बसिया अरु परबसिया बसिते भीत बहारु |
समुझ न परिअ रखिअ केहि सीवाँ पहिं रखबारु || ३४२१ ||
भावार्थ : - इस देश को अपने अधीन करने वाला बाहरी समुदाय और इस देश के निवासी जब सीमा के बाहर भीतर दोनों ओर निवासरत हैं तब यह समझना कठिन हो जाता है कि भारतीय सीमा सुरक्षा बल किसकी रक्षा कर रहा है |
पुरबली भारत देस ए जाके रहे अधीन |
जोगजुगत करि कहा भए ता हुँते स्वाधीन || ३४२२ ||
भावार्थ : - पूर्व में जिन्होंने ने बलात आधिपत्य स्थापित कर इस देश को अपने अधीन किया था क्या समूचा स्वतंत्रता संग्राम उन्हें अंग्रेजों से स्वाधीन करने के लिए था ?
स्वधुर के त नाउ धरे भाजत भारत देस |
प्रश्न यह है कि स्वाधीनता के नाम पर इन अधीनकर्ताओं को सुख पूर्वक रहने और अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए एक नहीं दो नहीं तीन नहीं चार चार देश मिले महामहिम .....भारतीयों को क्या मिला.....न्यायालय के धक्के.....?
दासकरिता देस बसे दासा भीत बहारु |
या हुँते अधिकार रचे रु या हुँते रखबारु || ३४२३ ||
भावार्थ : - इस देश के अधीनकर्ता देश में ही बसे हैं और इस देश की संतान की एक बड़ी संख्या सीमा के उसपार बसी है क्या संविधान और उसके अधिकार इन अधीनकर्ताओं के लिए रचे गए थे और सीमा सुरक्षा बल सीमापार निवासित भारतीयों के लिए ?
मूरख मूढ़ बनाई सबु देस दिबस मनबाहि |
स्वत्वाधीन आपने जबु अहँइहि ते नाहि || ३४२४ ||
भावार्थ : -- स्वतंत्रता दिवस मनवाकर देशवासियों को मूर्ख बनाया जा रहा है जबकि वे स्वतन्त्र हैं ही नहीं.....
भारत केर संबिधान एही हुँते रचियाए |
स्वाधीन हेतु कोई बहुर न सीस उठाए || ३४२५ ||
भावार्थ : - वस्तुत: भारत का संविधान इस हेतु रचा गया कि स्वाधीनता हेतु फिर कोई शीश न उठाए |
संविधान को चाहिये करत मूर करि राख |
देस धर्म सहुँ आपुने पोसै अपुनी साख || ३४२६ ||
भावार्थ : - एक संविधान को चाहिए कि वह तत्संबंधित राष्ट्र की मौलिकता का रक्षण करते हुवे उक्त राष्ट्र विशेष में प्रचलित आचार-विचार सहित उस मूल से व्युत्पन्न शाखाओं का परिपोषण करे |
जोई जाकी जनम भुइँ जोई जाका देस |
बिधि बिरचत सो मूलगत गह अधिकार बिसेस || ३४२७ ||
भावार्थ : - इस हेतु जो जिसकी जन्म भूमि है जो जिसका राष्ट्र है वहां वह मूलोत्पन्न संतानें विधि की संरचना कर विशेष मौलिक अधिकारों को ग्रहण करें |
संबिधान संपन्न किए बिरान सहुँ अधिकार |
देसज दूरी होत भए मूरी हेतु कुठार || ३४२८ ||
भावार्थ : - ( इस तथ्य से परे )भारत का संविधान भिन्न देश के मूल को अधिकार संपन्न कर स्वराष्ट्र जनित संतानों से दूर होते हुवे उसकी मौलिकता हेतु कुल्हाड़ी सिद्ध हुवा |
जहाँ पराया आपुना गहेउ अंतर भेद |
अबिच्छेद देस सौं तहँ अबिछिन रहँ परिछेद || ३४२९ ||
भावार्थ : - जहाँ मौलिकता व् अमौलिकता के मध्य भेददृष्टि (द्वैतवाद )ग्राह्य हो वहां तत्संबधित राष्ट्र अविभक्त राष्ट्र के सह अविच्छिन्न सीमाओं से युक्त रहता है |
इहाँ पराया आपुना गहे न अंतर भेद |
अबिछेद एहि देस भयो छिन्न भिन्न परिछेद || ३४३० ||
भावार्थ : - भारत के परिपेक्ष्य में कहा जाए तो यहाँ मौलिकता व् अमौलिकता में भेददृष्टि अग्राह्य रही इसका परिणाम यह हुवा कि विच्छेदित सीमाओं के सह यह देश खंड-खंड हो गया |
समुझ न परिअ रखिअ केहि सीवाँ पहिं रखबारु || ३४२१ ||
भावार्थ : - इस देश को अपने अधीन करने वाला बाहरी समुदाय और इस देश के निवासी जब सीमा के बाहर भीतर दोनों ओर निवासरत हैं तब यह समझना कठिन हो जाता है कि भारतीय सीमा सुरक्षा बल किसकी रक्षा कर रहा है |
पुरबली भारत देस ए जाके रहे अधीन |
जोगजुगत करि कहा भए ता हुँते स्वाधीन || ३४२२ ||
भावार्थ : - पूर्व में जिन्होंने ने बलात आधिपत्य स्थापित कर इस देश को अपने अधीन किया था क्या समूचा स्वतंत्रता संग्राम उन्हें अंग्रेजों से स्वाधीन करने के लिए था ?
स्वधुर के त नाउ धरे भाजत भारत देस |
प्रश्न यह है कि स्वाधीनता के नाम पर इन अधीनकर्ताओं को सुख पूर्वक रहने और अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए एक नहीं दो नहीं तीन नहीं चार चार देश मिले महामहिम .....भारतीयों को क्या मिला.....न्यायालय के धक्के.....?
दासकरिता देस बसे दासा भीत बहारु |
या हुँते अधिकार रचे रु या हुँते रखबारु || ३४२३ ||
भावार्थ : - इस देश के अधीनकर्ता देश में ही बसे हैं और इस देश की संतान की एक बड़ी संख्या सीमा के उसपार बसी है क्या संविधान और उसके अधिकार इन अधीनकर्ताओं के लिए रचे गए थे और सीमा सुरक्षा बल सीमापार निवासित भारतीयों के लिए ?
मूरख मूढ़ बनाई सबु देस दिबस मनबाहि |
स्वत्वाधीन आपने जबु अहँइहि ते नाहि || ३४२४ ||
भावार्थ : -- स्वतंत्रता दिवस मनवाकर देशवासियों को मूर्ख बनाया जा रहा है जबकि वे स्वतन्त्र हैं ही नहीं.....
भारत केर संबिधान एही हुँते रचियाए |
स्वाधीन हेतु कोई बहुर न सीस उठाए || ३४२५ ||
भावार्थ : - वस्तुत: भारत का संविधान इस हेतु रचा गया कि स्वाधीनता हेतु फिर कोई शीश न उठाए |
संविधान को चाहिये करत मूर करि राख |
देस धर्म सहुँ आपुने पोसै अपुनी साख || ३४२६ ||
भावार्थ : - एक संविधान को चाहिए कि वह तत्संबंधित राष्ट्र की मौलिकता का रक्षण करते हुवे उक्त राष्ट्र विशेष में प्रचलित आचार-विचार सहित उस मूल से व्युत्पन्न शाखाओं का परिपोषण करे |
जोई जाकी जनम भुइँ जोई जाका देस |
बिधि बिरचत सो मूलगत गह अधिकार बिसेस || ३४२७ ||
भावार्थ : - इस हेतु जो जिसकी जन्म भूमि है जो जिसका राष्ट्र है वहां वह मूलोत्पन्न संतानें विधि की संरचना कर विशेष मौलिक अधिकारों को ग्रहण करें |
संबिधान संपन्न किए बिरान सहुँ अधिकार |
देसज दूरी होत भए मूरी हेतु कुठार || ३४२८ ||
भावार्थ : - ( इस तथ्य से परे )भारत का संविधान भिन्न देश के मूल को अधिकार संपन्न कर स्वराष्ट्र जनित संतानों से दूर होते हुवे उसकी मौलिकता हेतु कुल्हाड़ी सिद्ध हुवा |
जहाँ पराया आपुना गहेउ अंतर भेद |
अबिच्छेद देस सौं तहँ अबिछिन रहँ परिछेद || ३४२९ ||
भावार्थ : - जहाँ मौलिकता व् अमौलिकता के मध्य भेददृष्टि (द्वैतवाद )ग्राह्य हो वहां तत्संबधित राष्ट्र अविभक्त राष्ट्र के सह अविच्छिन्न सीमाओं से युक्त रहता है |
इहाँ पराया आपुना गहे न अंतर भेद |
अबिछेद एहि देस भयो छिन्न भिन्न परिछेद || ३४३० ||
भावार्थ : - भारत के परिपेक्ष्य में कहा जाए तो यहाँ मौलिकता व् अमौलिकता में भेददृष्टि अग्राह्य रही इसका परिणाम यह हुवा कि विच्छेदित सीमाओं के सह यह देश खंड-खंड हो गया |
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