सोमवार, 18 जून 2018

----- ॥ दोहा-दशम ३३९ ॥ -----

बेद बिधि बिधानतस एक सनातन संविधान | 
नेम नीति निरधार जौ दए जथारथ ग्यान || ३३९१  || 

भावार्थ : - वेद वस्तुत: वैधानिक सिद्धांतों का प्रबंधन स्वरूप एक सनातन संविधान है जो नियम व् नीतियों का निर्धारण कर यथार्थ ज्ञान का प्रबोधन करते हैं | 

टिप्पणी : - संविधान अथवा विधान मनुष्य के लिए निर्मित होते हैं मनुष्य संविधान के लिए निर्मित नहीं होता एतएव यह परिवर्तनशील है | कोई संविधान कितने समय समय तक मान्य होता है यह देखने वाली बात है.....


नेम नियमन नियतन कर  रहै भीत मरयाद | 
सीवाँ रेख बँधाई के पनपे राष्ट्र वाद || ३३९२  || 
भावार्थ : - कतिपय नियमों निर्बंधों द्वारा निर्धारित  मर्यादा के अंतर्गत एक निश्चित सीमा रेखा अवरेखित कर  वैदिक काल में ही राष्ट्रवाद का प्रादुर्भाव हुवा | 


भेद पराई आपुनी सीवाँ संग बँधाए | 

सीवा के ए बँधता पुनि देसवाद उपजाए || ३३९३  || 
भावार्थ : - अपने-पराए में भेद के साथ देश सीमाओं से आबद्ध हुवे सीमाओं की इस बंध्यता से ही राष्ट्रवाद का अभ्युदय हुवा..... 


वसुधैव कुटुम्बकम कर वेद ए सूत पिरोए | 
बिनहि नेम मरयाद के राष्ट्र कलप न होए || ३३९ ४  || 
भावार्थ : - वेदों एवं उपनिषदों ने वसुधैव कुटुम्बकम के सूत्र का सूत्रपात कर समस्त पृथ्वी को एक राष्ट्र के रूप में निर्दिष्ट किया |  नियमों की मर्यादा से रहित होकर राष्ट्र की व् सीमाओं से विहीन होकर राष्ट्रवाद की कल्पना नहीं की जा सकती | 

मूल बिगोवत आपुनो सेष सोंहि सो देस | 
पतनोन्मुखी होइ के  होत जात अवसेष || ३३९५ || 
भावार्थ : - जो देश अपनी मौलिकता के विनाश का विधान करता है वह देश पतनोन्मुखी होते हुवे शेष से अवशेष में परिवर्तित होता चला जाता है | 


भारतिता ते भारती तासों भारत देस | 
भारतिता बिनसाई त  नही रहइगा सेष || ३३९६ || 
भावार्थ : -''भारत का अस्तित्व भारतियों से है भारतीयों का अस्तित्व भारतीयता से है जिस दिन भारतीयता समाप्त हो जाएगी उस दिन भारत का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा....." 

होअब बिरवँ अमुआ के चाहे पेड़ बबूल | 
फूरै आपनि साखि पै बिकसत आपनि मूल || ३३९७ || 
भावार्थ : -रसाल का विटप  हो अथवा बबूल का वृक्ष अथवा कोई भी क्यों है वह अपने मूल से ही विकसित  होता है व् अपनी शाखाओं पर ही फलीभूत होता  है | 

भारत के सविधान ते फरी पराई साख | 
आपुनि साख सुखाइ तिन करिया लाखन लाख || ३३९८ || 
भावार्थ : - भारत के संविधान से पराई शाखाएँ फलीभूत हुई अपने स्वायत्त का तिरष्कार के परिणामस्वरूप इसकी अपनी शाखाओं को शुष्क कर ये न केवल फलीभूत हुई अपितु घनीभूत भी होती चली गई | 

तब बहुमत का कीजिये होत अधिकाधिकाइ || 
देस मूल बिनसाइ जब राजिहि साख पराइ || ३३९९ || 
भावार्थ : - लोक तंत्र में बहुमत का सिद्धांत तब विफल सिद्ध होगा जब किसी देश विशेष की मौलिकता को नष्ट करते हुवे  उसकी कुल जनसंख्या में अधिसंख्या को प्राप्त होकर पराए देशों की शाखाएं अथवा उनके वंशज उसपर शासन करेंगे | 

भारत भूमि सोंहि जन्माइहिं  | तासु जनित भारतिअ कहाइहि || 
भारत बंसज भारत बासी | अबर बंस यहँ हसि अधिबासी || 
जिसका जन्म भारत भूमि में हुवा है उन पूर्वजों की संतान भारतीय हैं भारतीय का अर्थ है भारतवासी या भारतभूमि में उत्पन्न भारतवंशी | अन्य देश के वंश यहाँ के निवासी न होकर अधिवासी हैं |

जनि जिन्ह बिय आनि कतहूँ के |  मुसुलमान नहि भारतभू के ||
एकु सहस बरसि पुरब इहँ आए  |  बसि बसति बसात बासु बसाए ||   
जिन्हें अन्य किसी देश के बीज ने व्युत्पन्न किया वह मुस्लिम इस भारत भूमि की संतान नहीं हैं | एक सहस्त्र वर्षा से भी अधिक समय पूर्व इस देश में इनका आगमन हुवा | वासों में बसते बसते इन्होने बस्तियां बसा लीं

बसत बसति  पुनि भए परबासी | परबासिहि सहुँ भए अधिवासी ||
जग अधिबासि कतहुँ न कोई | बसि तहवाँ न मूलगत होई || 
इन बस्तियों में बसते ये प्रवासी हो गए, कुछ और अधिक काल तक वासित होने कारण ये प्रवासी से अधिवासी हो गए हो | संसार में जहाँ कहीं भी कोई भी अधिवासी रूप में निवास करते हों अथवा करता हो वह वहां के मूलगत नहीं हैं  | 

जौ  तरु साख जहाँ निपजावै | सो तहवाँ कइँ मूरि कहावै || 
बिस्तारि गहै जगत अपूरी   | कहँ ताहि ता देस कइ मूरी || 
वृक्ष की जो शाखा जहाँ व्युत्पन्न होती है वह वहीँ की मूलगत कहलाती है | जहाँ विस्तार ग्रहण समस्त संसार में विस्तार को क्यों न प्राप्त कर ले उसे उसी स्थान का मूल कहा जाएगा जहाँ वह व्युत्पन्न हुई | 

जाके पूर्बज जनम भए जाहि देस के  मूल | जनमत सो तो होइआ सोइ साख के फूल || ३४०० || 
भावार्थ : - "कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र का मूल नागरिक है यदि उसके पूर्वजों की जन्म व् कर्म भूमि उक्त राष्ट्र की भूमि रही हो तथा उसका जन्म ऐसे पूर्वजों द्वारा उत्पन्न माता-पिता से हुवा हो |" 


स्पष्टीकरण : - यहाँ पूर्वज का आशय व्यक्ति के पूर्व की ज्ञातित पीढ़ियों में उत्पन्न व्यक्ति से है |







----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...