(दोहाएकादश ९ )
बथुरत पूला आपना, बँधेउ पराए पूल |
बथुरत पूला आपना, बँधेउ पराए पूल |
भरम जाल भरमाइ के बिनसत गयउ मूल || ३४४१ ||
भावार्थ : --भारत वस्तुत: चार धार्मिक समुदायों के कुटुंब का राष्ट्र है, यह कुटुंब तब बिखर गया जब इसमें उस पराए कुटुंब को भी सम्मिलित किया गया जिसने उसे दास बनाया था | तत्पश्चात इन्हें अपना कहते हुवे एक भ्रम का जाल बिछाया गया जिसके बहकावे में आकर भारत की मौलिकता नष्ट-भ्रष्ट होती चली गई |
साख बिरानि राख करत, करत मूल निर्मूल |
जग अनभै अधिकार रचत मौलिकता गए भूल || ३४४ २ ||
भावार्थ : -- अपने मूल को निर्मूल कर अपनी मौलिकता को छिन्न-भिन्न करके एक पराई साम्प्रदायिक शाखा की रक्षा करते हुवे ऐसा अधिकार परिकल्पित किया गया जो विश्व में किसी राष्ट्र के संविधान ने नहीं किया था |
साख बिरानि राख करत, करत मूल निर्मूल |
जग अनभै अधिकार रचत मौलिकता गए भूल || ३४४ २ ||
भावार्थ : -- अपने मूल को निर्मूल कर अपनी मौलिकता को छिन्न-भिन्न करके एक पराई साम्प्रदायिक शाखा की रक्षा करते हुवे ऐसा अधिकार परिकल्पित किया गया जो विश्व में किसी राष्ट्र के संविधान ने नहीं किया था |
बिरावन भयउ बहोरी सासन के अधिकारि |
अखिल जगत कर देस जौ कतहुँ दरस नहि पारि || ३४४ ३ ||
भावार्थ :- जो राष्ट्र निर्माण के मूलभूत नहीं हैं उसे शासन करने का अधिकार प्राय: विश्व के किसी भी राष्ट्र ने नहीं दिया है | जो न केवल राष्ट्र निर्माण के मूलभूत नहीं हैं जिन्होंने उसे दास भी बनाया, भारत के संविधान ने ऐसे साम्राज्य वादी समुदाय को पुनश्च शासन करने का अधिकार दे दिया |
लागि होत भयो पुनि सो संविधान निरमाए |
अपने अपने देस में सब बिधि करत पराए || ३४४४ ||
भावार्थ : -- ततश्चात एक दिन निर्मित होकर वह संविधान रातोंरात देश पर लागू भी हो गया | लोगों को पता भी नहीं चला कि उस संविधान में देश के मूलनिवासियों को अधिकारों से विपन्न कर पराया कर दिया गया था |
सीँउ भए बिनु सीँउ भयो दिए पट बिनहि द्वार |
यह मूरख का देस कह राज करे संसार || ३४४५ ||
भावार्थ : -- सीमाओं के होते हुवे भी यह देश सीमा से विहीन रहा क्यों कि इसमें एक ऐसे द्वार का निर्माण किया गया जिसमें पट ही नहीं थे | उस द्वार पर अंकित किया गया कि यह मूर्खों का देश है यहाँ कोई भी कभी भी कहीं भी आ-जा सकता है और इसपर शासन भी कर सकता हैं |
एक तो भारा आपना भयऊ भारि अपार |
बहुरि संभारन कांधरा दियो परायो भार || ३४४६ ||
भावार्थ : --चार सम्प्रदायों के कुटुम्ब के देश का अपना भार ही भारी-भरकम था फिर उस के कन्धों पर पराए सम्प्रदाय के पालन-पोषण का भार भी लाद दिया गया |
बोहनहारा हारिया बोह परायो बोह |
दारिद रेखा बीच ते नीच भया ता सोंह || ३४४७ ||
भावार्थ : -- अपने दायित्व के साथ दुसरों का भारी भरकम दायित्वों को वहन करने के कारण इस देश का कंधा शिथिल होकर क्लांत गया जिसे निर्धन रेखा के मध्य में स्थित होना था वह कुटुम्ब निर्धन रेखा के नीचे आ गया |
प्राग समउ ए भारत भुइ चहुँ दिसि लिए बिस्तार |
सुगठित एक छत रूप दिए अन्तर देसिक धार || ३४४८ ||
भावार्थ : - प्राचीन समय में भारत का भूखंड चारों दिशाओं में विस्तार को प्राप्त होकर सुव्यवस्थित राजतांत्रिक क्षेत्रों की लघु ईकाइयों का समूह था | राष्ट्रीयता की धारा के इस अंतर विस्तार को सुसंगठित कर तदनन्तर एक प्रभुसत्तात्मक स्वरूप दिया गया |
एवम एकीकार भुइँ करि भए भारत गनराज |
स्वारथ परायन हेतु पुनि करिअब बहुंत विभाज || ३४४९ ||
भावार्थ : - इस प्रकार राज्य की इन लघु इकाइयों एवं इसके निवासियों को एक सीमा रेखा में आबद्ध करते हुवे इसके विस्तारित भूखंड का एकीकरण किया गया तदनन्तर प्रभुसत्ता संपन्न वैधानिक गणराज्य का स्वरूप धारण कर विश्व में यह एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हुवा | किन्तु अपना हित सिद्ध करने वाले स्वार्थी तत्त्वों के कारण यह वर्तमान में खंड-खंड हो गया |
पूल परयो हेतु पुनि खींचे पुनि एक रेख |
बसा बसाया बासना दे तिन पेटे लेख ||३४५० ||
भावार्थ : -- एक राष्ट्र को निर्मित करने में पीढ़ियों का रक्त लगता है; इस यथार्थ की उपेक्षा करते हुवे पराए देश के एक पराए समुदाय के लिए पुनश्च एक रेखा खिंच कर भारत को खंड-खंड करते हुवे एक सुव्यवस्थित राष्ट्र उनके नाम कर दिया |
अब लगि को न जनाइया भंजत भारत सेतु |
करतब लहुरा देस किए खंड खंड किन हेतु || ११ ||
भावार्थ : - भारत की सीमाओं का विभंजन करते इस विशाल राष्ट्र को लघुता प्रदान करने के कारण क्या थे | इसे किस हेतु खंड-खंड किया यह अब तक किसी भारतीय को ज्ञात नहीं है |
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(१० )
बसति बसति बसबासता मिलिअब पर समुदाय |
बसे बसेरा आपुना केहि हेतु कर दाए || १ ||
भावार्थ : - यदि एक पराए देश का सम्प्रदाय जब विद्यमान भारत के वस्ति वस्ति में निवासित है तब उसका विभाजन कर एक बसा बसाया राष्ट्र उसे किस हेतु दिया गया |
आन बसे परबासिया भए बिनु देस सदेस |
बिरावन भयउ भारती होत जात निज देस || २ ||
भावार्थ : -- अब देश में बसे पराए, देश रहित होते हुवे भी देशवाल हो गए | जो देशवाल थे, राष्ट्रिक थे वह राष्ट्र विहीन होकर राष्ट्र के स्वत्वाधिकार से वंचित हो गए, उनके लिए १९४७ की स्वतंत्रता अभिशाप सिद्ध हुई |
खंड खंड होतब अजहुँ भयऊ भारत सेष |
अस तो हो रहि जाएगा सनै सनै अवसेष || ३ ||
भावार्थ : -- विद्यमान समय में स्थिति यह है कि यह अखंड भारत खंड-खंड होकर शेष भारत में परिवर्तित हो गया है यदि यही अनुक्रम चलता रहा तो यह अवशेष मात्र होकर रह जाएगा |
स्वत्वाधिकार तैं जो स्वाजन्य परिरोधि |
सो बिधि सो सबिधायनी होत स्वतोबिरोधि || ६ ||
भावार्थ : - किसी विधि द्वारा विहित अधिनियम अथवा उसके उपबंध जब मूल निवासियों के स्वत्वाधिकार को परिरुद्ध करते हैं तब वह संविधान अपने ही राष्ट्र का विरोधी होता है |
दास करत गोसाइयाँ गोसाईँ कर दास |
सासन करे बिलास जब जन जन होत उदास || ७ ||
भावार्थ : - जब जनमानस अपने अस्तित्व के बौद्धिक तत्वों से अनभिज्ञ होते हुवे सुषुप्त और शासन निर्द्वन्द्व सुख उपभोग में मग्न होता है, तब स्वामी स्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर दासत्व को तथा दास उन अधिकारों से संपन्न होकर स्वामी के पद को प्राप्त होते जाते हैं |
निँद त्याज कर जागरन जन जन पूछ बुझाए |
पितु धन सम्पद जान के परबसिया कर दाए || ३ ||
भावार्थ : - सुषुप्त अवस्था त्याग कर जनमानस भी जागृत हो और सत्ता के लालचियों से प्रश्न करे कि राष्ट्र की भूमि को खंड-खंड कर उपनिवेशियों को दे दी गई क्या इन्होने इस राष्ट्र को अपनी पैतृक सम्पति समझ रखा है |
१९६० ई .के ९ वे संशोधन का कारण पूछे जिसमें देश के टुकड़े कर एक संधि के द्वारा बेरुबारी व् खुलना आदि क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिए गए थे |
पीर नहीं पर एकै की यह अगजग की पीर |
जेहि तरु तिन पोषि तेहि काटैं धीरहि धीर || ८ ||
भावार्थ : - उपनिवेशियों द्वारा प्रदत्त यह पीड़ा किसी एक राष्ट्र की न होकर उन सभी राष्ट्रों की है जहाँ की ये बसे हुवे हैं ये जिस वृक्ष से परिपुष्ट होते हैं उसी वृक्ष की जड़ें काटने में लगे रहते हैं इनकी अनंतिम परिणीति विभाजन है |
परे देस परबासिया होत बिमुख निज ईस ।
एक आध ते पूरन भए बहुरि कोटि पच्चीस ॥ ३२ ७१ ॥
भावार्थ : -- अपने ईश्वर से विमुख होकर दास के वेश में आते हैं ये प्रवासी । देश को लूटते हैं फिर उसपर अत्याचार करते ये शताब्दियों तक राज कर फिर उसपर अत्याचार हैं । उसे विभाजित करते हैं और कहीं नहीं जाते..... पहले आधे रहते हैं फिर एक हो जाते हैं फिर करोड़ों में व्याप्त होकर संख्यावादी लोकतंत्र से देश को पुनश्च नियंत्रित करते हैं......
अखिल जगत कर देस जौ कतहुँ दरस नहि पारि || ३४४ ३ ||
भावार्थ :- जो राष्ट्र निर्माण के मूलभूत नहीं हैं उसे शासन करने का अधिकार प्राय: विश्व के किसी भी राष्ट्र ने नहीं दिया है | जो न केवल राष्ट्र निर्माण के मूलभूत नहीं हैं जिन्होंने उसे दास भी बनाया, भारत के संविधान ने ऐसे साम्राज्य वादी समुदाय को पुनश्च शासन करने का अधिकार दे दिया |
लागि होत भयो पुनि सो संविधान निरमाए |
अपने अपने देस में सब बिधि करत पराए || ३४४४ ||
भावार्थ : -- ततश्चात एक दिन निर्मित होकर वह संविधान रातोंरात देश पर लागू भी हो गया | लोगों को पता भी नहीं चला कि उस संविधान में देश के मूलनिवासियों को अधिकारों से विपन्न कर पराया कर दिया गया था |
सीँउ भए बिनु सीँउ भयो दिए पट बिनहि द्वार |
यह मूरख का देस कह राज करे संसार || ३४४५ ||
भावार्थ : -- सीमाओं के होते हुवे भी यह देश सीमा से विहीन रहा क्यों कि इसमें एक ऐसे द्वार का निर्माण किया गया जिसमें पट ही नहीं थे | उस द्वार पर अंकित किया गया कि यह मूर्खों का देश है यहाँ कोई भी कभी भी कहीं भी आ-जा सकता है और इसपर शासन भी कर सकता हैं |
एक तो भारा आपना भयऊ भारि अपार |
बहुरि संभारन कांधरा दियो परायो भार || ३४४६ ||
भावार्थ : --चार सम्प्रदायों के कुटुम्ब के देश का अपना भार ही भारी-भरकम था फिर उस के कन्धों पर पराए सम्प्रदाय के पालन-पोषण का भार भी लाद दिया गया |
बोहनहारा हारिया बोह परायो बोह |
दारिद रेखा बीच ते नीच भया ता सोंह || ३४४७ ||
भावार्थ : -- अपने दायित्व के साथ दुसरों का भारी भरकम दायित्वों को वहन करने के कारण इस देश का कंधा शिथिल होकर क्लांत गया जिसे निर्धन रेखा के मध्य में स्थित होना था वह कुटुम्ब निर्धन रेखा के नीचे आ गया |
प्राग समउ ए भारत भुइ चहुँ दिसि लिए बिस्तार |
सुगठित एक छत रूप दिए अन्तर देसिक धार || ३४४८ ||
भावार्थ : - प्राचीन समय में भारत का भूखंड चारों दिशाओं में विस्तार को प्राप्त होकर सुव्यवस्थित राजतांत्रिक क्षेत्रों की लघु ईकाइयों का समूह था | राष्ट्रीयता की धारा के इस अंतर विस्तार को सुसंगठित कर तदनन्तर एक प्रभुसत्तात्मक स्वरूप दिया गया |
एवम एकीकार भुइँ करि भए भारत गनराज |
स्वारथ परायन हेतु पुनि करिअब बहुंत विभाज || ३४४९ ||
भावार्थ : - इस प्रकार राज्य की इन लघु इकाइयों एवं इसके निवासियों को एक सीमा रेखा में आबद्ध करते हुवे इसके विस्तारित भूखंड का एकीकरण किया गया तदनन्तर प्रभुसत्ता संपन्न वैधानिक गणराज्य का स्वरूप धारण कर विश्व में यह एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हुवा | किन्तु अपना हित सिद्ध करने वाले स्वार्थी तत्त्वों के कारण यह वर्तमान में खंड-खंड हो गया |
पूल परयो हेतु पुनि खींचे पुनि एक रेख |
बसा बसाया बासना दे तिन पेटे लेख ||३४५० ||
भावार्थ : -- एक राष्ट्र को निर्मित करने में पीढ़ियों का रक्त लगता है; इस यथार्थ की उपेक्षा करते हुवे पराए देश के एक पराए समुदाय के लिए पुनश्च एक रेखा खिंच कर भारत को खंड-खंड करते हुवे एक सुव्यवस्थित राष्ट्र उनके नाम कर दिया |
अब लगि को न जनाइया भंजत भारत सेतु |
करतब लहुरा देस किए खंड खंड किन हेतु || ११ ||
भावार्थ : - भारत की सीमाओं का विभंजन करते इस विशाल राष्ट्र को लघुता प्रदान करने के कारण क्या थे | इसे किस हेतु खंड-खंड किया यह अब तक किसी भारतीय को ज्ञात नहीं है |
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बसति बसति बसबासता मिलिअब पर समुदाय |
बसे बसेरा आपुना केहि हेतु कर दाए || १ ||
भावार्थ : - यदि एक पराए देश का सम्प्रदाय जब विद्यमान भारत के वस्ति वस्ति में निवासित है तब उसका विभाजन कर एक बसा बसाया राष्ट्र उसे किस हेतु दिया गया |
आन बसे परबासिया भए बिनु देस सदेस |
बिरावन भयउ भारती होत जात निज देस || २ ||
भावार्थ : -- अब देश में बसे पराए, देश रहित होते हुवे भी देशवाल हो गए | जो देशवाल थे, राष्ट्रिक थे वह राष्ट्र विहीन होकर राष्ट्र के स्वत्वाधिकार से वंचित हो गए, उनके लिए १९४७ की स्वतंत्रता अभिशाप सिद्ध हुई |
खंड खंड होतब अजहुँ भयऊ भारत सेष |
अस तो हो रहि जाएगा सनै सनै अवसेष || ३ ||
भावार्थ : -- विद्यमान समय में स्थिति यह है कि यह अखंड भारत खंड-खंड होकर शेष भारत में परिवर्तित हो गया है यदि यही अनुक्रम चलता रहा तो यह अवशेष मात्र होकर रह जाएगा |
स्वत्वाधिकार तैं जो स्वाजन्य परिरोधि |
सो बिधि सो सबिधायनी होत स्वतोबिरोधि || ६ ||
भावार्थ : - किसी विधि द्वारा विहित अधिनियम अथवा उसके उपबंध जब मूल निवासियों के स्वत्वाधिकार को परिरुद्ध करते हैं तब वह संविधान अपने ही राष्ट्र का विरोधी होता है |
दास करत गोसाइयाँ गोसाईँ कर दास |
सासन करे बिलास जब जन जन होत उदास || ७ ||
भावार्थ : - जब जनमानस अपने अस्तित्व के बौद्धिक तत्वों से अनभिज्ञ होते हुवे सुषुप्त और शासन निर्द्वन्द्व सुख उपभोग में मग्न होता है, तब स्वामी स्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर दासत्व को तथा दास उन अधिकारों से संपन्न होकर स्वामी के पद को प्राप्त होते जाते हैं |
निँद त्याज कर जागरन जन जन पूछ बुझाए |
पितु धन सम्पद जान के परबसिया कर दाए || ३ ||
भावार्थ : - सुषुप्त अवस्था त्याग कर जनमानस भी जागृत हो और सत्ता के लालचियों से प्रश्न करे कि राष्ट्र की भूमि को खंड-खंड कर उपनिवेशियों को दे दी गई क्या इन्होने इस राष्ट्र को अपनी पैतृक सम्पति समझ रखा है |
१९६० ई .के ९ वे संशोधन का कारण पूछे जिसमें देश के टुकड़े कर एक संधि के द्वारा बेरुबारी व् खुलना आदि क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिए गए थे |
पीर नहीं पर एकै की यह अगजग की पीर |
जेहि तरु तिन पोषि तेहि काटैं धीरहि धीर || ८ ||
भावार्थ : - उपनिवेशियों द्वारा प्रदत्त यह पीड़ा किसी एक राष्ट्र की न होकर उन सभी राष्ट्रों की है जहाँ की ये बसे हुवे हैं ये जिस वृक्ष से परिपुष्ट होते हैं उसी वृक्ष की जड़ें काटने में लगे रहते हैं इनकी अनंतिम परिणीति विभाजन है |
परे देस परबासिया होत बिमुख निज ईस ।
एक आध ते पूरन भए बहुरि कोटि पच्चीस ॥ ३२ ७१ ॥
भावार्थ : -- अपने ईश्वर से विमुख होकर दास के वेश में आते हैं ये प्रवासी । देश को लूटते हैं फिर उसपर अत्याचार करते ये शताब्दियों तक राज कर फिर उसपर अत्याचार हैं । उसे विभाजित करते हैं और कहीं नहीं जाते..... पहले आधे रहते हैं फिर एक हो जाते हैं फिर करोड़ों में व्याप्त होकर संख्यावादी लोकतंत्र से देश को पुनश्च नियंत्रित करते हैं......