शनिवार, 23 जुलाई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३४ ॥ -----


प्राग समउ सुघड़पन जबु कतहुँ न देइँ दिखाए । 
भारत मैं ता सोंहि तब  एकु संस्कृति जनाए ॥ ३३३९ ॥ 
भावार्थ : -- प्राचीन -काल में सभ्यता जब दर्शनातीत थी तब सभ्य व् शिष्ट भारत खण्ड में एक सुसंस्कृति का प्रादुर्भाव हुवा जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है.....

बरन समूह सों संपन्न  सुर सम्पद कर जोग । 
सरित रूप प्रगसित भई देउ गिरा कहँ लोग ॥ ३३४० ॥ 
भावार्थ : - इस संस्कृति के संग वर्ण समूह से संपन्न हस्त कमल में स्वरों की सम्पदा संकलित किए सूत्र रूप में एक समृद्ध भाषा देव गिरा प्रकट हुई, जो प्राचीनतम् भाषा के पद पर प्रतिष्ठित होकर सस्कृत नाम से प्रसिद्ध है ॥ 

जूह समूह समोए के पुरबल रहँ बन बासि । 
 बसे नगर भए नागरी मानस रहैं सुपासि ॥ ३३४१ ॥ 
भावार्थ : -- छोटे छोटे झुंड व् समूह में समेकित जो मनुष्य वनों में अधिवासित था अब वह कर्मशील होकर समष्टि में रूपान्तरित हो गया और एक समृद्ध व् वसति में सुखपूर्वक निवास करने लगा ॥ 

बसन संग भूषन बसे भई श्रील सब देह ।
अगन संग भाजन बसे बसे श्रीस सब गेह ॥ ३३४२ ॥ 


भावार्थ : -- धातुओं का परिष्करण हुवा वस्त्रों के संग आभूषणों के अधिवास से मानव देह शोभा से संपन्न हो गई । अग्नि का प्राकट्य हुवा ता संगत भाजनों के अधिवास से गृह स्वामी के संग सम्पदा भी गृह में निवास करने लगी ॥

सिंधु सरिता सींउ लिखी मध्य भाग सुर  गंग । 
चली परसति बीर भूमि हिलगिहि सागर संग ॥ ३३४३ ॥ 


भावार्थ : -- सीमाएं सिंधु नदी से उल्लखित हुईं मध्य भाग देवनदी गंगा जी से उल्लखित हुवा । जो वीर- भूमि (वंगाल का प्राचीन नाम ) को स्पर्श करती सागर में समाहित होती है ॥

तरंगिनी के तीर बसा बसति बसति बसबास । 
करष भुइँ भंडार भरे जौ कन कनक कपास ॥ ३३४४ ॥ 

भावार्थ : -- इन तरंगिनियों के तटवर्ती क्षेत्रों में वह नगर और निवास का विस्तार करता गया ॥  भूमि कर्षकर वह गेहुँ जौ कपास उपजाने लगा इस प्रकार कृषि का आविष्कार हुवा ॥ 

मानस गेह जुगाइया करि करि जबु श्रम कर्म । 
धी  गुन धरे प्रगस भया धीर रूप में धर्म ॥ ३३४५॥ 
भावार्थ : -- नगर और निवास में निवासित मानव अब पशुता का त्याग कर  जीवन यापन के लिए श्रम और कर्म करने लगा । कर्म के साथ बुद्धि के आठ गुणों को धारण किए संतोष स्वरूप में धर्म का प्राकट्य हुवा ॥ पहले बुद्धि आई फिर ज्ञान आया क्या कहूं क्या न कहूँ, क्या करूँ क्या न करूँ, क्या खाऊँ क्या न खाऊँ की बुद्धि आई । ज्ञान यह कि ये पेड़ कहाँ से आए ये नदियाँ कहाँ से आई ।

जीवन जोग जुगाउते उदयित भया ग्यान  ।
दीठ निपात दसहुँ दिसा दरसा देय ध्यान ॥ ३३४६॥ 
भावार्थ : -- मनुष्योचित हेतु अर्थात भोजन वासन वसन के संकलन करते ही मनुष्य में ज्ञान का अभ्युदय हुवा जब उसने दृष्टिआक्षेप कर दिशाओं का ध्यान पूर्वक अवलोकन किया ॥ 

चेतस मनस बिचारिआ सर्जन सक्ति सँजोए । 
जीवाजीउ जनाए सो जगजीवन हैं कोए ॥ ३३४७ ॥ 
भावार्थ : - अब चैतन्य चित्त विचार करने लगा सृजन शक्तियों को संगृहीत किए कोई ईश्वर है जो इस चराचर का जनक है ॥ 

जटा जूट धर शिवंकर संकर विराजमान । 
जोगेस्वर सरूप में दरस दियो भगवान ॥ ३३४८ ॥ 
भावार्थ : -- और जटाजूटधर मंगलकर योगवेश्वर रूप धारी विराजवान शंकर जी में उसे परम पिता परमेश्वर दृष्टिगत हुवे ॥ 

ससि खेत सोंहि जल भुअन हबिगह अगन सँजोए । 
धर्म नीठ सब होइ के पूजिहि पसु तरु तोए ॥ ३३४९ ॥ 
भावार्थ : - अन्न, जल व् अग्नि संग्रहण हेतु कुंड का निर्माण किया । पशु,वृक्ष व् जल की वंदना धार्मिक आस्था की परिचायक थी ॥ 

स्पष्टीकरण : -- प्राग समय में अग्नि प्रज्वलित रखना अत्यधिक कठिन कार्य था । अत: इसके संकलन हेतु कुंड की रचना की गई कालांतर में सम्भवतःयही कुंड हवन कुंड में रूपांतरित हो गए ॥ 

स्वस्तिका चीन्ह बरे धरनिहि देई मान । 
नगराधिप रखिया करे रहहीं कर्म प्रधान ॥ ३३५० ॥  
भावार्थ : - स्वास्तिक चीन्ह का वरण कर भूमि को देवी की मान्यता दी गई । नगर का प्रबंधन कर्म प्रधान होकर नगरवासी के व् रक्षण नगराधीश के अधीन होता ॥ 

 अवरज हो कि बनिजन हो ब्राम्हन हो कि भूप । 
पुरबल समउ सरोबर तट  कृतएं सौच कृत् कूप ॥ 
भावार्थ : - ब्राम्हण हो क्षत्रिय हों वैश्य हों चाहे क्षुद्र ही क्यों न हों चाहे फिर भगवान ही क्यों न हों प्राचीन काल में 
सभी लोग प्रात-क्रिया सरोवर अथवा नदी के तट पर संपन्न करते थे । छोटे छोटे गड्डे बनाए जाते जिन्हें शौच- कूप कहा जाता फिर उसमें मल -मूत्र त्याग कर उसकी उत्तम गति के लिए उसे तत्काल ही मिटटी से पाट दिया जाता । 

राजू : -- मल कब ढोया गया ? जब शुष्क शौच कूप बने ?ये किसने बनाए ? किसके राज में इनका सर्वाधिक उपयोग हुवा.....ये तो अपने शौच के विज्ञापनों में अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाला भारत शासन ही बता सकता है .....  


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