बुधवार, 5 दिसंबर 2018

----- ॥ दोहा-दशम ३४०-३४१॥ -----

नागरिकी अधिकार एक मौलिक एक अधिकार | 
येह  नागर कर दीजिए येह मूलि कर धार || ३४०१ || 
भावार्थ : - भारत के इतिहास से शिक्षा लेते हुवे वर्तमान संविधानों को दो प्रकार के अधिकारों से युक्त होना चाहिए, एक मौलिक अधिकार दूसरा नागरिक अधिकार | मौलिक अधिकार तत्संबंधित राष्ट्र के मूल निवासियों को एवं नागरिक अधिकार मूल निवासियों सहित प्रवासी पीढ़ियों को प्रदत्त हो |

शासन व् शासक चयन का अधिकार मौलिक अधिकार के अंतर्निहित हो.....

सासन के अधिकार जहँ गहे देस के मूरि | 
जनमानस के सोइ सासन रहँ दासन ते दूरि || ३४०२  || 
भावार्थ : -शासक व् शासन चयन जैसे मौलिक अधिकार जब राष्ट्र के मूल नागरिक को ग्राह्य हों तब वह लोकतंत्र दासत्व के भय से मुक्त होता है |

देस सासनाधिकार के मतै बनो दातार | 
जे ताहि कर दीजिए जौ अहहीं मूलाधार || ३४०३ || 
भावार्थ : - शासन का अधिकार जिस किसी को प्रदत्त नहीं करना चाहिए | अपनी मौलिकता की रक्षा करते हुवे किसी संविधान को शासन व् शासक चयन का अधिकार उन्हें प्रदत्त करना चाहिए जो तत्संबंधित राष्ट्र वृक्ष के मूलभूत हों |

अधीनकर्ता करहि दिए सासन के अधिकार | 
सो बिधान ता देस हुँत जोग न अंगीकार || ३४०४ ||
भावार्थ : - वह संविधान अंगीकार योग्य नहीं है जो तत्संबंधित राष्ट्र के अधीनकर्ता को ही शासनाधिकार से सम्पन्न करे |


बेली सों लपटाए के साख पराई राख | 
संविधान एहि देस के काटे अपनी साख || ३४०५ || 
भावार्थ : -भारत का संविधान स्वतोविरोधी संविधान है जो अपने राष्ट्र अपनी मौलिकता का ही विरोध करता है | यह अपनी शाखाओं को काटकर टुकड़े टुकड़े करता है और पराई शाखाओं को वेलों के सदृश्य परिपोषित कर उनकी रक्षा करता है |

साख पराइ ढोए भए पुरइन निपट गँवार | 
पढ़े लिखे जौ बिधि कहे कीन्हि सब सविकार || ३४०६ || 
भावार्थ : - कभी विद्या वाचस्पति रहे हमारे पूर्वज पराए समुदायों की दासता का भार वहन करते करते अनपढ़, अशिक्षित हो चले थे | उन्हें संविधान लिखना तो क्या बोलना तक नहीं आता था, कालान्तर में पढ़े लिखों ने जो संविधान कहा उन्होंने उसे निर्विरोध अंगीकार कर लिया |

सीख पराई सीख कै निज आपा बिसराए | 
अपुने देस आपनपो आपहि आप दुराए || ३४०७ || 
भावार्थ : - परायों की सिखाई सीख कर जो अपने अस्तित्व, अपने निजत्व, अपनी अस्मिता की अवहेलना करता हो वह अपने देश अपने गृह के स्वत्व व् स्वामित्व से स्वयं को वंचित करता है |

रकत धमनि महँ धावते पुर्बज करें पुकार |
होवनिहार ए देस परि तुम्हरेहि अधिकार || ३४०८ ||
भावार्थ : - धमनियों के रक्त रूप में दौड़ते हमारे पूर्वज आह्वान करते हैं हे भारत की संतानों इस देश की   सम्प्रभुता पर तुम्हारा अधिकार है इसे ग्रहण करो |

क्योंकि : - "स्वत्व के प्रति उदासीनता सम्प्रभुता का क्षरण कर स्वस्थिति को अस्थिर करती है....."
                  अथवा अधिकारों के प्रति उदासीनता सम्प्रभुता को क्षयित करती है सम्प्रभुता के क्षरण से        स्वस्थिति अस्थिर होती है....."

सो दासा मनमानसा जो अपुना गह देस | 
दूजन आपा दए रहे आप मलीना भेस || ३४०९ || 
भावार्थ : - वह दास मानसिकता है जब कोई अपना गृह अपने देश का स्वामित्व अन्य को प्रदान कर स्वयंम्लान रहे |

सँबिधान किन्ही सदा अपुने संगत हेत | 
धनिआ भूखन मारिया खाए पराया खेत || ३४१० || 
अर्थ :- संविधान ने अपनों की  अपेक्षा न कर सदैव उसकी उपेक्षा की |  खेत दूसरे खा रहे हैं और इसने स्वामी को भूखा रखा हुवा है |
भाव  : - भारत के संविधान ने मूल निवासियों की उपेक्षा करते हुवे भारत की सम्प्रभुता से उसकी मौलिकता को विपन्न कर सदैव अमौलिकता को संपन्न किया |

लोक तंत्र महँ सासिता लोकनीति बरताए | 
जो जन जन करि रीत है सोइ रीति अपनाए || ३४११ || 
भावार्थ : - लोक तंत्र में शासन की नीतियां लोक-व्यवहार के निर्वाह हेतु नियत होनी चाहिए  राज के लिए नहीं |  जो रीति जनसामान्य में प्रचलित हो उसे वह अंगीकार हो व लोक प्रचलित प्रथाएं एवं मान्यताएँ, नियम निर्णयों से विबन्धित न हो यही लोकतंत्र की मर्यादा है |

स्पष्टीकरण : - लोक प्रथाएं व् मान्यताएं प्रशासनिक विषयों से अन्यथा सामाजिक विषयों के अंतर्गत आती है एतएव ये सामाजिक संचेतना से संचालित व् नियंत्रित की जा सकती है  |

जोइ बिधिबत बिधिसंगत जो बिधि जुगत बिधान | 
जो मत अधिमत सब जगत होतब सोइ अधिमान || ३४१२ || 
भावार्थ : - "वह सिद्धांत अंगीकार करने योग्य है जो विधि सम्यक होते हुवे नियमानुरूप, विधानानकुल और सर्वाधिमान्य सिद्धांत हो |"

दासकरिता परबसिया बसिया करे समान | 
सँविधान महुँ बिहित कहा यहु अभिमत जगमान || ३४१३ || 
भावार्थ : - 'अपने अधीनकर्ता प्रवासियों को मूल निवासियों के समकक्ष अधिकार प्रदान करना' भारत के संविधान में विहित यह सिद्धांत क्या विश्वमान्य है ?

सँविधान ने रचिया रे नेम जग ते न्यारु |
जो मत जग अमान अहै सो मत ताहि प्यारु ||३४१४ || 
भावार्थ : - भारत के संविधान ऐसे नियम संरचित के गए हैं जो जगत रचित संवैधानिक नियमों से पृथक हैं जो सिद्धांत समूचे विश्व में अमान्य है वह सिद्धांत इसे प्रिय हैं |

परबसिआ बसिआ कहिब सुरग कहब जूँ नर्क | 
जन जन दिग भरमाइआ  सो तो तर्क कुतर्क || ३४१५ || 
भावार्थ : - प्रवासी को निवासी कहने का तर्क स्वर्ग को नर्क कहने के समान है जो कथन जनमानस को दिगभ्रमित करता हो वह तर्क कुतर्क है |

कहत पराया आपुना दिया देस बँटवार | 
ए बँटबारा अपुने कहुँ किया दास ता पार || ३४१६ || 
भावार्थ : - भारत विभाजन ने पराए देश में प्रादुर्भूत पराए समुदाय को अपना समुदाय घोषित करते हुवे देश बाँट कर दे दिया गया |   विभाजन ने सीमापार निवासरत मूल निवासी को उन परायों के अधीन रहने दिया | यह कहाँ का न्याय है |

जासु पुरबज बनहि बसत एही देसु निरमाए |
ता अपुने बिसराए के पराए देस बसाए || ३४१७ || 
भावार्थ : - जिनके पूर्वजों ने सघन वनों के आतप्त को सहन करते हुवे इस भारत देश का निर्माण किया, सत्ता की लौलुपता ने सीमापार निवासित उनकी संतानों का तिरष्कार कर अधीनकर्ता पराए समुदाय को देश में बसाए रखा |

" व्यक्तिमात्र की स्वाधीनता याथार्थ्य स्वाधीनता है....."

देस भुईँ बसबासिते देस बंधु निज बास | 
बँटाबन छन साईँ ते कियो पराया दास || ३४१८ || 
भावार्थ : -  अपनी जन्म भूमि, अपने देश में, अपने स्वत्वाधिकारी निवास में निवासरत इस देस की सीमापार  उन संतानों को विभाजनकर्ता ने क्षण मात्र में ही परायों के अधीन कर दिया  |

स्वधुर ते स्वभुईँजन रहीं जाएँ जहँ सेस |
स्वाधीन होतेउ बरु पराधीन सो देस || ३४१९ ||
भावार्थ :- "स्वदेशजनित संतति जहाँ स्वाधीनता प्राप्ति में शेष रह जाए वह देश पराधीन है | "

दास करिता गोसाईं गोसाईं जहँ दास | 
सो देसज सो देसभुइँ पराधीन संकास || ३४२० || 
भावार्थ :-- "जहाँ दासकर्ता को स्वत्वाधिकार प्राप्त हों और स्वामी इस अधिकार से वंचित होकर दास स्वरूप हो वह देशभूमि व् उसकी संताने स्वाधीन होते हुवे भी पराधीन के सदृश्य हैं |"











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