सुबारथ अरु परमारथ, अरथ गहे दुइ सार ।
एक ते जग साकार है, दूजे तेउ बिकार ॥ ३३२१ ॥
भावार्थ : --अर्थ की दो गति हैं स्वार्थ एवं परमार्थ । उपयोग करने पर अर्थ के दो विपरीत परिणाम प्राप्त होते हैं । परमार्थ के परिणाम स्वरूप संसार साकार हो जाता है जिससे ईश्वर सगुण रूप में प्रकट होते हैं । स्वार्थ के परिणाम स्वरूप संसार में विकृति आ जाती है जिससे ईश्वर निर्गुण रूप में प्राप्त होते हैं ॥
जहां अर्थ परमार्थ हेतु है वहां ईश्वर प्रकट होते हैं
जो अरथ परमारथ मद करे जगत के काज ।
निसदिन श्रीधर होइया तासों देस समाज ॥ ३३२२ ॥
भावार्थ : -- अर्थ जब परमार्थ के मद में व्यय होकर संसार के कल्याण परक कार्यों में संलग्न रहता है तब उससे देश समाज सहित संसार शोभा संपन्न होकर नित्य ही रूपवंत होता जाता है ॥
स्वारथ परत अर्थ कर जोवन भरे विकार ।
सुरति रहे बस आपनी भूर परे संसार ॥ ३३२३ ॥
भावार्थ : -- स्वार्थ परायण अर्थ पति का अर्थ संग्रह स्वहित हेतु होता है जो विकृति को उत्पन्न करता है । संसार को विस्मृत कर इसे स्वयं का ही स्मरण रहता है ॥
भोजन बासन बासना यहु जीवन के हेत ।
अजहुँ सरलतम रूप में लहि जन साधन सेत ॥ ३३२४॥
भावार्थ : -- भोजन वस्त्र और वास यह जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं । मुद्रा रूपी साधन से इसे प्राप्त करना मानव-जाति के लिए सरल हो गया ॥ पशु-पक्षियों को जिसके लिए संघर्ष करना पड़ता है ॥
त्याग केरा छालना जिउ धन छनता जात ।
बुरा बुर तीरे रहे भला भला छनि आत ॥ ३३२५ ॥
भावार्थ : -- पशु पक्षियों के जीवन-संघर्ष को यत् किंचित करने के लिएजीवन के पथ पर हम त्याग की छलनी लेते चलें । इस छलनी के प्रयोग से बुरा धन किनारे रह जाता है छन छन कर भला धन ही आता है ॥
भला जोगवन जोइयो भल ते होत भलाए ।
बुरा जुगते बुरा होत आपन हो कि पराए ॥ ३३२६ ॥
भावार्थ : -- धन दो प्रकार का होता है भला और बुरा । भला धन भला ही करेगा, बुरा बुरा ही करेगा अपना भी और दूसरों का भी, इसलिए भले धन का ही उपार्जन करें ॥
अम्बर डम्बर देख के कहत सुखी सब ताहि ।
सुख मिले संतोख ते धन सम्पद ते नाहि ॥ ३३२७॥
भावार्थ : -- भले धन की अधिकता भी असंतोष को व्युत्पन्न करती है । जीवन के आवश्यक हेतु को न्यूनतम कर यत किंचित धन से ही संतुष्ट रहना चाहिए कारण कि संतोष में ही सुख निहित है । आडम्बरियों के आडम्बर का दर्शन कर सब उसे सुखी कहते अवश्य हैं पर वे सुखी रहते नहीं है ॥
संतोषस्त्रिसु कर्तव्य:स्वदारे भोजने धने ।
त्रिषु चैव न कर्तव्य: स्वाध्याये जपदानयो ॥
भावार्थ : -- स्त्री संतति स्वजन भोजन धन में संतोष करना उत्तम है । स्वाध्याय, पूजन-वंदन जप-कीर्तन व् दान-धर्म में कभी संतोष नहीं करना चाहिए ॥
मानस करम उद्यम रबि जीवन जोग समूंद ।
गहे सो घन गेह गगन, बरखे बरखा बूँद ॥ ३३२८ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य कर्म श्रम उद्यम से धनार्जन करता है । यदि जीवन का आधरभूत धन समुद्र के समान है तब श्रम उद्यम तपस चरणी सूर्य के समान हो वाडवाग्नि के समान नहीं । सूर्य समुद्र से केवल मोतियों को चुनता है वाडवानल भक्ष्याभक्ष्य कर पूरे समुद्र को ही अवशोषित कर लेता है । उपार्जित धन जब घन बने और घर गगन बने तब वह घमंड न कर बून्द बने और वर्षा बनकर दान-धर्म करे उसका संग्रह न करे ।
स्थितिरुच्चै: पयोदानां पयोधीनामध: स्थिति: ।
भावार्थ : -- निरंतर वर्षा का दान करने से बादलों की स्थिति ऊपर होती है जल का संग्रह कर केवल गर्जना करने से स्थिति नीचे हो जाती है ॥
दुराचरन का राजना भरिया भरम अंदेस ।
भलमन साईं बिसराएँ खल न कायँ कलेस ॥ ३३२९ ॥
भावार्थ : -- जब निंदित आचरणों कुत्सित कर्म का राज होता है तब संसार भ्रम, संदेह से व्याप्त हो जाता है जो ज्ञान को आच्छादित कर उसे अज्ञानतस कर देता है ॥ तब सज्जनता प्रशमित और दुर्जनता लब्ध -प्रतिष्ठित होती जाती है ॥
सदगुन सुखकर सम्पदा, दुर्गुन दुःख की खान ।
जाहि बिबस जग होइया ताहि अधिकतम जान ॥ ३३३० ॥
भावार्थ : -- सुख व् दुःख गुणों के कारण भूत हैं । सद्गुण सुख की सम्पदा है, दुर्गुण दुखों के भंडार होते हैं । संसार यदि सद्गुणों के वशीभूत है तब सुख की अधिकता होगी, यदि वह दुर्गुण के अधीन हो तब दुःख अधिक होगा ॥
जहां अर्थ परमार्थ हेतु है वहां ईश्वर प्रकट होते हैं
जो अरथ परमारथ मद करे जगत के काज ।
निसदिन श्रीधर होइया तासों देस समाज ॥ ३३२२ ॥
भावार्थ : -- अर्थ जब परमार्थ के मद में व्यय होकर संसार के कल्याण परक कार्यों में संलग्न रहता है तब उससे देश समाज सहित संसार शोभा संपन्न होकर नित्य ही रूपवंत होता जाता है ॥
स्वारथ परत अर्थ कर जोवन भरे विकार ।
सुरति रहे बस आपनी भूर परे संसार ॥ ३३२३ ॥
भावार्थ : -- स्वार्थ परायण अर्थ पति का अर्थ संग्रह स्वहित हेतु होता है जो विकृति को उत्पन्न करता है । संसार को विस्मृत कर इसे स्वयं का ही स्मरण रहता है ॥
भोजन बासन बासना यहु जीवन के हेत ।
अजहुँ सरलतम रूप में लहि जन साधन सेत ॥ ३३२४॥
भावार्थ : -- भोजन वस्त्र और वास यह जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं । मुद्रा रूपी साधन से इसे प्राप्त करना मानव-जाति के लिए सरल हो गया ॥ पशु-पक्षियों को जिसके लिए संघर्ष करना पड़ता है ॥
त्याग केरा छालना जिउ धन छनता जात ।
बुरा बुर तीरे रहे भला भला छनि आत ॥ ३३२५ ॥
भावार्थ : -- पशु पक्षियों के जीवन-संघर्ष को यत् किंचित करने के लिएजीवन के पथ पर हम त्याग की छलनी लेते चलें । इस छलनी के प्रयोग से बुरा धन किनारे रह जाता है छन छन कर भला धन ही आता है ॥
भला जोगवन जोइयो भल ते होत भलाए ।
बुरा जुगते बुरा होत आपन हो कि पराए ॥ ३३२६ ॥
भावार्थ : -- धन दो प्रकार का होता है भला और बुरा । भला धन भला ही करेगा, बुरा बुरा ही करेगा अपना भी और दूसरों का भी, इसलिए भले धन का ही उपार्जन करें ॥
अम्बर डम्बर देख के कहत सुखी सब ताहि ।
सुख मिले संतोख ते धन सम्पद ते नाहि ॥ ३३२७॥
भावार्थ : -- भले धन की अधिकता भी असंतोष को व्युत्पन्न करती है । जीवन के आवश्यक हेतु को न्यूनतम कर यत किंचित धन से ही संतुष्ट रहना चाहिए कारण कि संतोष में ही सुख निहित है । आडम्बरियों के आडम्बर का दर्शन कर सब उसे सुखी कहते अवश्य हैं पर वे सुखी रहते नहीं है ॥
संतोषस्त्रिसु कर्तव्य:स्वदारे भोजने धने ।
त्रिषु चैव न कर्तव्य: स्वाध्याये जपदानयो ॥
भावार्थ : -- स्त्री संतति स्वजन भोजन धन में संतोष करना उत्तम है । स्वाध्याय, पूजन-वंदन जप-कीर्तन व् दान-धर्म में कभी संतोष नहीं करना चाहिए ॥
मानस करम उद्यम रबि जीवन जोग समूंद ।
गहे सो घन गेह गगन, बरखे बरखा बूँद ॥ ३३२८ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य कर्म श्रम उद्यम से धनार्जन करता है । यदि जीवन का आधरभूत धन समुद्र के समान है तब श्रम उद्यम तपस चरणी सूर्य के समान हो वाडवाग्नि के समान नहीं । सूर्य समुद्र से केवल मोतियों को चुनता है वाडवानल भक्ष्याभक्ष्य कर पूरे समुद्र को ही अवशोषित कर लेता है । उपार्जित धन जब घन बने और घर गगन बने तब वह घमंड न कर बून्द बने और वर्षा बनकर दान-धर्म करे उसका संग्रह न करे ।
स्थितिरुच्चै: पयोदानां पयोधीनामध: स्थिति: ।
भावार्थ : -- निरंतर वर्षा का दान करने से बादलों की स्थिति ऊपर होती है जल का संग्रह कर केवल गर्जना करने से स्थिति नीचे हो जाती है ॥
दुराचरन का राजना भरिया भरम अंदेस ।
भलमन साईं बिसराएँ खल न कायँ कलेस ॥ ३३२९ ॥
भावार्थ : -- जब निंदित आचरणों कुत्सित कर्म का राज होता है तब संसार भ्रम, संदेह से व्याप्त हो जाता है जो ज्ञान को आच्छादित कर उसे अज्ञानतस कर देता है ॥ तब सज्जनता प्रशमित और दुर्जनता लब्ध -प्रतिष्ठित होती जाती है ॥
सदगुन सुखकर सम्पदा, दुर्गुन दुःख की खान ।
जाहि बिबस जग होइया ताहि अधिकतम जान ॥ ३३३० ॥
भावार्थ : -- सुख व् दुःख गुणों के कारण भूत हैं । सद्गुण सुख की सम्पदा है, दुर्गुण दुखों के भंडार होते हैं । संसार यदि सद्गुणों के वशीभूत है तब सुख की अधिकता होगी, यदि वह दुर्गुण के अधीन हो तब दुःख अधिक होगा ॥
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