बुधवार, 15 मई 2019

---- ॥ दोहा-दशम ३६१ ॥ -----,

गइ उद्यमहि नीति असि लेखे | खैंचि गईं  दारिद नीच रेखे ||
दरिद्र धनी बिच खंदत खाई | चार बरन कहुँ बहुरि रचाई ||
उद्योग नीति ही ऐसी निश्चित की गई थी कि उसइ पार्श्व प्रभाव से देश में दरिद्रता की रेखा खींचती चली गई | इस रेखा ने दरिद्र व् धनाढ्यों के मध्य खाई खोद दी और देश पुनश्च चार वर्ग में विभाजित हो गया | 

जाति अपर गह अर्थ अधारा | पुर्बल केर दोषु अनुहारा ||
 दारिद परसत धनि अन्हावै | राज सदन परबेस न पावै |
यह वर्गीकरण जातियता से अन्यथा आर्थिक आधार  आधारित था  पूर्व के वर्गीकरण में व्याप्त दोषों का अनुशरण किया | अब दरिद्र के स्पर्श करने से धनि स्नान करने लगे लोकतंत्र के भवन में उसका प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया | 

दीन दसा रु मलिन बसबासा | दास बिरति सहुँ कवन बिकासा ||
अगन तैल बिनु दीप अधारे | कहु कतहुँ कहुँ होत उजियारा ||
जिसकी दशा दयनीय हो जिसका निवास मलिन हो ऐसी दासवृत्ति से भला किसकी उन्नति हुई है | अग्नि व् सार से रहित दीपक से भी क्या कहीं उजाला होता है | 

अर्थ प्रधान कियौ जब  तंत्रा  | कर्म कार भयऊ कल जंत्रा | 
कीन्हेसि सो लूटि हथौड़े |  हाथ अतीक काज बहु थोड़े || 
जनसंचालन तंत्र में अर्थ की प्रधानता को अंगीकार करने का परिणाम यह हुवा कि अब कल यंत्रों ने श्रमिकों का स्थान ग्रहण कर लिया | इस स्थानापन्न ने श्रमकों के हाथों से हथोड़े छीन कर उनकी आजीविका न्यून कर दिया अब हाथ अधिक थे और काम किंचित थे | 

कर्मकार कहुँ काम बिनु कियो धनिक के दास |
धरिआ खंदत खेह खन  दियो बाका नाउ बिकास ||
श्रमिकों को आजीविका विहीन कर  उन्हें धनिकों का बंधुआ बनाया गया और खेतों तथा खनिज खण्डों के  उत्खादन को विकास नाम दिया गया | 

बसनासन बासन बिनु बासिहि | देस प्रधान भासनहि भासिहि ||
बैस आपु अति ऊँच पदासन | नीच हुँत बुहा ढाई अँसुअन ||
निवासी भोजन वस्त्र व् आवास से वंचित हो चले प्रधानमंत्री भाषण में ही समस्त समस्याओं का निवारण कर दिया करते |  स्वयं ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित होकर नीच की निचाई हेतु घड़ियाल के आंसू बहाते | 

जनसेबक सों भएउ  भुआला | रँगे चोंच बक चलै मराला ||
रचत नेम नै धरम बिरोधी | कहि आपुनो परम परबोधी ||
जन सेवा के संकल्प से सत्ता  प्राप्त की और सेवा तिरोहित कर वह राजा बनकर राज करने लगे |  स्वभाव बगुले का स्वभाव किए  हंस की सी चाल चलते | धर्म विरोधी नियम रचते और स्वयं को धर्म का प्रकांड 'पंडित' कहते | 

रीति परथा बात सबु बीती | कहत बिरथा पुरातन रीती ||
अपुनी सबहि कहए अधुनाई | भलि अलप अति गहै बुराई ||
 हुवे भारत के सांस्कृतिक समृद्धि की प्रतिक पुरानी रीतियों, प्रथाओं, परिपाटियों व् ज्ञान परक वचनों को व्यर्थ कहते |अपनी सभी रीतियों व् प्रथाओं को आधुनिक कहते जिनमें भलमनसाई अत्यल्प व् बुराई अत्यधिक थी |

दया धर्म बिरोधी अस भयऊ सत्तासीन  | 
अगजग सो पथ चालिआ जो पथ पहुँच विहीन || १० ||
भावार्थ : -  इस प्रकार दया और धर्म का विरोध करने वाले सत्ता पर आसीन हो गए हैं, इनका अनुशरण करते हुवे अब लोग उस पथ पर चल पड़े हैं जो पथ कहीं नहीं जाता | 

पुनि जान कहँ चरन चले छूटत  साँचे पंथ  |
सत्धर्म दूरत पाछे बिलुपित गै सद ग्रन्थ ||
फिर देस के चरण जाने किस ओर चल पड़े सभी सन्मार्ग छूट गए , सद्धर्म से दूर होते इस देश से सद्ग्रन्थ भी पीछे कहीं ओझल होते चले गए | 

टूटत आपुनि साखि सौं बिहुरत अपना मूर |
पाछे न बहुर सकै गै निकसत ऐतक दूर ||
अपनी शाखाओं से टूटे अपनी मौलिकता से से पृथक हुवे वह चरण इतनी दूर निकल गए कि जहाँ से पीछे अपनी जड़ों की ओर लौटना संभव नहीं था | 

पंडित जी तो चलै गए रह गइ वाकी रीत |
रही नहि मरयाद अजहुँ रही न प्रीत प्रतीत ||
पंडित जी तो दिवंगत हो गए किन्तु उनकी रीति यहीं रह गई | इस रीति  का अनुशरण करते हुवे अब देश में कहीं मर्यादा रही न प्रेम और विश्वास ही रहा | 

रही पवन नहि पावनी रहे न निर्मल नीर |
पंडत के उद्जोग गए मलिन करत सबु तीर ||
अब पवन पावन न होकर दूषित हो गई जल निर्मल होकर मलीन हो गया पंडत के उद्योग सभी तटों को दोषसे परिपूर्ण करते गए | 


भास् पराई बोलते भरे परायो भेस |
रहे न लोग सो लोग न रहे देस सो देस ||
पराई भाषा भाषते पराई विभूषा आभरित करते अब लोग वैसे लोग नहीं रहे देश वैसा देश नहीं रहा जैसा वह हुवा करता था  | 

बैसे अजाति बाद अधुनै ऊँची पीठ अस  |
सुभाउ ते मनुजाद दीन धर्म निरपेख जौ || ||
भावार्थ : - विद्यमान समय में गणमान्य, धनाढ्य, लब्धप्रतिष्ठित, व् उच्च पद पर अजाति वाद विराजित हो गया है यह वर्ग संकरता ( हाइब्रिड) जनित दुर्गुणों से युक्त है |  दुर्दशाग्रस्त विश्व, देश व् समाज से खिन्न व् दया दान तप व् सत्य से उदासीन होते हुवे जो कीट भक्षी, तमचूर भक्षी, गोभक्षी, भ्रूणभक्षी, नरभक्षी स्वरूप मनुष्य को मारकर खाने वाले आसुरी स्वभाव का है || 

पंडत जी कहुँ जुग बिरताओ | पाए कछुक बहु गयउ गवायों ||

तासु बिगत अस भयो गगन गत | गहि धुर धुर अरु कछु नहि बिलखत ||
पंडत जी के काल का समापन हुवा  इस समाप्ति से देश ने जो खोया वह अत्यधिक था और जो प्राप्त किया वह अत्यल्प था | पंडित जी के दिवंगत होने से गगन धूल से व्याप्त होकर जैसे दुर्दशा को प्राप्त हो चला था और नेत्रों को कुछ भी दर्शित नहीं हो रहा था | 

दिगंत दिरिस दरस अस होई | धावत दुति गति गए जस कोई| ||
धूम संहति ते चहुँ दिसि धुँधर  | दिसि  न दरसिहिं नहि दरसिहिं डगर ||
छितिज का दृश्य इस प्रकार दर्श रहा था मानो कोई द्रुतगति से दौड़ता हुवा गया हो | धूम्रराशि से चारों दिशाऐं धुंधली हो उठी थीं जनमानस को अब न तो कोई दिशा ही दिखाई दे रही थी न कोई मार्ग ही दिखाई दे रहा था | 


लोक ब्यापि रहे जो देसा | खँडरत होत गयउ सो सेसा ||
बहोरि अनुसासत सो सेषा | भए नायक ता दलहि बिसेषा ||
जो देश समस्त विश्व में व्याप्त था वह खंड-खंड होकर शेष हो चुका था | तदनन्तर देश के अनुशासक दल विशेष के जो नायक हुवे - 

कहयउ लाल बहादुर  नावा | देस परधान पद पधरावा ||
 पुर्बल प्रधान देत सब दोसिहि  || बारम्बार लोग सब कोसिहि |  
उनका नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था फिर उन्होंने देश के प्रधानमंत्री पद का कार्यभार ग्रहण कर लिया | दिवंगत पूर्व प्रधान मंत्री पर दोषारोपण कर लोग उन्हें वारंवार कोसते | 


देखु अँधमति चलिअ कस चाला || करिते गोठि बैस चोपाला | 
निज हित हुँत पालत पोसिहि | जेहिं बसाइहिं पास पड़ोसिहि | |
चौपालों में विराजकर गोष्ठी करते हुवे वह कहते देखो ! उनकी अन्धबुद्धि ने कैसी कुटिल चाल चली |  स्वयं के कल्याण को परिलक्षित कर जिन्हें पालते पोषते देश व् देश के प्रतिवेश में वासित कर रखा 


भू भूति भरपूरत सो औरु औरु करि आस |
बैर परत बैरी करत गए  रिपु निज संकास ||
वह बहिरवर्ग भूमि सहित संसार के समस्त ऐश्वर्य से युक्त हो गए थे  तथापि वह अधिकाधिक की प्रत्याशा
में शत्रुता करते हुवे अपने प्रतिवेशियों को भी इस देश का शत्रु बनाते चले गए | 

किन्ही अँध बिस्बास सुहरिदय तिन्ह जान अस |
जल धरनिहि आगास चारिहुँ पुर रिपु दरसें ||
 उन्हें अपना सौहृदय संज्ञान कर ऐसा अंधविश्वास किया कि  जल क्या धरती आकाश क्या अब तो सभी ओर शत्रु ही शत्रु दृष्टिगत हो रहे हैं | 

को गह भीतर को बहियारे | भेदत घरि घरि सींव पचारें |
नगर अँधेरु सुझै कछु नाही | तापर  धूसर कछु नहि दरसाही ||
कोई गृह के भीतर तो कोई बाहर बैठा है | सीमाओं का उल्लंघन कर ये घडी घडी ललकार उठते हैं | नियम व् नीतियों के अभाव से कुछ संज्ञात नहीं हो रहा उसपर देस के कुमार्ग गमन का यह धूसर कुछ दर्शा नहीं रहा | 

अस चिंतत घरि पलक न  लागे | सोए न राति भोर रहँ जागे || 
एहि भारत केर सोइ संताना || जासु देस ए भयो जग जाना || 
ऐसा चिंतन कर घडी भर को भी उन्हें निद्रासुख प्राप्त नहीं होता, रात्रि शयन बिना वह भोर होने तक जागृत रहते |  यह भारत की वह संतान थी जिससे यह देश विश्व विख्यात हुवा था |   
     
 पुर्बल गह गह रह ससि साला | बिकसत उद्यम परे अकाला ||
उद्योग बृहत् इत  बिनसत ससि | लखिमिहि निकसावत माया बसि ||
पूर्वकाल में इस देश का गृह गृह शस्यशील हुवा करता था | उद्योगिक विकास होते ही यहाँ जैसे अकाल पड़ गया | इधर वृहत उद्योग धनधान्य को नष्ट करते गए घरों में लक्ष्मी का निष्कासन हो गया और उसका  स्थान माया ने ग्रहण कर लिया | 

राजत दल केँ काल बिहाना | रहिअहिं दलपति प्रथम प्रधाना ||
रहहि जैसेउ तासु बिचारा |  करिअ दल तैसोइ अनुहारा ||
पूर्वकाल में देश के प्रथम प्रधानमंत्री सत्ताधारी दल के दलपति थे | दल भी वैसा विचारों का अनुशरण करता होता चला गया जैसे उनके व्यक्तिगत विचार थे | 

ग्यान मनै न बिग्यान इतिहास न बिदमान | 
दल महुँ अजहुँ सोइ मनै जौ बाका अनुमान | 
अब न ज्ञान का कहा मान्य होता न विज्ञान का इतिहास का कहा मान्य न विद्यमान का, दल को वही मान्य होता जो प्रथम प्रधानमंत्री का अनुमान होता | 

बहुरि रचहिं सब  नेम बिधाना | प्रथम प्रधान केर अनुमाना || 
देस बिचार गयउ बिलोपे | तासु बिचार देइ सिरु थोपे || 
 अब संसद में सभी नियम व् विधान प्रथम प्रधानमंत्री के अनुमानों का ही अनुशरण कर रचे जाते | इस प्रकार इस देश के अपने विचार विलुप्त कर संसद  प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जी के निज  विचारों को जनमानस के शीश पर थोपा देता  | 

बहिअ तासों बहुरि अस धारा   | गहियउ देसज धर्म बिकारा ||
अजहुँ देस सो देस न होई | दसा दुसह दुर दिसा न कोई ||
इस थोपीकरण से विचारों की ऐसी धारा बह चली कि जिससे देश के आचार-विचार, आहार-विहार , भाषाभूषा यहाँ तक की उसके मूलगत निवासियों में भी विकृति आ गई | अब यह देश वह देश नहीं रहा दशा दुर्दशा को प्राप्त होकर दुसह हो गई ऐसी अवस्था में उसे कोई  दिशा सूझ नहीं रही थी  | 

प्राग बिरति करतब बिसरावा | देइ देस पुनि नव नउ नावा ||
पीठि बाहिरि बरग करि भारा | झूठ बदनु दए झूठहि नारा ||
ऐतिहासिक घटनाओं को विस्मृत  देश को ने नए नए नाम देकर उसकी पीठ पर बाह्यवर्ग का बोझ लाद दिया गया  और झूठे मुख से झूठे नारे दिए गए | 

हिन्दू मुसलिम सिख ईसाई |आध बहिर देसिअ समुदाई  ||  
भाइ भाइ कर बंचकताई  | अब लगि लोगन्हि समुझ न आई || 
 जिसमें आधा बहिर्देशीय समुदाय था ऐसे हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई के बंधुत्व का मायाजाल लोगों को विद्यमान समय तक समझ नहीं आया  | 

गहै सिहासन अल्पहि काला  | चलिअ दल तैसेउ परिचाला |
कठ पुतरी बस आपु बिहीन | बिनु नय भए अस दलहि अधीना ||
यत्किं चित समय के लिए ग्राह्य हुई सत्ता का शासन काल अत्यल्प था | दल जैसी चालें चलता प्रधान मंत्री भी वैसे ही परिचालन करते | इसप्रकार वह स्वयं के नियमों व् नियंत्रण से रहित संकेतों पर नृत्य करने वाली किसी कठपुतली के समान दल के अधीन थे  

राज किए सो अति अल्पहि काज किए कुल चार |
लाह लहन दल गै तासु कीर्ति करत अपार ||
प्रधानमंत्री लालबहादुर श्रीवास्तव का कार्यकाल अत्यंत अल्प था उनके द्वारा  किए गए कार्य भी यत्किंचित थे | इस यत्किंचित कार्यों का सत्ता की लाभ लब्धि हेतु उसका  अपार प्रचार करते चले | 

सत्ता सूत गहत निज हाथा | भेंट भईं समास कहुँ साथा || 
घनी भूत गनि महुँ बहुतेरी | जनमानस लए चहुँ दिसि घेरी || 

बँधेउ बहुतक संकट पासा | नेम नीति गत कतहुँ निरासा | 
दल कैं भगतिहि दल पद पूजा | दल ते अबरु उपाए न दूजा || 
कहीं बहुंत से संकट पाश की बंध्यता थी तो यही नियम व् नीतिगत निराशा थी दल की भक्ति दलगत पद की पूजा,  दल से भिन्न कोई दूसरी विचारमूलक युक्ति भी नहीं थी | 

सहत  देसजन भाजन दंसू |गहत  बिषम दुःख तासु बिधंसू | 
गाँव बास निज बसति उजारे | बसिहि अगम बन घन अँधियारे ||  
विभाजन के दंश को सहन किए एवं उसके विध्वंश का भीषण दुःख हृदय में लिए देश का जनमानस अपना गांव अपनी बस्तियां अपने गृह को उजाड़े अंधकारमय दुर्गम वनों में जा बसा था  ||  

जासु धान धन रहँ भरपूरे | सो हलधर सहुँ भए हल दूरे || 
धरनिहि संगत बिछुरे बाछर | भयउ रतन कन कंकन बिनु कर || 
जिससे देश में धन धान्य  परिपूर्ण रहता था उस हलधर से हल दूर हो चुके थे धरती से उसके वत्सल दूर हो गए थे अब उसके हस्त रत्नकणों के कंगनों से रहित हो गए थे | 

धेनु पयस गह बहुतहि रोईं | अहहिं न मम पय पायन कोई || 
देसहु कुदसा तासहुँ घेरीं |  कहँ अब कंजन सुर मनि ढेरी || 
पयस ग्रहण किए धेनु रुदन कर कहती अब मेरा स्नेह रस पाने वाला नहीं है | उसके साथ देश को भी बुरी दशाओं ने घेर लिया था अब उसके लिए भी धनधान्य रूपी स्वर्ण व् चिन्तामणियों की ढेरियां स्वप्न हो गई थीं | || 

जुग जुग लगि बिकसाए के गहे रहे जहँ मूरि | 
तासहुँ जोग लगाए पुनि प्रसरत गए बहु दूरि || 
युगों युगों तक जड़ें ग्रहण किए जहाँ वह फलाफूला उन जड़ों से ही संयोजित रहकर वह  प्रस्तारित हुवा  बहुंत दूर चला आया था | 


बिरवा केरि साखि चहे केतक दूरि पसारि | 
मूरि परि जहँ उपजाई तहँ करि गई पुकारि || 
वृक्ष की शाखा चाहे कितनी ही दूर प्रस्तारित हो जाए वह वहीँ की उत्पत्ति कहलाती है जिस मूल से व्युत्पन्न होकर जहाँ वह वृक्ष में परिणित हुई | 

गहरत अबरु  नगर अँधियारा | अजहुँ चहुँ पुर चरन पैसारा | 
जहँ नय  नेम नीति बिनु राजा | बिपति कै तहँ बसत समाजा || 

सासि स्वारथ नीति जहँ करहिं | बिपद जाल जन काहे न परहिं | 
करषि करम परि धरे अधारा | रह देस जौ जगत भरतारा  ||  

भुईँ भुईं अति उर्बरु जहँ की | दरसै न ससि जन दीठि तहँकी || 
हल बिनु हलधर कर बिनु काजा |  अजहुँ भए तहँ रतन सम नाजा | 


ज्यावत जिन्ह   | सो जन भोजन तेउ तरसाए  | 
उलट बरेली बांस अनायो  |  बहिरि देस तब मोल मँगायो   |  

रूसेउ हल तैं जब खलिहाना || हारि गहे रन भट बलबाना ||

जय जुवान जय जय करिसाना | कहिअ उछाहत देस प्रधाना ||


कीन्हे बैरि बैर अतीवा भय गहि सीवाँ 







मंगलवार, 12 मार्च 2019

---- ॥ दोहा-दशम ३६०॥ -----,


साजि सैन न त समरु समाजे | होइ समयगत काज अकाजे || 
रिपु सौ हरिदय सरिरुह लेखे | कीन्हि नित उत्पात न देखे || 
 न सेना ही सुसज्जित की न युद्ध की तैयारी की समयोपरांत किए गए युद्ध के सभी उपक्रम व्यर्थ सिद्ध हुवे | शत्रु को सौहृदय के समान संज्ञान कर उसके निरंतर उत्पातों को अनदेखा किया | 

कियउ ताहि परि अंध भरोसा |  हारत धरिअ देस सिरु दोसा || 
परिनत पुनि सब संक असंका | कुटिलपना ते भए अकलंका || 
उसपर अंधविश्वास किया और पराजय का दोष देश के शीश पर मढ़ दिया | तत्पश्चात पराजय की सभी आशंकाओं को अशंका में परिणित कर कुटिलता पूर्वक देश के प्रधान स्वयं निष्कलंक हो गए | 

कियो पराहत हेतु दुराई | जन जन संगत बहु चतुराई || 
जहाँ असाँच कपट छल छूती | दूरत तहँ जस बिजय बिभूती || 
देश के जनमानस से अत्यंत चतुराई पूर्वक पराजय के कारणों को गोपित कर दिया | जहाँ असत्य छल व् कपट की अपवित्रता हो वहां कीर्ति व् विजय की विभूति अप्राप्य रहती है  | 

बल बुद्धिहि करि लेइ परीखा | ए संग्राम दियो अस सीखा || 
बन्धुजात संग बंधुताई | सद सतनुरकत संग  मिताई || 
बल व बुद्धि की परीक्षा लेते हुवे ये संग्राम यह शिक्षा दे गया कि बंधुता अथवा भाईचारा अपने बन्धुजातकों से ही होना चाहिए, धर्मरत सत्यनिष्ठ से मित्रता होनी चाहिए  | 

राजपाट छाँड़े नहीं अजई होत प्रधान | 
खात हरिदय घात बहुरि छुटे देह ते प्रान || ३६०१ || 
पराजेय होते हुवे भी देश के प्रधान ने सत्ता नहीं त्यागी तदनन्तर हृदयघात होने पर उनकी  देह ने प्राण त्याग दिए  | 

गत प्रधान कइ कारज काला | कतहुँ काल भए कतहुँ अकाला || 
छायउ जद्यपि नगर अँधेरा | कीन्हि कछुएकु दीप उजेरा || 
पूर्व प्रधान मंत्री के कार्य काल की विवेचना करें तो इनके शासन में कहीं काल तो कहीं अकाल था | यद्यपि नीति व् नियमों का घोर अभाव था  इस अभाव में भी नीतियों के कुछ दीपक प्रकाश बिखरते रहे | 

प्राँत प्राँत महँ देस बखारा | होत समिट भयो एकाकारा || 
छन छित छिदरित देसिअताई | अजहुँ भई दृढ  देस इकाई || 
प्रांतों में बिखरा राष्ट्र एकत्रीभूत होकर एकरूप होता गया, विकीर्णित व् दुर्बल राष्ट्रीयता अब एक सुदृढ़ राष्ट्र ईकाई में परिणित हो चली | 

अस्वमेधिअ राजसुय संगा | रहउ पुरबल ए देस एकंगा || 
सरब भुइँ करि रीति अनुहारे | दहुँ दिसि के दिग्पाल गुहारे || 
 प्राचीन काल में अश्मेध व् राजसूय यज्ञों से यह देश एकीकार रहा |  सार्वभौमिकता  की इस रीति का अनुशरण करते हुवे  चारों ओर के राजाओं का आह्वान किया गया | 

पुनि खन खंडित देसिअ धारा | लीन्हि अबिरल सरिद अकारा | 
भयउ अबरु अपरबल प्रबाहा |  रलमिलिहि जबु सकल नरनाहा || 
फिर तो  खंड खंड हुई इस राष्ट्रिय धारा ने एक अविरल सरिता का रूप धारण कर लिया | इसका प्रवाह तब और अधिक प्रबल हो गया जब प्रांतों के सभी राजा इस सरिता में समाहित हो गए | 

कारन कपट बिनहि छलछंदू | रहँ ए राजोपक्रम निर्द्वंदू  | 
कहन जोगु प्रतिरोधु न होई | को एक आध रु बाध न कोई || 
कपट अथवा किसी छलरचना से रहित होने के कारण शासन का यह उपक्रम निर्द्वन्द्व रहा | ऐसा कोई प्रतिरोध न था जो वर्णन योग्य हो कोई एक आध  बाधा ही थी अन्यथा तो यह निर्बाध ही रहा | 

सर्बभूमि सरूप धरे भए एहि देस सँजूत | 
एक छतर भए सबहि राज बाँधि गयउ एक सूत || ३६०२ ||  
सार्वभौमिक स्वरूप धारण  किए फिर यह देश संगठित हुवा और  इसके सभी प्रांत एक सूत्र में बंधकर एक छत्र हो गए | 


बुध/बृहस्पति, १३/१४  मार्च २०१९                                                               

अस तौ सबहि राज बिलिनाईं  | कस्मीरु परि रहेउब बिलगाईँ || 
किएँ प्रधान इहँ कुचक कुचाला | करत कूट छल सहित भुआला || 
ऐसे तो सभी प्रांतों का संविलयन हो चुका था किन्तु कश्मीर इस संविलीनीकरण से पृथक रहा | यहाँ देश के प्रधान ने षणयंत्र कर कुचालि की, कश्मीर के राजा सहित देश के साथ छल व् वंचन करते हुवे | 

रचत नेम कृत दुरनै नीती | अपुने पराए सहुँ प्रीती || 
नग उतंग अति हिमधर नामा | जुग सहुँ थापित जहँ सिउ धामा || 
दुर्नीति का आश्रय लेकर अपनों का तिरष्कार परायों से प्यार का नियम रच गए  | यह ऊंचा पर्वत हिमालय जिसका नाम है जहाँ युगों से स्थापित भारतीयों के भगवान शिव शंकर का धाम है | 

बहति जहाँ सों पावनि गंगा | अबिलग होत भए बिलगितंगा || 
देस भूमि भू सम्पद वाकी | जोइ मूरि गत संतति ताकी || 
जहाँ से उनकी पावन गंगा बहती आई है वह कश्मीर अभिन्न होते हुवे इस देश से भिन्न हो गया | कोई देश कोई देशभूमि कोई भूसंपदा पर उसका प्रभुत्व होता है जो उसकी मूलगत संताने हों | 

दासा करतब  जनिति पराई | भइ तासु बरियात गोसाईं || 

धाता हेतु हेतु निज धाती | धरएँ अँगार हम्म नित छाँती || 
किन्तु अन्योदर्य संतति इस देशभूमि को अपना दास बनाकर उसके बलपूर्वक स्वामी बन बैठी | अपने जन्मदाता देश व् मातृ रूपी देशभूमि के लिए हमने अपनी वक्ष पर नित्य ही उनके  अंगार सहे | 

प्रबसिहिं भीत भूर मरजादा | सुरत  तेहि मन भरे बिषादा ||  
पर जनितिहि करि सहियब गोले | न्याउ प्रिय कछु जगत न बोले || 
मर्यादाएं विस्मृत कर जब इन्होने हमारी सीमाओं का उल्लंघन किया भीतर प्रविष्ट हुवे  उस घुसपैठ का स्मरण करते हुवे मन विषाद से भर उठता है | हम इन पराए देशजों के गोले सहते रहे किन्तु 'न्यायप्रिय' विश्व ने (इनके विरुद्ध ) एक शब्द भी नहीं कहा || 

जहाँ कैलासा नाथ निबासा जहाँ पावनि गंग बहे | 
सकल सो हिम भू भृताञ्चल भारत केर अंग अहे  || 
बिनसै जान केतक धन सम्पद राखि ताहि रखबार रे |  
केतनि केत बीर भट भएउ खेत लए उर रिपुहु प्रहार रे || 
जहाँ कैलाशनाथ का निवास है  जहाँ पावन गंगा बहती है वह समूचा हिमक्षेत्र भारत का ही अंग है | उसकी रक्षा करने में इस देश की जाने कितनी ही सम्पति विनष्ट हो गई | कितने ही वीर योद्धा शत्रु का प्रहार ह्रदय में लिए वीर गति को प्राप्त होते रहे | 

भाग बिधाता भारत कै लिखे नेम गै बाम | 
तिनकी करनी अजहुँ लग राज करे इस्लाम || 3604 || 
भारत के भाग्य विधाता (प्रथम )प्रधान ऐसा विपरीत नियम लिख गए उनकी करनी से अबतक इस देश में इस्लाम राज कर रहा है | 


शनिवार, १६ मार्च, २०१९                                                                                      
देउ धाम धी धर्म हमारे | चरन चरन गयऊ दुत्कारे || 
देस बासि निज भाष रु भेखा | गए प्रधान किएँ सदा उपेखा || 
हमारे आराध्य हमारे धाम हमारे आचार-विचार हमारे धर्म को चरण-चरण पर दुत्कारा गया | अपना देश उसके मूलभूत निवासी अपनी भाषा अपनी वेशभूषा की दिवंगत प्रधानमन्त्री ने सदैव उपेक्षा की | 

हमरे अंजन संग अँजवाएँ | अँधरे कहत जो दीठि दिसाएँ || 
हमहि सों भए राजांगनिबारू | देस धुजा धर धुजिन्हि धारू || 
हमारे ज्योति से ज्योतिर्मान हुवे नेत्रों को जब हम अंधे कहते तब वह हम पर ही क्रोध प्रकट करते | हमसे ही जो राज्यांग ( राष्ट्र, राजा या स्वामी, मंत्री, दुर्ग,राजकोष, बल,सुहृदय एक राष्ट्र निर्माण हेतु आवश्यक ये सात अंग एक आठवाँ अंग भी होना चाहिए वो है भूमि )  वाले हुवे देश वाले ध्वजाधारी हुवे सेना नियोजित करना जिन्होंने हमसे सीखा 

तिनकी पढ़ाए तजनिज ग्रंथा  | चरत कुपथ बिसुरे निज पंथा || 
वाकी चलनि देस अनुहारे | पतनमुखी पथ  पद पैसारे || 
उनकी धूर्ततापूर्ण बातों में आकर उन्होंने स्वधर्मग्रन्थों को त्याग दिया और कुपंथ पर चलते हुवे उन्हें अपना सदपंथ विस्मृत हो गया | उनकी इस चलनी का अनुशरण करते हुवे इस देश के चरण भी पतनोन्मुखी पथ चल पड़े | 

जेहि संकरति बेद पुराना | कुल दूषक सकुचित मत माना || 
ता संकरित कहत अधुनाई | दिए कुल जाति समाजु नसाई || 
वेद पुराणों ने जिस संकृति वंशनाशक के सह एक संकीर्ण विचार कहा ( पद्मपुराण )उस संकरता उस मिलावट को आधुनिक विचार कहकर इस कुल, जाति को नष्ट करते हुवे एक समृद्ध समाजिक व्यवस्था का विध्वंश कर दिया | 

जासु  देसधरम सहित जाती जात नसात  | 
समउ परे निरमाइअहि बिलगित बाकी जात || 3605|| 
जिन विचार धाराओं से इस देश में प्रचलित धर्म-प्रथा  व् जातिगत सामाजिक व्यवस्था को नष्ट हो रही है कालान्तर में वह एक पृथक जातक वर्ग को निर्मित करेंगी | 

होंहि ए जाति बरग बहु रंगा | देस धर्म बिनु बिनु भू संगा | 
कोष बल बिनु बिनु संबिधाने  | होंहि न अपुने नाहि बिराने || 
यह जाति वर्ग बहुरुपिया प्रकृति का होगा न इसकी कोई अपनी धर्म संस्कृति होगी न ये किसी  राष्ट्रभूमि से युक्त होगा | कोष व् बल से रहित इसका कोई संविधान न होगा न यह अपना होगा न पराया | 

ए अनुमानित लोग बहुतेरे | तथाकथित जनप्रियता केरे  | 
प्रभा मंडल मुख दए प्रधाना  | आपसहुँ अधिकु केहि न जाना  || 
बहुतस लोगों का यह अनुमान है कि  तथकथित लोकप्रियता का एक आभामंडल मुख पर प्रतिष्ठित किए देश के प्रथम प्रधानमन्त्री ने  अपने अधिक किसी को नहीं जाना ||  

तासु स्वार्थ निज हितदेखा  | लोक हित नित किन्ही उपेखा | 
पच्छिम केरि अधम अधुनाई  | भारत भू बरियात बियायो || 
उनके स्वाभिप्राय ने स्वहित देखा इस स्वहित हेतु लोकहित की सदैव उपेक्षा की | सीमांत पश्चिमी देशौं की अधमतस आधुनिकता भारत की भूमि पर बलपूर्वक आरोपित किया | 

सोषन कारक गए अस पोषे  | गयउ तासु सब पोषन सोषे || 
बाँट बखेरा के भए दोसी | अधीन करिता करत पडोसी || 
फिर तो इस भूमि के शोषक कारक ऐसे पोषित किए गए कि उसकी पोषण क्षमता शोषित होती चली गई | देस के विभाजन तदनन्तर अस्त-व्यस्त हुई सामाजिक व्यवस्था के वह दोषी सिद्ध हुवे | 

बाँट बखेरा करत पुनि ऐसो रचे बिधान | 
कहत पड़ोसी हिन्द को नव इस्लामिस्तान  || 3606 ||    
देश विभाजन व् इस सामाजिक बिखराव के पश्चात एक ऐसा संविधान की रचना की जिसके  क्रियान्वयन के पश्चात कालान्तर में पड़ोसी अब इस देश को नया पाकिस्तान कहते हैं | 

कहति ए लिखिनि सुकबि कहनाई | अलप प्रसंस अधिक निदराई || 
गहे प्रधान स्यानप थोरे | गुन अल्पहि अति औगुन जोरे || 
उत्तम कवि कहते हैं कि  यह लेखनी प्रशंसा कतिपय व् निंदा अतिशय करती है इन प्रधान ने ज्ञान विवेक यत्किंचित ही ग्रहण किया अवगुणों का संग्रह अधिक तो सद्गुणों का न्यून किया  | 

कलुषित करतब किएँ अधिकाई | करिअब  कस कृत करम बड़ाई || 
कहन लगे जबु मैं कलिसाई | खन खंडित भई पंडिताई || 
जब कलुषित कार्य अधिकाधिक किए तो फिर किए गए कर्मों की प्रशंसा कैसे की जाए | जब वह स्वयं को ईसाई कहने लगे तब उनका पांडित्य खंडित हो गया | 
निपतित चरित भूरि मरजादा | देसिअ पन ते भरे बिषादा || 
जासु राज छलु कपट ब्यापा | कहौ त तासु नाउ को जापा || 
जिसके शासनकाल ने छल और कपट व्याप्त किया हो और चारित्रिक पतन ने सभी मर्यादाएँ  लांघ दी हो,  देशीय से जिसका सदा का वैमनस्य रहा हो  कहिए तो उसके नाम की कोई कीर्ति करता है क्या ?

पंथ दुरुह जन जूह अगाधा | तासु नीति नय ते भइ बाधा || 
चरन त्रान बिनु नगर अँधेरे | कांकर पाथर रिपु बहुतेरे | 
पंथ अगम्य था और पथिक रूपी जन समूह अगाध था इस शासनकाल का नेतृत्व व् उसकी नीतियां विघ्नकारक सिद्ध हुईं | पथरीले पथ पर कंटक रूपी शत्रुओं की बाहुल्यता थी  ऐसी बाहुलयता में जहां नियम व् नीतियों का अभाव था वहां सुरक्षा के उपाय भी अल्पतर थे | 

कंचे संगत पाए जूँ  हीर कहाता काँच || 
औगुन संग कहाए तूँ औगुन गुन पै पाँच || 3607|| 
कंचों के संगत जिसप्रकार हीरा भी काँच ही कहलाता है उसीप्रकार अतिशय अवगुणों के सांगत कतिपय सद्गुण भी अवगुण ही कहलाते हैं 
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मंगलवार,०७ मई, २०१९                                                                       

प्रथम करम जौ कहउँ बखाना |  जथा जतन निज मति अनुमाना || 
आखर मुखि ग्यान गुन  सागर | गढ़े ग्रन्थ जौ जगत प्रथमतर || 
यथायत्न  व् अपनी बुद्धिं के अनुसार  लेखनी सर्वप्रथम उस कार्य की प्रशंसा जो उक्त शासनकाल द्वारा किया गया | अक्षरों के परम विद्वान ज्ञान व् गुणों का सिंधु होते हुवे जिन्होंने विश्व में ग्रंथों की सर्वप्रथम रचना की | 

परबस परे देसजन सोई | अनपढ़ निपट निराखर होई || 
दीन हीन जन दूज अधीना | होइसि पाठन पठन बिहीना || 
इस पराधीन देश का वही जनमानस निरक्षर होकर नितांत अशिक्षित होता चला गया | पराई अधीनता ने उसे  दुर्दशा से ग्रस्त कर दिया इस दुर्दषाने उसे अध्ययन अध्यापन से विहीन कर दिया | 

प्रथम प्रधान केरि रौताई | करन जोग एहि काज बड़ाई || 
जबहि निराखर देस दिठायो | घर घर आखर अलख जगायो || 
प्रथम प्रधानमन्त्री के शासनकाल का प्रशंसा योग्य यही कृत्या है कि उसे देश निरक्षर दर्शित हुवा तब उसने घर घर में अक्षरों की अलख जगाई | 

बरन दीप पुनि धरत द्वारा | भयउ तमोधन करत उजारा || 
जहाँ बिद्याघर नगर न पावा | रचेउ तहँ अजहुँ सबु गाँवा || 
वर्णों के दीपक द्वार पर आधारित किए यह दीपक अशिक्षा के अन्धकार का हरण करते गए | जहाँ नगरों में विद्यालय नहीं थे वहां अब यह ग्राम-ग्राम में निर्मित हो गए | 

चढ़त बरन सोपान भए पढ़ेलिखे जुववान | 
पढ़े लिखे बालक अजहुँ पढ़े लिखे बिरधान || ३६०८ || 
वर्णों के सोपान पथ पर चढ़ते अब देश का न केवल युवा अपितु बचपन व् वृद्ध भी शिक्षित हो गया | 

एहि बिद्या ग्यान करि रीती | निपतत चरित बढ़ाइ अनीति  || 
भवन आपुना सीख पराई | उदर भरे सो धरम सिखाईं || 
किन्तु इस शैक्षणिक क्रान्ति में जिस शिक्षा प्रणाली का प्रयोग किया गया वह चारित्रिक पतन कर अनैतिकता को प्रोत्साहित करती थी | विद्यालय देश के अपने थे किन्तु वहां सीख पराई थी, जो उदर पूर्ति करे वहां वही विद्या सिखाई जाती | 

पढ़े पोथि ग्यान सो कोरा | दिसाहीन करि दिए पथ भोरा || 
बिनस सुपंथ रचे अस पंथा | लुपुत होत गए सबु सद ग्रंथा || 
पोथियों में लिखित ज्ञान नितांत ही कोरा था यह दिशा हीन कर विद्यार्थी को पथ भ्रमित करता  | सन्मार्ग को विनष्ट कर इसने ऐसे मार्ग की रचना की जिसके अनुशरण से सभी सद्ग्रन्थ को लुप्तप्राय होते चले गए | 

घन घन धन सम्पद उपजावै | बिद्या गुरु सो पाठ पढ़ावै || 
गह बिनु मनि तहाँ भएँ मनीसा | बाग बिनहि तहँ भएँ बागीसा || 
जिससे अधिकाधिक धन का उपार्जिन हो सके शिक्षक वही पाठ पढ़ाते | विद्यार्थी विद्या मणि ग्रहण किए बिना ही मनीषी हो  जाता विद्या विशारद हुवे बिना ही वहां विद्व्ता प्राप्त हो जाती | 

निरमएँ अस भेषज अभियंता | कपट बेस जिमि साधुहु संता || 
बोधगम्य ग्यान नहिबोधे | धनासक्त मति कछु नहि सोधे || 
चिकित्सक व् अभियंता ऐसे बनाया जाता जैसे वेश धारण करने मात्र से कोई पाखंडी साधू बनता है | विज्ञता विषयिक ज्ञान के बोधन से रहित धन में आसक्त हुई बुद्धि कुछ अनुसंधान नहीं करती |( जैसे विदेशी आविष्कार कर कर के इन्हें दे देते ये उसका उपभोग करने में प्रथम आते स्वयं कुछ नहीं करते |)

पच्छिमी अनुहारनन्हि किए अस बिगत ग्यान | 
पढ़ते जड़मति होएं के भूरे सब बिग्यान || ३६०९ || 
विश्व को धातुमय करने वाले  विद्वान देश को  पाश्चात्य के अनुशरण ने विद्या से ऐसा विहीन  कर दिया कि अध्ययन अध्यापन के पश्चात भी जड़मति हुवा वह सारा विज्ञान भूल गया | 

बृहस्पतिवार, ०९ मई, २०१९        

होतब जब को देस अधीना | होइँ तहाँ बस बिनहि बसीना  || 
उदर नाज नहि देह न चीरा | सोग बियोग रोग दए पीरा || 
जब कोई देश परायों के अधीन होता है निवासी होते हुवे भी वहां देशवासी को निवास की सम्प्रभुता का अधिकार अप्राप्त होता है | उदर में अनाज नहीं होता देह में वस्त्र नहीं होते शोक वियोग और रोग उसे उत्पीड़ा देते हैं | 

सुतंत्र भएँ जब कह भइ भोरा | निसि तम चोरा पीट ढिँढोरा || 
दीठात चित्र लिखित दिनमाना | दिए प्रमान अस प्रथम प्रधाना || 
देश स्वतन्त्र हो गया स्वाधीनता की भोर हो गई एक रात यामघोषक ने यह उद्घोषणा की | देश के प्रथम प्रधान ने चित्र में उल्लेखित सूर्य दर्शाकर इसका प्रमाण दिया | 

करतब निज बस कोषागारे |  राजत राज भयो रजवारे || 

रोग पीरित कर हुँत उत्पाली | चले बहुरि पच्छिम कर चाली || 
सत्तासित होते ही देश के कोषागार पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया लोकतंत्र की शासन व्यवस्था राजसी की   | रोग पीड़ित जनमानस की स्वास्थ्य सेवा हेतु पुनश्च पाश्चात्य पद्धति का अनुशरण किया गया | 

एहि चाली करि फलु अस होई | अहहि न अजहुँ निरामय कोई || 

बिदेसी अरोग बिधा प्रचारे  | तासु कारन रोग संचारे || 
इस अंध अनुशरण का परिणाम यह हुवा कि वर्तमान में कोई देस वासी निरोगी नहीं है | (इस प्रकार )विदेशी चिकित्सा पद्धति का प्रचार किया पार्श्व प्रभाव के कारणवश इससे रोगों का निवारण न होकर उनका प्रसारण ही हुवा | 


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देअ जंतु जिउ पीर घनेरे | एही बिधा जो औषधि  हेरे || 
सो बिषकर रसायनि संघटन | गहे बिषम भा रुधिराभिसरन || 
जीव-जंतुओं पर क्रूरता करते हुवे इस विधा ने जिस औषधि विज्ञान का अनुसंधान किया वह वस्तुत: विषाक्त रसायनों संघटन है इसके सेवन से रक्त का परिभ्रमण विषमता को प्राप्त होता है | 

आरोग धाम देस हमारू | रोगोपचार परिसोधनवारू ||
प्रथम औषधिहि ग्रन्थ रचयिता | रचित गई जहँ चरक संहिता ||
जबकी रोगों एवं उनके उपचारों का शोधकर्ता होते हुवे  हमारा यह देश आरोग्यधाम की पदवी को प्राप्त हुवा यह वह भारत है जिसने प्रथम औषधि ग्रन्थ की रचना की यह वह भारत है जहां चरक संहिता रची गई | 

रोगहन रूप अमरित सोधे | विषहरु रुधिरु सरन नहि रोधे ||
कहत जगत मह जिउ जो होई | रहें निरामय यहँ सब कोई ||
संसार में जितने भी जीव हैं वह सभी निरोगी रहें इस उद्देश्य के साथ रोग नाशक अमृतमय  रसायन का शोधन किया जो विषहारी थे एवं  रक्त के अभिशरण में अवरोध व्युत्पन्न नहीं करते | 

गह रोगापह बिधा पराई | विषकर रस गए रुधिरु सँचाई ||
अजहुँ हमरी भई अस देही  | अमरित रस भए बिनहि सनेही ||
पराई चिकित्सा पद्धति को अपनाकर हमने अपने रुधिर में विषाक्त रसों को संचयित कर लिया अब हमारा शरीर इस प्रकार का हो गया कि उसपर आयुर्वेदिक अमृतमय रस प्रभावशून्य हो चले  |  

पुर्बल निरामय होइ जहँ अमर रहे सब लोग |
आयुरकाल छरत तिन्ह अजहूँ मारे रोग || ३६११ ||
इसप्रकार पूर्व समय में जहाँ इस देश के वासी सुखी व् निरामय होकर अमर हुवा करते थे वहीं वर्तमान में औसत आयु काल का क्षरण कर उसे रोग मार रहे हैं | 

शुक्रवार, १० मई , २०१९                     
स्वधुर केरे दीप प्रसंगा | प्रान दान को भयउ पतंगा || 
राज सिहांसन पाँखि संगा | आप बियत गत होइँ बिहंगा || 
स्वाधीनता के दीपक का प्रसंग प्राप्त हुवा और  प्राण दानकर कोई पतंग हो गया  और वह स्वयं राज सिंहासन के पंख लगाकर आकाश में उड़ते रहे | 
सत्ता हुँत करिगै संग्रामा | दीन्हेसि स्वाधीन नामा |
जन सेवक कह मत संचायो | सिंहासन बत्तीस रचायो ||
स्वाधीनता के नाम से जो संग्राम किया वस्तुत: वह सत्ता का संग्राम था |   स्वयं को जनसेवक कहकर जनमत संग्रह किया   को अपने प्रभाव से नचाने वाले ऊँचे  स्थानों की रचना की गई | 


राज गहत भए सेबक राजा | राजा कर कछु काम न काजा || 
सत्तासुख अस मति भरमायो | सेवाधर्म देइ बिहुरायो ||
सत्ता हाथ लगते ही सेवक राजा बन बैठे राजा हुई प्रजा को आजीविका का अभाव था | सत्ता के सुख ने सत्ताधारियों की बुद्धि ऐसे भ्रष्ट की कि वह अपना सेवाधर्म ही भूल गए | 


भुइँ भूतार्थ सोइ जनावा  | होईं  जोइ पयादहि पांवा || 
जनमानस कर उदर महुँ आगी | जौ दुर्नय कारन अति जागी || 
भूमिगत यथार्थ से वही परिचित होता है जो पंखों से नहीं पैरों से चलता हो | जनमानस के उदर में क्षुधा की आग लगी थी, इस शासन की दुर्नीतियों के कारण वह और अधिक भड़क उठी थी || 


उत्पादन कर साधन चीन्हि | उद्यमिकरन देस कहुँ किन्ही || 
तासु कारन बिकसे उद्योगा | कही कहाइ कहें कछु लोगा || 
उत्पादन के सरल उपायों को पहचानकर इस शासनकाल ने फिर देश का औद्योगीकरण किया इस शासन काल के कारण ही उद्योग-धंधे विकसित भी हुवे क्वचित लोग ऐसी कही कहाई बातें कहते हैं | 


तासहुँ जिनकहुँ लाह लहाही  | सो कतिपय एहि करम सराही || 
राज प्रबंधन तासु बिहाना | होतब गए पुनि अर्थ प्रधाना || 
इस उद्योगीकरण से जिन मुट्ठीभर लोगों को लाभ लब्ध  हुवा वह प्रथम प्रधान के इस कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा करते हैं| इस उद्योगिकीकरण के पश्चात  देश का शासन प्रबंध धन पर आश्रित होकर अर्थ प्रधान होता चला गया | 

बहिता धन अवसोष के पूंजी गए निरमाए |
उदार हरिदय होए पुनि कछु कर देइ धराए ||३६१२ क ||
 लोक प्रवाहित धन का शोषण कर उसका पूंजीकरण किया गया, तदनन्तर उदारवादी होकर यह पूंजी कतिपय लोगों के हाथ में दे दी गई | 

अस पूंजीवादिता सों पूंजि लब्धि पै  पाँच |
धनिक बरग उपजाए सो जनमे अर्थ पिसाच || ३६१२ ख ||
इस पूंजीवादी व्यवस्था से देश का यह पूंजीगत धन गिने चुने लोगों के हाथों में चला गया इस पूंजी से लाभान्वित होकर  देश में पूंजीपतियों का एक वर्ग उत्पन्न हुवा इस वर्ग ने फिर धन के पिशाचों को जन्म दिया |

सत्ताधर पुनि चलत कुचाली | अपनायउ सो अर्थ प्रनाली || 
जहाँ उपनावन केर उपाए | पूँजीपति बरग लए हथियाए  || 
सत्ता धारियों ने फिर कुचालें चलते हुवे उस अर्थप्रणाली को अंगीकृत किया जहाँ उत्पादन के साधनों पर पूंजीपति वर्ग का एकाधिकार होता है | 

जनमानस सों कियौ ब्याजा | उपजेउ प्रभुतसील समाजा ||
रचिते सद संसाद सदन | तिनके हितकर नेम निबंधन ||
 प्रभुत्व शील समूह को व्युत्पन्न कर देशवासियों को छला | संसद के सभा सदन में प्रतिनिधि सदस्यों ने इस समूह  के लाभ व् कल्याण हेतु नियम निबंधन गढ़े | 

पुरबल लोहल हल कि हथौड़े | भवन केर कल  ईंट कि रोड़े ||
चाका चिमटा चून कि चीरा | सबहि बस्तु निरमयउ कुटीरा ||
अस्त्रशस्त्र हो अथवा हल-हथौड़े भवननिर्माण यन्त्र हों, ईंट -पत्थर हों  चक्का हो कि चिंमटा हो अथवा चूना हो अथवा वस्त्र ही क्यों न हो  पूर्व समय में मानव जीवन यापन की ये वस्तुएं कुटीरों में लघु उपक्रम द्वारा निर्मित होती थी | 

जेहि उद्यम कर्मकर गहयो | उद्यम पति जौ निज गह रहयो ||
लूटि ताहि धन पति कर दायो | सो सब उद्यम दिए बिनसायो ||
जो उद्यम-उद्योग कर्मकारों के हाथों में था जिससे वह अपने गृह के उद्यम-उद्योग का स्वामी था | उस स्वामित्व को लूटकर तथा उनके लघु उपक्रमिक व्यवस्था को नष्ट कर उत्पादन के ये साधन पूंजीपतियों को हस्तांतरित कर दिये गए | 

हरत खेतभू खन खलिहाना | करत हल भूति बिहुन किसाना ||
गेह भवन भए नाज बिहुने | उपनावन निपते दिन दूने ||
कृषिभूमि उसमें स्थित खनिजखानों व् खलिहानों का अधिग्रहण कर कृषक को हल आजीविका से विहीन कर दिया | गृह -भवन खाद्यान से रिक्त हो चले और देश का सकल घरेलु उत्पादन दिनोंदिन दुगनी गति से गिरता चला गया | 

बहुरि खेट खन  गाँव बसावा | चलें नगर पथ वाके पांवा ||
उदर असन नहि नहि तन चीरा | बसे मलिनि कुटि करि तहँ भीरा |
फिर तो खेड़ों में खण्डों में बसे गांववालों के चरण नगर की और जाने वाले पंथ पर चल पड़े | उदर में अन्न नहीं देह में वस्त्र नहीं वह नगरों में संकुलता उत्पन्न करते मलिन कुटीरों में बसते चले गए || 

करिषि करम कर श्रम सक्ति  किए कल जंत्र निजोग |
तहँ उपजित बस्तु बिलासी धनिक करए उपजोग || ३६१३ ||
इस प्रकार कृषि कर्म में नियोजित श्रमशक्ति का दुरूपयोग कर उसका नियोजन उद्यम उद्योगों में किया गया | वहां उत्पादित वस्तुएं भोग विलासी धनाढ्य वर्ग के लिए होती | 

उद्यमि करन के एकै मंत्रा | भोग बस्तु निपजै कल जंत्रा ||
पुरबल उद्यम के अस्तंभा | मानस के कर रहँ अवलंभा ||
औद्योगिकीकरण का एक ही मंत्र था कि उपभोग की वस्तुएं कल यंत्रों द्वारा उत्पन्न हों | पूर्व समय मेंउद्यमों का स्तम्भ मानव के हाथों में अवलम्बित था |  

करत प्रगति पुनि पच्छिम बासी | भयउ भूरि भव भोग बिलासी ||
पुनि भएँ जब  मानस अधिकाना | उपजि बस्तु भइँ तिल परमाना ||
फिर  (ज्ञान व् उपदेशों से रहित होने के कारण )अत्यंत ही भोग विलासी प्रवृत्ति के पश्चिमी वासि प्रगति पथ पर द्रुत गति से बढ़ने लगे | उसपर मानव जनसंख्या का वैश्विक विस्फोट हुवा तब उत्पादित वस्तुएं न्यून हो गईं और उपभोक्ता अधिक हो गए | 

तासु अपूर्ति पूरन हुँते | निपजावनु सुख साधन बहुँते ||
उद्यमिकरन कइँ चाह जनाइ | अरु नाना कल जंत्र उपजाइ ||
उनकी अपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अधिकाधिक सुखसाधनों के उत्पादन के लिए औद्योगिकीकरण की आवश्यकता उत्पन्न हुई और नानाभांति के कलयंत्रों का आविष्कार हुवा || 

संचित धन निकसाए पुनि करै ढोल में पोल |
छनिक छदम बढ़ती केर  बोले मधुरिम बोल || ३६१४ ||
फिर भूमि संचित सम्पदा का निष्कासन होने लगा भूमि तो गोल थी जहाँ यह सम्पदा निष्कासित हुई वहां की भूमि पोली होकर ढोल हो गई | और वह क्षणिक व् छद्म प्रगति के सुरीले बोल बोलने लगी | 

एक दिवस जब कंपति  ए उठिहेंगी जब दोल |
छैल छबीली प्रगति कर खुलहएंगी सब पोल ||
एक दिन कम्पन करती जब यह दोल उठेगी तब उक्त कथनों को सिद्ध करते इस छैल छबीली छद्म प्रगति का सारा भेद खुल जाएगा | और ये भी सिंधु घाटी की सभ्यता जैसे हो जाएगी | 

सोमवार, १२ मई, २०१९             

अजहुँ उद्यम सहुँ बैठ बिठाए | जगजन खनि खन खंदै रु खाए ||
खातेउ असि बरसि कछु बीते | होहि अवसि भूधन सों रीते ||
अभी तो विश्व का जनमानस इन उद्यमों उद्योगों द्वारा खनिज खदानों का उत्खादन कर बैठे बैठे सुख भोग रहा है | यदि यह भोग विलास इसी प्रकार से होता रहा तो कुछ वर्षों के पश्चात यह भूमि सम्पदा से रहित होगी  | 

लघुता माहि बसी प्रभुताई || सबकहुँ सो सुठि सुकुति जनाई ||
पुरबल गह लघु मझलि इकाई | सोन चिड़ी एहि देस कहाई ||
लघुता में प्रभुता का वास होता है यह सुन्दर विचार सर्वविदित है पूर्व समय में लघु व मध्यम इकाइयों के बल पर ही यह देश सोने की चिड़िया कहा जाता था | 

भयउ भूमि भव भूतिहि भूरी | भवन भवन भँडारू भर पूरी ||
जथारथ उपनावन उपनाए | दीर्घ कालिहि प्रगति पथ पाए ||

यह भूमि ऐश्वर्य से परिपूर्ण थी इसके भवन-भवन में भरपूर भंडारण था | वास्तविक उत्पाद उत्पादित करते हुवे यह दीर्घ कालिक प्रगति के पंथ को प्राप्त था | 

राजपंथ बहु सेतु बनाई | बृहद बृहद अति गहत  इकाई || 
अजहुँ एहि देस मलिन कहिलाए | मँगए लोग यहँ हाथ पैसाए || 
राजपथों और सेतुओं की रचना तथा वृहद्  वृहद् उपक्रमों से युक्त होते हुवे भी वर्तमान में यह देश मलिन व् भिक्षा वृत्ति से जीवन यापन करने वाला वाले लोगों का देश कहलाता है | 

कहाँ ए काल कहाँ सो काला |  कहँ त बकुल कहँ  हंसक चाला || 
चारिहुँ पुर उद्यम करि जाला | तापर भुति करम अकाला || 
आधुनिक कहा जाने वाला कहाँ तो यह काल कहाँ वह पुरातन  स्वर्ण काल| कहाँ ये पश्चिमी वाली बगुले सी चलनी और कहाँ वह हंस की चाल | पश्चिम के अनुकरण वाले इस आधुनिक काल में चारों और उद्यम उद्योग का जाल होने के पश्चात भी आजीविका का अकाल पड़ा हुवा है | 

बिचरत जहँ तहँ अर्थ पिसाचा | खंद खनी खन खावहिं काचा || 
निसिचर नै नीति ब्याला | दंतालय समास कराला || 
पुर्ब ए भू असि पति सों पूरी |  करिअ देत सुबरन सो धूरी || 
अर्थ पिसाच समास ब्याला | सत नीति नै हतै तत्काला| 
समस्या रूपी विकराल मुख में राक्षसी प्रवृत्ति के नेतृत्व की हिंसाकारी नीतियों के दांते ग्रहण किए अर्थ पिशाच जहाँ तहाँ विचरण करते हैं और खनिज खदानों को कच्चा चबा जाते हैं |  प्राग समय में यह भूमि ऐसे धनपतियों से परिपूर्ण थी जो  मिटटी को भी स्वर्ण में परिवर्तित कर देते र समस्याओं केअर्थ पिशाचाओं औ हिंसक जंतुओं को सात्विक प्रवृत्ति वाले नेतृत्व की नीतियां अर्थ पिशाचों और समस्याओं के हिंसालुओं को तत्काल हताहत  कर देतीं | 

लघुत मझारि उद्यम अधारि करि  पुरबल चरना नुहारते |
कर्मकार केर कुटीरु कुटुम कर जंत्र भवनाधारते ||
जन सेबक सेबा ब्यौहारत सहार्थ सहुँ सहारते |
पूरत अपूरत भरि पूरिते भवन भवन भंडार ते ||
अपने पूर्व के स्वर्णिम काल का अनुशरण करते हुवे देश के उद्योग यदि लघु व् मध्यम स्वरूप में आधारित होते  यंत्रगृहों को कर्मकारों की कुटियाओं में उनके कुटुम के हाथ पर अवलम्बित करते और देश के जनप्रतिनिधि सेवा व्यवहार कर सहयोग द्वारा उनकी सहेज करते तो अपूर्त की पुर्तियाँ करते हुवे इस देश के भवन भवन वैभव विभूतियों से भरे पुरे होते | 

बृहदोदयोग करत गए धनिक बरग कहुँ पीन | 
बसत जन जन मलिन भवन रहे दीन के दीन || 
वृहद उद्योग धनाढ्यवर्ग को और अधिक धनाढ्य करते चले गए | और देश का जनसमान्य वर्ग मलिन भवनों में बसता दरिद्र का दरिद्र रहा | 

रविवार, 10 मार्च 2019

--- ॥ दोहा-दशम ३५९॥ -----

छाज चकरबरति सी गह छतरधारि सी धाज |
प्रजा तंत्र माहि मंत्री भयो राजाधिराज || ३५९१ || 
भावार्थ : - चक्रवर्ती राजाओं जैसी साजसज्जा व् छत्रधारियों जैसी चमक-दमक ग्रहण किए प्रजातंत्र में अब मंत्री राजाधिराज हो चले थे |

मान राजा आपनु पुनि पहिर पंचु परिधान | 
अवनि न आवत उड़ि फिरे बैसे बहुरि बिमान || ३५९२ || 
भावार्थ : - तदनन्तर स्वयं को राजा मानकर ये पंचपरिधान धारण किए विमान में विराजित होकर गगन में उड़ते फिरते चुनाव के समय चलने वाले इनके त्राणहीन चरण अब धरती पर ही नहीं पड़ते ||

जनजन केरि करनिधि के आपहु भयो निधान | 
भाषन माहि निपजायउ अजहुँ असन धन धान || ३५९३  || 
भावार्थ : - जन जन की कर निधि के ये स्वयं ही निधान बन बैठे अब भोजन, वस्त्र, धन, धान खेत में उत्पन्न न होकर इनके भाषणों में उत्पन्न होने लगे |

भागबिधाता देस के बहुरि आपुनो जान | 
नेम बिहुने औरन हुँत रचेउ नेम बिधान || ३५९४ || 
भावार्थ : - स्वयं को देश का भाग्यविधाता संज्ञान करते हुवे नियम व् मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले अब औरों के लिए नियम व् मर्यादाएं निर्मित करने लगे |

पाए सिन्हासन पुनि पुनि भरेउ अस मद मान | 
बुद्धि संगत बिनसायो बिबेक सोंहि  ग्यान || ३५९५ || 
भावार्थ : - वारंवार सिंहासन प्राप्त होने पर शासनकर्ता मद व् अभिमान से भर गए इस अभिमान ने सत्ताधारी की बुद्धि के साथ उसके ज्ञान व् विवेक को भी विनष्ट कर दिया |

कवन रिपु को सौ हरिदय अपुना कवन बिरान | 
भरम भरे मन मानसा तासु रहे नहि भान || ३५९६ || 
भावार्थ : - कौन शत्रु है कौन मित्र है कौन अपना कौन पराया है भ्रम के वशीभूत मनोमस्तिष्क को इसका ज्ञान न हुवा |

जो अहिती कहि जोग नहि कहे तासु निज भाइ | 
निज हिती हुँते देस कहुँ करत गयउ अहिताइ || ३५९७ || 
भावार्थ : - जो शत्रु कहने के भी योग्य नहीं थे उन चीनियों को भाई कहा | अपने हितैषियों के हित के लिए ये शासनकर्ता देश का अहित करते चले गए |

नगर अँधेरा छाए जब  चौपट रहे दुआर | 
पहरारु जब सोए रहे जगे रहे संसार || ३५९८ ||
भावार्थ : - नियम व् नीतियों के अभाव में जब देश के द्वार चौपट हो चुके थे जब प्रहरी गहरी निद्रा में थे किन्तु संसार जागृत था |

धर्म बिरोधि भुआलु जब फिरतब गालु बजाइ | 
मतिहीन तिन्ह जानि तब पडोसि किअउ चढ़ाइ || ३५९९ || 
भावार्थ : - धर्म विरोधी होकर शासक जब विश्व में आत्मश्लाघा करते फिर रहे थे तब उसे बुद्धिहीन संज्ञानकर प्रतिवेशी ने देश पर आक्रमण कर दिया |

कोपत आनि सैन चतुरंगा | साज संग्रामु समाजु संगा  ||
रहँ सीउँ अस तासु रनरंगा | फुकरेउ जिमि सरोष भुजंगा ||
समस्त संग्राम सामग्रियों से सजी शत्रु की चतुरंगिणी सेना कोप करते हुवे सम्मुख आ डटी | सीमारेखा पर उसके उत्साह का प्रदर्शन ऐसा था मानो रोष से भरे सर्प फुफकार रहे हों | 

बहोरि दुहु पुर तैं बरबंडा | गहि प्रलयंकर अगन प्रचंडा ||
छाडत चलि गै गोला गोली | धसे भूधर धरनिहि डोली ||
फिर तो दोनों पालियों के वीर प्रलयंकारी अग्नि ग्रहण किए हुवे गोले और गोलियां छोड़ते चले गए इस घमासान से धरती डोल  उठी लगी और भूधर राज हिमालय धंसने लगा | 

रिपुहु अपरबल बल अस भयऊ | बार बिफल सब होतब गयऊ ||
करत बीर पुनि हाहाकारा | कीन्हिसि त्राहि त्राहि पुकारा ||
शत्रु के प्रचंड बल ऐसा था  देश की सेना के सभी प्रहार विफल होते चले गए तदनन्तर शूरवीर हाहाकार करते हुवे रक्षा की पुकार करने लगे | 

लह अधुनातन आजुध नाना | बरत बिधा बहुतेर बिधाना ||
बुद्धि ग्यान बिबेक बिहीना  | बली होतब भयउ बलहीना ||
नाना आधुनिक अस्त्र-शास्त्रों से युक्त होकर उनके संचालन की विधाओं का विभिन्न प्रकार से उपयोग करते हुवे वह शूरवीर बली होते हुवे भी बुद्धि ज्ञान विवेक की हीनता के कारण बलहीन सिद्ध हुवे | 

भोगत राजु भरे रहे सासनहर मन भरम | 
भई पराजय रिपु तईं भेद गयो पुनि मरम || ३६०० || 
सत्ता का उपभोग करते सत्ताधारी का मन  भ्रमों से परिपूरित था  ( पडोसी तो हमारे भोलेभाले भाई हैं वह युद्ध नहीं करेंगे ) और फिर यह रहस्य उद्घाटित हुवा कि देश की सेना शत्रु के हाथों परास्त हो गई | 



रविवार, 10 फ़रवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५ ८ ॥ -----,

जुगलगि लमनिहि दासिता कर्यो दीन मलीन से | 
काज बिहुने जनजन पुनि होतब गै अरु दीन से || ३५ ८१ || 
भावार्थ : - सहस्त्र वर्षों तक की लम्बी दासता ने भारत के जनमानस को अभावग्रस्त कर दरिद्र कर दिया था विभाजित देश में जीविकाविहीन होकर वह और अधिक दरिद्र होता चला गया |

गहे देस अस दुरदिबस दिसा दरसि नहि कोइ | 
रहिअउ सोई दुर्दसा रहिअ दासिता सोइ || ३५ ८२ || 
भावार्थ : - देश में ऐसी अन्धेरा व्याप्त था कि उसे कोई दिशा ही दर्शित नहीं हुई दिशाहीन देश की दशा फिर वहीँ रही और दासता भी वही रही |

उद्या न को नेम नभस न दिसा न कतहुँ प्रकास | 
देस भुईँ बँटि गइ रु जन रहउ दास के दास || ३५८३ || 
भावार्थ : - न नियमों का ही सूर्योदय हुवा न कहीं प्रकाश होता दर्शित नहीं हुवा, देश की भूमि भी विभक्त हो गई और जनमानस दास का दास बना रहा |

अंधड़ भई दारिद की सुरसा मुखी समास | 
चरन चरन जलजान दए बूड़न केर अभास || ३५ ८४ ||
भावार्थ : - दरिद्रता की सुरसाके मुख सी यह विकराल समस्या राष्ट्र रूपी जलयान हेतु अंधड़ सिद्ध हुई जो चरण-चरण पर राष्ट्र रूपी जलयान को डूबने का आभास कराती |

दुरदरस दर्पन पाछे सत्ता दियो अँधेरि | 
ता अंधड़ आनि बहोरि पग पग लेईं अबघेरि || ३५ ८५ || 
भावार्थ : - चकाचौंध उत्पन्न करने वाली सत्ता रूपी दर्पण की मलिनता ने देश के साथ छल किया  उसपर यह दरिद्र की विकराल समस्या उसे चरण चरण पर घेरने लगी |

घात देस बिस्बास |
साँस साँस उछ्बास दिए भए सब आस निरास ||

सत्तासीत स्वारथी मारएँ ऐसो मंत्र | 
जनमानस रहेउ नहीं कहाँ जोग परतंत्र || ३५ ८६ || 
भावार्थ : - स्वार्थी सत्ताधारीयों ने ऐसा मंत्र फूंका कि जनसामान्य देश परतंत्र है यह कहने योग्य भी नहीं रहा  |

जबु आगत चुनाउ चरे चरनी पहन बिहीन  |
आपु दीनानाथ करे जन नाथन कहु दीन || ३५ ८७ -क || 

रहनी पहनी बिलगु किए कहनी करनी हीन | 
चढ़न सिहासन चरफरे अस बिनु जल जस मीन || ३५ ८७-ख || 
 भावार्थ : - देस में आमचुनाव के आते गए यह सत्ताधारी चलनी को त्राणहीन करते हुवे स्वयं को दीनबंधु प्रदर्शित करते दीनबन्धुओं को दारिद्र करते गए चुनाव के समय इनकी पहनी इनकी रहनी से विलग होती और  कथनी को करनी से रहित कर ये सिंहासन प्राप्त करने हेतु जल बिन मीन के जैसे तड़पने लगते |

चरपरनिहि बत कहत फिरे कृत नित नउ षड़यंत्र | 
राजा गए रानि गइ है अब तो परजातन्त्र || ३५ ८८ || अज्ञात || 
भावार्थ : - चिकनीचुपड़ी बातें कर नित नव षड़यंत्र करते हुवे वह कहते फिरते ''राजा गए रानी गई अब तो  प्रजातंत्र है'' |

माँगत मत अति बिनइबत घर घर चरबाँक | 
गेह दुआरिहि पट दिए त कहे झरोखे झाँक || ३५ ८९ || 
भावार्थ : - अत्यंत विनयानवत होकर वह घर घर में चतुराई पूर्वक मतों की मांग करते | जिसके घर की दुआरी पटाच्छादित होती तो वह झरोखों से झांकर कहते ''प्रजातंत्र है'' |

कर जोरि सिरुनत परत रे जन जन के पाउ | 
देइ गारी हनत चपत चढ़त चुनाबी नाउ || ३५९० || 
भावार्थ : - पहले ये हथजोड़े सिरोनत किए मत हेतु जन जन के चरण स्पर्श करते | चुनाव की नाव में चढ़ते ही अपशब्दों का प्रयोग करते हुवे उसके गालों पर थप्पड़ मारकर चल पड़ते ||


शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५७ ॥ -----


अपनी सुलटी जान के भरे दम्भ अभिमान |
सत्तारूढ़ि दल रहैं तब भबितब ते अनजान || ३५७१ ||
भावार्थ : - अपने विचारों को ही  राष्ट्र के अनुकूल मानने वाले दम्भ और अहंकार से परिपूर्ण तात्कालिक सत्ताधारी तब भविष्य से अनभिज्ञ थे  |

लोकतंत्र के अर्थ ए जनजन करे चुनाउ |
सासनकारज हेतु मन जाके सेवा भाउ  || ३५७२ ||
भावार्थ : - भारतीय लोकतंत्र का यह अर्थ था कि देश का जनमानस शासनसंचालन हेतु उसका चुनाव करे जिसके मन में देश सेवा का भाव हो |

खेवट खेवा में रहे सेवा गइँ बिसराइ |
खेवाई कर देइ पुनि पथिक चलें बोहाइ || ३५७३ ||
भावार्थ : - किन्तु राष्ट्र रूपी जलयान का संचालन करने वाले सेवा को विस्मृत कर स्वार्थ पूर्ति में संलग्न हो गए और भारत का जनमानस करसिद्धि भी देकर बहता चला गया (मूर्ख बना रहा )|

काटि कूट कुठार सरिस  देस धर्म संजात  |
तिनके कुण्ठ बिचार अस  चले मूरि बिनसात || ३५७४ ||
भावार्थ : - उनके कुण्ठ विचार कुल्हाड़ी के समान  देश में व्युत्पन धर्म और उसके जातकों को उनकी मौलिकता से पृथक करते हुवे उन्हें समूल नष्ट करते चले गए |

मुख मण्डल परि आभ दिए बरनत कुटिल सुभाउ | 
जनजन के मन मानसा छाड़त गयउ प्रभाउ || ३५७५ || 
भावार्थ : - कुटिल स्वभाव वरणकर मुख पर एक विशेष आभामंडल लिए ये सत्ताधारी जनमानस के मनोमष्तिष्क को प्रभावित करते चले |

जन जन के धन कोष कहुँ चरन चरन कृत सोष | 
बाहिर जग जगरात गए गोपत अंतर दोष || ३५७६ || 
 भावार्थ : - जनमानस के  परिश्रम से अर्जित कर कोष के चरण-चरण पर शोषण द्वारा बाह्य जगत उज्ज्वलित करते हुवे यह अपने अव्यवस्थित अंतर्जगत के दोषों को गोपित करते चले |

चकाचौंध निज संग लिए जब जन जन समुहाए | 
प्रगसेउ भगवन सबु अस पर्सन होड़ मचाए  ||३५७७ ||
भावार्थ : - अपने इस बाह्यजगत की चकाचौंध के साथ जब यह जनमानस के सम्मुख होते तब उनमें उन्हें स्पर्श करने की ऐसी प्रतिस्पर्धा होती जैसे नगर में साक्षात भगवान प्रकट हुवे हैं उनके स्पर्श मात्र से वह समस्यामुक्त हो जाएंगे ||

मुख मंडल दीपितमई कर कौसल ते हीन | 
दर्पन दमकत दरस जस पाछे दरस मलीन || ३५७८ || 
 भावार्थ : - जैसे दर्पण का सम्मुख दैदीप्यमान दर्शित होता है किन्तु उसके पृष्ठ में मलीनता दर्शित होती है उसी प्रकार यह संविधान निर्माता सत्तासीन भी सम्मुख तो दीप्तिमय दर्प से युक्त थे किन्तु उनका पार्श्व नीति व् नियमों की कार्यकुशलता से विहीन था |

कर्म मर्यादा सँग रहे रहे धरम मैं नीठ | 
ता दोष तिन्ह दरस्यो जाकी ग्यान दीठ || ३५७९ || 
भावार्थ : -  अपनी जाति की मर्यादा का पालन करने वाले जिन धर्मनिष्ठों के पास ज्ञानदृष्टि थी उन्हें दर्पण रूपी यह दोष दृष्टिगत हो जाता |

सासन बकुला होइ के चला मराली चाल | 
सुरसा मुख सी होइ चलि जन समास बिकराल ||३५८० || 
भावार्थ : - राम की बगुला भक्ति से प्राप्त सत्ताधारियों का शासन हंस की चाल चला  किन्तु इसकी चालचलनि से जनसमस्याएं सुरसा के मुख सी विकराल होती चली गईं |


मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

----- ॥ दोहा-दशम ३५६ ॥ -----,

पथिकहु अन्धानुहारत भयउ नैन ते हीन | 
ताहि संगत लेइ चले जिनके रहे अधीन || ३५६१ || 
भावार्थ : - यात्री भी नेत्रविहीन होकर उक्त विचारधारा का अंधानुकरण करने लगे और भारभूत होते हुवे समुद्र के उन लुटेरों को अपना साथ ले चले जिन्होंने इस जलयान को अपने अधीन किया था |

जहाँ अल्पतम आपने पराए बहु अधिकाए | 
ताहि बहुमत पाए तहाँ हथ बाँसन बँसनाए || ३५६२ ||  
भावार्थ : - लोकतंत्र का दोष यह है कि जब किसी राष्ट्र में उसके मूलभूत की संख्या अल्पतम हो जाए और बहिर्देशियों की संख्या बहुलता को प्राप्त हो जाए तब ऐसे बाहुल्य के बहुमत से उक्त रष्ट्र की सम्प्रभुता पर बहिर्देशियों का अधिकार स्थापित हो जाता है |

उदाहरण के लिए : - जम्मू व् कश्मीर
टिप्पणी : - संविधान के द्वारा शासन का अधिकार मूलभूत को प्रदान कर ऐसे दोष का निवारण किया जा सकता है |

सासन के अधिकार गह  दुहरावत इतिहास | 
मूलभूत पुनि दासकृत निज निवास निर्बास || ३५६३ || 
भावार्थ : -शासन का अधिकार से संपन्न ये इतिहास को दोहराते हुवे (भविष्य में) इस राष्ट्र के मूलभूत को उनके अपने निवास से निष्कासित कर दास वृत्ति को विवश करेंगे |

एक धर्मि संग मिलत तब करतब एकै कगार | 
एक जान करि मिलहेंगे अधार संग अधार || ३५६४ || 
भावार्थ : - तदनन्तर इस राष्ट्र रूपी जलयान के आधार से आधार मिलाते वह बहिर्देशी एकधर्मी समुदाय सम्मिलित होकर अपनी सीमाओं का एकीकरण कर लेंगें |

दास रूप अनुपालिते वाके नेम बिधान | 
सो देस अस बूड़तेसि बूड़त जस जलजान || ३५६५ || 
भावार्थ : - दास रूप में फिर उन बहिर्देशियों के संविधान का अनुपालन करते हुवे यह राष्ट्र ऐसे अवगाहित हो जाएगा जैसे कोई जलयान अवगाहित होता है |

अधुनै देस को चाहिए सो संबिधिक सुधार | 
मूलभूत कर देइ जो शासन के अधिकार || ३५६६ || 
भावार्थ : - विद्यमान भारत को ऐसे संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता है जो मूलभूत निवासियों को ही शासन का अधिकार प्रदान करे |

बिचार धार होतब तब देस बाद प्रतिकूल | 
बहिर बरग बहुलाए सो करत अलपतम मूल || ३५६७ || 
भावार्थ : - शासनतंत्र की विचारधारा राष्ट्रवाद के प्रतिकूल होती है जब वह बाह्यवर्ग को बहुलतम कर मूलभूत समुदाय को अल्पतम कर देती है |

करनधार बिनु देस तब होतब राम भरोस | 
बहिर बरग के बहुल ते गह बहुमत कहुं दोष || ३५६८ || 
भावार्थ : -  नियम व् नीतियों से रहित लोकतांत्रिक राष्ट्र तब रामभरोसे होता है जब वह बहुलित बहिर्देशीय समुदाय के बहुमत का दोष ग्रहण करता है |

सींव संग बिरोधि होत जब बिचार करि धार | 
 मूलभूत बिनसाए सो बिंधत जान अधार  | ३५६९  || 
भावार्थ : - शासनतंत्र की विचारधारा जब सीमावाद के विरुद्ध होती हैं राष्ट्र रूपी जलयान के आधार को छिद्रित कर उसके मूलभूत को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है |

देसबाद नुकूल होत जौ बिचार करि धार | 
चरत अबिरत करतब पक्खर जान अधार || ३५७० || 
भावार्थ : -  राष्ट्रवाद के अनुकूल विचारधारा से युक्त राष्ट्र रूपी जलयान अपने आधार को सुदृढ़ कर जगत में अविरत प्रचालन करता है |

होत कुसल जब जान करि करनधार करतार | 
निज पथिक संग लए चले करतब सबहि कगार || ३५७१ || 
भावार्थ : -  यदि नीति-नियम निर्धारित करने वाला कुशल हो तब राष्ट्र विरोधी शक्तियों को एक किनारे लगाकर वह राष्ट्र रूपी जलयान अपने मूलभूत पथिकों के साथ सतत रूप में संचालित रहता है |




------ ॥ दोहा-दशम ३५५ ॥ -----,

देस जौ बिटप रूप है मौली वाके मूर | 
साख तासु समुदाय है  अरु सम्पद फल फूर || ३५५१ || 
भावार्थ : - कोई राष्ट्र यदि वृक्ष स्वरूप है उसके मूल निवासी ही उसके मूल हैं राष्ट्र में प्रादुर्भूत समुदाय ही उसकी शाखा-प्रशाखाएं हैं फल फूल उसकी सम्पदा है |

मूरि ते फलीभूत भए गह धन सम्पद कोष | 
बिटप सुखाए आपुना पराए को परिपोष || ३५५२ || 
भावार्थ : - मूल निवासियों से फलीभूत राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा का अधिग्रहण कर फिर उससे अपने वृक्ष को शुष्क कर पराई सम्प्रदायों का परिपोषण किया जाने लगा |

सिंहासन बिराजित भए बिहुरत जोइ बिदेसि | 
अजहुँ बिरोधि भाव संग बैरन लगे सुदेसि || ३५५३ || 
भावार्थ : - विदेशी का बहिष्कार स्वदेशी अपनाने के आह्वान से सत्ता को प्राप्त हुवे शासको अब विरोधी भाव लिए स्वदेशी में दोष दर्शाने लगे |

निज भाषा निज संस्कृति निज भूषा निज भेष  | 
अबरहि बर मानत तासु भए हितकारि बिसेष || ३५५४ || 
भावार्थ : - अपनी भेष भूषा अपनी भाषा अपनी संस्कृति से भिन्न देशों की भाषा  व् संस्कृति को श्रेष्ठ व्  सर्वोपरि मानकर वह उनके विशेष हितकारी हो चले |

समुझत कोबिद आपुनो पढ़िकेँ पढ़नि पराइ | 
सत्ताधारी किन्हेसि सोइ जोइ मन आइ || ३५५५ || 
भावार्थ : - विदेशी शैक्षणिक संस्थानों से शिक्षित सत्ताधारी स्वयं को महा विद्वान संज्ञानकर अपनी इच्छानुसार कार्य करने लगे |

जो प्रतिकूल बात कहे ताको संग बिबाद | 
अधिनायक तंत्र सहुँ अस निपजे सत्तावाद || ३५५६ ||
भावार्थ : - जो इस स्वेच्छाचारिता के प्रतिकूल वचन कहता वह विवादित हो जाता इस प्रकार अधिनायकतंत्र के साथ सत्तावाद प्रादुर्भूत हुवा |

नीतिनेम बिनु देस बिनु करनधार जलजान | 
अपुना जहाँ न आपुना राजएँ तहाँ बिरान || ३५५७ || 
भावार्थ : - नीति नियम से रहित राष्ट्र कर्णधार से रहित जलयान के समान होता है |  जहाँ स्वत्व पर अपना अधिकार नहीं होता वहां उस पोत के पति पराए हो जाते हैं |

पथिक पटतर देसज जन जगत पयोधि अपार | 
काज पाल रौता बात बहतीं धार बिचार || ३५५८ || 
भावार्थ : -मूलभूत संतान ही उस राष्ट्ररूपी जलयान के यात्री होते हैं शासन  पाल और  शासनव्यवस्था वायु स्वरूप व् उसकी विचारधारा ही धाराओं के सदृश्य होती हैं |

देसबाद बिरोधजनक पुनि बिचार की धार | 
चढ़त जगत बोहत ताहि बूड़त पाए न पार  || ३५५९ || 
भावार्थ : - जब विचारों की ये धाराएं राष्ट्रवाद अथवा सीमावाद हेतु विरोध व्युत्पन्न करने वाली होती हैं तब वह तट रूपी सीमाओं की पहुँच से विहीन हो जाता है जिससे विश्वभर के यात्री उसपर आरूढ़ हो जाते हैं और फिर असहनीय भार उस जलयान को डूबो देता है  |

अजहुँ रजत रौताइ के भए ऐसोइ बिचार | 
समय बिरतत पातु चले बोहत भार अपार ||३५६० || 
भावार्थ : -  इस समय तात्कालिक सत्तारूढ़ शासकवर्ग की विचारधारा भी ऐसी ही थी, इन विचारों के परिणाम स्वरूप कालान्तर में भारत रूपी जलयान असहनीय भार लेकर चला |


मंगलवार, 29 जनवरी 2019

------ ॥ दोहा-दशम ३५४ ॥ -----,

कालि कलुषि कलीसाई जद्यपि चरन बहोरि | 
कारि रैनी कारि रही भई नहीं परि भोरि || ३५४१ || 
भावार्थ : - यद्यपि अंग्रेज ईसाई अपनी दासत्व की कालिमा के साथ लौट गए थे   किन्तु स्वाधीनता की भोर नहीं हुई नियम व् नीतियों के अभाव की अँधेरी रात्रि जस का तस रही |

देस चाक पुनि चलि परे पीछु परायो कंत | 
ढँकत बुराईं आपनी रचत गयउ षड्जंत्र || ३५४२ ||
भावार्थ : - देश का चक्र पुनश्च चल पड़ा इस बार सम्मुख न होकर पश्च भाग में बहिर्देशी का स्वामित्व था अपनी त्रुटियों के ढकाव हेतु यह षड़यंत्र रचता गया |

चारन रथपथ राजसी नाउ दियो जनतंत्र | 
कहत मंतब सोइ रहै कहए मंत्रि जौ मंत्र || ३५४३ || 
भावार्थ : - जनतंत्र का नाम देकर जन संचालन के रथ व् उसका पथ को राजसी किया गया यह कहते हुवे कि अब मंत्री जो मंत्रणाएं करेंगे वह प्रजावर्ग को मान्य होंगी |

सासनहर कीन्हे जौ कहतब सो सबु नीक | 
चरत लीक को आपुना कहते पुरानि लीक || ३५४४ ||
भावार्थ : - पराए कंत के दिखाए पाषाणपंथ पर अग्रसर होते अब सत्ताधारी जो कहते वह सब आधुनिक कहलाता जो कोई अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं का अनुशरण करता उसे वह पुराणपंथी कहते |

स्वत्वाधिकार संगत जहँ जन होत बिहीन | 
जहाँ न प्रभुता आपनी सो तो देस अधीन || ३५४५ || 
भावार्थ : - जहाँ का जनमानस संपत्ति पर से स्वामित्व के अधिकार से विहीन हो जहाँ अपना सम्प्रभुत्व न हो वह देश पराधीन होता है |

सम्पदा परि स्वत्व करि रहे नहीं अधिकार | 
सम्प्रभुता भइँ नाउ की खात पराई मार || ३५४६ || 
भावार्थ : - सम्पति पर स्वामित्व का अधिकार छीन लिया गया, देश की मौलिकता पर बहिर्देशीय के संघात से राष्ट्र की सम्प्रभुता भी नाममात्र की रह गई |

सनै सनै सासनतंत्र भयऊ बरचस्बान | 
जन सधारन होत गए सासक महमहिमान || ३५४७ || 
भावार्थ : - धीरे धीरे शासनतंत्र अधिकाधिक शक्तिशाली होता चला गया, शासक वर्ग महानता को प्राप्त होकर असाधारण होते चले गए जन मानस 'साधारण' कहा जाने लगा  |

रचत बिधि कछु आन कहे रजत भयउ कछु आन | 
भोग बिलासी बान किए बैसे ऊँच मचान || ३५४८ || 
भावार्थ : - संविधान निर्मित करते समय कुछ और कहा गया जब इन शासकों का राज आया तब कुछ और ही कहा जाने लगा समानता की बात करने वाले भोग विलासिता की बानि वरण कर  ऊँची आसंदी पर जा बैठे |

लोकतंत्र जो देहि तौ  आतम बिधिहि बिधान | 
न्याउ हरिदै देस है मूलभूत हैं प्रान || ३५४९ || 
भावार्थ : - लोकतंत्र यदि शरीर है तो  संविधान उसकी आत्मा है, न्याय उसका हृदयदेश है तत्संबंधित राष्ट्र के मूलभूत उसके प्राण है |

 मूलभूत बिनसाइ के तासों होत बिहीन |
मरनासन्न होत जात तंत्र प्रान ते हीन || ३५५०  ||
भावार्थ : - अपने मूलभूत को विनष्ट कर मौलिकता से विहीन कोई लोकतंत्र प्राणहीन होकर अवश्य ही मृत्यु के निकट होता है |




----- ॥ दोहा-दशम ३५३ ॥ -----,

सुनि प्रात जब पाखंडित पण्डितान की तान | 
मूलभूत गह बहिर किए बैसे भीत बिरान || ३५३१ || 
भावार्थ : - प्रात: फिर पांडित्य का पाखंड करने वाले खंडित पंडित की तान सुनी गई जो देश के मूलभूत थे उन्हें बहिर्गृही कर जो बहिर्देशीय मूल थे उन्हें देश के अंतर्गृही घोषित किया गया  |

परबस करिया मूल पुनि चरन साँकरी डार | 
चले पाछि करि चलनि अस संबिधान अनुहार || ३५३२ || 
भावार्थ : - भारत की मौलिकता के चरणों में सांकलें देकर उसे पराए मूल के वशीभूत कर फिर संविधान का अनुशरण करते हुवे देश को पश्चिम के चाल चलन में प्रवृत्त किया गया |

डगर डगर रु गाँउ नगर होत मूल दुखिआर | 
मारे मारे इत फिरे खात पराई मार || ३५३३ || 
भावार्थ : - हिंसावादी बहिर्देशीय समुदाय के घात पर चढ़ा फिर इधर वह देशीय मूल संकटापन्न होकर मार्गों परके नगरों व् गाँवों में जहाँ-तहाँ भटकने को विवश हो गया |

गेह द्वार लुटाए के कहुँ आसरा न आस | 
भूमि भईं पुनि साथरी ओहार दिए अगास || ३५३४ || 
भावार्थ : - घर द्वार लूट लिया गया था, न कहीं आश्रय था कोई आस ही थी  | भूमि ही उस मूल की साथरी तो आकाश उसका आच्छादन था |

जुग जुग लगि बिकसाए के गहे रहे जहँ मूरि | 
तासहुँ जोग लगाए पुनि प्रसरत गए बहु दूरि || ३५३४ || 
युगों युगों तक जड़ें ग्रहण किए जहाँ वह फलाफूला उन जड़ों से ही संयोजित रहकर वह प्रस्तारित हुवा और बहुंत दूर चला आया था | 

बिरवा केरि साखि चहे केतक दूरि पसारि | 
मूरि परि जहँ उपजाई तहँ करि गई पुकारि || ३५३४ || 
वृक्ष की शाखा चाहे कितनी ही दूर प्रस्तारित हो जाए वह वहीँ की उत्पत्ति कहलाती है जिस मूल से व्युत्पन्न होकर जहाँ वह वृक्ष में परिणित हुई | 


रहब सो बासि जेहि बन जाई | सबहिं भाँति अति सुखद सुहाई ||
बनदेबी बनदेब उदारा | प्रगसिहि सम्पद गहे अपारा ||
वह निवासी फिर जिस वन जाकर रहे वह सभी प्रकार से अतिशय सुखप्रद और सुहावना था |  वहां वनदेवी व् वनदेवता अत्यंत उदार ह्रदय थे, वह अपार प्राकृतिक सम्पदा से युक्त होकर प्राकट्य रूप में उपस्थित थे | 

बसिअ रहिअ तब तहँ बनबासी | बीच बीच कुटि कलित सुपासी ||
गहिए रहि सबु  पुण्य करि पुंजा || कोसु कोसु कृत कौसुम कुंजा ||
वनों के मध्य भागों में कुटिया निर्मित करके वहां वनवासी सुखपूर्वक निवास किया करते थे वह सभी पुण्यों के पूंजी से युक्त थे और प्रत्येक कोस पर उन्होने कुसुम कुञ्ज रचित किए हुवे थे || 

पूछे अगमु मग जबु धरि पाएँ | थकित पथिक कहु कहाँ ते आए ||
जगत भरी कर लै सिरु भारा | बालक संग न कोउ दारा || 
मार्ग दुर्गम था जब उन मार्गों में उन निवासियों के चरण  प्रविष्ट होते ही उन्होंने प्रश्न किया : -''अरे श्रमित पथिक ! संसार भर के भार को शीर्ष किए हुवे तुम कहाँ से आए हो ? जबकि तुम्हारे साथ न कोई बालक है और न कोई स्त्री ही हैं ? 
नागर भेसु कंठ मनि माला |  सीस पटिका तिलक दे भाला || 
कासत कौधनि काछनि काछे | मौलिका बाँधेउ कर पाछे || 
तुम्हारा शिष्ट पुरुषों का भेष है , कंठ में मणिमाल्य है सिर पर पट्टिका बंधी है  तिलक चिन्हित मस्तक है | करधनी में काछनी कर्षित की हुई है, कलाई में मौलिका बंधी है | 


अहहु त देसु निबासि हमारे | अहहिं कहाँ कौटुम तुम्हारे  ||
कवन तुम्ह कहँ तुहरे थाना  | कहौ कहँ केर बरे तुअ बाना || 
 तुम हमारे देश के निवासी प्रतीत होते हो,   तुमकौन हो ? तुम्हारा कौटुम्ब कहाँ है ?तुम्हारा वास स्थान कहाँ है ? कहो तो ये तुम्हारा पहनावा कहाँ का है ? 

अहौ कहौ कहँ गाँउ तिहारे | पूछत कौतुक दीठि निहारे ||
कहहु कवन अस कारन होंही | आनि परे इहँ तोहि बटोही ||

कौतुहल मई दीठि किए पेखि पथिक मग जात | 
भाखत मधुर भाखा निज पूछि जबहि सकुचात || 

अच्इ कलस भरि पानि बैस छिनुक बट छाँव भलि | 

कहइहि मृदुलित बानि प्रीति पूरित प्रिय बचन ए | 

हम गौपाल हम करिसाना | बनिज कहत हमहीं जग जाना ||
अजहुँ न हमरे ठाहर ठावाँ | छाँड़ आयउब तिन्हनि गाँवा ||
हम गौपालक हैं हमरा उद्यम कृषिकर्म है हमें वाणिज्यक कहा जाता है | इस समय हमारा ढहरने हेतु कोई स्थान नहीं है इस हेतु हमने उन्हें गाँव में छोड़ दिया है | 



कोलाहलु करि चहुँ ओर निसि घन भोर भइ बिनु भोर करे..,
गाँव नगरिहि फिरि डगरि डगरि ढिंढोरची ए ढिंढोर धरे..,
पुर्बल बसिकर्ता बहिरे बरग हुँत भाजत भारत देस रे..,
पर बसिकर सहुँ अजहुँ सुतंत्र भए दीन्हे असि सँदेस रे..,

देस बसे परबसिया एहि भू किन्ही बहुस खनखण्ड रे
आनि  षंड षंड महुँ पुनि सोइ उद्दंड भरिए बहु घमंड रे
केहि करतल पाहन गहे त  केहि करतल गहे दंड रे
गाँव ठाँव ढहाउ बस्ति दुर्बाद त करत धुनि प्रचंड रे

 लूटि मारु धरु धरु कह भीते बहिरावत गह देस धनी |
नगर अँधियारा  नेम नीति नहिँ छाइहिं चहुँ दिसि निसि घनी ||
खंग दए खलहान खसौट लए खोदि खंद सबु खेह खनी ||
बारहि बार बहुरि बहुरि कछु दिन परि  करिते सोइ करनी ||

नाज पात उपजात कतहुँ कछु त छीनि छीनि लै खावहीं | 
क्रुद्ध बिरुद्ध होतेउ कुबुद्ध सो झुण्ड झुण्ड सहुँ आवहीं || 
छाँडत नयन अँगारी बदन सबु अगन कुंड दरसावहीं |
धाए जहँ तहँ हनत महि पटकत धरत जेहिं केहिं पावहीं || 

अरु सो भारति लोग कहँ कहत पचारि पचार | 
त्राहि त्राहि  पुकारि करत जन जन हाहाकार || ३५३५ || 

संचै सम्पद लुटि लै राखी | चाहें जबहीं दिठावहि आँखी | 
खलु दुसठ कैं उद्दंडता  के देखि रूप अंतर बल थाके | 

गाँव ठेरे बसे तहँ जेते | बोए बिनु रहँ सबहिं के खेते || 

चिंतत मन कछु करम न हाथा | बिरती निसि सब भुज धरि माथा || 

आह बिरंचि भाग कस राच्यो | दारुन दुसह दसा सिरु नाच्यो || 
सोए चन्दा नैन रहँ जागे | जगती जोति पलक न लागे | 

खनखंडित होतब एहि देसा  | सहत परायन्हि भयउ सेसा  || 
सुतंत्रा भई पीट ढिँढोरे | राजे आपु हमरे गह फोरे ||  



जन जन कै आहूति लिए सुतंत्रता दिए नाम | 

लड़े सो तो स्वारथी  सत्ता के संग्राम || ३५३६ || 


देस फुरबारि फूर भए चारहि धरम समूह | 
बसि रहे जहँ भाँति भाँति जाति बरग करि जूह || ३५३५ || 
भावार्थ : - चार धर्म के पुष्पसमूह से युक्त ये देश पुष्पवाटिका के सदृश्य था जहाँ विभिन्न प्रकार की जातियों के अन्तर्वर्ग की मंजरियाँ अपने पुष्प समूह की क्यारियों में वसवासित थी |

हाथ को हाथ सुझे नहि चहुँ पुर नगर अँधेर | 
बाँट देस पुनि सेष महँ सब कहुँ दियो बखेर || ३५३६ || 
भावार्थ : -  सब ओर नीति व् न्याय का घन घोर अभाव कर देश-विभाजन के परिणाम ने एक सुव्यवस्थित सामाजिक तंत्र को शेष भारत में तितर-बितर कर दिया |

जुग लगि पसराए रहेउ मूर गहे बट छाँउ | 
जनमदहु जन्माए रहें उजारि दिए सो गाँउ || ३५३७ || 
भावार्थ : - जहाँ जन्मदाताओं के भी जन्मदाता का छायामयी वट वृक्ष अपनी जड़ युगों तक प्रस्तारित किए हुवे था वे गांव उजाड़ दिए गए |

किए हल खेह बिनु त रहा नहीं हाथ कछु काम | 
बिधि लेखिते लेखत भए भाग बिधाता बाम || ३५३८ || 
भावार्थ : - हाथों को हल व् खेतों से रहित कर आजीविका छीन ली गई थी | संविधान लिखते लिखते भारत के भाग्य विधाता राष्ट्रविरोधी हो गए |

चरत लीक पूरत रीत निज संस्कृति सँजोए | 
कुटिरु बसाए देस बीच बेहढ़ बन के होए || ३५३९ || 
भावार्थ : - अपनी मर्यादाओं, परमपराओं अपनी रीतियों का निर्वाह करते अपनी संस्कृति को सहेजे फिर वह गाँव देश के सघन वनों के मध्य कुटियाओं में निवास करने लगा |

सुवारथ परता उत कर करषत सत्ता सूत | 
अमूरि हुँत हितु नीति किए अहित करि मूरि हूँत || ३५४० || 
भावार्थ : - उधर स्वार्थ परायणता सत्ता की शक्तियों का भरपूर दुरूपयोग करते हुवे  मौलिकता हेतु हितों का अभाव करते हुवे अमौलिकता हेतु हितकारी नीतियां निर्धारण करने में संलग्न हो गई |


----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...