असाहित परसासी कहँ, आर्य एक पर जाति ।
बेद बचन पुकार कहे सज्जन सील सभ्रांति ॥ ३३६१ ॥
भावार्थ : --भेद नीति का आश्रय लेकर असाहित्यक शासकों ने 'आर्य' शब्द को एक अन्य देश की द्विजाति कहकर अर्थार्पित किया । वेद मन्त्रों में यह शब्द एक संबोधन मात्र है, जो भद्र पुरुषों के हेतु उच्चारित होता है जैसे श्रीमान,महोदय, पूज्यनीय, श्री, महानुभाव आदि आदि ।
पद्म पुराण में वर्णित है : --
जन्मना ब्राम्हणों ज्ञेय: संस्कारैर्द्विज उच्यते ।
( ४३ । १३४- ३८ )
भावार्थ : -- ब्राम्हणों के बालक को जन्म से ब्राम्हण समझना चाहिए । संस्कारों से उसकी 'द्विज' अथवा 'द्विजाति' संज्ञा होती है तथा विद्या पढकर वह 'विप्र' नाम धारण करता है ।
अधभरमनिअ पुकार के मूलक मूल उपारि ।
कतहुँ त पसुचारि लिखिया कतहुँ लिखे बैपारि ॥ ३३६२ ॥
भावार्थ : - मूलगत को निर्मूल कर विभाजित भारत के सत्ताधारियों ने आर्य को एक जाति सिद्धकर उसे अर्धभ्रमणीय ( खानाबदोश, कुलहीन ) पशुचारी प्रवृत्ति की जाति कहा जो व्यापार करते थे ॥
मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त जो मनुष्य अपनी अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वस्तु का क्रय-विक्रय करते हों वह पशुचारी प्रवृत्ति के कैसे हो सकते है..... ?
अचलाधिक कर तलहटी विन्ध्याचल के पास ।
पूर्बापर सागर लगे द्विजप करेँ निवास ॥ ३३६३॥
भावार्थ : - विध्याचल से लेकर हिमालय के तटवर्ती क्षेत्र व् पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक का क्षेत्र आर्यो का निवास स्थल था शेष भूभाग बिहड़ वनों से आच्छादित था ॥
कतहुँ त परन कुटिरु बसैं, जगोपबित अभिजात ।
कतहुँ भील बन भाँवरे त कतहुँ कोल किरात ॥ ३३६३ ॥
भावार्थ : -- वैदिक काल का प्रारम्भिक परिदृश्य यह था कि कहीं पर्ण-कुटिया रचकर यज्ञ आदि कर्मकांड से पवित्र हुवा अभिजात्य वर्ग निवासरत था कहीं भ्रमणकारी भील तो कहीं कोल किरात जाति दृष्टिगोचर होती जिन्हें विभाजित भारत में उजड्ड, अशिष्ट, उद्दंड, अनपढ़, असभ्य व् आदिजाति के रूप में परिभाषित किया गया ॥
रिसि मुनि तपसि बस्यो बन लिख्यो बेद पुरान ।
पीठासीन ब्रम्हन जिन, बाँचत देइँ ग्यान ॥ ३३६४ ॥
भावार्थ : -- वैदिक काल ही वह काल था जिसमें वननिवासित ऋषि मुनि व् तपस्वियों ने वेदादि धर्म ग्रंथों की रचना की, व्यास पीठ पर विराज कर ब्राम्हण देव जिन ग्रन्थों का व्याख्यान कर जनमानस को ज्ञानवान करते हैं यह वही वेद-पुराण हैं ॥
स्पष्टीकरण : - इस लिए व्यास पीठ पर केवल ब्राम्हण के श्रीमुख से ही ज्ञान ग्रहण करें, स्वयं आलेखित ज्ञान को भी ब्राम्हण के श्रीमुख से ही सुनें, कारण की ब्राम्हण धर्मार्थ हेतु और अन्य स्वार्थ हेतु उपदेश करते हैं ॥
वक्ता किसे बनावें.....? जो विरक्त, वैष्णव, ब्राम्हण, विषय विषद् , भावितात्मनः , धीर व् अत्यंत नि:ष्पृह हो
भाजन सोंहि अगन बसे बसे श्रीस सब गेह ।
भूषन बसन बसाए पुनि रहँ अनगढ़ सब देह ॥ ३३६५ ॥
भावार्थ : -- ( अंग्रेजों के कालक्रम को ही यदि सटीक मानें तो ) धातुओं का परिष्करण हुवा वस्त्रों के संग आभूषणों के अधिवास से मानव देह शोभा से तो संपन्न हो गई । अग्नि का प्राकट्य हुवा ता संगत भाजनों के अधिवास से गृह स्वामी के संग सम्पदा भी गृह में निवास करने लगी, किन्तु मनुष्य के धातु का परिष्करण न होने के कारण मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त होकर भी वह मूर्ख व् असभ्य ही रहा ॥
करतब कर पुनि पाइये यह उपधारन धार ।
बनचरनी अपावन मन सोधन करे विचार ॥३३६६ ॥
भावार्थ : -- कर्म करो तत्पश्चात ही फल का सेवन करो सम्यक चिंतन के पश्चात् यह बुद्धि आई किन्तु ज्ञान नहीं आया । मनुष्य का पशुवत स्वभाव जब यथावत रहा तब उसने वनचारी अपवित्र मन को पवित्र करने का विचार किया ॥
पाहन परिसुधित भए जब धातु कुसल यह देस ।
भाजन में भोजन बसे तन भए भूषन भेस ॥ ३३६७ ॥
भावार्थ : -- पाषाण को परिष्कृत कर जब इस देश ने धातु का शोधन किया तभी विश्व को भाजन में भोजन करना आया । तदनंतर वस्त्राभूषण से वह परिचित हुवा ॥ इस प्रकार विश्व को पाषाण युग से आधुनिक युग में पहुंचाया ॥
मानस जब जग जनम लिए पाहन भए सब कोए ।
धाता धात न होइया जब लग देह न धोए ॥ ३३६८॥
भावार्थ : -- विश्व में जब मानव जाति का आविर्भाव हुवा तब वह पाषाण स्वरूप की थी । जिस प्रकार पाषाण के परिमार्जन से धातुएं प्राप्त हुईं उसी प्रकार मानव देह के परिमार्जन से वर्ण प्राप्त हुवे । इस परिमार्जन के पश्चात ही पालन पोषण करने वाले मातृत्व व् पितृत्व भाव प्राप्त हुवा जो पशु व् पाशविक प्रवृत्ति के मनुष्य में न्यूनतम पाया जाता है ।
परिमार्जन के कारण ही अन्य देशजों के अपेक्षाकृत भारतियों में वात्सल्य भाव अत्यधिक होता है.....
धात लहे अरु मल गहे जब लग बिलग न होए ।
पाहन पाहन हो रहे निज गुन कहे न कोए ॥ ३३६९॥
भावार्थ : - पाषाण जब तक मलिनता से पृथक नहीं होता तब तक वह अपना धात्विक गुण प्रकट नही करता और पाषाण का पाषाण ही रहता है ।
जब लग धात न धोइया तब लग रह पाषान ।
लोहिताए लोहू भया उदया नवल बिहान ॥ ३३७० ॥
भावार्थ : - जब तक मनुष्य का परिशोधन नहीं होता तब तक वह पाषाण ही है । जब वह परिमार्जित होकर लोहिताए, लौह, स्वर्ण, रजत आदि धातुओं में परिणित होकर ही वह नवयुग में प्रवेश करता है ।
बेद बचन पुकार कहे सज्जन सील सभ्रांति ॥ ३३६१ ॥
भावार्थ : --भेद नीति का आश्रय लेकर असाहित्यक शासकों ने 'आर्य' शब्द को एक अन्य देश की द्विजाति कहकर अर्थार्पित किया । वेद मन्त्रों में यह शब्द एक संबोधन मात्र है, जो भद्र पुरुषों के हेतु उच्चारित होता है जैसे श्रीमान,महोदय, पूज्यनीय, श्री, महानुभाव आदि आदि ।
पद्म पुराण में वर्णित है : --
जन्मना ब्राम्हणों ज्ञेय: संस्कारैर्द्विज उच्यते ।
( ४३ । १३४- ३८ )
भावार्थ : -- ब्राम्हणों के बालक को जन्म से ब्राम्हण समझना चाहिए । संस्कारों से उसकी 'द्विज' अथवा 'द्विजाति' संज्ञा होती है तथा विद्या पढकर वह 'विप्र' नाम धारण करता है ।
अधभरमनिअ पुकार के मूलक मूल उपारि ।
कतहुँ त पसुचारि लिखिया कतहुँ लिखे बैपारि ॥ ३३६२ ॥
भावार्थ : - मूलगत को निर्मूल कर विभाजित भारत के सत्ताधारियों ने आर्य को एक जाति सिद्धकर उसे अर्धभ्रमणीय ( खानाबदोश, कुलहीन ) पशुचारी प्रवृत्ति की जाति कहा जो व्यापार करते थे ॥
मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त जो मनुष्य अपनी अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वस्तु का क्रय-विक्रय करते हों वह पशुचारी प्रवृत्ति के कैसे हो सकते है..... ?
अचलाधिक कर तलहटी विन्ध्याचल के पास ।
पूर्बापर सागर लगे द्विजप करेँ निवास ॥ ३३६३॥
भावार्थ : - विध्याचल से लेकर हिमालय के तटवर्ती क्षेत्र व् पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक का क्षेत्र आर्यो का निवास स्थल था शेष भूभाग बिहड़ वनों से आच्छादित था ॥
कतहुँ त परन कुटिरु बसैं, जगोपबित अभिजात ।
कतहुँ भील बन भाँवरे त कतहुँ कोल किरात ॥ ३३६३ ॥
भावार्थ : -- वैदिक काल का प्रारम्भिक परिदृश्य यह था कि कहीं पर्ण-कुटिया रचकर यज्ञ आदि कर्मकांड से पवित्र हुवा अभिजात्य वर्ग निवासरत था कहीं भ्रमणकारी भील तो कहीं कोल किरात जाति दृष्टिगोचर होती जिन्हें विभाजित भारत में उजड्ड, अशिष्ट, उद्दंड, अनपढ़, असभ्य व् आदिजाति के रूप में परिभाषित किया गया ॥
रिसि मुनि तपसि बस्यो बन लिख्यो बेद पुरान ।
पीठासीन ब्रम्हन जिन, बाँचत देइँ ग्यान ॥ ३३६४ ॥
भावार्थ : -- वैदिक काल ही वह काल था जिसमें वननिवासित ऋषि मुनि व् तपस्वियों ने वेदादि धर्म ग्रंथों की रचना की, व्यास पीठ पर विराज कर ब्राम्हण देव जिन ग्रन्थों का व्याख्यान कर जनमानस को ज्ञानवान करते हैं यह वही वेद-पुराण हैं ॥
स्पष्टीकरण : - इस लिए व्यास पीठ पर केवल ब्राम्हण के श्रीमुख से ही ज्ञान ग्रहण करें, स्वयं आलेखित ज्ञान को भी ब्राम्हण के श्रीमुख से ही सुनें, कारण की ब्राम्हण धर्मार्थ हेतु और अन्य स्वार्थ हेतु उपदेश करते हैं ॥
वक्ता किसे बनावें.....? जो विरक्त, वैष्णव, ब्राम्हण, विषय विषद् , भावितात्मनः , धीर व् अत्यंत नि:ष्पृह हो
भाजन सोंहि अगन बसे बसे श्रीस सब गेह ।
भूषन बसन बसाए पुनि रहँ अनगढ़ सब देह ॥ ३३६५ ॥
भावार्थ : -- ( अंग्रेजों के कालक्रम को ही यदि सटीक मानें तो ) धातुओं का परिष्करण हुवा वस्त्रों के संग आभूषणों के अधिवास से मानव देह शोभा से तो संपन्न हो गई । अग्नि का प्राकट्य हुवा ता संगत भाजनों के अधिवास से गृह स्वामी के संग सम्पदा भी गृह में निवास करने लगी, किन्तु मनुष्य के धातु का परिष्करण न होने के कारण मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त होकर भी वह मूर्ख व् असभ्य ही रहा ॥
करतब कर पुनि पाइये यह उपधारन धार ।
बनचरनी अपावन मन सोधन करे विचार ॥३३६६ ॥
भावार्थ : -- कर्म करो तत्पश्चात ही फल का सेवन करो सम्यक चिंतन के पश्चात् यह बुद्धि आई किन्तु ज्ञान नहीं आया । मनुष्य का पशुवत स्वभाव जब यथावत रहा तब उसने वनचारी अपवित्र मन को पवित्र करने का विचार किया ॥
पाहन परिसुधित भए जब धातु कुसल यह देस ।
भाजन में भोजन बसे तन भए भूषन भेस ॥ ३३६७ ॥
भावार्थ : -- पाषाण को परिष्कृत कर जब इस देश ने धातु का शोधन किया तभी विश्व को भाजन में भोजन करना आया । तदनंतर वस्त्राभूषण से वह परिचित हुवा ॥ इस प्रकार विश्व को पाषाण युग से आधुनिक युग में पहुंचाया ॥
मानस जब जग जनम लिए पाहन भए सब कोए ।
धाता धात न होइया जब लग देह न धोए ॥ ३३६८॥
भावार्थ : -- विश्व में जब मानव जाति का आविर्भाव हुवा तब वह पाषाण स्वरूप की थी । जिस प्रकार पाषाण के परिमार्जन से धातुएं प्राप्त हुईं उसी प्रकार मानव देह के परिमार्जन से वर्ण प्राप्त हुवे । इस परिमार्जन के पश्चात ही पालन पोषण करने वाले मातृत्व व् पितृत्व भाव प्राप्त हुवा जो पशु व् पाशविक प्रवृत्ति के मनुष्य में न्यूनतम पाया जाता है ।
परिमार्जन के कारण ही अन्य देशजों के अपेक्षाकृत भारतियों में वात्सल्य भाव अत्यधिक होता है.....
धात लहे अरु मल गहे जब लग बिलग न होए ।
पाहन पाहन हो रहे निज गुन कहे न कोए ॥ ३३६९॥
भावार्थ : - पाषाण जब तक मलिनता से पृथक नहीं होता तब तक वह अपना धात्विक गुण प्रकट नही करता और पाषाण का पाषाण ही रहता है ।
जब लग धात न धोइया तब लग रह पाषान ।
लोहिताए लोहू भया उदया नवल बिहान ॥ ३३७० ॥
भावार्थ : - जब तक मनुष्य का परिशोधन नहीं होता तब तक वह पाषाण ही है । जब वह परिमार्जित होकर लोहिताए, लौह, स्वर्ण, रजत आदि धातुओं में परिणित होकर ही वह नवयुग में प्रवेश करता है ।
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