रविवार, 21 अगस्त 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३८ ॥ -----


कुल में कुलप गाँवाधिप, बिस में रह बिसितेस । 
जन के पत राजन कहत राजिहि देस नरेस ॥ ३३८१॥ 
भावार्थ : -- वैदिक काल में प्रशासनिक ईकाई कुल, ग्राम, विश ( बीस गांव के समूह को विश कहते  व् राष्ट्र में विभक्त थीं । कुल का प्रमुख कुलप, कुल के समूह ग्राम अथवा गाँव कहलाने लगा जिसका प्रमुख को  ग्रामाधिपति, बीस गाँव के अधिपति को ग्रामीण विंशतीश कहते । गाँव जब समृद्ध वसति में परिणित हुवा तब वह जनपद होकर नगर कहलाने लगा जिसके अध्यक्ष  को राजन कहते ।  कालांतर में यही राजन राष्ट्र अथवा देश का नरेश कहलाने लगा ॥

कुल कैसे बना ?
भीतरी संस्कार ने गांठे सील आचार । 
जाहि सों कुल कुलिक रचे उद्भव कृत कुल धार ॥ ३३८२॥  
भावार्थ : -- घर भीतर का संसार जब संस्कारित हुवा तब उसने मानव मात्र में चरित्र का निर्माण किया जिससे जिससे स्वजनो का उद्भव हुवा, तत्पश्चात कुल धारक के  द्वारा कुल की संरचना हुई अब मानव स्थायी रूप में निवास करने लगा ।

स्त्री पुरुष के सम्बन्धों में जितनी अधिक पवित्रता होती है स्वजन भी उतने ही अधिक होते हैं.....

कछु रीति नीति नेम कृत  कछु परम्परित परिपाटि । 
बंधू बाँध बँधाई के कसे गाँठ बँट साँटि ॥ ३३८३ ॥ 
भावार्थ : -- कतिपय रीतियों, नियम, नीतियों एवं प्रथाओं के  परम्परागत अवलम्बन से आत्मीय सम्बन्ध  प्रगाढ़ होते चले गए,  त्याहारों ने तो इन संबंधों को मधुरता से भर दिया ॥ 


तन संचालन हुँत उदर जोवत जौं जल नाज । 
धन सम्पद सँजोवत तस कछु जन बनि काज ॥ ३३८४ ॥ 
भावार्थ : -- शरीर -संचालन हेतु उदर जिस प्रकार अन्न-जल का संग्रह  करता हैं । उसी प्रकार जन संचालन हेतु  कतिपय जन समूह वाणिज्य कर्म में प्रवृत्त होकर जीवन हेतु आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करने लगा ॥ 

गेह गेह गौपाल के करष भूमि सब गेहि । 
राज काज हेतु बलि कह निज मन ते कर देहि ॥ ३३८५॥  
भावार्थ  : --  घरों में गौपालन व् भूमि पर कृषि कार्य कर वणिजी कुलप प्रजा पालन के निमित्त स्वेच्छा से जो राजस्व देता उसे 'बलि' कहा जाता ।

अपूरति पूरावन हुँत करियब यातायात । 
अन्वयागत एहि  गुन सों उद्भय बनिजन जात ॥ ३३८६ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त व्यक्ति द्वारा अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वस्तु का क्रय-विक्रय करना, उनका यातायात करना उसका कार्य था । इस प्रकार वंशानुगत इस कार्य विशेष को करते हुवे वैश्य व्युत्पन्न हुवे ॥ 

धर्मार्थ कर  दान के राजन राजस देह । 
श्रमि कू श्रमधन देइया पाल पोष निज गेह ॥ ३३८७ ॥ 
भावार्थ : -- धमार्थ हेतु हस्त में दान, प्रजा पालन के निमित राजस्व , श्रमिकों को उनका श्रम धन देकर स्वयं सहित सबका पालन पोषण करना वैश्य के वेद विहित कर्त्तव्य थे ॥ 

चारि बरन करि बेद कहि प्रथम बदन भगवान । 

दूजा भुजा तिजहर उरु चातुर चरन समान ॥ ३३८८ ॥ 
भावार्थ : -- वेदों की जन संचालन व्यवस्था ने सभ्य मानव को चार वर्ग में विभक्त किया । ईश्वर को मानव शरीर की उपमिति देकर प्रथम वर्ग का उपमान ईश्वर के श्री मुख से किया, दूसरे व् तीसरे वर्ग की तुलना भुजा व् उदर भाग से व् चतुर्थ वर्ग की तुलना ईश्वर के चरण से की ॥ 

उरु अन्न जल बाहु बल मानस ज्ञान अगार । 

ता संग सकल देहि के बिय पद बोहिनहार ॥ ३३९० ॥ 
भावार्थ : -- उदर भाग में अन्न- जल का बाहु में बल का मन -मानस में ज्ञान का संग्रह होता है । इस प्रकार द्वि चरण ऐसे संग्रहन से युक्त देह के भारवाहक होते हैं ॥ 





इस प्रकार नाम भीतर के संसार का व् उपनाम बाहिर के संसार का द्योतक बना ।



धार्मिक उपासना पद्धति के अनुशरण से धर्म संप्रदाय व् जीविका अथवा जीवनोपार्जक कार्य का वंशानुगत अनुशरण करने से जातियाँ व्युत्पन्न हुई ।





बुधवार, 10 अगस्त 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३७ ॥ -----

यह धरति यह खग मण्डल गहे धातु कर माल । 
यन्त्र तंत्र संयत्र संग रचे रंत के जाल ॥ ३३७१ ॥ 
भावार्थ : -  इस देश ने जब पाषाणों से धातुएं निष्कासित कीं  तब यह विश्व रन्त -यन्त्र -तंत्र- संयत्र से युक्त होकर प्रगति पथ पर अग्रसर हुवा  अत: ऐसे देश के आदर्श स्मरणातीत न हों ॥ 

पठत जगत बिचार करे कछु बोधि प्रबोध । 
यह तन मल मलनाईया,  सोंधि ताहि कर सोध ॥ ३३७२ ॥ 
भावार्थ : -- कतिपय बुद्ध प्रबुद्धों की बुद्धि ने  विश्व का सम्यक चिन्तन व् अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि मलिनता से युक्त यह देह भी पाषाण स्वरूप है इसे भी परिष्कृत होकर शुद्ध होना चाहिए ॥ 

बसे भवन तन भयउ जन सुधिगन  करे विचार । 
बाहर के संसार एक भीतर के संसार ॥ ३३७३ ॥ 
भावार्थ : - प्रबुद्ध जनों की बुद्धि ने फिर यह विचार किया  आवासों में अधिवासित यह मानव अब जन की संज्ञा को प्राप्त हो गया अब इसका एक बाह्यजगत व् दूसरा अंतर्जगत हैं ॥ 

भीतर संस्कारित किए बाहर कर्म अधार । 
भूषण बसन सँवार पुनि दोनौं दिए सिंगार ॥ ३३७४ ॥ 
भावार्थ : - भीतर के संसार को  संस्कारों से व् बहार के संसार को विभिन्न प्रकार के कर्मों से संस्कारित किया ततपश्चात भूषा व् भाषा आदि को संयत कर दोनों संसार को व्यवस्थित किया और  उसे लेखाबद्ध करते चले  ॥ 

प्रथम अनूप ग्राम बसा  जनपद भए जनजूह । 
बसे नगर भए नागरी, गहे सैन्य समूह ॥ ३३७५ ॥ 
भावार्थ : -- भवनों में अधिवासित मानव समूह  प्रथमतस नदी तट के गांव से जनपद में परिवर्तित हुवा और   जन कहलाने लगा  ततपश्चात रक्षातंत्र  से युक्त जनपद नगर में रूपांतरित हुवे और अब वह नागरिक बन गया ॥

स्पष्टीकरण : -- बुद्धि ने विचार किया अब इस नगर को संचालित करने हेतु एक प्रबन्ध तंत्र की आवश्यकता है ॥

रचत नगर रचिता कहे प्रथम बेद यह मंत्र । 
कतहुँ राजा राज रहे कतहुँ प्रजा के तंत्र ॥ ३३७६॥ 
भावार्थ : - नगर-निर्माण  के पश्चात् वेद रचयिता ने प्रथम वेद में यह मन्त्र उद्घोषित किया कि वैदिक युग में राजतंत्रात्मक शासन के सह कतिपय जनपदों में प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली भी प्रचलित थी ॥

स्पष्टीकरण : -- नगर निर्माण के पश्चात् ही कोई शासन प्रणाली प्रचलित होती है इसका तात्पर्य यह  है की उत्तर वैदिक काल से पूर्व  ही नगर-निर्मित हो गए थे ॥



अन्वयागत रखिया रह गहे सबहि रन साज । 
कुलवंत कुल दीप सोइ चुनि भए राज धिराज ॥ ३३७७॥ 
भावार्थ : --  बाहिर के संसार में जो कुलीन कुल वंशानुगत जन समूह की रक्षा का  कार्य करता आया हो, कुल धारक को राजतांत्रिक शासन व्यवस्था का राजा बनाया जाता । इस प्रकार वंशानुगत कर्म के आधार पर जातिगत वर्ग  का आविर्भाव हुवा जिसे 'क्षत्रिय' कहा गया ।

मुखिया सहित  पति पद रच रचया मंत्रि  नरेस । 
जन संचालन जगत कर दिया तंत्र यह देस ॥ ३३७८ ॥ 
भावार्थ : -- इन ऐतहासिक तथ्यों से यह सिद्ध होता हैं कि  ग्राम कूटक, नगराध्यक्ष, मंत्री, राजा आदि पदों की रचना कर इस देश ने ही विश्व को जन संचालन शासन प्रणाली का उपहार दिया ॥

सभा समिति सँजोग करे रचे सदन सद जोग । 
एक सदस रहें सीलबर , दूज सदस चुनि लोग ॥ ३३७९ ॥ 
भावार्थ : -- वैदिक काल की शासन व्यवस्था ने सभा व् समिति के सदस्यों को समेकित कर एक सदन रचा ।  सभा श्रेष्ठ व् सभ्रांत जनों की संस्था थी, समिति चुने हुवे सदस्यों की संस्था थी जो जन सामान्य का प्रतिनिधित्व करती ॥

राजन कहत पुकारिया जन जन केर प्रधान । 
जो ता सम्मति देइ सो सदप कहत ईसान ॥ ३३८०॥ 
भावार्थ : -- जन के शासक  को राजन कहा जाता था ।  सभा व् समिति राजन की  परामर्श दात्री संस्थाएं थी जिस अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था ॥

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३६ ॥ -----

असाहित परसासी कहँ, आर्य एक पर जाति । 
 बेद बचन पुकार कहे सज्जन सील सभ्रांति ॥ ३३६१ ॥ 
भावार्थ : --भेद नीति का आश्रय लेकर असाहित्यक शासकों ने 'आर्य' शब्द को  एक अन्य  देश  की द्विजाति कहकर अर्थार्पित किया । वेद मन्त्रों में यह शब्द एक संबोधन मात्र है, जो भद्र पुरुषों के हेतु उच्चारित होता है जैसे श्रीमान,महोदय, पूज्यनीय, श्री, महानुभाव आदि आदि ।

पद्म पुराण में वर्णित है : -- 
जन्मना ब्राम्हणों ज्ञेय: संस्कारैर्द्विज उच्यते । 
( ४३ । १३४- ३८ ) 
भावार्थ : -- ब्राम्हणों के बालक को जन्म से ब्राम्हण समझना चाहिए । संस्कारों से उसकी 'द्विज' अथवा 'द्विजाति' संज्ञा होती है तथा विद्या पढकर वह 'विप्र' नाम धारण करता है ।

अधभरमनिअ पुकार के मूलक मूल उपारि ।
कतहुँ त पसुचारि लिखिया कतहुँ लिखे बैपारि ॥ ३३६२ ॥
भावार्थ : - मूलगत को निर्मूल कर विभाजित भारत के सत्ताधारियों ने आर्य को एक जाति  सिद्धकर उसे अर्धभ्रमणीय ( खानाबदोश, कुलहीन  ) पशुचारी प्रवृत्ति की जाति कहा जो व्यापार करते थे ॥ 

मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त जो मनुष्य अपनी अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वस्तु का क्रय-विक्रय करते हों वह पशुचारी प्रवृत्ति के कैसे हो सकते है..... ?


अचलाधिक कर तलहटी विन्ध्याचल के पास । 
पूर्बापर सागर लगे द्विजप करेँ निवास ॥ ३३६३॥ 
भावार्थ : - विध्याचल से लेकर हिमालय के तटवर्ती क्षेत्र व् पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक का क्षेत्र आर्यो का निवास स्थल था शेष भूभाग बिहड़ वनों से आच्छादित था ॥

कतहुँ त परन कुटिरु बसैं, जगोपबित अभिजात । 
कतहुँ भील बन भाँवरे त कतहुँ कोल किरात ॥ ३३६३ ॥ 
भावार्थ : -- वैदिक काल का प्रारम्भिक परिदृश्य यह था कि कहीं पर्ण-कुटिया रचकर यज्ञ आदि कर्मकांड से पवित्र हुवा अभिजात्य वर्ग निवासरत था कहीं भ्रमणकारी भील तो कहीं कोल किरात जाति दृष्टिगोचर होती जिन्हें विभाजित भारत में उजड्ड, अशिष्ट, उद्दंड, अनपढ़, असभ्य व् आदिजाति के रूप में परिभाषित किया गया ॥ 

रिसि मुनि तपसि बस्यो बन लिख्यो बेद पुरान । 
पीठासीन ब्रम्हन जिन, बाँचत देइँ ग्यान ॥ ३३६४ ॥ 
भावार्थ : -- वैदिक काल ही वह काल था जिसमें वननिवासित ऋषि मुनि व् तपस्वियों ने वेदादि धर्म ग्रंथों की रचना की, व्यास पीठ पर विराज कर ब्राम्हण देव जिन ग्रन्थों का व्याख्यान कर जनमानस को ज्ञानवान करते हैं यह वही वेद-पुराण हैं ॥ 

स्पष्टीकरण : - इस लिए व्यास पीठ पर  केवल  ब्राम्हण के श्रीमुख से ही ज्ञान ग्रहण करें, स्वयं आलेखित ज्ञान को भी ब्राम्हण के श्रीमुख से ही सुनें, कारण की ब्राम्हण धर्मार्थ हेतु और अन्य स्वार्थ हेतु उपदेश करते हैं ॥ 

वक्ता किसे बनावें.....? जो विरक्त, वैष्णव, ब्राम्हण, विषय विषद् , भावितात्मनः , धीर व् अत्यंत नि:ष्पृह हो 

भाजन सोंहि अगन बसे बसे श्रीस सब गेह । 
भूषन बसन बसाए पुनि रहँ अनगढ़ सब देह ॥ ३३६५ ॥ 
भावार्थ : -- ( अंग्रेजों के कालक्रम को ही यदि सटीक मानें तो ) धातुओं का परिष्करण हुवा वस्त्रों के संग आभूषणों के अधिवास से मानव देह शोभा से तो संपन्न हो गई । अग्नि का प्राकट्य हुवा ता संगत भाजनों के अधिवास से गृह स्वामी के संग सम्पदा भी गृह में निवास करने लगी, किन्तु मनुष्य के धातु का परिष्करण न होने के कारण मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त होकर भी वह मूर्ख व् असभ्य ही रहा ॥


करतब कर पुनि पाइये यह उपधारन धार । 
बनचरनी अपावन मन सोधन करे विचार ॥३३६६ ॥ 
भावार्थ : -- कर्म करो तत्पश्चात ही फल का सेवन करो  सम्यक चिंतन के पश्चात् यह बुद्धि आई किन्तु ज्ञान नहीं आया । मनुष्य का पशुवत स्वभाव जब यथावत रहा तब उसने वनचारी अपवित्र मन को पवित्र करने का विचार किया ॥ 

पाहन परिसुधित भए जब धातु कुसल यह देस । 
भाजन में भोजन बसे तन भए भूषन भेस ॥ ३३६७ ॥ 
भावार्थ : -- पाषाण को परिष्कृत कर जब इस देश ने धातु का शोधन किया तभी विश्व  को भाजन में भोजन करना आया । तदनंतर वस्त्राभूषण से वह परिचित हुवा ॥ इस प्रकार विश्व को पाषाण युग से आधुनिक युग में पहुंचाया ॥ 

मानस जब जग जनम लिए पाहन भए सब कोए । 
धाता धात न होइया जब लग देह न धोए ॥ ३३६८॥ 
भावार्थ : -- विश्व में जब मानव जाति का आविर्भाव  हुवा तब वह पाषाण स्वरूप की थी । जिस प्रकार पाषाण के परिमार्जन से धातुएं प्राप्त हुईं उसी प्रकार मानव देह के परिमार्जन से वर्ण प्राप्त हुवे । इस परिमार्जन के पश्चात ही पालन पोषण करने वाले मातृत्व व् पितृत्व भाव प्राप्त हुवा  जो पशु व् पाशविक प्रवृत्ति के मनुष्य में न्यूनतम पाया जाता है  । 

 परिमार्जन के कारण ही अन्य देशजों के अपेक्षाकृत  भारतियों में वात्सल्य भाव अत्यधिक होता है.....

धात लहे अरु मल गहे जब लग बिलग न होए । 
पाहन पाहन हो रहे निज गुन कहे न कोए ॥ ३३६९॥ 
भावार्थ : - पाषाण जब तक मलिनता से पृथक नहीं होता तब तक वह अपना धात्विक गुण प्रकट नही करता और पाषाण का पाषाण ही रहता है । 

जब लग धात न धोइया तब लग रह पाषान । 
लोहिताए लोहू भया उदया नवल बिहान ॥ ३३७० ॥ 
भावार्थ : - जब तक मनुष्य का परिशोधन नहीं होता तब तक वह पाषाण ही है । जब वह परिमार्जित होकर लोहिताए, लौह,  स्वर्ण,  रजत आदि धातुओं में परिणित होकर ही वह नवयुग में प्रवेश करता है । 

----- मिनिस्टर राजू १८४ -----

पता है राजू अब ये अंग्रेज के बच्चे भी आर्यों के आगमन की फैली भ्रांतियों जैसी भ्रांतियां फैलाकर दुनिया भर में क्या कहते फिरते हैं..... ?

राजू : -- क्या कहते फिरते हैं मास्टर जी.....?

" हम भारत से आए थे"

राजू : -- हाँ मास्टर जी ! अब हम लोंग को भी श्रीमान, श्रीमान नहीं बोलना चाहिए । अन्यथा ये कल को कह देंगे ये तो अंदमान निकोबार से आए थे और कारोबार करते थे.....




----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...