि
विहुना = विहीन
देसी रु देसावर महँ अंतर करे न कोइ |
अभारती कहुँ भारती एकै कहैं रहँ दोइ || ३४९४ ||
भावार्थ : - देशी व् विदेशी में कोई अंतर न करने पाए इस हेतु भारत से भिन्न देश के वंशजों को और भारतीय को 'हम सब एक है' का नारा देकर एक ही कहा गया जबकि यह भिन्न हैं |
भरता पेटे भुक लिखे अपने पेटे भोग |
भार गहे अस दास भए बहुर देस के लोग || ३४९५ ||
भावार्थ : - देश की प्रभुता के स्वामी के भाग्य में भूख लिखकर इन विधान निर्माताओं ने अपने भाग्य में भोग और विलासिता लिखी, इस प्रकार क्षुधा के संग बहिर्देशीय दासकर्ता का भार भी वहन किए देशवासी पुनश्च दास बनते चले गए |
न इतिहास न बिदुबान न ग्यान न त बिग्यान |
अजहुँ जन महँ सोइ मने जो तिनके अनुमान || ३४९६ ||
भावार्थ : - न इतिहास की न वर्तमान की, न ज्ञान की न विज्ञान की, अब भारत के जनमानस में वही मान्य होता जो इन सत्ताधारियों की अनुमानित अवधारणा होती |
एक धर्म में कोई वर्ग उपेक्षित हो तो आवश्यक नहीं वह दूसरे धर्म में भी उपेक्षित हो
पर नहीं : - खाता न बही - जो सत्ताधारी कहें वो सही.....
सो बिधि बिनासइता बिधि बिधुंसिक सो बिधान |
नेम बिपर्यासित जोइ होतब बिधुतसमान || ३४९७ ||
भावार्थ : - वह विधि विनाशकारक है वह विधान विध्वंशक है जो नियमों के विपरीत होकर स्वार्थ के आशय से युक्त हो |
मानस हुँत सब नेम बिधि मानस ता हुँत नाहि |
अपुनी जीवा जोगते जोग रखै सब काहि || ३४९८ ||
भावार्थ : - प्रकृति से अन्यथा मनुष्य द्वारा रचित नियम निबंधन मनुष्य हेतु होते हैं मनुष्य उन हेतु नहीं होता एतएव ये परिवर्तन शील होते हैं नियम निबंधन वह हैं जो निज मर्यादाओं की रक्षा करते हुवे अन्यान्य को भी मर्यादित करे |
रजते राजा की कही सके नही को काट |
कबहुँ केहि जो बोलते गहे दंड सो डाँट || ३४९९ ||
भावार्थ : - किन्तु इन सत्ताधारियों के दल द्वारा निर्मित विधान में विहित किए गए नियम अकाट्य थे भविष्य में इन नियमों के विरोधी हेतु तिरष्कार के सह दंड का उपबंध किया गया |
बहिर देसिअ भारा जो कहिते साख पराइ |
काटन खावन धाइहीं देताब धरम दुहाइ || ३५०० ||
भावार्थ : - अब बहिर्देशीय भार को कोई भारत से अन्यथा प्रादुर्भूत धर्म शाखा कहता ये सत्ताधारी धर्म की दुहाई देकर उसे ही काट खाने को दौड़ते |
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