कहु समाज केहि बोलिए सम्प्रदाय में कौन ।
धरम कीन्ह पुकारिये संविधान है मौन ॥३४३१ ||
भावार्थ : -- एक राष्ट्र को सम्प्रदाय व् समाज के मध्य का अंतर ज्ञात रहना चाहिए यह उसके संविधान में वर्णित व् परिभाषित होना चाहिए । भारत के संविधान ने धर्म को परिभाषित किए बिना उसे निरपेक्ष कर दिया जिसके कारण आज विश्व में भारतियों की संख्या के साथ भारतीय सभ्यता व् संस्कृति भी विलुप्त हो रही है ॥
एक सब्द को तोड़ संग दियो दूज को जोड़ ।
करे हितारथ आपना साँच अर्थ को छोड़ ।। ३४३२ ||
भावार्थ : --एक शब्द को तोड़ कर उसके संग नए शब्द को जोड़ दिया गया और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों का निरूपित किया । अपना हित सिद्ध करने के लिए उक्त शब्दों के वास्तविक अर्थ का अनर्थ कर दिया गया ॥
धर्माधर्म जान बिना,कृत्याकृत्य न देखि ।
बाकी जनिति अधिकाधिक भयौ धर्म निरपेखि ॥३४३३ ॥
भावार्थ : -- जिन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है जो धर्म निरपेक्ष हैं उनमें अधिकांश वह और उनकी संतति हैं जिन्होंने धर्म व् अधर्म के ज्ञान बिना किंकर्त्तव्यम् अकर्त्तव्यम् को नहीं जाना॥
घोर घाउ कर होत जूँ कर ते कठिन कृपान ।
कुकरतार ते कठिन तूँ वाके नेम बिधान || ३४३४ ||
भावार्थ : -- जिस प्रकार हाथ की चोट से गहरी हाथ में गहि कृपाण की चोट होती है । उसी प्रकार कुशासक की तुलना में उसके नियम व् विधान से हानि अधिक होती ॥
बिभाजन पाछे जद्यपि जुगे धरम निरपेख |
ए सोधन परबसिया कर दिए अधिकार बिसेख || ३४३५ ||
धर्मनिर्पेक्ष को यद्यपि विभाजन के पश्चात ४२वें संविधान संशोधन के द्वारा संयोजित किया गया | इस संशोधित विधान का परिणाम यह हुवा है कि इस शब्दयुग्म ने भारत के अधीनकर्ता देशांतर समुदाय को भारत पर विशेष अधिकार से संपन्न कर दिया |
देस बिधान अबलेखित लखत धर्म निरपेख |
जगदीतिहास माहि एहि लिखिहि अबसि उलिलेख || ३४३६ -क ||
धर्म निरपेख ओट दिए लिया राम का नाम |
फलीभूत बिधि करत किए घनी भूत इस्लाम || ३४३६-ख ||
भावार्थ : - भारत के संविधान में उल्लेखित धर्मनिरपेक्ष का निरिक्षण कर संसार के इतिहास में अवश्य ही यह उल्लेख होगा कि भारत के संविधान ने धर्म निरपेक्ष की आड़ में भारत में प्रादुर्भूत हिन्दू धर्म का दुरूपयोग कर एक भिन्न देश के मतावलम्बियों को फलीभूत करते हुवे उनकी जड़ें गहरी कीं |
धर्म पतिता को होत न दिसा पंथ की सूझ ।
कवन हम कहाँ ते आए चले कहाँ नहि बूझ || ३४३७ ||।२७७४।
भावार्थ : -- धर्म से पतित अथवा निरपेक्ष समुदाय में दिशा व् पंथ निर्धारण करने की शक्ति नहीं होती । हम कौन हैं कहाँ से आए हैं कहाँ जा रहे हैं यह उन्हें संज्ञात नहीं होता ॥
" धर्म मानव जीवन की यात्रा का पथ प्रदर्शक है..... नाम उसका परिचय व् जाति उसकी पहचान है....."
जहाँ रहे गनवादिता तहाँ रहे गुन गौन ।
सुचिता सच्चरिता सहित रहे धर्म तहँ मौन ॥२९६३ ॥
भावार्थ : -- जहाँ सांख्यवाद प्रभावी होता है , वहां शुद्धता, सच्चरित्रता के संग गुणों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक धर्म मौन धारण कर लेता है और गुण गौण हो जाते हैं । जहाँ गुणवाद प्रभावी होता है वहां सांख्यिकी पर संकट आन पड़ता है अत: दोनों का ही सामंजस्य आवश्यक है विद्यमान समय में सांख्यवाद अत्यधिक प्रभावी है ॥
निष्कर्ष : -- सांख्यवाद में व्युत्पन्न संतति गुणहीन होती है.....
धरम कीन्ह पुकारिये संविधान है मौन ॥३४३१ ||
भावार्थ : -- एक राष्ट्र को सम्प्रदाय व् समाज के मध्य का अंतर ज्ञात रहना चाहिए यह उसके संविधान में वर्णित व् परिभाषित होना चाहिए । भारत के संविधान ने धर्म को परिभाषित किए बिना उसे निरपेक्ष कर दिया जिसके कारण आज विश्व में भारतियों की संख्या के साथ भारतीय सभ्यता व् संस्कृति भी विलुप्त हो रही है ॥
एक सब्द को तोड़ संग दियो दूज को जोड़ ।
करे हितारथ आपना साँच अर्थ को छोड़ ।। ३४३२ ||
भावार्थ : --एक शब्द को तोड़ कर उसके संग नए शब्द को जोड़ दिया गया और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों का निरूपित किया । अपना हित सिद्ध करने के लिए उक्त शब्दों के वास्तविक अर्थ का अनर्थ कर दिया गया ॥
धर्माधर्म जान बिना,कृत्याकृत्य न देखि ।
बाकी जनिति अधिकाधिक भयौ धर्म निरपेखि ॥३४३३ ॥
भावार्थ : -- जिन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है जो धर्म निरपेक्ष हैं उनमें अधिकांश वह और उनकी संतति हैं जिन्होंने धर्म व् अधर्म के ज्ञान बिना किंकर्त्तव्यम् अकर्त्तव्यम् को नहीं जाना॥
घोर घाउ कर होत जूँ कर ते कठिन कृपान ।
कुकरतार ते कठिन तूँ वाके नेम बिधान || ३४३४ ||
भावार्थ : -- जिस प्रकार हाथ की चोट से गहरी हाथ में गहि कृपाण की चोट होती है । उसी प्रकार कुशासक की तुलना में उसके नियम व् विधान से हानि अधिक होती ॥
बिभाजन पाछे जद्यपि जुगे धरम निरपेख |
ए सोधन परबसिया कर दिए अधिकार बिसेख || ३४३५ ||
धर्मनिर्पेक्ष को यद्यपि विभाजन के पश्चात ४२वें संविधान संशोधन के द्वारा संयोजित किया गया | इस संशोधित विधान का परिणाम यह हुवा है कि इस शब्दयुग्म ने भारत के अधीनकर्ता देशांतर समुदाय को भारत पर विशेष अधिकार से संपन्न कर दिया |
देस बिधान अबलेखित लखत धर्म निरपेख |
जगदीतिहास माहि एहि लिखिहि अबसि उलिलेख || ३४३६ -क ||
धर्म निरपेख ओट दिए लिया राम का नाम |
फलीभूत बिधि करत किए घनी भूत इस्लाम || ३४३६-ख ||
भावार्थ : - भारत के संविधान में उल्लेखित धर्मनिरपेक्ष का निरिक्षण कर संसार के इतिहास में अवश्य ही यह उल्लेख होगा कि भारत के संविधान ने धर्म निरपेक्ष की आड़ में भारत में प्रादुर्भूत हिन्दू धर्म का दुरूपयोग कर एक भिन्न देश के मतावलम्बियों को फलीभूत करते हुवे उनकी जड़ें गहरी कीं |
धर्म पतिता को होत न दिसा पंथ की सूझ ।
कवन हम कहाँ ते आए चले कहाँ नहि बूझ || ३४३७ ||।२७७४।
भावार्थ : -- धर्म से पतित अथवा निरपेक्ष समुदाय में दिशा व् पंथ निर्धारण करने की शक्ति नहीं होती । हम कौन हैं कहाँ से आए हैं कहाँ जा रहे हैं यह उन्हें संज्ञात नहीं होता ॥
" धर्म मानव जीवन की यात्रा का पथ प्रदर्शक है..... नाम उसका परिचय व् जाति उसकी पहचान है....."
जहाँ रहे गनवादिता तहाँ रहे गुन गौन ।
सुचिता सच्चरिता सहित रहे धर्म तहँ मौन ॥२९६३ ॥
भावार्थ : -- जहाँ सांख्यवाद प्रभावी होता है , वहां शुद्धता, सच्चरित्रता के संग गुणों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक धर्म मौन धारण कर लेता है और गुण गौण हो जाते हैं । जहाँ गुणवाद प्रभावी होता है वहां सांख्यिकी पर संकट आन पड़ता है अत: दोनों का ही सामंजस्य आवश्यक है विद्यमान समय में सांख्यवाद अत्यधिक प्रभावी है ॥
निष्कर्ष : -- सांख्यवाद में व्युत्पन्न संतति गुणहीन होती है.....
अति सुन्दर।
जवाब देंहटाएंनये साल अर्थात 2019 आप सब के लिए सुखकारी हो ।
परम सादर