भारत कहुँ देसन्ह का होता नहि दातार |
बिधि बिधेयता राखिता सब दिसि निज अधिकार || ३४५१ ||
भावार्थ : - यदि भूमि भारत के स्वामित्व की थी तब भारत को देशों का दातार नहीं होना चाहिए था | संविभक्त राष्ट्रों पर प्रभुत्व स्थापित करते हुवे भारत को उन्हें अपनी संवैधानिक शक्तियों के द्वारा नियंत्रित करना चाहिए था |
बिलगत पराए आपुने कतिपय नेम नियंत |
जाताजात होतब रहत कछुक अबधि परजंत || ३४५२ ||
भावार्थ : - कतिपय नियमों के नियंत्रण द्वारा अपने मूलगत समुदाय व् बाह्य समुदाय को पृथक तो करना चाहिए थे और कुछ समय पर्यन्त तक देशीय व् देशांतर के आवागमन होता रहता (और हुवा भी)|
परबसिया कर सौंपि दिए जुद्ध संधि सम थान |
न बिधेइता बरतिआ न कीन्हेसि पन ठान || ३४५३ ||
भावार्थ : - स्वत्वाधिकार की उपेक्षा कर इन भिन्न देश के मतावलम्बियों को किसी युद्ध संधि के समान राष्ट्र सौंपे गए ( मानों भारत उनसे युद्ध में हार गया हो ) तात्कालिक भारत द्वारा उन राष्ट्रों पर न कोई सम्प्रभुता स्थापित की न उनसे कोई संवैधानिक प्रतिज्ञा ही की ||
आनि परे केहि सहुँ अस दसा जौ बिपर्जास |
बाँट बखेरा करि चहे निज भुइँ देस निबास || ३४५ ४-क ||
होत चेतस ए देस सों करत देस बंटबार |
बिधि बिधेयता रखै तहँ राखत निज अधिकार || ३४५ ४-ख ||
भावार्थ : -भारत से अन्य किसी राष्ट्र में यदि ऐसी ही विपरीत परिस्थितियां निर्मित हो जाएं कि जिससे उसे भी अपनी भूमि अपने देश निवास का विभाजन करना आवश्यक हो तब इस देश से शिक्षा लेकर वह सचेत रहे व् विभाजन करते हुवे संविभक्त भूमि को राष्ट्र का स्वरूप न देकर अपना प्रभुत्व स्थापित करते हुवे उसे अपनी संवैधानिक शक्तियों द्वारा नियंत्रित करे |
परबसिया बसियाए सो अपना गेह लुटाए |
वाका दासा होइ के फिर पाछे पछिताए || ३४५ ५ ||
भावार्थ : - उत्तम तो यही होगा कि कोई राष्ट्र प्रवासियों को बसाए ही नहीं क्योंकि जो प्रवासियों को वसवासित करता है वह अपना घर अपनी भूमि अपना राष्ट्र ही लुटाता है और उसका दास बनकर फिर कालान्तर में पश्चाताप करता है |
नागर मान परबसिआ करिए तस ब्योहार |
मूल निवासिहि जानिये तस दीजिए अधिकार | ३४५ ६ ||
भावार्थ : - प्रवासियों को नागरिक संज्ञान कर उनसे तदनुसार व्यवहार करना चाहिए | राष्ट्र निर्माण में मूल भूत को ही देस के निवासी संज्ञान कर तदनुसार उन्हें अधिकारों से सम्पन्न करना चाहिए |
केत न केत देस बसे केतिक जन जग माहि |
को देस कहौ केहि के होए कहा सब काहि || ३४५ ७ ||
भावार्थ : - कोई राष्ट्र विशेष किसका होना चाहिए ? क्या ये सबका होना चाहिए ? फिर तो जाने कितने जनमानस देश में निवासित हैं और कितने ही जगत में ? भारत के विषय में कहा जाता है ये देश सबका है, क्या विश्व के सभी राष्ट्र संविधान निरपेक्ष होकर सबके होने चाहिए |
कोउ देस केहि जन के सरब प्रथम एहि लेख |
संविधान बहुरि तिन्हनि दए अधिकार बिसेख || ३४५ ८ ||
भावार्थ : - कोई राष्ट्र विशेष किसका है सर्वप्रथम इसका स्पष्ट उल्लेख करते हुवे तत्पश्चात तत्संबंधित राष्ट्र की मौलिकता को संरक्षित कर संविधान उन्हें विशेषाधिकारों से संपन्न करे |
गोसाईँ के देस भुइँ गोसाईं के खेत |
पराधीन रु स्वाधीन होत मूलगत हेतु || ३४५ ९ ||
भावार्थ : - पराधीन कौन होता है ? स्वाधीनता किसके लिए होती है | किसी राष्ट्र को अपने अधीन करने वाले के लिए ? नहीं ! कोई राष्ट्र भूमि या उसका कोई क्षेत्र स्वामी का जो उस राष्ट्र निर्माण के मूल में हैं क्योकि पराधीनता व् स्वाधीनता उस मूलगत के निमित्त ही होती है
अपने से भिन्न देश के निवासियों का अपने देश में प्रदत्त स्वत्व अथवा सम्प्रभुत्व का विरोध यदि साम्प्रादायिकता है तो है
जो देश सबहीं के सो होत प्रभुत ते हीन |
परु अरु स्वाधीन तहाँ भयऊ अर्थ बिहीन || ३४६० ||
भावार्थ : - जो राष्ट्र विशेष किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों, समाज, समुदाय अथवा समुदायों का न होकर सार्वजनिक हो वह सम्प्रभुता से रहित होता है सम्प्रभुता से रहित राष्ट्र में पराधीन व् स्वाधीन जैसे शब्दों का कोई औचित्य नहीं रहता |
बिधि बिधेयता राखिता सब दिसि निज अधिकार || ३४५१ ||
भावार्थ : - यदि भूमि भारत के स्वामित्व की थी तब भारत को देशों का दातार नहीं होना चाहिए था | संविभक्त राष्ट्रों पर प्रभुत्व स्थापित करते हुवे भारत को उन्हें अपनी संवैधानिक शक्तियों के द्वारा नियंत्रित करना चाहिए था |
बिलगत पराए आपुने कतिपय नेम नियंत |
जाताजात होतब रहत कछुक अबधि परजंत || ३४५२ ||
भावार्थ : - कतिपय नियमों के नियंत्रण द्वारा अपने मूलगत समुदाय व् बाह्य समुदाय को पृथक तो करना चाहिए थे और कुछ समय पर्यन्त तक देशीय व् देशांतर के आवागमन होता रहता (और हुवा भी)|
परबसिया कर सौंपि दिए जुद्ध संधि सम थान |
न बिधेइता बरतिआ न कीन्हेसि पन ठान || ३४५३ ||
भावार्थ : - स्वत्वाधिकार की उपेक्षा कर इन भिन्न देश के मतावलम्बियों को किसी युद्ध संधि के समान राष्ट्र सौंपे गए ( मानों भारत उनसे युद्ध में हार गया हो ) तात्कालिक भारत द्वारा उन राष्ट्रों पर न कोई सम्प्रभुता स्थापित की न उनसे कोई संवैधानिक प्रतिज्ञा ही की ||
आनि परे केहि सहुँ अस दसा जौ बिपर्जास |
बाँट बखेरा करि चहे निज भुइँ देस निबास || ३४५ ४-क ||
होत चेतस ए देस सों करत देस बंटबार |
बिधि बिधेयता रखै तहँ राखत निज अधिकार || ३४५ ४-ख ||
भावार्थ : -भारत से अन्य किसी राष्ट्र में यदि ऐसी ही विपरीत परिस्थितियां निर्मित हो जाएं कि जिससे उसे भी अपनी भूमि अपने देश निवास का विभाजन करना आवश्यक हो तब इस देश से शिक्षा लेकर वह सचेत रहे व् विभाजन करते हुवे संविभक्त भूमि को राष्ट्र का स्वरूप न देकर अपना प्रभुत्व स्थापित करते हुवे उसे अपनी संवैधानिक शक्तियों द्वारा नियंत्रित करे |
परबसिया बसियाए सो अपना गेह लुटाए |
वाका दासा होइ के फिर पाछे पछिताए || ३४५ ५ ||
भावार्थ : - उत्तम तो यही होगा कि कोई राष्ट्र प्रवासियों को बसाए ही नहीं क्योंकि जो प्रवासियों को वसवासित करता है वह अपना घर अपनी भूमि अपना राष्ट्र ही लुटाता है और उसका दास बनकर फिर कालान्तर में पश्चाताप करता है |
नागर मान परबसिआ करिए तस ब्योहार |
मूल निवासिहि जानिये तस दीजिए अधिकार | ३४५ ६ ||
भावार्थ : - प्रवासियों को नागरिक संज्ञान कर उनसे तदनुसार व्यवहार करना चाहिए | राष्ट्र निर्माण में मूल भूत को ही देस के निवासी संज्ञान कर तदनुसार उन्हें अधिकारों से सम्पन्न करना चाहिए |
केत न केत देस बसे केतिक जन जग माहि |
को देस कहौ केहि के होए कहा सब काहि || ३४५ ७ ||
भावार्थ : - कोई राष्ट्र विशेष किसका होना चाहिए ? क्या ये सबका होना चाहिए ? फिर तो जाने कितने जनमानस देश में निवासित हैं और कितने ही जगत में ? भारत के विषय में कहा जाता है ये देश सबका है, क्या विश्व के सभी राष्ट्र संविधान निरपेक्ष होकर सबके होने चाहिए |
कोउ देस केहि जन के सरब प्रथम एहि लेख |
संविधान बहुरि तिन्हनि दए अधिकार बिसेख || ३४५ ८ ||
भावार्थ : - कोई राष्ट्र विशेष किसका है सर्वप्रथम इसका स्पष्ट उल्लेख करते हुवे तत्पश्चात तत्संबंधित राष्ट्र की मौलिकता को संरक्षित कर संविधान उन्हें विशेषाधिकारों से संपन्न करे |
गोसाईँ के देस भुइँ गोसाईं के खेत |
पराधीन रु स्वाधीन होत मूलगत हेतु || ३४५ ९ ||
भावार्थ : - पराधीन कौन होता है ? स्वाधीनता किसके लिए होती है | किसी राष्ट्र को अपने अधीन करने वाले के लिए ? नहीं ! कोई राष्ट्र भूमि या उसका कोई क्षेत्र स्वामी का जो उस राष्ट्र निर्माण के मूल में हैं क्योकि पराधीनता व् स्वाधीनता उस मूलगत के निमित्त ही होती है
अपने से भिन्न देश के निवासियों का अपने देश में प्रदत्त स्वत्व अथवा सम्प्रभुत्व का विरोध यदि साम्प्रादायिकता है तो है
जो देश सबहीं के सो होत प्रभुत ते हीन |
परु अरु स्वाधीन तहाँ भयऊ अर्थ बिहीन || ३४६० ||
भावार्थ : - जो राष्ट्र विशेष किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों, समाज, समुदाय अथवा समुदायों का न होकर सार्वजनिक हो वह सम्प्रभुता से रहित होता है सम्प्रभुता से रहित राष्ट्र में पराधीन व् स्वाधीन जैसे शब्दों का कोई औचित्य नहीं रहता |
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