रविवार, 1 मई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३१ ॥ -----


विद्याधर मग चालिया मिली मझारी लूट । 
लूटन माहि गहि मनिआ  गई हाथ से छूट ॥ ३३११ ॥ 
भावार्थ : -- विद्या ( ज्ञान ) सन्मार्ग को निर्दिष्ट करती है , विद्या के चरम बिंदु की प्राप्ति से ईश्वर की प्राप्ति होती है  । विद्या धारण कर फिर जब कोई इस मार्ग में चल निकलता है तब  बीच-बीच में उसे लूट मिलती है फिर यदि वह लूटने में संलिप्त हो जाए तब उसकी विद्या कहीं पीछे छूट जाती है । 

हनुमन अति लघु रूप धरि  प्रबसिहि पड़ौसि देस । 
जहँ बड़ न जाए सके तहँ  लघुबर करिहि प्रबेस ॥ ३३१२ ॥ 
भावार्थ : -- महावीर हनुमान मषक रूप धारण कर पड़ोसी देश में  प्रविष्ट हुवे । जहाँ बड़ों-बड़ों की प्रविष्टि नहीं हो पाती वहां छोटों का प्रवेश हो जाता है ॥ 

सम्पद काल  में भूषना विपदा काल सहाए । 
बिरधा काल धरी ढकी बिदुता केर सुभाए ॥ ३३१३ ॥ 
------ ॥ अरस्तु ॥ -----
भावार्थ : -- सम्पद काल में यह आभूषण स्वरूप है विपदा काल में सहायक है वृद्धावस्था में यह संचित सम्पत्ति है विद्वता की ऐसी प्रकृति है ॥

संजम सम को सैन नहि विद्या सम नहि नैन । 
रहियो पहरे आपने नैन धरे दिन रैन ॥ ३३१४ ॥ 
भावार्थ : -- संयम जैसी  कोई सेना नहीं विद्या जैसी कोई दृष्टि नहीं ।   ऐसी  दृष्टि के निरीक्षण में ऐसी सेना के द्वारा  हम अपनी रक्षा स्वयं कर सकते हैं ॥

करे करम के साथ है मानस केरा मोल । 
कर नहि पार गिराइया ताही पाषन बोल ॥ ३३१५॥ 
भावार्थ : -- स्वर्ण का मूल्य उसकी शुद्धता पर आधारित होता है मनुष्य का मूल्य उसके सत्कर्म पर आधारित होता है ।  किंचित सतकर्म मनुष्य को सहँगा बनाते है कुकर्म से वह साधारण पत्थर के जैसे मूल्यहीन हो जाता है ॥

ज्ञान से मनुष्य सत्कर्म में प्रवृत्त होता है विद्या विद्वान् से, शिक्षा शिक्षक से प्राप्त होती है ज्ञान गुरु से प्राप्त होता है

येन खट्वां समारूढ: परितप्येत कर्मणा । 
आदावेव न तत् कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥ 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ ----- 
भावार्थ : -- जगत का प्रपंच क्षणभंगुर है तो उसके सम्मुख इस जीवन का क्या ठिकाना।अत: वे  कार्य पहले कर लेने चाहिए जिन्हें न करने पर बाद में खटिया में पड़कर पश्चाताप करना पड़े ॥ 


कपटी ढोंगी पाखनी महात्मन भर भेष  । 
सीख मिले घर आपना तापर गयउ बिदेस ॥ ३३१६  ॥ 
भावार्थ : - हमारे देश के महात्मा  कोई संत-महात्मा नहीं थे सत्ता प्राप्ति  के लिए उन्हें महात्मा बनाया गया था देश में शिक्षा उपलब्ध थी तथापि उसे विदेशों में ग्रहण की गई ,  महात्मा लोग ऐसा करते हैं क्या ? उद्योग पतियों के हॉउस में रहे महात्मा लोग ऐसे रहते हैं क्या ? ॥ 

राजू : -- हाँ तो क्या यहां योग्य शिक्षक नहीं थे या नहीं हैं  , विदेशों में उपचार कराते हैं क्या यहां योग्य चिकित्सक  नहीं थे या नहीं हैं । 

देस होलि जलाए कहा स्वदेसी अपनाएँ । 
महमंत्री पड़िया रहा पढ़वन देस पराए ॥ ३३१७॥ 
भावार्थ : -- जब देश विदेशी वस्तुओं की होली जलकर स्वदेशी अपनाने क संदेश दे रहा था । तब देश के प्रधानमंत्री जी विदेशी शिक्षा ग्रहण करने व्यस्त थे महात्मा लोग ऐसे को प्रधानमंत्री बनाते हैं क्या ? 

राजू : -- हाँ गोद तो बिलकुल भी नहीं लेते..... चाणक्य के देश से अरथ सास्तर पढ़ने गई थी महारानी.....

जीवन जियधन सों चरे  ताहि बिनु जिए न कोइ । 
भोजन बासन बासना श्रम बिनु साध न होइ ॥ ३३१८॥ 
भावार्थ : -- जीवन जल व् अन्न  से संचालित होता है जल अन्न रूपी यह धन जीवन की प्रथम व् परम आवश्यकता है,  इस धन के आधार कर प्राणी जगत जीवंत है ॥ भोजन वस्त्र आवास रूप में यह श्रम से ही साध्य होता है ॥ 

इस धन के द्वारा जीवन का संधारण करने के लिए मनुष्य नाना भाँति की कलाएँ करता है, यही कलाएँ विद्या कहलाती हैं ॥  

समय पुरब श्रम करम बिनु धन धामन की लाह । 
पाप करम निपजाइया किए समरथ सब काहु ॥ ३३१९ ॥ 
भावार्थ : -- यथोचित श्रम और कर्म किए बिना समय से पूर्व भाग्य से अधिक धन धाम की अभिलाषा ने पापकर्मों को उपजाया, इन पाप कर्मों ने पापियों को भी समर्थ बना दिया ॥ 

समरथ दोष  नहीं गोसाईं । पावक सुरसरि रबिकर नाई ॥ 

जीवन धन का जोउना  चतुर भदर में अर्थ । 
 पर हुँते परमारथ है आपनि हुँत स्वारथ ॥ ३३२० ॥ 
भावार्थ : - चूँकि जल व् अन्न जीवन का आधार स्वरूप है एतएव यह वास्तविक धन है । सृष्टि द्वारा मनुष्य हेतु अधिकृत चार पदार्थों में जिसे अर्थ कहा गया ।  परहित हेतु हो तो अर्थ एक  उत्कृष्ट पदार्थ है  है स्वयं हेतु हो तो यह निकृष्ट है ॥ 

जीव जगत के लिए जीवन धन का प्रतिरूप भोजन वस्त्र आवास की व्यवस्था अर्थ व्यवस्था कहलाई । अर्थ को सुव्यवस्थित करने हेतु मुद्रा एक  उत्तम साधन सिद्ध हुई । अर्थ की अव्यवस्था मुद्रा के अवमूल्यन का प्रमुख कारण है 

 जल  के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती ।  जीवन के संधारण  में जल व् अन्न का प्रथम स्थान है ततपश्चात अन्य का, अतएव  यही वास्तविक अर्थ है ॥ 



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