कहँ फिरे भइँ भोर भोर करत रोर तमचोर |
पलक ओहारि उघारि त जोहि न कतहुँ अँजोर || ३४८१ ||
भावार्थ : - याम उद्घोषक कोलाहल करके भोर होने की सूचना देते फिर रहे थे पलकों ने पटाच्छादन त्यागकर देखा तो स्वातन्त्र का प्रकाश कहीं भी दर्शित नहीं हुवा |
रैनि के कर धान गहे मसि मुख मेढ़ मुँडेर |
चौपट द्वारि छाए रहिँ चहुँ पुर नगर अँधेर || ३४८२ ||
भावार्थ : - सम्प्रभुता अधीनकर्ता के ही करतल में थी मेढ़ व् मुंडेरों पर दासता का कालापन व्याप्त था, न्याय नीति व् नियम का सर्वत्र अभाव किए देश का द्वार चौपट हो चुका था |
छाजन भाजन देइ दै गह छत छाम छदाम |
लिख मिले माथ इस्लाम इस्लाम रु इस्लाम || ३४८३ ||
भावार्थ : -अपने एक क्षत्र राष्ट्र को वारम्वार खंडित कर मात्र चौथाई भाग का एक निर्बल व् अकिंचन शेष ग्रहण किए वह अन्धेरा प्रत्येक देश खंड के मस्तक पर इस्लाम इस्लाम और इस्लाम लिखता गया |
एहि छदाम कहु केहि के लखे नहीं कछु नाम |
भूरे गौतम महबीर भूरे नानक राम || ३४८४ ||
भावार्थ : - किन्तु वे देश किसके थे ये शेष किसका है वह यह नाम लिखना भूल गया, वह भूल गया कि ये देश राम के थे गौतम- महावीर के थे और नानक के थे और ये शेष उन्ही का है |
और अब ये दासता की कलुषता जम्मू, कश्मीर यहाँ तक की अयोध्या में भी इस्लाम लिखने पर तुली है जो एक किरण की आशा थी वह भी निराशा में परिवर्तित होती जा रही है.....
सबहीं कतहुँ ब्यापते भय पूरित घन काल |
रैन बिराम बिनु बिलखिहि जहँ तहँ काल ब्याल || ३४८५ ||
भावार्थ : - स्वतंत्रता के प्रभात से रहित सर्वत्र भय पूरित दासता की कालिमा व्याप्त किए वह परतंत्रता की सघन रात्रियाँ ही थी, और न्याय नियम नीतियों के अँधेरे में जहाँ देखो वहां हिंसक निष्ठुरता
दिखाई दे रही थी |
सुबारथ परत रहइँ रत करत जनहि मति भ्रंस |
भाजत भाजत देस पुनि राखन भाजक अंस || ३४८६ ||
भावार्थ : - जनमानस की बुद्धि भ्रमित कर उधर स्वार्थपरायणता देश को वारंवार विभाजित करते भाजाकांश की ही रक्षा में संलग्न थी |
भाजक अंश = वह भाजक जिसे किसी राशि अथवा देश में भाग देने पर कुछ शेष न रहे |
गहत राज भएँ काज सब देस काल बिपरीति |
निज अँध मतहि दुज सिरु दए गहतब स्वहित नीति || ३४८ ७ ||
भावार्थ : - सत्ता हाथ आते ही अब उसके सभी कार्य देश काल के विपरीत हो चले | स्वयं के लाभ की नीतियां ग्रहण करते वह निज कुत्सित विचारों को दूसरों पर थोपती चली गईं |
चरन चरन कुचालि चलत भेद बुद्धि भरमाए |
करत जतनी जान जन अपने कवन पराए || ३४८८ ||
भावार्थ : - ये विचार अंतर करने की दृष्टि को भ्रमित कर चरण चरण पर कुचालें चलते हुवे इस प्रकार की चतुराई करते कि भारतीय जनमानस को यह ज्ञात न हो पाए कि कौन इस देश के मूलभूत हैं कौन नहीं |
देसाबर परपंथि हुँत पथ पथ होत उदार |
मूर बिहूना देस करत अपनी साख बिदार || ३४८९ ||
भावार्थ : - स्वराष्ट्र से भिन्न अन्य राष्ट्र के लुटेरे समुदायों हेतु ये पंथ पंथ पर उदारता का आश्रय लेते हुवे देश को उसकी मौलिकता से रहित कर अपनी ही शाखाओं को काटते गए |
मलीन मत सहुँ मेलते आप त भयउ मलीन |
औरन को मलिनाए सो जौ जन रहैँ कुलीन ||३४९ ० ||
भावार्थ : -कलुषित विचारों के समागम से उत्पन्न ये विचारक स्वयं तो मूल व् कुलहीन होते गए और जो जनमानस कुलीन था अपने आभामंडल के प्रभाव से यह उन्हें भी मूल व् कुलहीन करते चले |
पलक ओहारि उघारि त जोहि न कतहुँ अँजोर || ३४८१ ||
भावार्थ : - याम उद्घोषक कोलाहल करके भोर होने की सूचना देते फिर रहे थे पलकों ने पटाच्छादन त्यागकर देखा तो स्वातन्त्र का प्रकाश कहीं भी दर्शित नहीं हुवा |
रैनि के कर धान गहे मसि मुख मेढ़ मुँडेर |
चौपट द्वारि छाए रहिँ चहुँ पुर नगर अँधेर || ३४८२ ||
भावार्थ : - सम्प्रभुता अधीनकर्ता के ही करतल में थी मेढ़ व् मुंडेरों पर दासता का कालापन व्याप्त था, न्याय नीति व् नियम का सर्वत्र अभाव किए देश का द्वार चौपट हो चुका था |
छाजन भाजन देइ दै गह छत छाम छदाम |
लिख मिले माथ इस्लाम इस्लाम रु इस्लाम || ३४८३ ||
भावार्थ : -अपने एक क्षत्र राष्ट्र को वारम्वार खंडित कर मात्र चौथाई भाग का एक निर्बल व् अकिंचन शेष ग्रहण किए वह अन्धेरा प्रत्येक देश खंड के मस्तक पर इस्लाम इस्लाम और इस्लाम लिखता गया |
एहि छदाम कहु केहि के लखे नहीं कछु नाम |
भूरे गौतम महबीर भूरे नानक राम || ३४८४ ||
भावार्थ : - किन्तु वे देश किसके थे ये शेष किसका है वह यह नाम लिखना भूल गया, वह भूल गया कि ये देश राम के थे गौतम- महावीर के थे और नानक के थे और ये शेष उन्ही का है |
और अब ये दासता की कलुषता जम्मू, कश्मीर यहाँ तक की अयोध्या में भी इस्लाम लिखने पर तुली है जो एक किरण की आशा थी वह भी निराशा में परिवर्तित होती जा रही है.....
सबहीं कतहुँ ब्यापते भय पूरित घन काल |
रैन बिराम बिनु बिलखिहि जहँ तहँ काल ब्याल || ३४८५ ||
भावार्थ : - स्वतंत्रता के प्रभात से रहित सर्वत्र भय पूरित दासता की कालिमा व्याप्त किए वह परतंत्रता की सघन रात्रियाँ ही थी, और न्याय नियम नीतियों के अँधेरे में जहाँ देखो वहां हिंसक निष्ठुरता
दिखाई दे रही थी |
सुबारथ परत रहइँ रत करत जनहि मति भ्रंस |
भाजत भाजत देस पुनि राखन भाजक अंस || ३४८६ ||
भावार्थ : - जनमानस की बुद्धि भ्रमित कर उधर स्वार्थपरायणता देश को वारंवार विभाजित करते भाजाकांश की ही रक्षा में संलग्न थी |
भाजक अंश = वह भाजक जिसे किसी राशि अथवा देश में भाग देने पर कुछ शेष न रहे |
गहत राज भएँ काज सब देस काल बिपरीति |
निज अँध मतहि दुज सिरु दए गहतब स्वहित नीति || ३४८ ७ ||
भावार्थ : - सत्ता हाथ आते ही अब उसके सभी कार्य देश काल के विपरीत हो चले | स्वयं के लाभ की नीतियां ग्रहण करते वह निज कुत्सित विचारों को दूसरों पर थोपती चली गईं |
चरन चरन कुचालि चलत भेद बुद्धि भरमाए |
करत जतनी जान जन अपने कवन पराए || ३४८८ ||
भावार्थ : - ये विचार अंतर करने की दृष्टि को भ्रमित कर चरण चरण पर कुचालें चलते हुवे इस प्रकार की चतुराई करते कि भारतीय जनमानस को यह ज्ञात न हो पाए कि कौन इस देश के मूलभूत हैं कौन नहीं |
देसाबर परपंथि हुँत पथ पथ होत उदार |
मूर बिहूना देस करत अपनी साख बिदार || ३४८९ ||
भावार्थ : - स्वराष्ट्र से भिन्न अन्य राष्ट्र के लुटेरे समुदायों हेतु ये पंथ पंथ पर उदारता का आश्रय लेते हुवे देश को उसकी मौलिकता से रहित कर अपनी ही शाखाओं को काटते गए |
मलीन मत सहुँ मेलते आप त भयउ मलीन |
औरन को मलिनाए सो जौ जन रहैँ कुलीन ||३४९ ० ||
भावार्थ : -कलुषित विचारों के समागम से उत्पन्न ये विचारक स्वयं तो मूल व् कुलहीन होते गए और जो जनमानस कुलीन था अपने आभामंडल के प्रभाव से यह उन्हें भी मूल व् कुलहीन करते चले |
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