मंगलवार, 29 जनवरी 2019

------ ॥ दोहा-दशम ३५४ ॥ -----,

कालि कलुषि कलीसाई जद्यपि चरन बहोरि | 
कारि रैनी कारि रही भई नहीं परि भोरि || ३५४१ || 
भावार्थ : - यद्यपि अंग्रेज ईसाई अपनी दासत्व की कालिमा के साथ लौट गए थे   किन्तु स्वाधीनता की भोर नहीं हुई नियम व् नीतियों के अभाव की अँधेरी रात्रि जस का तस रही |

देस चाक पुनि चलि परे पीछु परायो कंत | 
ढँकत बुराईं आपनी रचत गयउ षड्जंत्र || ३५४२ ||
भावार्थ : - देश का चक्र पुनश्च चल पड़ा इस बार सम्मुख न होकर पश्च भाग में बहिर्देशी का स्वामित्व था अपनी त्रुटियों के ढकाव हेतु यह षड़यंत्र रचता गया |

चारन रथपथ राजसी नाउ दियो जनतंत्र | 
कहत मंतब सोइ रहै कहए मंत्रि जौ मंत्र || ३५४३ || 
भावार्थ : - जनतंत्र का नाम देकर जन संचालन के रथ व् उसका पथ को राजसी किया गया यह कहते हुवे कि अब मंत्री जो मंत्रणाएं करेंगे वह प्रजावर्ग को मान्य होंगी |

सासनहर कीन्हे जौ कहतब सो सबु नीक | 
चरत लीक को आपुना कहते पुरानि लीक || ३५४४ ||
भावार्थ : - पराए कंत के दिखाए पाषाणपंथ पर अग्रसर होते अब सत्ताधारी जो कहते वह सब आधुनिक कहलाता जो कोई अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं का अनुशरण करता उसे वह पुराणपंथी कहते |

स्वत्वाधिकार संगत जहँ जन होत बिहीन | 
जहाँ न प्रभुता आपनी सो तो देस अधीन || ३५४५ || 
भावार्थ : - जहाँ का जनमानस संपत्ति पर से स्वामित्व के अधिकार से विहीन हो जहाँ अपना सम्प्रभुत्व न हो वह देश पराधीन होता है |

सम्पदा परि स्वत्व करि रहे नहीं अधिकार | 
सम्प्रभुता भइँ नाउ की खात पराई मार || ३५४६ || 
भावार्थ : - सम्पति पर स्वामित्व का अधिकार छीन लिया गया, देश की मौलिकता पर बहिर्देशीय के संघात से राष्ट्र की सम्प्रभुता भी नाममात्र की रह गई |

सनै सनै सासनतंत्र भयऊ बरचस्बान | 
जन सधारन होत गए सासक महमहिमान || ३५४७ || 
भावार्थ : - धीरे धीरे शासनतंत्र अधिकाधिक शक्तिशाली होता चला गया, शासक वर्ग महानता को प्राप्त होकर असाधारण होते चले गए जन मानस 'साधारण' कहा जाने लगा  |

रचत बिधि कछु आन कहे रजत भयउ कछु आन | 
भोग बिलासी बान किए बैसे ऊँच मचान || ३५४८ || 
भावार्थ : - संविधान निर्मित करते समय कुछ और कहा गया जब इन शासकों का राज आया तब कुछ और ही कहा जाने लगा समानता की बात करने वाले भोग विलासिता की बानि वरण कर  ऊँची आसंदी पर जा बैठे |

लोकतंत्र जो देहि तौ  आतम बिधिहि बिधान | 
न्याउ हरिदै देस है मूलभूत हैं प्रान || ३५४९ || 
भावार्थ : - लोकतंत्र यदि शरीर है तो  संविधान उसकी आत्मा है, न्याय उसका हृदयदेश है तत्संबंधित राष्ट्र के मूलभूत उसके प्राण है |

 मूलभूत बिनसाइ के तासों होत बिहीन |
मरनासन्न होत जात तंत्र प्रान ते हीन || ३५५०  ||
भावार्थ : - अपने मूलभूत को विनष्ट कर मौलिकता से विहीन कोई लोकतंत्र प्राणहीन होकर अवश्य ही मृत्यु के निकट होता है |




----- ॥ दोहा-दशम ३५३ ॥ -----,

सुनि प्रात जब पाखंडित पण्डितान की तान | 
मूलभूत गह बहिर किए बैसे भीत बिरान || ३५३१ || 
भावार्थ : - प्रात: फिर पांडित्य का पाखंड करने वाले खंडित पंडित की तान सुनी गई जो देश के मूलभूत थे उन्हें बहिर्गृही कर जो बहिर्देशीय मूल थे उन्हें देश के अंतर्गृही घोषित किया गया  |

परबस करिया मूल पुनि चरन साँकरी डार | 
चले पाछि करि चलनि अस संबिधान अनुहार || ३५३२ || 
भावार्थ : - भारत की मौलिकता के चरणों में सांकलें देकर उसे पराए मूल के वशीभूत कर फिर संविधान का अनुशरण करते हुवे देश को पश्चिम के चाल चलन में प्रवृत्त किया गया |

डगर डगर रु गाँउ नगर होत मूल दुखिआर | 
मारे मारे इत फिरे खात पराई मार || ३५३३ || 
भावार्थ : - हिंसावादी बहिर्देशीय समुदाय के घात पर चढ़ा फिर इधर वह देशीय मूल संकटापन्न होकर मार्गों परके नगरों व् गाँवों में जहाँ-तहाँ भटकने को विवश हो गया |

गेह द्वार लुटाए के कहुँ आसरा न आस | 
भूमि भईं पुनि साथरी ओहार दिए अगास || ३५३४ || 
भावार्थ : - घर द्वार लूट लिया गया था, न कहीं आश्रय था कोई आस ही थी  | भूमि ही उस मूल की साथरी तो आकाश उसका आच्छादन था |

जुग जुग लगि बिकसाए के गहे रहे जहँ मूरि | 
तासहुँ जोग लगाए पुनि प्रसरत गए बहु दूरि || ३५३४ || 
युगों युगों तक जड़ें ग्रहण किए जहाँ वह फलाफूला उन जड़ों से ही संयोजित रहकर वह प्रस्तारित हुवा और बहुंत दूर चला आया था | 

बिरवा केरि साखि चहे केतक दूरि पसारि | 
मूरि परि जहँ उपजाई तहँ करि गई पुकारि || ३५३४ || 
वृक्ष की शाखा चाहे कितनी ही दूर प्रस्तारित हो जाए वह वहीँ की उत्पत्ति कहलाती है जिस मूल से व्युत्पन्न होकर जहाँ वह वृक्ष में परिणित हुई | 


रहब सो बासि जेहि बन जाई | सबहिं भाँति अति सुखद सुहाई ||
बनदेबी बनदेब उदारा | प्रगसिहि सम्पद गहे अपारा ||
वह निवासी फिर जिस वन जाकर रहे वह सभी प्रकार से अतिशय सुखप्रद और सुहावना था |  वहां वनदेवी व् वनदेवता अत्यंत उदार ह्रदय थे, वह अपार प्राकृतिक सम्पदा से युक्त होकर प्राकट्य रूप में उपस्थित थे | 

बसिअ रहिअ तब तहँ बनबासी | बीच बीच कुटि कलित सुपासी ||
गहिए रहि सबु  पुण्य करि पुंजा || कोसु कोसु कृत कौसुम कुंजा ||
वनों के मध्य भागों में कुटिया निर्मित करके वहां वनवासी सुखपूर्वक निवास किया करते थे वह सभी पुण्यों के पूंजी से युक्त थे और प्रत्येक कोस पर उन्होने कुसुम कुञ्ज रचित किए हुवे थे || 

पूछे अगमु मग जबु धरि पाएँ | थकित पथिक कहु कहाँ ते आए ||
जगत भरी कर लै सिरु भारा | बालक संग न कोउ दारा || 
मार्ग दुर्गम था जब उन मार्गों में उन निवासियों के चरण  प्रविष्ट होते ही उन्होंने प्रश्न किया : -''अरे श्रमित पथिक ! संसार भर के भार को शीर्ष किए हुवे तुम कहाँ से आए हो ? जबकि तुम्हारे साथ न कोई बालक है और न कोई स्त्री ही हैं ? 
नागर भेसु कंठ मनि माला |  सीस पटिका तिलक दे भाला || 
कासत कौधनि काछनि काछे | मौलिका बाँधेउ कर पाछे || 
तुम्हारा शिष्ट पुरुषों का भेष है , कंठ में मणिमाल्य है सिर पर पट्टिका बंधी है  तिलक चिन्हित मस्तक है | करधनी में काछनी कर्षित की हुई है, कलाई में मौलिका बंधी है | 


अहहु त देसु निबासि हमारे | अहहिं कहाँ कौटुम तुम्हारे  ||
कवन तुम्ह कहँ तुहरे थाना  | कहौ कहँ केर बरे तुअ बाना || 
 तुम हमारे देश के निवासी प्रतीत होते हो,   तुमकौन हो ? तुम्हारा कौटुम्ब कहाँ है ?तुम्हारा वास स्थान कहाँ है ? कहो तो ये तुम्हारा पहनावा कहाँ का है ? 

अहौ कहौ कहँ गाँउ तिहारे | पूछत कौतुक दीठि निहारे ||
कहहु कवन अस कारन होंही | आनि परे इहँ तोहि बटोही ||

कौतुहल मई दीठि किए पेखि पथिक मग जात | 
भाखत मधुर भाखा निज पूछि जबहि सकुचात || 

अच्इ कलस भरि पानि बैस छिनुक बट छाँव भलि | 

कहइहि मृदुलित बानि प्रीति पूरित प्रिय बचन ए | 

हम गौपाल हम करिसाना | बनिज कहत हमहीं जग जाना ||
अजहुँ न हमरे ठाहर ठावाँ | छाँड़ आयउब तिन्हनि गाँवा ||
हम गौपालक हैं हमरा उद्यम कृषिकर्म है हमें वाणिज्यक कहा जाता है | इस समय हमारा ढहरने हेतु कोई स्थान नहीं है इस हेतु हमने उन्हें गाँव में छोड़ दिया है | 



कोलाहलु करि चहुँ ओर निसि घन भोर भइ बिनु भोर करे..,
गाँव नगरिहि फिरि डगरि डगरि ढिंढोरची ए ढिंढोर धरे..,
पुर्बल बसिकर्ता बहिरे बरग हुँत भाजत भारत देस रे..,
पर बसिकर सहुँ अजहुँ सुतंत्र भए दीन्हे असि सँदेस रे..,

देस बसे परबसिया एहि भू किन्ही बहुस खनखण्ड रे
आनि  षंड षंड महुँ पुनि सोइ उद्दंड भरिए बहु घमंड रे
केहि करतल पाहन गहे त  केहि करतल गहे दंड रे
गाँव ठाँव ढहाउ बस्ति दुर्बाद त करत धुनि प्रचंड रे

 लूटि मारु धरु धरु कह भीते बहिरावत गह देस धनी |
नगर अँधियारा  नेम नीति नहिँ छाइहिं चहुँ दिसि निसि घनी ||
खंग दए खलहान खसौट लए खोदि खंद सबु खेह खनी ||
बारहि बार बहुरि बहुरि कछु दिन परि  करिते सोइ करनी ||

नाज पात उपजात कतहुँ कछु त छीनि छीनि लै खावहीं | 
क्रुद्ध बिरुद्ध होतेउ कुबुद्ध सो झुण्ड झुण्ड सहुँ आवहीं || 
छाँडत नयन अँगारी बदन सबु अगन कुंड दरसावहीं |
धाए जहँ तहँ हनत महि पटकत धरत जेहिं केहिं पावहीं || 

अरु सो भारति लोग कहँ कहत पचारि पचार | 
त्राहि त्राहि  पुकारि करत जन जन हाहाकार || ३५३५ || 

संचै सम्पद लुटि लै राखी | चाहें जबहीं दिठावहि आँखी | 
खलु दुसठ कैं उद्दंडता  के देखि रूप अंतर बल थाके | 

गाँव ठेरे बसे तहँ जेते | बोए बिनु रहँ सबहिं के खेते || 

चिंतत मन कछु करम न हाथा | बिरती निसि सब भुज धरि माथा || 

आह बिरंचि भाग कस राच्यो | दारुन दुसह दसा सिरु नाच्यो || 
सोए चन्दा नैन रहँ जागे | जगती जोति पलक न लागे | 

खनखंडित होतब एहि देसा  | सहत परायन्हि भयउ सेसा  || 
सुतंत्रा भई पीट ढिँढोरे | राजे आपु हमरे गह फोरे ||  



जन जन कै आहूति लिए सुतंत्रता दिए नाम | 

लड़े सो तो स्वारथी  सत्ता के संग्राम || ३५३६ || 


देस फुरबारि फूर भए चारहि धरम समूह | 
बसि रहे जहँ भाँति भाँति जाति बरग करि जूह || ३५३५ || 
भावार्थ : - चार धर्म के पुष्पसमूह से युक्त ये देश पुष्पवाटिका के सदृश्य था जहाँ विभिन्न प्रकार की जातियों के अन्तर्वर्ग की मंजरियाँ अपने पुष्प समूह की क्यारियों में वसवासित थी |

हाथ को हाथ सुझे नहि चहुँ पुर नगर अँधेर | 
बाँट देस पुनि सेष महँ सब कहुँ दियो बखेर || ३५३६ || 
भावार्थ : -  सब ओर नीति व् न्याय का घन घोर अभाव कर देश-विभाजन के परिणाम ने एक सुव्यवस्थित सामाजिक तंत्र को शेष भारत में तितर-बितर कर दिया |

जुग लगि पसराए रहेउ मूर गहे बट छाँउ | 
जनमदहु जन्माए रहें उजारि दिए सो गाँउ || ३५३७ || 
भावार्थ : - जहाँ जन्मदाताओं के भी जन्मदाता का छायामयी वट वृक्ष अपनी जड़ युगों तक प्रस्तारित किए हुवे था वे गांव उजाड़ दिए गए |

किए हल खेह बिनु त रहा नहीं हाथ कछु काम | 
बिधि लेखिते लेखत भए भाग बिधाता बाम || ३५३८ || 
भावार्थ : - हाथों को हल व् खेतों से रहित कर आजीविका छीन ली गई थी | संविधान लिखते लिखते भारत के भाग्य विधाता राष्ट्रविरोधी हो गए |

चरत लीक पूरत रीत निज संस्कृति सँजोए | 
कुटिरु बसाए देस बीच बेहढ़ बन के होए || ३५३९ || 
भावार्थ : - अपनी मर्यादाओं, परमपराओं अपनी रीतियों का निर्वाह करते अपनी संस्कृति को सहेजे फिर वह गाँव देश के सघन वनों के मध्य कुटियाओं में निवास करने लगा |

सुवारथ परता उत कर करषत सत्ता सूत | 
अमूरि हुँत हितु नीति किए अहित करि मूरि हूँत || ३५४० || 
भावार्थ : - उधर स्वार्थ परायणता सत्ता की शक्तियों का भरपूर दुरूपयोग करते हुवे  मौलिकता हेतु हितों का अभाव करते हुवे अमौलिकता हेतु हितकारी नीतियां निर्धारण करने में संलग्न हो गई |


बुधवार, 23 जनवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५२ ॥ -----,

संबिधान महँ मेटि जूँ बहिर भीत के भेद | 
रेख धरे पुनि नाउ के सीवाँ गई बिभेद || ३५२१ || 
भावार्थ : - संविधान ने ज्योंहि बाह्य व् आंतरिकता में परस्पर भिन्नता का अभाव किया त्योंहि भारत की सीमा रेखा विभेद्य होकर नाममात्र की रह गई | 

तादात्मए सहुँ बिभेदि सीँव रेख के संग | 
देस भेस परिबेस कइँ गइँ मरियादा भंग || ३५२ २ ||
भावार्थ : - तादात्म्य अर्थात दो भिन्न वस्तु, व्यक्ति अथवा व्यक्तियों का समुदाय के परस्पर अभिन्न होने के भाव द्वारा विभेदित सीमारेखा के साथ इस देश की उसके परिवेश की उसकी वेशभूषा उसकी भाषा उसके आचार-विचार, आहार-विहार की मर्यादाएं भी भंग होती चली गईं | 

देस मान मरयाद जौ जुग लग रहैँ अभेद | 
संबिधान के लेखि अस छन महुँ गइँ छतछेद || ३५२३ || 
भावार्थ : - युगों तक अभेद्य मर्यादाओं के कारण विश्वभर में जो इस देश की प्रतिष्ठा थी संविधान के निर्मित होते ही क्षत-विक्षत होकर वह क्षणमात्र में ही धूमिल हो गई | 

धर्म संस्कृति आपुनी रच्छत अपुनी बान | 
देस भूमि हुँत जौ बीर दियउ प्रान बलिदान || ३५२ ४ || 
भावार्थ : - अपनी धर्म -संस्कृति अपनी अस्मिता अपनी देशभूमि के लिए जिन वीरों ने प्राणों का बलिदान दिया था |

देस रिपु अपनाई गए  बिसर गयो सो बीर | 
सुरते नीलम लाल सों  सुरते मोती हीर || ३५२५ || 
भावार्थ : -  देश के शोषणकर्ता शत्रु अपनाए गए  देश पर बलिदान होने वाले उन शूरवीरों को विस्मृत कर दिया गया | सत्ता में विराजित स्वार्थपरता को स्मरण रहा तो केवल हीरे मोती का रहा, लाल और नीलम का रहा |

देस बिभागा करत पुनि तासु पीठ दे भारु | 
 बिधि बिधान तैं पोषि गए पुनि हितु सोषन हारु || ३५२६ || 
भावार्थ : - (इस प्रकार )देश का विभाजन कर पुनश्च उन्हें शेष देश की पीठ पर भारभूत करते हुवे स्वहित हेतु दूसरों के हित का शोषण करने वाले देश से भिन्न उक्त दुष्ट समुदाय को संविधान द्वारा पुष्ट किया गया  |

देस भाष पुनि भाषते बसत पास प्रतिबेस
अंतर भीत ब्यापते गह गह करिअ प्रबेस || ३५२६ || 
भावार्थ : - देश की वेशभूषा उसकी भाषा का अपहरण  कर अब तक पास पड़ोस में वसवासित वह शोषणकर्ता शनै शनै देश के आतंरिक भागों में भी व्याप्त होते चले गए फिर तो गृह गृह में उनका प्रवेश होने लगा |

निज परिहार पराए की सीखि सिखाई बात | 
पाषानु पथ पद दिये कहत गय ए अधुनात || ३५२७ || 
भावार्थ : - अपनी आधुनिक व् उन्नत सामाजिक व्यवस्था का तिरष्कार करके परायों की पाषाणपंथी बातों में आकर सत्ताधारी इस देश के चरण को पाषाणपंथ की ओर बढ़ाते चले गए यह कहते हुवे कि यह आधुनिकता है | क्या धर्म-जाति से विहीन पाषाणयुगी मनुष्य आधुनिक है ?

जो मानस के हंस रहँ याके फेरे फेर | 
अधबर तौ तीत्तर भए अध्बर भयो बटेर || ३५२८ || 
भावार्थ : - इनका द्वारा भारतीय समाज का इस भांति परिवर्तन हुवा कि जो मानस के कल हंस थे वह आधे हंस और आधे बगुले भी न होकर आधे तीतर आधे बटेर हो गए | अर्थात इनके सामाजिक परिवर्तन से एक संगठित सामाजिक व्यवस्था विघटित होती चली गई |

जनमानस परि एहि भाँति थापत निजी बिचार | 
जनमत संग्रह बिनु कहत सब कहुँ अंगीकार || ९३५२ -क || 
गहत सिँहासन आपहीं रचित गए संबिधान | 
ताहि संगत अनजानत भारत की संतान || ३५२९ -ख || 
भावार्थ : - इस प्रकार अपने निजी विचारों को देश पर थोपकर जनमत संग्रह के बिना ही उसे अंगीकार कहते हुवे  भारत की मूलभूत संतान को अँधेरे में रखकर स्वयं सत्ताधारी दल द्वारा संविधान निर्मित किया गया |

हम भारत के लोग ते संगत भारत बासि | 
अधीनकर्ता देस के कीन्हि देस निबासि ||  ३५३० || 
भावार्थ : -'' हम भारत के लोग'' इस एक वाक्य से भारत के मूलभूत निवासियों के संगत इस देश के अधीनकर्ता बहिर्देशीय समुदाय को भी देश का निवासी घोषित किया गया ||




सोमवार, 21 जनवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५१ ॥ -----,

दासकरिता बदली ते बदले नहि जो देस  | 
बिगरी न बानी बान न बिगरी नहि परिबेस || ३५११ || 

भावार्थ : - शब्ताब्दियों तक के दासकर्ता से अन्य दासकर्ता की अधीन होने के पश्चात भी  जिस देश की वेशभूषा जिसका परिवेश विकृत नहीं हुवा ,  परिवर्तित अधीनता के पश्चात भी यह  देश अपरिवर्तित रहा  |

बहिर देस के जनित पुनि होत गयउ एकदेस | 
बिगड़े भूषा भाष सों बिगड़त गए परिबेस || ३५१२ || 
भावार्थ :  (फिर विभाजन के पश्चात जब )बहिर्देश के मूल और इस देश के मूलभूत जब एक ही देश के कहलाने लगे तब  इस देश की विकृत हुई वेशभूषा के साथ इसका पावन परिवेश ( आहार-विहार, आचार-विचार )भी विकृत होता चला गया |

धरमी धरम बिहून भए बरनी बरन बिहीन | 
दूजे मेले मेलि के होतब गयउ मलीन || ३५१३ || 
भावार्थ : - दूसरों की मलिनता के मिलावट से मलीन होकर इस देश में प्रादुर्भूत धर्मानुयायी धर्म से विहीन हो गए, वर्ण धारण करने वाले वर्णी वर्ण से विहीन हो गए |  और यह भारत इंडिआ होता चला गया  |

राजत जुग लगि देस परि खायउ लूट खसौट | 
संबध तिन्हनि आपुने सासनहर दिएँ ओट || ३५१४ || 
भावार्थ : - शताब्दियों तक देश पर राज कर उसका आर्थिक शोषण करने वाले बहिर्देशीय शत्रु समुदाय से सत्ताधारी ने आत्मीय सबंध स्थापित किया और देश स्वतन्त्र होने के पश्चात उन्हें अपना सरंक्षण देते गए  |

बहिर देसिअ बरग संग जाके जुगे सँजोग | 
पूछे जन जन कहु कहा रहँ प्रधान के जोग || ३५१५ || 
भावार्थ : - वर्तमान का जनमानस प्रश्न करता रहा, बहिर्देशीय शत्रु समुदाय से जिस व्यक्ति के आत्मीय सम्बन्ध थे क्या वह इस देश के प्रधान पद के योग्य था ?

अस सत्तारूढ़ि दल तैं बिरचित गै सँबिधान | 
देस हुँत दुर्भाग लिखे तिनके हुँत कल्यान || ३५१६ || 
भावार्थ : -  जो दासकर्ता को संरक्षण दे ऐसे सत्तारूढ़ दल के द्वारा देश का संविधान निर्मित हुवा, और संविधान में सत्ताधारी के इन आत्मीय जनों के भाग्य में सुख -सौभाग्य और भारतवासियों के भाग्य में दुर्भाग्य लिखा गया |

गहे जो दल सिन्हासन रचे सोइ सँविधान | 
कहा ए उचित अकि ए हुँत को परिषद्  कृत आन || ३५१७ || 
भावार्थ : - क्या किसी सत्ताधारी दल द्वारा ही किसी राष्ट्र का संविधान निर्माण करना न्यायसंगत है ? अथवा इस हेतु कोई स्वतन्त्र स्वायत्त संस्था अथवा समिति गठित नहीं होनी चाहिए थी.....?

सत्ताधारि सोंहि बिबस अबरउ लेखनहार | 
ता प्रियजनहि हुँत एहि बिधि लिखेउ गै अधिकार || ३५१८  || 
भावार्थ : - (कदाचित) सत्ताधारी की आज्ञा से विवश होकर संविधान के अन्य रचनाकारों ने भारत के दासकर्ता किन्तु उनके प्रियजनों हेतु अधिकार लिखकर उन्हें देश की सम्प्रभुता से संपन्न किया गया |

गेह भया कि देस भया दुनहु लहैं मर्याद | 
बहिर चरन को लँघे नहि सोई सीवाँ वाद || ३५१ ९ || 
भावार्थ : -  गृह हो अथवा कोई देश हो दोनों की अपनी अपनी मर्यादाएं होती हैं कोई बाह्य तत्व इसका उल्लंघन  न करे यही राष्ट्रवाद अथवा सीमावाद है |

राष्ट्रवादसों वासिन , के का हो परिमान । 
जथोचित नेम संग बँध रहें स्थित थितमान ।२११८ । 
भावार्थ : -- राष्ट्रवाद किसे कहना चाहिए : -- "जो राष्ट्र-निवासी यथोचित विधि-विधान के आदेश का पालन करने में संलग्न हों एवं स्थित सीमाओं के अंतर्गत कृत-संकल्प होकर स्थितिमान् रहें वह  राष्ट्र वाद है....."

देस संग को सीँव हैं सीँव संग को देस | 
देस जनित के सहित जौ रखै तासु परिबेस || ३५२० || 
भावार्थ : - किसी राष्ट्र से ही उसकी उस सीमा का अस्तित्व हैं उस सीमा से किसी राष्ट्र का अस्तित्व हैं जो उसके मूल निवासियों सहित उसकी भूमि पर प्रादुर्भूत धर्म-संस्कृति,आचार-विचार व् उसके आहार-विहार की रक्षा करे | 

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

----- मिनिस्टर राजू १८८ -----


राजू : - मास्टरजी ! तीन चार सौ वर्ष पश्चात जब हम लगभग सभी भारतीय संकरित हो जाएंगे तब हमें जाति का महत्व समझ आएगा..,

मास्टरजी : - तब अमेरिका बोलेगा ई देखो धर्म-जात्ति.....और हम बोलेंगे ऐसो पतंगे तो हमने उड़ा उड़ा के कटवा दी हैं.....
राजू : - हाँ! तबतक ईंधन के सारे स्त्रोत समाप्त हो चुके होंगे और वो गोमय के कंडे की आंच पर सैंकी गई रोटी से गुड़ और माखन का स्वाद लेकर कौन सा गाना गाएगा.....?

मास्टर जी : -- अरे वही ह्रदय में सनेह हो तो छाछ भी दही बन जाती है..,
राजू : - तब भारत बोलेगा इसकी दही की.., ऐ अफगानिस्तान दे तो इसके कान के नीचे..,
मास्टर जी : -- लो वो इंडिआ के बोलने से थोड़ ही दे देगा..,
और फिर इधर ''बहनजी'' के साथ गठबंधन करने वाला इस्लाम अपने विवाहिक अवसरों पर छंद पडेगा
राजू : - कौन सा वाला..?
मास्टर जी : -- अरे वही ! छन पकैया छन पकैया छन्नी ऊपर गाछ |
जनम संगिनि माखन सी साली खट्टी छाछ ||
और हम भारतीयों की हम भारत की संतानों की तो दास्ताँ तक न होगी दास्तानों में
हम ''मैक मोहन सींग खान'' बने पाषाण युग की कोई नई दास्ताँ लिख रहे होंगे.....

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५० ॥ -----,

रजत राज गह सूत कृत दबाउनी नै नीति | 
बिधि बिधाता रचत गै जग बिपरीतक रीति || ३५० १ || 
भावार्थ : - (इस प्रकार) सत्ता हाथ लगते ही उसकी शक्तियों का दुरूपयोग कर दमनकारी नेतृत्व व् नीतियों की परिकल्पना करते हुवे विधि विधाता विश्वमान्य नियमों के विपरीत नियमों की रचना करते गए |

राज राजना = सत्ता हाथ आना
सत्ता सूत्र   = शासन शक्ति
गह = ग्रहण करना
कृत = रचना, परिकल्पना
दबाउनि = दमनकारी
नय नीति = नेतृत्व व् नीति
जग विपरीत = विश्वमान्य नियमों के विपरीत

विहित करतब करत करत बंसागत को जातु | 
धरम जात कहुँ संगती धात धात महँ धातु ||  ३५०२  || 
भावार्थ : - एक निश्चित स्वभाव का पालन कर किसी निश्चित कर्म को करते करते  कोई वंशानुगत जातक धर्म व् जाति के संगत अपने रक्त में परिष्कृत धातु धारण करता है | यह एक वैज्ञानिक स्वयं शोध है |

बासन बसन सों जहँ सबु सुख साधन करि जंत्र | 
ए अवसिक नहि कि होत तहँ सुदृढ़ समाजिक तंत्र || ३५० ३ || 
भावार्थ : - जो राष्ट्र भोजन वासन वसन के सह समस्त भौतिक संसाधनों से युक्त हो अथवा कोई राष्ट्र या उसकी भूमि की आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ हो तो यह आवश्यक नहीं कि उसकी सामाजिक व्यवस्था भी उतनी ही सुदृढ़ होगी |

होइ सकै ता देस करि सुदृढ़ समाजिक तंत्र |
बासन बसन सों जहँ सबु सुख साधन करि जंत्र || ३५०४ ||  
भावार्थ : - किसी राष्ट्र की समाजिक व्यवस्था यदि सुदृढ़ है तो उसकी आर्थिक व्यवस्था भी सुदृढ़ हो सकती है

पाहन जुग कर मानसा लहै धरम नहि जात | 
सुघरपन दुराई रहे बन गोचर कहलात ||३५० ५ || 
भावार्थ : -  पाषाण युग का मानव इस हेतु पाषाण बुद्धि का था क्योंकि उसने वह मानवोचित धर्म व् जाति धारण नहीं की थी जो उसे पाशविकता से पृथक करती है इसलिए धर्म व् जाति से रहित मनुष्य का स्वभाव असभ्य वनचर के समदृश्य होता है |

पाखन वाद निरुपत गहँ पाहन जुगी बिचार | 
पछिआतिकरन देस किए दिए भरि दोषु बिकार ||३५० ६ ||
भावार्थ : - धर्म के नाम पर छल करने वाले पाखंडवाद का निरूपण करते हुवे जाति व् धर्म से रहित उक्त पाषाणयुगी विचारों ने देश की अग्रवर्ती व् सुदृढ़ सामाजिक व्यवस्था का पाश्चात्यीकरण कर उसे दोष व् विकारों से भर दिया |

अपने मैले मेलते बसिते भीत बिरान | 
कुलवान एहि देस जनहि करतब गयो मलान ||३५०७ || 
भावार्थ : - देश के अंतर में वसवासित भारतीय बने बहिर्देशीय समुदायों ने अपनी मलिनता के मिलावट से इस देश के कुलवान जनमानस को मलीन करते गए |

पाखंडिक गै जापते राम राम राम हे राम | 
पछिआतिकरन के अगहुँ लाह लहे इस्लाम || ३५०८ || 
भावार्थ : - धर्म के नाम पर छल करने वाला पाखंडवादी तो राम राम हे राम कर चल बसा किन्तु आगे इस्लाम ने देश के इस पाश्चात्यीकरण का भरपूर लाभ उठाया |

पछिआति करन देस किए  कहै एही अधुनात | 
सत्ता वादी जो कहे दिन कहुँ रात त रात || ३५०९ || 
भावार्थ : - देश की अग्रवर्ती सामाजिक व्यवस्था को पश्चवर्ती कर उसे आधुनिक कहा गया | अब  देश को सत्तावाद संचालित करने लगा वह दिन को रात कहता तो सभी को मान्य होता |

अधुनातन को भया नहि अहो बांचत अँगरेजि | 
को कलीसाई को भए इस्लामिक रँगरेजि || ३५१० || 
भावार्थ : - इस प्रकार  पाश्चात्यीकरण से अंग्रेजी बांचता देश आधुनिक तो नहीं हुवा प्रत्युत वह भारत से इंडिया हो गया और भारतीयों में संकरित जाति से संकरित धर्म का जातक होते हुवे कोई ईसाई तो कोई रंगरेज इस्लामिक हो गया |




बुधवार, 16 जनवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३४९ ॥ -----,

बहिष्कार पुनि आपुना सम्मुख देख निहार | 
दीन दरिदर देस लिखत दियो परायो भार || ३४९१ || 
भावार्थ : - फिर अपने सम्मुख अपना सामाजिक बहिष्कार होते देखकर इन विचारों ने एक दुर्बल व् अकिंचन राष्ट्र के भाग्य में परायों का भार भी लिख दिया |

नगर अँधेरा मेटते भेद भरम करि नास | 
न्याय नभ निरनय नभस प्रेसत तबहि प्रकास || ३४९२ || 
भावार्थ : - नियम व् नीतियों का प्रादुर्भाव जब अंतर के दृष्टिभ्रम को नष्ट करता है न्याय के नभ से निर्णयों का सूर्य भी तभी प्रकाश प्रेषित करता है |

भेद दीठि बिहुने रहइँ तिनके रचे बिधान | 
खोट खरे रु भले बुरे भए सब एकै समान || ३४९३ || 
भावार्थ : - इनके विधान भेद बुद्धि से रहित थे जो अंतर करने वाली दृष्टि को भ्रमित करते थे इन विधानों की दृष्टि में निकृष्ट-उत्कृष्ट,सत्य-असत्य, हिताहित, अपने-पराए आदि विपरीत स्वभाव एक ही समान थे |

भेद दृष्टि = दो व्यक्ति अथवा वस्तुओं में परस्पर अंतर करने वाली दृष्टि
विहुना = विहीन

देसी रु देसावर महँ अंतर करे  न कोइ | 
अभारती कहुँ  भारती एकै कहैं रहँ दोइ || ३४९४ || 
भावार्थ : -  देशी व् विदेशी में कोई अंतर न करने पाए इस हेतु   भारत से भिन्न देश के वंशजों को और भारतीय को  'हम सब एक है' का नारा देकर एक ही कहा गया जबकि यह भिन्न हैं |

भरता पेटे भुक लिखे अपने पेटे भोग | 
भार गहे अस दास भए बहुर  देस के लोग || ३४९५ || 
भावार्थ : - देश की प्रभुता के स्वामी के भाग्य में भूख लिखकर इन विधान निर्माताओं ने अपने भाग्य में भोग और विलासिता लिखी, इस प्रकार क्षुधा के संग बहिर्देशीय दासकर्ता का भार भी वहन किए देशवासी पुनश्च दास  बनते चले गए |

न इतिहास न बिदुबान न ग्यान न त बिग्यान | 
अजहुँ जन महँ सोइ मने जो तिनके अनुमान || ३४९६  || 
भावार्थ : - न इतिहास की न वर्तमान की, न ज्ञान की न विज्ञान की,  अब भारत के जनमानस में वही मान्य होता जो इन सत्ताधारियों की अनुमानित अवधारणा होती  |

एक धर्म में कोई वर्ग उपेक्षित हो तो आवश्यक नहीं वह दूसरे धर्म में भी उपेक्षित हो
पर नहीं : - खाता न बही - जो सत्ताधारी कहें वो सही.....

सो बिधि बिनासइता बिधि बिधुंसिक सो बिधान | 
नेम बिपर्यासित जोइ होतब बिधुतसमान || ३४९७ || 
भावार्थ : - वह विधि विनाशकारक है वह विधान विध्वंशक है जो नियमों के विपरीत होकर स्वार्थ के आशय से युक्त हो |

मानस हुँत सब नेम बिधि मानस ता हुँत नाहि | 
अपुनी जीवा जोगते  जोग रखै सब काहि || ३४९८ || 
भावार्थ : - प्रकृति से अन्यथा मनुष्य द्वारा रचित नियम निबंधन मनुष्य हेतु होते हैं मनुष्य उन हेतु नहीं होता एतएव ये परिवर्तन शील होते हैं  नियम निबंधन वह हैं जो निज मर्यादाओं की रक्षा करते हुवे अन्यान्य को भी मर्यादित करे |

रजते राजा की कही सके नही को काट | 
कबहुँ केहि जो बोलते गहे दंड सो डाँट || ३४९९  || 
भावार्थ : - किन्तु इन सत्ताधारियों के दल द्वारा निर्मित विधान में विहित किए गए नियम अकाट्य थे भविष्य में इन नियमों के विरोधी हेतु तिरष्कार के सह दंड का उपबंध किया गया |

बहिर देसिअ भारा जो कहिते साख पराइ | 
काटन खावन धाइहीं देताब धरम दुहाइ || ३५००  || 
भावार्थ : - अब बहिर्देशीय भार को कोई भारत से अन्यथा प्रादुर्भूत धर्म शाखा कहता ये सत्ताधारी धर्म की दुहाई देकर उसे ही काट खाने को दौड़ते |


मंगलवार, 15 जनवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३४८ ॥ -----,

कहँ फिरे भइँ भोर भोर करत रोर तमचोर | 
पलक ओहारि उघारि त जोहि न कतहुँ अँजोर || ३४८१ || 
भावार्थ : - याम उद्घोषक कोलाहल करके भोर होने की सूचना देते फिर रहे थे पलकों ने पटाच्छादन त्यागकर  देखा तो स्वातन्त्र का प्रकाश कहीं भी दर्शित नहीं हुवा  |

रैनि के कर धान गहे मसि मुख मेढ़ मुँडेर | 
चौपट द्वारि छाए रहिँ चहुँ पुर नगर अँधेर || ३४८२ || 
भावार्थ : -  सम्प्रभुता अधीनकर्ता के ही करतल में थी मेढ़ व् मुंडेरों पर दासता का कालापन व्याप्त था, न्याय नीति व् नियम का सर्वत्र अभाव किए देश का द्वार चौपट हो चुका था |

छाजन भाजन देइ दै गह छत छाम छदाम | 
लिख मिले माथ इस्लाम इस्लाम रु इस्लाम || ३४८३ || 
भावार्थ : -अपने एक क्षत्र राष्ट्र को वारम्वार खंडित कर मात्र चौथाई भाग का एक निर्बल व् अकिंचन शेष ग्रहण किए वह अन्धेरा प्रत्येक देश खंड के मस्तक पर इस्लाम इस्लाम और इस्लाम लिखता गया |

एहि छदाम कहु केहि के लखे नहीं कछु नाम | 
भूरे गौतम महबीर भूरे नानक राम || ३४८४ || 
भावार्थ : - किन्तु वे देश किसके थे ये शेष किसका है वह यह नाम लिखना भूल गया, वह भूल गया कि ये देश राम के थे गौतम- महावीर के थे और नानक के थे और ये शेष उन्ही का है |

और अब ये दासता की कलुषता जम्मू, कश्मीर यहाँ तक की अयोध्या में भी इस्लाम लिखने पर तुली है जो एक किरण की आशा थी वह भी निराशा में परिवर्तित होती जा रही है.....

सबहीं  कतहुँ ब्यापते भय पूरित घन काल | 
रैन बिराम बिनु बिलखिहि जहँ तहँ काल ब्याल ||  ३४८५ || 
भावार्थ : -  स्वतंत्रता के प्रभात से रहित सर्वत्र भय पूरित दासता की कालिमा व्याप्त किए वह परतंत्रता की सघन रात्रियाँ ही थी, और न्याय नियम नीतियों के अँधेरे में जहाँ देखो वहां हिंसक निष्ठुरता
दिखाई दे रही थी |

सुबारथ परत रहइँ रत करत जनहि मति भ्रंस | 
भाजत भाजत देस पुनि राखन भाजक अंस || ३४८६ ||
भावार्थ : - जनमानस की बुद्धि भ्रमित कर उधर स्वार्थपरायणता देश को वारंवार विभाजित करते भाजाकांश की ही रक्षा में संलग्न थी  |
भाजक अंश = वह भाजक जिसे किसी राशि अथवा देश में भाग देने पर कुछ शेष न रहे |

गहत राज भएँ काज सब देस काल बिपरीति | 
निज अँध मतहि दुज सिरु दए गहतब स्वहित नीति || ३४८ ७ || 
भावार्थ : - सत्ता हाथ आते ही अब उसके सभी कार्य देश काल के विपरीत हो चले | स्वयं के लाभ की नीतियां ग्रहण करते वह निज कुत्सित विचारों को दूसरों पर थोपती चली गईं  |

चरन चरन कुचालि चलत भेद बुद्धि भरमाए | 
करत जतनी जान जन अपने कवन पराए || ३४८८ || 
भावार्थ : -  ये विचार अंतर करने की दृष्टि को भ्रमित कर चरण चरण पर कुचालें चलते हुवे इस प्रकार की चतुराई करते कि भारतीय जनमानस को यह ज्ञात न हो पाए कि कौन इस देश के मूलभूत हैं कौन नहीं |

देसाबर परपंथि हुँत पथ पथ होत उदार | 
मूर बिहूना देस करत अपनी साख बिदार || ३४८९ || 
भावार्थ : - स्वराष्ट्र से भिन्न अन्य राष्ट्र के लुटेरे समुदायों हेतु ये पंथ पंथ पर उदारता का आश्रय लेते हुवे देश  को उसकी मौलिकता से रहित कर अपनी ही शाखाओं को काटते गए |

मलीन मत सहुँ मेलते आप त भयउ मलीन | 
औरन को मलिनाए सो जौ जन रहैँ कुलीन ||३४९ ० || 
भावार्थ : -कलुषित विचारों के समागम से उत्पन्न ये विचारक स्वयं तो मूल व् कुलहीन होते गए  और जो जनमानस कुलीन था अपने आभामंडल के प्रभाव से यह उन्हें भी मूल व् कुलहीन करते चले  |











   

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३४७ ॥ -----,

पराए भए गह बाहुड़े गेहि भयो बहिआरु | 
नित प्रति दिबस होइ रहे गेह सीँउ बिसरारु || ३४७ १ || 
भावार्थ : - पराए गृह के भीतर ही रहे गृह स्वामी बाहर हो गए अब उस गृह की मर्यादाऐं, उसकी सीमाऐं नित्य प्रतिदिवस नष्ट-भ्रष्ट होने लगी |

बँधा बँधाआ बँसोरा बाँटत दियो बखेर  | 
छाड बसेरा आपुना उड़ि उड़ि चले पखेर  || ३४७२ ||  
भावार्थ : - सुव्यवस्थित भारत को विभाजन ने बिखेर कर रख दिया पूरा देश अस्तव्यस्त हो चला था पक्षी अपने सदियों के बसे बसाए बसेरों को छोड़ते चले जा रहे थे |

जुग जुग केरा बसउना जुग जग का बसबास  |
दोइ पलक में ऊजड़ा सब कहुँ भया बिनास ||३४७३ || 
भावार्थ : - युगों से वसवासित वास,  वस्तियां दो ही क्षण में उजाड़ दी गईं इस उजाड़ से सर्वत्र विनाश ही विनाश दृष्टिगत होने लगा | 

बिछड़े भुइँ सों बाछड़े बिछड़े हल सों खेह | 
रासि बिरानी लागते रीते भए सब गेह || ३४७४ || 
भावार्थ : - भूमियों से उनके वत्सल वियोजित हो गए खेतों से हल वियोजित हो गए भिन्न देशीय समुदाय के अत्याचार से पीड़ित गृह गृहवासियों से रिक्त होते चले गए |

अजहुँ सुभाग सों भया ए सुन्दर सुखद सँजोग | 
सुवाधीन ए देस भयो सुतंत्र भए सब लोग || ३४७५ || 
भावार्थ : - सौभाग्यवश ऐसा सुन्दर सुखद संयोग हुवा ये देश अब स्वाधीन हो गया है और सब लोग स्वतन्त्र हो गए हैं |

कहे ढँढोरा पीट के ढिँढ़ोरची सब गाँउ | 
पुरजन ते उर मेलि के सब कहुँ देत बधाउ || ३४७६ || 
भावार्थ : - ऐसा कहते उधर उद्घोषक गाँव गाँव में ढिंढोरा पीट कर यह उद्घोषणा कर रहे थे और पुरजनों को ह्रदय से लगाते हुवे व् सब को शुभकामनाएं देते चल रहे थे  |

गावहु मंगल गान अरु बारौ घिउ के दीप | 
द्वार द्वार देइ के देहर करौ उदीप || ३४७७ || 
भावार्थ : - सब मंगल गान गाओ ''घी के दीपक जलाओ'' और द्वार द्वार पर आधार कर अपनी देहलियों को उद्दीप्त करो  |

सुवारथ परता कर अस गहे राज अरु पाट |
सकल देस बवनाए के करतब बारह बाट || ३४७८ || 
भावार्थ : - समूचे राष्ट्र को खंड खंड कर उसके सुव्यवस्थित समाज को अस्तव्यस्त करते इस प्रकार सत्ता सूत्र स्वार्थ परायणता के हाथ लग गया |

अरून चूढ़ के बोल ते होत नही जूँ भोर | 
स्वाधीनता मिले नहीं पीटत जगत ढिँढोर || ३४७९ || 
भावार्थ : - जिस प्रकार मुर्गे के बाँग दे देने भर से भोर नहीं होती उसी प्रकार जगत में ढिंढोरे पीटने भर से स्वाधीनता प्राप्त नहीं होती  |

भूमि गई बिभूति गईँ गया नहीं परि कोइ | 
देस भीत बसबास रहँ अधीनकरिता सोइ || ३४८० || 
भावार्थ : -  एक बृहद भूमि खंड विभक्त होकर चला गया उसकी भूसंपदा चली गई किन्तु भाजक नहीं गए |  देश के शेष भूमि व् शेष  भूसंपदा पर अधिकार स्थापित किए वह भाजक अधीनकर्ता देश में ही निवासित रहे |

शनिवार, 5 जनवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३४६ ॥ -----,

भारत सब कइ होइ जूँ भया जगत का देस | 
बाकी भूमि होत गई सेस संग अवसेस || ३४६१ || 
भावार्थ : - भारत देस जब भारतियों का न होकर सबका देश हो गया तब उसकी भूमि खंड-खंड होकर शेष से अवशेष मात्र रह गई |

अजहुँ सार्बिक होइहि त रहिइहिं नहि अबसेष | 
सरनार्थि होइ जाइब  देसज राउर देस || ३४६२ || 
भावार्थ : - यदि अभी भी भारत सबका देश होगा तो यह भूमि अवशेष मात्र भी नहीं रहेगी और भारतीय अपने ही देश में शरणार्थी होकर रह जाएंगे  |

को देस भू तिन्हनि करि  भयउ मूलगत जेतु |
पर ते को निजबसताइ गहिब जात तिन हेतु ||३४६३ || 
भावार्थ : - कोई राष्ट्र अथवा राष्ट्र भूमि पर प्रभुत्व होता है जो उस राष्ट्र के निर्माण में मूलभूत होते हों | दूसरों के अधीनस्थ कोई स्वत्व अथवा स्वाधीनता उस मूलभूत के हेतु ही प्राप्त की जाती है |

कोई राष्ट्र उनका होता है जो उसके निर्माण में मूलभूत हैं कोई अधीनता उनके विरुद्ध कारित की जाती है कोई स्वाधीनता उनके निमित्त प्राप्त की जाती है

अधीन प्रभुत स्वाधीन होत परायो हूँत | 
स्वाधीन तब होइ नहि  वाके मूरी भूत || ४३४६ || 
भावार्थ : - किसी राष्ट्र के अधीन हुवे सम्प्रभुत्व की स्वाधीनता यदि राष्ट्र से भिन्न व्यक्ति, व्यक्तियों अथवा समुदाय हेतु हो तब उसके मूलभूत स्वाधीन न होकर पराधीन ही रहते हैं |

होत जात सो देस निज संप्रभूत तैं दूर | 
मौलि अधिकृति ते अधिकृत भवतु परायो मूर || ३४६५ || 
भावार्थ : - वह राष्ट्र अपने सम्प्रभुत्व से दूर होता चला जाता है जिसके संविधान में स्वयं से भिन्न अन्योदर्य मूल, मौलिक अधिकारों से संपन्न हों |  

एहि देस स्वाधीन किए सीस बाँधि तलवार | 
कहा आधिकरिता बहुरि करतन सासनहार || ३४६६ || 
भावार्थ : - सिर पर तलवार बांधकर अपना रक्त बहाते हुवे इस देश को क्या इस हेतु स्वाधीन किया गया था कि उसका आधिकर्ता ही अधिकारों से समृद्ध होकर उसपर पुनश्च शासन करे |

कहा प्रथम आधिकरिता  केर उत्तराधिकारि | 
दुज ते लहि स्वाम पुनि देइ जाति करधारि || ३४६७ || 
भावार्थ : - किसी स्वामी द्वारा अपनी सम्पति पर द्वितीय बलात आधिपत्य कर्ता से प्राप्त किया गया स्वामित्व क्या प्रथम बलात आधिपत्य कर्ता अथवा उसके उत्तराधिकारी वंशजों को पुनश्च हस्तांतरित की जाती है क्या |

प्रभुत बसीभूत भै पुनि  प्रभुता भइ तब दासि | 
आधिकर्ताधिबासि ही  भयो बहुरि जबु सासि || ३४६८ || 
भावार्थ : - ( किन्तु भारत के सत्ताधारियों ने ऐसा किया ) स्वाधीनता  पश्चात जब अधिवासी अधीनकर्ता को शासन करने का अधिकार प्राप्त हुवा तब देश का सम्प्रभुत्व उसके वशीभूत हो गया और उसकी साधन सम्पतियाँ उसकी पुनश्च दासी हो गईं |

एहि पाटल बर्नारुनिम पाहन कर इतिहास | 
कहत अधिबासि कर रचे करत देस कहुँ दास || ३४६९ || 
भावार्थ : - यह लालगुलाबी पत्थरों का इतिहास इस बात का साक्ष्य है कि इसे स्थायी रूप से निवासित एक भिन्न राष्ट्र के धार्मिक समुदाय ने इस राष्ट्र को अधीन करते हुवे रचा था |

खैँचते एकै रेख ते देस भया परदेस | 
परबस पड़िया बासिआ तहँ बासी रह सेस || ३४७० || 
भावार्थ : -एक रेखा खींचते ही किसी के लिए यह देश विदेश हो गया, और इस राष्ट्र का मूलभूत होकर भी वह स्वाधीनता से शेष होकर पराए के वशीभूत ही रहा |



बुधवार, 2 जनवरी 2019

-----॥ धर्मो रक्षति रक्षित: ॥ -----



बसे देस बवनाए जो , रहि सो अपने ठाट ।
एक एक कह सबहि  कछु करिया बारह बाट ॥ ३२६१ ॥ 
भावार्थ : -- जो पराए हैं और वासी बने इस देश में बसे हैं इनके कारण जब से इस देश का एकीकरण हुवा तब से इस देश की  सस्कृति छिन्न भिन्न हो गई और यह सर्वतस् नष्ट-भ्रष्ट हो गया । " हम सब एक हैं" हमारे  रक्त का रंग एक है" ईश्वर अल्ला एक है" " क्या काला  क्या सफ़ेद सब एक हैं"  इनमें कोई भेद नहींहै । गौमाता का तो क्या ये भ्रूण का भी भक्षण करते हैं और कहते हैं हमारा खान-पान एक है, बेबे ( बहन )  कब बीबी  बन जाती है पता नहीं चलता और  कहते हमारी संस्कृति एक है ॥ है ? 

 ऐसा कुत्सित एकीकरण कर इन्होने इस देश का बारह बाट कर दिया.....

बारह बाट : -- मोह, दीनता, भय, ह्रास, हानि, ग्लानि, क्षुधा, तृषा, क्षोभ, व्यथा, मृत्यु और अपकीर्ति ये बारह बाट हैं

बिगड़ा था घर आपना कुलाचार परिहाए । 
तापर लूट मचाए के पड़िया आन  पराए ॥ ३२६२ ॥ 
भावार्थ : -  कुलगत रीति-नीति का  परित्याग कर कोई गृह यदि पुरस्तात्  कुमार्गगामी हो उसपर बिगड़ैल  परिपंथ  वहां आकर अधिकार संपन्न हो जाए  तब सन्मार्गी की भी कुमार्गी होने की संभावना बनी रहती है ॥

यह देस सो देस जहां रहँ सब जीअ सुखारि । 
राम रमे बन बन तहाँ कुञ्ज कुञ्ज गिरधारि ॥ ३२६३॥ 
भावार्थ : -- यह देश वह देश है जहाँ संसार के सभी जीवंतकों को जीवन का अधिकार है । यहां वन वन में भगवान श्री राम का व कुञ्ज कुञ्ज में गिरधारी का वास हुवा ॥ 

खेत करन कस होइया धारत धारिहि धुर कस धारि । 
जेहि देस परबोधिया कहत केहि तल बारि ॥ ३२ ६४ ॥ 
 भावार्थ : -- कोई स्थान सीमाबद्ध कैसे होता है इसकी सुरक्षा कौन करता है सेना क्या होती है । शस्त्र शास्त्र क्या है यह भारत द्वारा विदित हुवा । 

देस  दुरग कोष दल पति मात सुहरिदै संग । 

केहि राज प्रबंधन के जे सब साधक अंग ॥ ३२६५ ।। 
भावार्थ : -- राज्य , दुर्ग, कोष, दल, पति, अमात्य व् साथ में सुहृदय । राज्य  प्रबंधन के ये साधक अंग हैं ॥ 


कतहुँ सुलिखित लेख कतहुँ चित्रवत चित्र बिन्यास । 
रन करम सों ए  देस के भरे परे इतिहास ॥३२६६ ॥ 

भावार्थ : - कही न सुलिखित लेख हैं कहीं अद्भुत चित्र- विन्यास हैं । जो यह उल्लेखित करते हैं कि भारत का इतिहास युद्ध संकुलता से भरा हुवा है जितने युद्ध इस देश में हुवे उतने कहीं नहीं हुवे ॥  



सीख सीख एहि देस के  भयउ छतर छत्तीस । 
देस दासा होइ रहे ता  सहुँ अवनत सीस ॥ ३२६७ ॥ 
भावार्थ : -- इस देश के इतिहास से सीख लेकर छत्तीसों राष्ट्र बने । शताब्दियों की दासता के कारण उन रंगरूटों के  सम्मुख इसका शीश झुका रहा ॥ 

पति पताकिनी  होत  का हरिदय कवन सनेहि । 
अब हम ता सों जानिहैं कहत पताका केहि ॥ ३२६८ ॥ 
भावार्थ : -- पति कैसे बनाते हैं, पताकिनी कहाँ से आती है हृदय का स्नेहि किसे होना चाहिए ॥  इन अनपढ़ नेताओं के कारण अब यह सब हमें इन छत्र -छत्तीसों से सीखना पड़ता है इन्हें पढ़ना आता तो अपने देश का इतिहस पढ़कर संविधान लिखते । इसको पताका बोलते हैं अब यह वे हमें बताते हैं ॥ 

ई देखो बम......तुहार बम तुहरे ही सिर पर फोड़ न दें तो हमरे नाम बदल दीजो । 

प्रथम प्रक्षेपण पुरुष  = अस्वत्थामा 

भाग भाग कर देस के भागमभागा होइ । 
गयो गयो सब कोइ कहँ गया न कतहूँ कोइ ॥ ३२६९ ॥ 
भावार्थ : -- जब इस अखण्ड देश को खण्ड खण्ड करते विभाजित किया गया । तब एक भागम-  भाग  सी हुई थी । सबने कहा प्रवासी भाग गए पर गया कोई नहीं ॥  यह देश वारंवार विभाजित होता गया, सत्ता के  लालचियों ने कारण अब तक स्पष्ट नहीं किया.....

आन बसे परबासिया किए एहि देस अधीन । 
राजा सो कस होइआ अहँ जो राज बिहीन ॥ ३२७० ॥ 
भावार्थ : -- राष्ट्र  के बिना राज प्रबंधन के साधक अंगों की कल्पना नहीं की जा सकती । जो प्रवासी हों किसी देश में जा बसे हों कालान्तर में जिन्होंने छल से लूट से उस देश को अधीन कर उसपर अत्याचार किया वे राष्ट्रिक कैसे हो सकते हैं । जब वे राष्ट्रिक नहीं हो सकते तो फिर वे किसी राष्ट्र के स्वामी कैसे हुवे ? क्यों हुवे ?

कलह न जानब छोट करि  कलह कठिन परिनाम । 
लगति अगनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम ॥ 
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- लड़ाई को अनदेखा नहीं करना । लड़ाई का परिणाम बहुंत भयंकर होता है ।  निर्धन की झोपड़ी में लगी आग बड़े बड़े धनिकों के धन धाम को भस्म कर देती है.....


भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज । 
रावन हो कि रामराज, जमन कि आँगलि राज ।३२४६ । 
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज जमन राज हो या फिर अंगेरजी राज,  सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥

अजहुँ त हाथ पसार के माँग रहे हैं न्याय । 
 न तरु खेत करि मेलिबो,  और न कोउ उपाय ॥ ३२ ४७ ॥ 
भावार्थ : -- अभी यह समय हाथ पसारे न्याय मांग रहा है । दे दो ! अन्यथा संग्राम के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न होगा ॥

है धर्म संग्राम येह, नहि कायर का  काम । 
सीस माँगे सीस दियो चाम माँगे त चाम ॥ ३२४८ ॥ 
भावार्थ : -- यह धर्म संग्राम होगा इसमें कायरों का कुछ काम न होगा । ये सीस मांगेगा सीस देना पड़ेगा, चाम मांगेगा चाम देना पड़ेगा ॥

यहां निबासी कौन है कौन इहाँ परबासि । 
रन भूमि के तीर खड़ा पूछेगा मुठि कासि ॥ ३२५१ ॥ 


भावार्थ : -- इस देश के निवासी कौन हैं ? प्रवासी कौन है ? रण-भूमि के मुहाने पर खड़े होकर यह प्रश्न करते हुवे उसकी मुट्ठियाँ कसी होंगी ॥  

करे करम का लेखनी लिखे भाग के लेख ॥
तेरे सिर तलबारि अरि, देख सके तो देख ॥ ३२५२ ।
भावार्थ : -- किए कर्मों की लेखनी से ही यह हस्त भाग्य के लेख लिखता है । रे संसार के शत्रु  तेरी लेखनी तेरे भाग्य में शीश पर तलवार लिख रही है देख सके तो देख ॥ 

आया जो घर छोड़ के बहोरि सो फिरि जाए ॥
धरम केर संग्राम में न त रहु सीस बिनाए ॥ ३२५३ ॥
भावार्थ : --  जो अपना घर छोड़ आया है वह लौट जाए । अन्यथा इस धर्म- संग्राम में वे शीश से रहित हो जाएगा॥  


हित करिया बस आपना किया न कासों हेत ।
सूर बीर के हाथ चढ़ कटेगा सोए खेत ॥ ३२५५॥
भावार्थ : -- जिसने केवल स्वयं के प्रयोजनों को सिद्ध किया । जिसको  किसी पर दया  नहीं आई जिसने किसी से प्रेम नहीं किया, किसी का कल्याण नहीं किया । सूर वीर के हत्थे चढ़ खेत में वही कटेगा  ॥ 

मैं पूछा रे काल कूँ करन चला संग्राम ॥
तू करता तू कारना करिया मेरा नाम ॥ ३२५६॥
भावार्थ : - मैं ने पूछा हे काल ! तुम युद्ध क्यूँ चाहते हो ? काल ने उत्तर दिया रण- कर्त्ता  तुम ही हो कारण भी तुम ही हो मैं निमित्त मात्र हूँ तुमने नाम मेरा कर दिया युद्ध में नहीं तुम चाहते हो । 

कारन जहाँ जन्माया  जोधन जनिआ तहहिं। 
तुम कारन मति जामियो जोधन होउ न कहहिं ॥ ३२५७॥ 

भावार्थ : -- कार्य बिना कारण के नहीं होता । कारणों की व्युतपत्ती से ही युद्ध उत्पन्न होता है  । तुम कारण उत्पन्न मत करो युद्ध कहीं नहीं होगा । 

जो मुख साँचा बोलिये अगजग बैरी होए । 
पड़िया लोहा लेवना औरु उपाय न कोए ॥ ३२ ५८॥ 
भावार्थ : --यदि कोई सत्य कहे तो संसार उसका विरोधी हो जाता हैं । ऐसी स्थिति में लोहा लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहता ॥ 


बँधे कसाई खूँट जो सीस देत जिअ जाहि । 
रोक  सके तो रोक ले जो को बिघन न चाहि ॥ ३२५९ ॥ 
भावार्थ : -- जो कसाई के खूंटे बंध के शीश और चर्म का बलिदान कर रहे हैं । युद्ध न चाहने वाले शान्ति प्रिय लोग नृसंस हत्या करते उन क्रूर नपुंसक  कसाइयों को रोके ॥ 

पाल पराया पोषिया बासन दिया पड़ोस । 
सींउ पारगत झूझिया वका को न दोष ॥ ३२६० ॥ 
भावार्थ : - जिन परायों ने इस देश को लूट उन्हें पाल पोष कर मुस्टंडे कर दिया और बसने को पड़ोस भी दे दिया । मर्यादाओं का उल्लंघन कर नित्य विध्वंश हेतु उतारू रहने वालों को रोक सको तो रोको ॥ 

अपने देस बिसारिया अपने देसाचार । 
धर्महु दुत्कृत होइहि त रहिहि कवनि आधार ॥ ३२२१ ॥ 

भावार्थ : -- अधुनातन भारत के आचार-विचार, आहार-विहार इस देश में ही तिरष्कृत होने लगे हैं । यदि यहाँ प्रवर्तित धर्मों को भी दुत्कारा जाएगा तब वे कहाँ अवस्थित होंगे ?

अपने तीज तिहार  सों अपने देसाचार। 
सुरसदन सदा सोहिआ अपने देस द्वार ॥ ३२२२ ॥ 
भावार्थ : -- अपने आचार- व्यवहार, अपने तीज त्यौहार, अपने देवालय अपने देश में ही अच्छे लगते हैं । धर्म का प्रसार हो उपासना पद्धतियों का नहीं.....

अधर्मी जनम जगत कर पापन के परिनाम । 
दान धरम सतकर्म सों अवतरे कोउ राम ॥ ३२२३ ॥ 
भावार्थ : -- दुष्ट का जन्म जन मानस के पापों का परिणाम है  राम जैसे ईश्वर का अवतरण उसके दान-धर्म व सत्कर्मों की परिणिति है ॥

जगज जीवन जेन्ह के जन्में जेहि निबासु । 
सुर सदन तीरथ पुरी कहत तेहि के तासु ॥ ३२२४॥ 
भावार्थ : --  जिस धर्मानुयायी के इष्ट देव ने जहाँ जन्म लिया है वह स्थान उसी का तीर्थ स्थान अथवा सुर सदन कहलाता है किसी अन्य का नहीं ॥

आन देस जा बासिया जाके देस बिरान । 
जहँ जहँ तीर्थ पुरिन तहँ करष बढ़ावै जान ॥ ३२२५ ॥ 
भावार्थ : --  फिर किसी अन्य देश का वंशज किसी अन्य  देश में जा बसता हो और जहां जहां उसके तीर्थ स्थान हैं वहां वह व्यर्थ ही विवाद उपस्थित करता हो तब उसका क्या किया जाए ?

आए ब्याज भेस भरी करि करि सींवा पार । 
बस्तु धरत एहि  देस पर करे तहाँ अधिकार ॥ ३२२९ ॥ 
भावार्थ : -- सीमाओं का अतिक्रमण कर कपट वेश धारण किए म्लेच्छ भारत में आए और आते रहे । मस्जिद अथव गिरिजाघर रूपी वस्तु को जहाँ तहाँ  रखते हुए ये इस देश पर आधिपत्य निरूपित करते गए इस प्रकार विश्व में इनका प्रभुत्व स्थापित होता चला गया ॥ 

आन भूमि भगनाए के रचे देस पर देस । 
अजहुँ त भारत सेष ते हॉट जाएँ अवशेष ॥ ३२३० ॥ 
भावाथ : -- दूसरों की भूमि भवन पर बलात आधिपत्य स्थापित कर उसे विभाजित करते हुवे इनके  देश पर देश बनते गए  ऐसे अपाराधिक ( यौद्धिक नहीं ) साम्राज्य वाद के कारण  भारत व भारतीय अब शेष से अवशेष होते  जा रहें है, जो चिंतनीय है ॥

धरम माहि प्रतीति रहे जगहितकारी नीति । 
प्रभुता कबहु न परिहरै जहाँ भली सब रीति ॥ ३२०१ ॥ 
भावार्थ : -- जिस देश में धर्म पर विश्वास दृढ रहे और नीतियां विश्व के लिए हितकारी हों जहाँ प्रथाएं व् परम्परा हानिप्रद न होकर स्वस्थ हो उस देश को प्रभुता त्याज्य नहीं करती ॥ 

रीझि बूझि पर आपनी बवहिं नवहिं निज काज । 
बिचार हीन के धारे बिनसे देस समाज ॥ ३२०२ ॥ 
भावार्थ : --अपनी समझ पर ही मन्त्र मुग्ध होने वाले स्वार्थ सिद्धि हेतु जहाँ तहाँ सिर झुकाने वाले निर्बुद्धि की बुद्धि से देश व् समाज विलुप्त होते हैं ॥ 



भीत भीत बिदेस बसे करिअ सेष अवसेष । 
जोइ सिँहासन धारिया सोइ लुटावै देस ॥ ३२० ५ ॥  
भावार्थ : --  हंस विवेक की किञ्चितता के कारण ही अद्यावधि भारत भीतर ही भीतर खंड खंड हो गया है ये खंड छोटे बड़े  विदेश बन गए हैं कहीं इस्लाम का राज चलता है तो कहीं ईसाई का तो कहीं अन्यान्य का । सत्ताधारियों में तो जैसे देश को लूटने और लुटाने की होड़ लगी है ॥ 

यह नदी यह नग निर्झर देख लखे सब काल । 
बेद रचि घन बन मुनिगन चहुँ पुर फिरिहि ब्याल ॥३२०६॥ 
भावार्थ : -- भारत की इन नदियों ने इन झरनों के इन पर्वतों ने सभी काल देखे हुवे हैं । वह वैदिक काल भी जब घने वनों से आच्छादित यह देश मुनिगण द्वारा वेदों की रचना में लयलीन था हिंसक पशु इसके चारों ओर विचरण किया करते थे ॥ 

सुरग अवतरित सुर सरित यह गिरि राज बिसाल । 
जहां बिराजित सिउ संभु कंठ गहे अहि माल ॥ ३२०७ ॥ 
भावार्थ : -- स्वर्ग से अवतरित यह सुरसरित यह हिमालय का विशाल क्षेत्र । जहाँ कंठ में अहिमाल ग्रहण किये भगवान शिव शम्भु विराजित हैं ॥ 

मूर्धाभिषेक सरूप येह कलस केदार । 
प्राच रूप प्राग् अभिमत जुग जुग धरे सँभार ॥ ३२०८॥ 

भावार्थ : -- भारत  वर्ष का मूर्द्धन्याभिषेक स्वरूप यह केदारनाथ धाम है । जिसने प्राग चिन्हों सहित प्राचीन काल से चले आ रहे धार्मिक मत को युगों युगों से संजो रखा है ॥ कोई धार्मिक मत जहाँ होगा मतावलम्बी वहां नहीं होंगे तो कहाँ होंगे । 


पुराकल्प कृत पुरी यह जगत बिदित जग नाथ । 
अस्थापित हरि मूर्ति जगनमई के साथ ॥ ३२०९ ॥ 

भावार्थ : - धर्मावलम्बियों को मर्यादित करती जगत प्रसिद्ध यह जगन्नाथ पुरी है जो आद्य काल की कृति है । जहाँ जगन्मयी के साथ भगवान जगन्नाथ विराजित हैं  इसकी मर्यादा भंग करने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है ॥  


भारत बरस का द्वार यह द्वारिका धाम । 
धर्मोपदेस दय  यहॉँ बिराजित घन स्याम ॥ ३२१० ॥ 
भावार्थ : - भारत वर्ष के द्वार को दर्शाता यह द्वारिका धाम है काबा नहीं है  । धर्म का उपदेश देने वाले भगवान कृष्ण यहां विराजमान हैं ।

जमन जूह एहि  देस में भरे अधिकाधिकाए । 
सुर सदनिन तीरथ पुरिन तापर एकहू नाए ॥ ३२११ ॥ 

भावार्थ : - कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश में मुसलमानों का एक भी तीर्थ नहीं है ॥



स्वाध्ययन सत्योधन धरम करम करताए ।
संतापित तापस चरन बिहनै सुख बरधाए ॥ ३२१३-ख ॥  

----- ॥ विदूर नीति ॥ -----
भावार्थ : - आवृत्ति पूर्वक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म व् संतप्त तपस्या से अंत में सुख की वृद्धि होती है ॥ 

 न्याय संगत बितर्कन बिधि सम्मत परमान । 
साखी दिरिस अवमति दिए नेति जोग अवज्ञान ॥ ३२१४॥ 
भावार्थ : -- न्याय संगत तर्क, विधि- सम्मत साक्ष्य, साक्षाद्दृश्य को तिरोहित कर दिया गया निर्णय अवज्ञा के योग्य होता है.....

धर्माधारित संहिता यह श्रुति वेद पुरान । 
भारत की संतान के अभिलेखित परमान ॥ ३२१५॥ 
भावार्थ : -- ये श्रुति, वेद, उपनिषद, पुराणादी संहिताएं वैदिक धर्म का प्रमाणिक आधार है भारत के वंशजों का अभिलेखित साक्ष्य हैं ॥ यहां इस्लाम स्वयं को भारत का मूल सिद्ध करने पर तुला है ॥  

धर्माधारित संहिता भारत के एहि नीवँ । 
अन्यान्य दरसाइया लिखे ए देस के सीवँ ॥३२१६॥ 
भावार्थ : -- ये धर्माधारित संहिताएं राष्ट्र के रूप में भारत का निरूपण करती हैं (पद्मपुराण )। अन्य देशों के सह इनमें इस देश की सीमाओं का भी उल्लेख है । भिन्न देश के अन्य धार्मिक संप्रदाय के अनुयायि  अपनी सीमाओं का साक्ष्य प्रस्तुत करें ॥ 

देखे लोचन साखिता यह सरजू के तीर । 
भव तारन कलिमल हरन प्रगसे जग रघुबीर ॥ ३२१७॥ 
भावार्थ : -- यह सरयू नदी उस समय की प्रत्यक्ष साक्षी है जब संसार से पार उतारने कलयुग के पापों को हरण करने भगवान श्री राम ने जन्म लिया ॥ 


अपने अपने धर्म  में आस्था के अधिकार को धार्मिक आस्था का अधिकार कहते हैं  वैदिक धर्मावलम्बियों से यह अधिकार छीना जा रहा  है ।  अन्य सम्प्रदायों के इष्ट का जहाँ जन्म हुवा वहां यदि कोई मंदिर बने तो कैसा लगेगा ?






----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...