शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३५ ॥ -----

चतुरारध सहस बरस तीनि अरध परजंत । 
धरनिहि भीत समाए भए सुघरपना कर अंत ॥ ३३५१ ॥  
भावार्थ : --  इस सभ्यता का अस्तित्व लगभग साढे चार सहस्त्राब्दी  पूर्व से  साढ़े तीन सहस्त्राब्दी पूर्व तक रहा । ततपश्चात भूमि में समाहित होकर इसका अंत हो गया ॥ 

किछु कलिसाई लेखिआ भारत के इतिहास । 
सुकरात तिन्ह बिभाजित देस केर परसासि ॥३३५२-क॥ 
 केहि भूतिक आपद सों सुथर नगर बिन्यास | 
सुघरपना भुइँ भीत गए भए सब सत्यानास ॥३३५२-ख॥ 
  
भावार्थ : -- भारत का यह इतिहास कतिपय अंग्रेज ईसाइयों द्वारा लिखित व् विभाजित भारत के सत्ताधारियों द्वारा अनुमोदित है । जिनके अनुसार सिंधु घाटी की यह सुव्यवस्थित नागरीय सभ्यता वेदों की रचना से पूर्व की है जो किसी प्राकृतिक आपदा के कारण भूमि में समाहित हो गई और इसका विनाश हो गया ॥ 

कोउ पड़े अकाल कहँएँ कोउ बाढ़ भूचाल । 
भवन हो जन जीवन हो कवलित किए सब काल ॥ ३३५३ ॥ 
भावार्थ : -- सिंधु सभ्यता का पतन /विनाश का कारण किसी ने अकाल तो किसी ने बाढ़ किसी ने भूचाल कहा । सम्भवत: भूचाल के कारण इसका अंत हुवा । भवन हो चाहे जनजीवन सभी भूमि के गर्त में समा गए ऐसा भारत के इतिहास में वर्णित है ॥ 

प्रश्न यह है कि कुछ भी नहीं बचा क्या....?

सिंधु नगर बसइ भए कस कैसेउ भए बिहान । 
 प्रवान पूर पुरा थरी  भरम भरे अनुमान  ॥ ३३५४ ॥ 
भावार्थ : - सिंधु की नगरीय सभ्यता प्रारम्भ कैसे हुई फिर इसका व् अंत कैसे हुवा  । पुरा स्थली यद्यपि स्वयं में प्रमाण है  तद्यपि  इसके कारण भ्रमकारी अनुमानों पर आधारित हैं ॥ 

जीवन जोग जुगाए के जोइ गहे गह्बार । 
अपूरति भर जो पूरिया ताहि कहत बैपार ॥ ३३५५ ॥ 
भावार्थ : - मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त व्यक्ति द्वारा  अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वस्तु का क्रय-विक्रय व्यापार कहलाता है ।  

जीवन जोग जुगाए के जोइ गहे गह्बार । 
अपूरति पूरावन हुँत सोइ करे बैपार ॥ ३३५६॥ 
भावार्थ : -- मनुष्योचित जीवन हेतु से सम्पन्न व्यक्ति ही अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए व्यापार करता है । 

भए ऐतक सुग्घड़ कहा आन देस के बासि | 
ता सोंहि ब्यबहार किएँ सैंधौ नगर निबासि || ३३५७ || 
क्या अन्य देशों के मनुष्य भी तब इतने ही सभ्य व् सम्पन्न हो गए थे जिनके सिंधु निवासी से व्यापारिक संबंध थे ?  

चार पदारथ जोग जो  करत भूरि उपजोग । 
रहब बहुरि सो धरमवत सुघर कहत सब लोग ॥ ३३५७ ॥  
भावार्थ : -- जो मनुष्य धर्मवत होते हुवे जीवन हेतु आवश्यक संसाधनों का न्यूनतम संधारण कर  उसका अधिकाधिक उपयोग करता हो लोग उसे ही सभ्य कहते है ॥ 

आँग्ल कर अवधारना नागर नगर निवासि । 
गाँव गवईं गँवारू सब अनगढ़ सब बनबासि ॥ ३३५८॥ 
भावार्थ : -- अंग्रेज ईसाईयों की यह अवधारणा है कि मनुष्य जब नगर का निवासी हो तभी वह सभ्य कहलाता है । ग्रामीण व् वनवासी असभ्य होते हैं । 

नगरु भवन कृत काँकरी जिमि घन बन तरु माल । 
बसबासहि नागरी कि जहँ तहँ बसइँ ब्याल ॥ ३३५९ ॥ 
भावार्थ : -- लोग तो कहते हैं कि  नगरों में कंकरों से निर्मित भवन हैं वह  घने बन के वृक्ष समूह जैसे हैं । इनमें निवासित ये सभ्य नागरिक यहाँ वहाँ विचरण करते दुष्ट निष्ठुर हिंसक जंतु हैं जो दंड से विहीन है  फिर केवल नगर में निवासित नागरिक सभेय कैसे हुवा..... ? 


आए बहुरि सो काल जब रचे बेद बिद बेद । 
भगित देस के सासि बर भेद नीति करि भेद ॥ ३३६० ॥ 
भावार्थ : -- तदनन्तर उस काल का आगमन हुवा जब वेदों की रचना हुई । भारत और भारतीयों में विभेद कर विभाजित देश के शासकों  ने अंग्रेजों वाली भेद नीति का प्रयोग किया ॥ 

















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