विद्याधर मग चालिया मिली मझारी लूट ।
लूटन माहि गहि मनिआ गई हाथ से छूट ॥ ३३११ ॥
भावार्थ : -- विद्या ( ज्ञान ) सन्मार्ग को निर्दिष्ट करती है , विद्या के चरम बिंदु की प्राप्ति से ईश्वर की प्राप्ति होती है । विद्या धारण कर फिर जब कोई इस मार्ग में चल निकलता है तब बीच-बीच में उसे लूट मिलती है फिर यदि वह लूटने में संलिप्त हो जाए तब उसकी विद्या कहीं पीछे छूट जाती है ।
हनुमन अति लघु रूप धरि प्रबसिहि पड़ौसि देस ।
जहँ बड़ न जाए सके तहँ लघुबर करिहि प्रबेस ॥ ३३१२ ॥
भावार्थ : -- महावीर हनुमान मषक रूप धारण कर पड़ोसी देश में प्रविष्ट हुवे । जहाँ बड़ों-बड़ों की प्रविष्टि नहीं हो पाती वहां छोटों का प्रवेश हो जाता है ॥
सम्पद काल में भूषना विपदा काल सहाए ।
बिरधा काल धरी ढकी बिदुता केर सुभाए ॥ ३३१३ ॥
------ ॥ अरस्तु ॥ -----
भावार्थ : -- सम्पद काल में यह आभूषण स्वरूप है विपदा काल में सहायक है वृद्धावस्था में यह संचित सम्पत्ति है विद्वता की ऐसी प्रकृति है ॥
संजम सम को सैन नहि विद्या सम नहि नैन ।
रहियो पहरे आपने नैन धरे दिन रैन ॥ ३३१४ ॥
भावार्थ : -- संयम जैसी कोई सेना नहीं विद्या जैसी कोई दृष्टि नहीं । ऐसी दृष्टि के निरीक्षण में ऐसी सेना के द्वारा हम अपनी रक्षा स्वयं कर सकते हैं ॥
करे करम के साथ है मानस केरा मोल ।
कर नहि पार गिराइया ताही पाषन बोल ॥ ३३१५॥
भावार्थ : -- स्वर्ण का मूल्य उसकी शुद्धता पर आधारित होता है मनुष्य का मूल्य उसके सत्कर्म पर आधारित होता है । किंचित सतकर्म मनुष्य को सहँगा बनाते है कुकर्म से वह साधारण पत्थर के जैसे मूल्यहीन हो जाता है ॥
ज्ञान से मनुष्य सत्कर्म में प्रवृत्त होता है विद्या विद्वान् से, शिक्षा शिक्षक से प्राप्त होती है ज्ञान गुरु से प्राप्त होता है
येन खट्वां समारूढ: परितप्येत कर्मणा ।
आदावेव न तत् कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥
----- ॥ विदुर नीति ॥ -----
भावार्थ : -- जगत का प्रपंच क्षणभंगुर है तो उसके सम्मुख इस जीवन का क्या ठिकाना।अत: वे कार्य पहले कर लेने चाहिए जिन्हें न करने पर बाद में खटिया में पड़कर पश्चाताप करना पड़े ॥
कपटी ढोंगी पाखनी महात्मन भर भेष ।
सीख मिले घर आपना तापर गयउ बिदेस ॥ ३३१६ ॥
भावार्थ : - हमारे देश के महात्मा कोई संत-महात्मा नहीं थे सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हें महात्मा बनाया गया था देश में शिक्षा उपलब्ध थी तथापि उसे विदेशों में ग्रहण की गई , महात्मा लोग ऐसा करते हैं क्या ? उद्योग पतियों के हॉउस में रहे महात्मा लोग ऐसे रहते हैं क्या ? ॥
राजू : -- हाँ तो क्या यहां योग्य शिक्षक नहीं थे या नहीं हैं , विदेशों में उपचार कराते हैं क्या यहां योग्य चिकित्सक नहीं थे या नहीं हैं ।
देस होलि जलाए कहा स्वदेसी अपनाएँ ।
महमंत्री पड़िया रहा पढ़वन देस पराए ॥ ३३१७॥
भावार्थ : -- जब देश विदेशी वस्तुओं की होली जलकर स्वदेशी अपनाने क संदेश दे रहा था । तब देश के प्रधानमंत्री जी विदेशी शिक्षा ग्रहण करने व्यस्त थे महात्मा लोग ऐसे को प्रधानमंत्री बनाते हैं क्या ?
राजू : -- हाँ गोद तो बिलकुल भी नहीं लेते..... चाणक्य के देश से अरथ सास्तर पढ़ने गई थी महारानी.....
जीवन जियधन सों चरे ताहि बिनु जिए न कोइ ।
भोजन बासन बासना श्रम बिनु साध न होइ ॥ ३३१८॥
भावार्थ : -- जीवन जल व् अन्न से संचालित होता है जल अन्न रूपी यह धन जीवन की प्रथम व् परम आवश्यकता है, इस धन के आधार कर प्राणी जगत जीवंत है ॥ भोजन वस्त्र आवास रूप में यह श्रम से ही साध्य होता है ॥
इस धन के द्वारा जीवन का संधारण करने के लिए मनुष्य नाना भाँति की कलाएँ करता है, यही कलाएँ विद्या कहलाती हैं ॥
समय पुरब श्रम करम बिनु धन धामन की लाह ।
पाप करम निपजाइया किए समरथ सब काहु ॥ ३३१९ ॥
भावार्थ : -- यथोचित श्रम और कर्म किए बिना समय से पूर्व भाग्य से अधिक धन धाम की अभिलाषा ने पापकर्मों को उपजाया, इन पाप कर्मों ने पापियों को भी समर्थ बना दिया ॥
समरथ दोष नहीं गोसाईं । पावक सुरसरि रबिकर नाई ॥
जीवन धन का जोउना चतुर भदर में अर्थ ।
पर हुँते परमारथ है आपनि हुँत स्वारथ ॥ ३३२० ॥
भावार्थ : - चूँकि जल व् अन्न जीवन का आधार स्वरूप है एतएव यह वास्तविक धन है । सृष्टि द्वारा मनुष्य हेतु अधिकृत चार पदार्थों में जिसे अर्थ कहा गया । परहित हेतु हो तो अर्थ एक उत्कृष्ट पदार्थ है है स्वयं हेतु हो तो यह निकृष्ट है ॥
जीव जगत के लिए जीवन धन का प्रतिरूप भोजन वस्त्र आवास की व्यवस्था अर्थ व्यवस्था कहलाई । अर्थ को सुव्यवस्थित करने हेतु मुद्रा एक उत्तम साधन सिद्ध हुई । अर्थ की अव्यवस्था मुद्रा के अवमूल्यन का प्रमुख कारण है
जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती । जीवन के संधारण में जल व् अन्न का प्रथम स्थान है ततपश्चात अन्य का, अतएव यही वास्तविक अर्थ है ॥
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