सोमवार, 31 दिसंबर 2018

------ ॥ दोहा-दशम ३४४ ॥ -----,

(दोहाएकादश ९ )
बथुरत पूला आपना, बँधेउ पराए पूल | 
भरम जाल भरमाइ के  बिनसत गयउ मूल || ३४४१ || 
भावार्थ : --भारत वस्तुत: चार धार्मिक समुदायों के कुटुंब का राष्ट्र है, यह  कुटुंब तब बिखर गया जब इसमें  उस पराए कुटुंब को भी सम्मिलित किया गया जिसने उसे दास बनाया  था  |  तत्पश्चात इन्हें अपना कहते हुवे एक भ्रम का जाल बिछाया गया जिसके बहकावे में आकर भारत की मौलिकता नष्ट-भ्रष्ट होती चली गई |

साख बिरानि राख करत, करत मूल निर्मूल |
जग अनभै अधिकार रचत मौलिकता गए भूल || ३४४ २ || 
 भावार्थ : -- अपने मूल को निर्मूल कर अपनी मौलिकता को छिन्न-भिन्न करके  एक पराई साम्प्रदायिक शाखा की रक्षा करते हुवे ऐसा अधिकार परिकल्पित किया गया जो विश्व में किसी  राष्ट्र के संविधान ने नहीं किया था  | 


बिरावन भयउ बहोरी  सासन के अधिकारि | 
अखिल जगत कर देस जौ कतहुँ दरस नहि पारि || ३४४ ३ || 
भावार्थ :- जो राष्ट्र निर्माण के मूलभूत नहीं हैं उसे शासन करने का अधिकार प्राय: विश्व के किसी भी राष्ट्र ने नहीं दिया है | जो न केवल राष्ट्र निर्माण के मूलभूत नहीं हैं जिन्होंने उसे दास भी बनाया, भारत के संविधान ने ऐसे  साम्राज्य वादी समुदाय को पुनश्च शासन करने का अधिकार दे दिया |

 लागि होत भयो पुनि सो  संविधान निरमाए |  
अपने अपने देस में सब बिधि करत पराए || ३४४४ || 
भावार्थ : -- ततश्चात एक दिन निर्मित होकर वह संविधान रातोंरात देश पर लागू भी हो गया | लोगों को पता भी नहीं चला कि उस संविधान में देश के मूलनिवासियों को अधिकारों से विपन्न कर पराया कर दिया गया था |

सीँउ भए बिनु सीँउ भयो दिए पट बिनहि द्वार | 
यह मूरख का देस कह राज करे संसार || ३४४५ || 
भावार्थ : -- सीमाओं के होते हुवे भी यह देश सीमा से विहीन रहा क्यों कि इसमें एक ऐसे द्वार का निर्माण किया गया जिसमें पट ही नहीं थे |  उस द्वार पर अंकित किया गया कि यह मूर्खों  का  देश है यहाँ कोई भी कभी भी कहीं भी आ-जा सकता है और इसपर शासन भी कर सकता हैं |

एक तो भारा आपना भयऊ  भारि अपार | 
बहुरि संभारन कांधरा दियो परायो भार || ३४४६ ||   
भावार्थ : --चार सम्प्रदायों के कुटुम्ब के देश का अपना भार ही भारी-भरकम था फिर उस के कन्धों पर पराए सम्प्रदाय के पालन-पोषण का भार भी लाद दिया गया |

बोहनहारा हारिया बोह परायो बोह | 
दारिद रेखा बीच ते नीच भया ता सोंह || ३४४७ || 
भावार्थ : -- अपने दायित्व  के साथ दुसरों का भारी भरकम दायित्वों को वहन करने के  कारण  इस देश का कंधा शिथिल होकर क्लांत गया जिसे निर्धन रेखा के मध्य में स्थित होना था वह कुटुम्ब निर्धन रेखा के नीचे आ गया |

प्राग समउ ए भारत भुइ चहुँ दिसि लिए बिस्तार | 
सुगठित एक छत रूप दिए अन्तर देसिक धार || ३४४८ || 
भावार्थ : - प्राचीन समय में भारत का भूखंड चारों दिशाओं में विस्तार को प्राप्त होकर सुव्यवस्थित राजतांत्रिक क्षेत्रों की लघु ईकाइयों का समूह था | राष्ट्रीयता की धारा के इस अंतर विस्तार को सुसंगठित कर तदनन्तर एक प्रभुसत्तात्मक स्वरूप दिया गया |

एवम एकीकार भुइँ करि भए भारत गनराज |
स्वारथ परायन हेतु पुनि करिअब बहुंत विभाज || ३४४९ ||  

भावार्थ : - इस प्रकार राज्य की इन लघु इकाइयों एवं इसके निवासियों को एक सीमा रेखा में आबद्ध करते हुवे इसके विस्तारित भूखंड का एकीकरण किया गया तदनन्तर प्रभुसत्ता संपन्न वैधानिक गणराज्य का स्वरूप धारण कर विश्व में यह एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हुवा | किन्तु अपना हित सिद्ध करने वाले स्वार्थी तत्त्वों के  कारण यह वर्तमान में खंड-खंड हो गया |

पूल परयो हेतु पुनि खींचे पुनि एक रेख | 
बसा बसाया बासना दे तिन पेटे लेख ||३४५० || 
भावार्थ : -- एक राष्ट्र को निर्मित करने में पीढ़ियों का रक्त लगता है; इस यथार्थ की उपेक्षा करते हुवे पराए देश के एक पराए समुदाय के लिए पुनश्च एक रेखा खिंच कर भारत को खंड-खंड करते हुवे एक सुव्यवस्थित राष्ट्र उनके नाम कर दिया |

अब लगि को न जनाइया भंजत  भारत सेतु | 
करतब लहुरा देस किए खंड खंड किन हेतु || ११ || 
भावार्थ : - भारत की सीमाओं का विभंजन करते इस विशाल राष्ट्र को लघुता प्रदान करने के कारण क्या थे | इसे किस हेतु खंड-खंड किया यह अब तक किसी भारतीय को ज्ञात नहीं है |
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(१० )
बसति बसति बसबासता मिलिअब पर समुदाय | 
बसे बसेरा आपुना केहि हेतु कर दाए || १ || 
भावार्थ : - यदि एक पराए देश का सम्प्रदाय जब विद्यमान भारत के वस्ति वस्ति में निवासित है तब उसका विभाजन कर एक बसा बसाया राष्ट्र उसे किस हेतु दिया गया |


आन बसे परबासिया भए बिनु देस सदेस |
बिरावन भयउ भारती होत जात निज देस || २ || 
भावार्थ : -- अब देश में बसे पराए,  देश रहित होते हुवे भी देशवाल हो गए |  जो देशवाल थे, राष्ट्रिक थे वह राष्ट्र विहीन होकर राष्ट्र के स्वत्वाधिकार से वंचित हो गए, उनके लिए १९४७ की स्वतंत्रता अभिशाप सिद्ध हुई |

खंड खंड होतब अजहुँ भयऊ भारत सेष | 
अस तो हो रहि जाएगा सनै सनै अवसेष || ३ || 
भावार्थ : -- विद्यमान समय में स्थिति यह है कि यह अखंड भारत खंड-खंड होकर शेष भारत में परिवर्तित हो गया है  यदि यही अनुक्रम चलता रहा तो यह अवशेष मात्र होकर रह जाएगा  |

स्वत्वाधिकार तैं जो स्वाजन्य परिरोधि | 
सो बिधि सो सबिधायनी होत स्वतोबिरोधि || ६ || 
भावार्थ : - किसी विधि द्वारा विहित अधिनियम अथवा उसके उपबंध जब मूल निवासियों के स्वत्वाधिकार को परिरुद्ध करते हैं तब वह संविधान अपने ही राष्ट्र का विरोधी होता है |

दास करत गोसाइयाँ गोसाईँ कर दास | 
सासन करे बिलास जब जन जन होत उदास || ७ || 
भावार्थ : -   जब जनमानस अपने अस्तित्व के बौद्धिक तत्वों से अनभिज्ञ होते हुवे सुषुप्त और शासन निर्द्वन्द्व सुख उपभोग में मग्न होता है, तब स्वामी स्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर दासत्व को तथा दास  उन अधिकारों से संपन्न होकर स्वामी के पद को प्राप्त होते जाते हैं |

निँद त्याज कर जागरन जन जन पूछ बुझाए | 
पितु धन सम्पद जान के परबसिया कर दाए || ३ || 
भावार्थ : - सुषुप्त अवस्था  त्याग कर जनमानस भी जागृत हो और सत्ता के लालचियों से प्रश्न करे कि राष्ट्र की भूमि को खंड-खंड कर उपनिवेशियों को दे दी गई क्या इन्होने इस राष्ट्र को अपनी पैतृक सम्पति समझ रखा है |

१९६० ई .के ९ वे संशोधन का कारण पूछे जिसमें देश के टुकड़े कर एक संधि के द्वारा बेरुबारी व् खुलना आदि क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिए गए थे |

पीर नहीं पर एकै की यह अगजग की पीर | 
जेहि तरु तिन पोषि तेहि काटैं धीरहि धीर || ८ || 
भावार्थ : - उपनिवेशियों द्वारा प्रदत्त यह पीड़ा किसी एक राष्ट्र की न होकर उन सभी राष्ट्रों की है जहाँ की ये बसे हुवे हैं ये जिस वृक्ष से परिपुष्ट होते हैं उसी वृक्ष की जड़ें काटने में लगे रहते हैं  इनकी अनंतिम परिणीति विभाजन है  | 

परे देस परबासिया होत बिमुख निज ईस । 
एक आध ते पूरन भए बहुरि कोटि पच्चीस ॥ ३२ ७१ ॥ 
भावार्थ : -- अपने ईश्वर से विमुख होकर दास के वेश में आते हैं ये प्रवासी ।  देश को लूटते हैं फिर उसपर अत्याचार करते ये शताब्दियों तक राज कर फिर उसपर अत्याचार हैं । उसे विभाजित करते हैं और कहीं  नहीं जाते..... पहले आधे रहते हैं फिर एक हो जाते हैं फिर करोड़ों में व्याप्त होकर संख्यावादी  लोकतंत्र से देश को पुनश्च नियंत्रित करते हैं......




शनिवार, 29 दिसंबर 2018

----- ॥ दोहा-दशम ३४३ ॥ -----,

कहु समाज केहि बोलिए सम्प्रदाय में कौन । 
धरम कीन्ह पुकारिये संविधान है मौन ॥३४३१ || 
भावार्थ : -- एक राष्ट्र को सम्प्रदाय व् समाज के मध्य का अंतर ज्ञात रहना चाहिए यह  उसके संविधान में वर्णित व् परिभाषित होना चाहिए । भारत के संविधान ने धर्म को परिभाषित किए बिना उसे  निरपेक्ष कर दिया जिसके कारण आज विश्व में भारतियों की संख्या के साथ भारतीय सभ्यता व् संस्कृति भी विलुप्त हो रही है ॥ 

एक सब्द को तोड़ संग दियो दूज को जोड़ । 
करे हितारथ आपना साँच अर्थ  को  छोड़ ।। ३४३२ || 
भावार्थ : --एक शब्द  को तोड़ कर उसके संग  नए शब्द को जोड़ दिया गया और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों का निरूपित किया । अपना हित सिद्ध करने के लिए उक्त शब्दों  के वास्तविक अर्थ का अनर्थ कर दिया गया ॥


धर्माधर्म जान बिना,कृत्याकृत्य न देखि । 
बाकी जनिति अधिकाधिक भयौ धर्म निरपेखि ॥३४३३ ॥ 
भावार्थ : -- जिन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है जो धर्म निरपेक्ष हैं उनमें  अधिकांश वह और उनकी संतति हैं जिन्होंने धर्म व् अधर्म के ज्ञान बिना किंकर्त्तव्यम् अकर्त्तव्यम् को नहीं जाना॥ 


घोर घाउ कर होत जूँ कर ते कठिन कृपान । 
कुकरतार ते कठिन तूँ वाके नेम बिधान || ३४३४ || 
भावार्थ : -- जिस प्रकार हाथ की चोट से गहरी हाथ में गहि कृपाण की चोट होती है । उसी प्रकार कुशासक की तुलना में  उसके नियम व् विधान से हानि अधिक होती ॥


बिभाजन पाछे जद्यपि  जुगे धरम निरपेख | 
ए सोधन परबसिया कर दिए अधिकार बिसेख || ३४३५ || 
धर्मनिर्पेक्ष को यद्यपि विभाजन के पश्चात ४२वें संविधान संशोधन के द्वारा संयोजित किया गया | इस संशोधित विधान का परिणाम यह हुवा है कि इस शब्दयुग्म ने भारत के अधीनकर्ता देशांतर समुदाय को भारत पर विशेष अधिकार से संपन्न कर दिया |

देस बिधान अबलेखित लखत धर्म निरपेख | 
जगदीतिहास माहि एहि लिखिहि अबसि उलिलेख || ३४३६ -क || 
धर्म निरपेख ओट दिए लिया राम का नाम | 
फलीभूत बिधि करत किए घनी भूत इस्लाम || ३४३६-ख || 

भावार्थ : - भारत के संविधान में उल्लेखित धर्मनिरपेक्ष का निरिक्षण कर संसार के इतिहास में अवश्य ही यह उल्लेख होगा कि भारत के संविधान ने धर्म निरपेक्ष की आड़ में भारत में प्रादुर्भूत हिन्दू धर्म का दुरूपयोग कर एक भिन्न देश के मतावलम्बियों को फलीभूत करते हुवे उनकी जड़ें गहरी कीं |

धर्म पतिता को होत न दिसा पंथ की सूझ । 
कवन हम कहाँ ते आए चले कहाँ  नहि बूझ || ३४३७ ||।२७७४। 
भावार्थ : -- धर्म से पतित अथवा निरपेक्ष समुदाय में दिशा व् पंथ निर्धारण करने की शक्ति नहीं होती  । हम कौन हैं कहाँ से आए हैं कहाँ जा रहे हैं यह उन्हें संज्ञात नहीं होता ॥

" धर्म मानव जीवन की यात्रा का पथ प्रदर्शक है.....  नाम उसका परिचय व् जाति  उसकी पहचान है....."


जहाँ रहे गनवादिता तहाँ रहे गुन गौन । 
सुचिता सच्चरिता सहित  रहे धर्म तहँ मौन ॥२९६३ ॥ 
भावार्थ : -- जहाँ सांख्यवाद प्रभावी होता है , वहां शुद्धता, सच्चरित्रता के संग गुणों  को प्राप्त करने के लिए आवश्यक धर्म मौन धारण कर लेता  है और गुण गौण हो जाते हैं । जहाँ गुणवाद प्रभावी होता है वहां  सांख्यिकी पर संकट आन पड़ता है अत: दोनों का ही सामंजस्य आवश्यक है विद्यमान समय में सांख्यवाद अत्यधिक प्रभावी है ॥ 

 निष्कर्ष : -- सांख्यवाद में व्युत्पन्न संतति गुणहीन होती है.....






बुधवार, 26 दिसंबर 2018

----- ॥ दोहा-दशम ३४२ ॥ -----,

बसिया अरु परबसिया बसिते भीत बहारु | 
समुझ न परिअ रखिअ केहि सीवाँ पहिं रखबारु || ३४२१ || 
भावार्थ : - इस देश को अपने अधीन करने वाला बाहरी समुदाय और इस देश के निवासी जब सीमा के बाहर भीतर दोनों ओर निवासरत हैं तब यह समझना कठिन हो जाता है कि भारतीय सीमा सुरक्षा बल किसकी रक्षा कर रहा है |

पुरबली भारत देस ए जाके रहे अधीन | 
जोगजुगत करि कहा भए ता हुँते स्वाधीन || ३४२२ ||  
भावार्थ : - पूर्व में जिन्होंने ने बलात आधिपत्य स्थापित कर इस देश को अपने अधीन किया था क्या समूचा  स्वतंत्रता संग्राम उन्हें अंग्रेजों से स्वाधीन करने के लिए था ?

स्वधुर के त नाउ धरे भाजत भारत देस |

प्रश्न यह है कि स्वाधीनता के नाम पर इन अधीनकर्ताओं को सुख पूर्वक रहने  और अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए एक नहीं दो नहीं तीन नहीं चार चार देश मिले महामहिम .....भारतीयों को क्या मिला.....न्यायालय के धक्के.....?

दासकरिता देस बसे दासा भीत बहारु | 
या हुँते अधिकार रचे रु या हुँते रखबारु || ३४२३ || 
भावार्थ : - इस देश के अधीनकर्ता देश में ही बसे हैं और इस देश की संतान की एक बड़ी संख्या  सीमा के उसपार बसी है क्या संविधान और उसके अधिकार इन अधीनकर्ताओं के लिए रचे गए थे और सीमा सुरक्षा बल सीमापार निवासित भारतीयों के लिए ?

मूरख मूढ़ बनाई सबु देस दिबस मनबाहि | 
स्वत्वाधीन आपने जबु अहँइहि ते नाहि || ३४२४ || 
भावार्थ : -- स्वतंत्रता दिवस मनवाकर देशवासियों को मूर्ख बनाया जा रहा है जबकि वे स्वतन्त्र हैं ही नहीं.....

भारत  केर संबिधान एही हुँते रचियाए | 
स्वाधीन हेतु कोई बहुर न सीस उठाए || ३४२५  || 
भावार्थ : - वस्तुत: भारत का संविधान इस हेतु रचा गया कि स्वाधीनता हेतु फिर कोई शीश न उठाए  |

संविधान को चाहिये करत मूर करि राख | 
देस धर्म सहुँ आपुने पोसै अपुनी साख || ३४२६ || 
भावार्थ : - एक संविधान को चाहिए कि वह तत्संबंधित राष्ट्र की मौलिकता का रक्षण करते हुवे उक्त राष्ट्र विशेष में प्रचलित आचार-विचार सहित उस मूल से व्युत्पन्न  शाखाओं का परिपोषण करे  |

जोई जाकी जनम भुइँ जोई जाका देस | 
बिधि बिरचत सो मूलगत गह अधिकार बिसेस || ३४२७ || 
भावार्थ : - इस हेतु जो जिसकी जन्म भूमि है जो जिसका राष्ट्र है वहां वह मूलोत्पन्न संतानें विधि की संरचना कर विशेष मौलिक अधिकारों को ग्रहण करें |

संबिधान संपन्न किए बिरान सहुँ अधिकार | 
देसज दूरी होत भए मूरी हेतु कुठार || ३४२८  || 
भावार्थ : - ( इस तथ्य से परे )भारत का संविधान भिन्न देश के मूल को अधिकार संपन्न कर स्वराष्ट्र जनित संतानों से दूर होते हुवे उसकी मौलिकता हेतु कुल्हाड़ी सिद्ध हुवा |

जहाँ पराया आपुना गहेउ अंतर भेद | 
अबिच्छेद देस सौं तहँ अबिछिन रहँ परिछेद || ३४२९ || 
भावार्थ : - जहाँ मौलिकता व् अमौलिकता के मध्य भेददृष्टि (द्वैतवाद )ग्राह्य हो वहां तत्संबधित राष्ट्र अविभक्त राष्ट्र के सह अविच्छिन्न सीमाओं से युक्त रहता है |

इहाँ पराया आपुना गहे न अंतर भेद | 
अबिछेद एहि देस भयो छिन्न भिन्न परिछेद || ३४३० || 
भावार्थ : - भारत के परिपेक्ष्य में कहा जाए तो यहाँ मौलिकता व् अमौलिकता में भेददृष्टि अग्राह्य रही इसका परिणाम यह हुवा कि विच्छेदित सीमाओं के सह यह देश खंड-खंड हो गया |



बुधवार, 5 दिसंबर 2018

----- ॥ दोहा-दशम ३४०-३४१॥ -----

नागरिकी अधिकार एक मौलिक एक अधिकार | 
येह  नागर कर दीजिए येह मूलि कर धार || ३४०१ || 
भावार्थ : - भारत के इतिहास से शिक्षा लेते हुवे वर्तमान संविधानों को दो प्रकार के अधिकारों से युक्त होना चाहिए, एक मौलिक अधिकार दूसरा नागरिक अधिकार | मौलिक अधिकार तत्संबंधित राष्ट्र के मूल निवासियों को एवं नागरिक अधिकार मूल निवासियों सहित प्रवासी पीढ़ियों को प्रदत्त हो |

शासन व् शासक चयन का अधिकार मौलिक अधिकार के अंतर्निहित हो.....

सासन के अधिकार जहँ गहे देस के मूरि | 
जनमानस के सोइ सासन रहँ दासन ते दूरि || ३४०२  || 
भावार्थ : -शासक व् शासन चयन जैसे मौलिक अधिकार जब राष्ट्र के मूल नागरिक को ग्राह्य हों तब वह लोकतंत्र दासत्व के भय से मुक्त होता है |

देस सासनाधिकार के मतै बनो दातार | 
जे ताहि कर दीजिए जौ अहहीं मूलाधार || ३४०३ || 
भावार्थ : - शासन का अधिकार जिस किसी को प्रदत्त नहीं करना चाहिए | अपनी मौलिकता की रक्षा करते हुवे किसी संविधान को शासन व् शासक चयन का अधिकार उन्हें प्रदत्त करना चाहिए जो तत्संबंधित राष्ट्र वृक्ष के मूलभूत हों |

अधीनकर्ता करहि दिए सासन के अधिकार | 
सो बिधान ता देस हुँत जोग न अंगीकार || ३४०४ ||
भावार्थ : - वह संविधान अंगीकार योग्य नहीं है जो तत्संबंधित राष्ट्र के अधीनकर्ता को ही शासनाधिकार से सम्पन्न करे |


बेली सों लपटाए के साख पराई राख | 
संविधान एहि देस के काटे अपनी साख || ३४०५ || 
भावार्थ : -भारत का संविधान स्वतोविरोधी संविधान है जो अपने राष्ट्र अपनी मौलिकता का ही विरोध करता है | यह अपनी शाखाओं को काटकर टुकड़े टुकड़े करता है और पराई शाखाओं को वेलों के सदृश्य परिपोषित कर उनकी रक्षा करता है |

साख पराइ ढोए भए पुरइन निपट गँवार | 
पढ़े लिखे जौ बिधि कहे कीन्हि सब सविकार || ३४०६ || 
भावार्थ : - कभी विद्या वाचस्पति रहे हमारे पूर्वज पराए समुदायों की दासता का भार वहन करते करते अनपढ़, अशिक्षित हो चले थे | उन्हें संविधान लिखना तो क्या बोलना तक नहीं आता था, कालान्तर में पढ़े लिखों ने जो संविधान कहा उन्होंने उसे निर्विरोध अंगीकार कर लिया |

सीख पराई सीख कै निज आपा बिसराए | 
अपुने देस आपनपो आपहि आप दुराए || ३४०७ || 
भावार्थ : - परायों की सिखाई सीख कर जो अपने अस्तित्व, अपने निजत्व, अपनी अस्मिता की अवहेलना करता हो वह अपने देश अपने गृह के स्वत्व व् स्वामित्व से स्वयं को वंचित करता है |

रकत धमनि महँ धावते पुर्बज करें पुकार |
होवनिहार ए देस परि तुम्हरेहि अधिकार || ३४०८ ||
भावार्थ : - धमनियों के रक्त रूप में दौड़ते हमारे पूर्वज आह्वान करते हैं हे भारत की संतानों इस देश की   सम्प्रभुता पर तुम्हारा अधिकार है इसे ग्रहण करो |

क्योंकि : - "स्वत्व के प्रति उदासीनता सम्प्रभुता का क्षरण कर स्वस्थिति को अस्थिर करती है....."
                  अथवा अधिकारों के प्रति उदासीनता सम्प्रभुता को क्षयित करती है सम्प्रभुता के क्षरण से        स्वस्थिति अस्थिर होती है....."

सो दासा मनमानसा जो अपुना गह देस | 
दूजन आपा दए रहे आप मलीना भेस || ३४०९ || 
भावार्थ : - वह दास मानसिकता है जब कोई अपना गृह अपने देश का स्वामित्व अन्य को प्रदान कर स्वयंम्लान रहे |

सँबिधान किन्ही सदा अपुने संगत हेत | 
धनिआ भूखन मारिया खाए पराया खेत || ३४१० || 
अर्थ :- संविधान ने अपनों की  अपेक्षा न कर सदैव उसकी उपेक्षा की |  खेत दूसरे खा रहे हैं और इसने स्वामी को भूखा रखा हुवा है |
भाव  : - भारत के संविधान ने मूल निवासियों की उपेक्षा करते हुवे भारत की सम्प्रभुता से उसकी मौलिकता को विपन्न कर सदैव अमौलिकता को संपन्न किया |

लोक तंत्र महँ सासिता लोकनीति बरताए | 
जो जन जन करि रीत है सोइ रीति अपनाए || ३४११ || 
भावार्थ : - लोक तंत्र में शासन की नीतियां लोक-व्यवहार के निर्वाह हेतु नियत होनी चाहिए  राज के लिए नहीं |  जो रीति जनसामान्य में प्रचलित हो उसे वह अंगीकार हो व लोक प्रचलित प्रथाएं एवं मान्यताएँ, नियम निर्णयों से विबन्धित न हो यही लोकतंत्र की मर्यादा है |

स्पष्टीकरण : - लोक प्रथाएं व् मान्यताएं प्रशासनिक विषयों से अन्यथा सामाजिक विषयों के अंतर्गत आती है एतएव ये सामाजिक संचेतना से संचालित व् नियंत्रित की जा सकती है  |

जोइ बिधिबत बिधिसंगत जो बिधि जुगत बिधान | 
जो मत अधिमत सब जगत होतब सोइ अधिमान || ३४१२ || 
भावार्थ : - "वह सिद्धांत अंगीकार करने योग्य है जो विधि सम्यक होते हुवे नियमानुरूप, विधानानकुल और सर्वाधिमान्य सिद्धांत हो |"

दासकरिता परबसिया बसिया करे समान | 
सँविधान महुँ बिहित कहा यहु अभिमत जगमान || ३४१३ || 
भावार्थ : - 'अपने अधीनकर्ता प्रवासियों को मूल निवासियों के समकक्ष अधिकार प्रदान करना' भारत के संविधान में विहित यह सिद्धांत क्या विश्वमान्य है ?

सँविधान ने रचिया रे नेम जग ते न्यारु |
जो मत जग अमान अहै सो मत ताहि प्यारु ||३४१४ || 
भावार्थ : - भारत के संविधान ऐसे नियम संरचित के गए हैं जो जगत रचित संवैधानिक नियमों से पृथक हैं जो सिद्धांत समूचे विश्व में अमान्य है वह सिद्धांत इसे प्रिय हैं |

परबसिआ बसिआ कहिब सुरग कहब जूँ नर्क | 
जन जन दिग भरमाइआ  सो तो तर्क कुतर्क || ३४१५ || 
भावार्थ : - प्रवासी को निवासी कहने का तर्क स्वर्ग को नर्क कहने के समान है जो कथन जनमानस को दिगभ्रमित करता हो वह तर्क कुतर्क है |

कहत पराया आपुना दिया देस बँटवार | 
ए बँटबारा अपुने कहुँ किया दास ता पार || ३४१६ || 
भावार्थ : - भारत विभाजन ने पराए देश में प्रादुर्भूत पराए समुदाय को अपना समुदाय घोषित करते हुवे देश बाँट कर दे दिया गया |   विभाजन ने सीमापार निवासरत मूल निवासी को उन परायों के अधीन रहने दिया | यह कहाँ का न्याय है |

जासु पुरबज बनहि बसत एही देसु निरमाए |
ता अपुने बिसराए के पराए देस बसाए || ३४१७ || 
भावार्थ : - जिनके पूर्वजों ने सघन वनों के आतप्त को सहन करते हुवे इस भारत देश का निर्माण किया, सत्ता की लौलुपता ने सीमापार निवासित उनकी संतानों का तिरष्कार कर अधीनकर्ता पराए समुदाय को देश में बसाए रखा |

" व्यक्तिमात्र की स्वाधीनता याथार्थ्य स्वाधीनता है....."

देस भुईँ बसबासिते देस बंधु निज बास | 
बँटाबन छन साईँ ते कियो पराया दास || ३४१८ || 
भावार्थ : -  अपनी जन्म भूमि, अपने देश में, अपने स्वत्वाधिकारी निवास में निवासरत इस देस की सीमापार  उन संतानों को विभाजनकर्ता ने क्षण मात्र में ही परायों के अधीन कर दिया  |

स्वधुर ते स्वभुईँजन रहीं जाएँ जहँ सेस |
स्वाधीन होतेउ बरु पराधीन सो देस || ३४१९ ||
भावार्थ :- "स्वदेशजनित संतति जहाँ स्वाधीनता प्राप्ति में शेष रह जाए वह देश पराधीन है | "

दास करिता गोसाईं गोसाईं जहँ दास | 
सो देसज सो देसभुइँ पराधीन संकास || ३४२० || 
भावार्थ :-- "जहाँ दासकर्ता को स्वत्वाधिकार प्राप्त हों और स्वामी इस अधिकार से वंचित होकर दास स्वरूप हो वह देशभूमि व् उसकी संताने स्वाधीन होते हुवे भी पराधीन के सदृश्य हैं |"











----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...