यह धरति यह खग मण्डल गहे धातु कर माल ।
पठत जगत बिचार करे कछु बोधि प्रबोध ।
यन्त्र तंत्र संयत्र संग रचे रंत के जाल ॥ ३३७१ ॥
भावार्थ : - इस देश ने जब पाषाणों से धातुएं निष्कासित कीं तब यह विश्व रन्त -यन्त्र -तंत्र- संयत्र से युक्त होकर प्रगति पथ पर अग्रसर हुवा अत: ऐसे देश के आदर्श स्मरणातीत न हों ॥
पठत जगत बिचार करे कछु बोधि प्रबोध ।
यह तन मल मलनाईया, सोंधि ताहि कर सोध ॥ ३३७२ ॥
भावार्थ : -- कतिपय बुद्ध प्रबुद्धों की बुद्धि ने विश्व का सम्यक चिन्तन व् अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि मलिनता से युक्त यह देह भी पाषाण स्वरूप है इसे भी परिष्कृत होकर शुद्ध होना चाहिए ॥
बसे भवन तन भयउ जन सुधिगन करे विचार ।
बाहर के संसार एक भीतर के संसार ॥ ३३७३ ॥
भावार्थ : - प्रबुद्ध जनों की बुद्धि ने फिर यह विचार किया आवासों में अधिवासित यह मानव अब जन की संज्ञा को प्राप्त हो गया अब इसका एक बाह्यजगत व् दूसरा अंतर्जगत हैं ॥
भीतर संस्कारित किए बाहर कर्म अधार ।
भूषण बसन सँवार पुनि दोनौं दिए सिंगार ॥ ३३७४ ॥
भावार्थ : - भीतर के संसार को संस्कारों से व् बहार के संसार को विभिन्न प्रकार के कर्मों से संस्कारित किया ततपश्चात भूषा व् भाषा आदि को संयत कर दोनों संसार को व्यवस्थित किया और उसे लेखाबद्ध करते चले ॥
प्रथम अनूप ग्राम बसा जनपद भए जनजूह ।
बसे नगर भए नागरी, गहे सैन्य समूह ॥ ३३७५ ॥
भावार्थ : -- भवनों में अधिवासित मानव समूह प्रथमतस नदी तट के गांव से जनपद में परिवर्तित हुवा और जन कहलाने लगा ततपश्चात रक्षातंत्र से युक्त जनपद नगर में रूपांतरित हुवे और अब वह नागरिक बन गया ॥
स्पष्टीकरण : -- बुद्धि ने विचार किया अब इस नगर को संचालित करने हेतु एक प्रबन्ध तंत्र की आवश्यकता है ॥
रचत नगर रचिता कहे प्रथम बेद यह मंत्र ।
कतहुँ राजा राज रहे कतहुँ प्रजा के तंत्र ॥ ३३७६॥
भावार्थ : - नगर-निर्माण के पश्चात् वेद रचयिता ने प्रथम वेद में यह मन्त्र उद्घोषित किया कि वैदिक युग में राजतंत्रात्मक शासन के सह कतिपय जनपदों में प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली भी प्रचलित थी ॥
स्पष्टीकरण : -- नगर निर्माण के पश्चात् ही कोई शासन प्रणाली प्रचलित होती है इसका तात्पर्य यह है की उत्तर वैदिक काल से पूर्व ही नगर-निर्मित हो गए थे ॥
अन्वयागत रखिया रह गहे सबहि रन साज ।
कुलवंत कुल दीप सोइ चुनि भए राज धिराज ॥ ३३७७॥
भावार्थ : -- बाहिर के संसार में जो कुलीन कुल वंशानुगत जन समूह की रक्षा का कार्य करता आया हो, कुल धारक को राजतांत्रिक शासन व्यवस्था का राजा बनाया जाता । इस प्रकार वंशानुगत कर्म के आधार पर जातिगत वर्ग का आविर्भाव हुवा जिसे 'क्षत्रिय' कहा गया ।
मुखिया सहित पति पद रच रचया मंत्रि नरेस ।
जन संचालन जगत कर दिया तंत्र यह देस ॥ ३३७८ ॥
भावार्थ : -- इन ऐतहासिक तथ्यों से यह सिद्ध होता हैं कि ग्राम कूटक, नगराध्यक्ष, मंत्री, राजा आदि पदों की रचना कर इस देश ने ही विश्व को जन संचालन शासन प्रणाली का उपहार दिया ॥
सभा समिति सँजोग करे रचे सदन सद जोग ।
एक सदस रहें सीलबर , दूज सदस चुनि लोग ॥ ३३७९ ॥
भावार्थ : -- वैदिक काल की शासन व्यवस्था ने सभा व् समिति के सदस्यों को समेकित कर एक सदन रचा । सभा श्रेष्ठ व् सभ्रांत जनों की संस्था थी, समिति चुने हुवे सदस्यों की संस्था थी जो जन सामान्य का प्रतिनिधित्व करती ॥
राजन कहत पुकारिया जन जन केर प्रधान ।
जो ता सम्मति देइ सो सदप कहत ईसान ॥ ३३८०॥
भावार्थ : -- जन के शासक को राजन कहा जाता था । सभा व् समिति राजन की परामर्श दात्री संस्थाएं थी जिस अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था ॥
भावार्थ : -- कतिपय बुद्ध प्रबुद्धों की बुद्धि ने विश्व का सम्यक चिन्तन व् अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि मलिनता से युक्त यह देह भी पाषाण स्वरूप है इसे भी परिष्कृत होकर शुद्ध होना चाहिए ॥
बसे भवन तन भयउ जन सुधिगन करे विचार ।
बाहर के संसार एक भीतर के संसार ॥ ३३७३ ॥
भावार्थ : - प्रबुद्ध जनों की बुद्धि ने फिर यह विचार किया आवासों में अधिवासित यह मानव अब जन की संज्ञा को प्राप्त हो गया अब इसका एक बाह्यजगत व् दूसरा अंतर्जगत हैं ॥
भीतर संस्कारित किए बाहर कर्म अधार ।
भूषण बसन सँवार पुनि दोनौं दिए सिंगार ॥ ३३७४ ॥
भावार्थ : - भीतर के संसार को संस्कारों से व् बहार के संसार को विभिन्न प्रकार के कर्मों से संस्कारित किया ततपश्चात भूषा व् भाषा आदि को संयत कर दोनों संसार को व्यवस्थित किया और उसे लेखाबद्ध करते चले ॥
प्रथम अनूप ग्राम बसा जनपद भए जनजूह ।
बसे नगर भए नागरी, गहे सैन्य समूह ॥ ३३७५ ॥
भावार्थ : -- भवनों में अधिवासित मानव समूह प्रथमतस नदी तट के गांव से जनपद में परिवर्तित हुवा और जन कहलाने लगा ततपश्चात रक्षातंत्र से युक्त जनपद नगर में रूपांतरित हुवे और अब वह नागरिक बन गया ॥
स्पष्टीकरण : -- बुद्धि ने विचार किया अब इस नगर को संचालित करने हेतु एक प्रबन्ध तंत्र की आवश्यकता है ॥
रचत नगर रचिता कहे प्रथम बेद यह मंत्र ।
कतहुँ राजा राज रहे कतहुँ प्रजा के तंत्र ॥ ३३७६॥
भावार्थ : - नगर-निर्माण के पश्चात् वेद रचयिता ने प्रथम वेद में यह मन्त्र उद्घोषित किया कि वैदिक युग में राजतंत्रात्मक शासन के सह कतिपय जनपदों में प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली भी प्रचलित थी ॥
स्पष्टीकरण : -- नगर निर्माण के पश्चात् ही कोई शासन प्रणाली प्रचलित होती है इसका तात्पर्य यह है की उत्तर वैदिक काल से पूर्व ही नगर-निर्मित हो गए थे ॥
अन्वयागत रखिया रह गहे सबहि रन साज ।
कुलवंत कुल दीप सोइ चुनि भए राज धिराज ॥ ३३७७॥
भावार्थ : -- बाहिर के संसार में जो कुलीन कुल वंशानुगत जन समूह की रक्षा का कार्य करता आया हो, कुल धारक को राजतांत्रिक शासन व्यवस्था का राजा बनाया जाता । इस प्रकार वंशानुगत कर्म के आधार पर जातिगत वर्ग का आविर्भाव हुवा जिसे 'क्षत्रिय' कहा गया ।
मुखिया सहित पति पद रच रचया मंत्रि नरेस ।
जन संचालन जगत कर दिया तंत्र यह देस ॥ ३३७८ ॥
भावार्थ : -- इन ऐतहासिक तथ्यों से यह सिद्ध होता हैं कि ग्राम कूटक, नगराध्यक्ष, मंत्री, राजा आदि पदों की रचना कर इस देश ने ही विश्व को जन संचालन शासन प्रणाली का उपहार दिया ॥
सभा समिति सँजोग करे रचे सदन सद जोग ।
एक सदस रहें सीलबर , दूज सदस चुनि लोग ॥ ३३७९ ॥
भावार्थ : -- वैदिक काल की शासन व्यवस्था ने सभा व् समिति के सदस्यों को समेकित कर एक सदन रचा । सभा श्रेष्ठ व् सभ्रांत जनों की संस्था थी, समिति चुने हुवे सदस्यों की संस्था थी जो जन सामान्य का प्रतिनिधित्व करती ॥
राजन कहत पुकारिया जन जन केर प्रधान ।
जो ता सम्मति देइ सो सदप कहत ईसान ॥ ३३८०॥
भावार्थ : -- जन के शासक को राजन कहा जाता था । सभा व् समिति राजन की परामर्श दात्री संस्थाएं थी जिस अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था ॥
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