गुरुवार, 19 मई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३३ ॥ -----,

करम कमाई आपनी, जो सब जनम सहाए ।
धन कमाए का लाहिये, जीमें बैठ पराए ॥ ३३३१ ॥ 
भावार्थ : -- सत्कमों का उपार्जन ही वास्तविक उपार्जन है जो मरणोपरांत साथ जाता है और सभी जन्मों में  सहायक होता है । कुकर्म से जीव निम्न योनि को प्राप्त होता है सत्कर्म से  वह उस योनि में सुख पूर्वक निवास करता है । मरणोपरांत कर्मों के उपार्जन का उपभोग वह स्वयं करता है  उसकी धन-सम्पति का उपभोग कोई और ही करते हैं, एतएव धन सम्पति के संकलन से कुछ लाभ नहीं होता  ।


पति चल बसे उद्योग यहीं रह गए जिसे पराए जीम रहे हैं पंडित चल बसे रोटी और बेटी पराए खा गए ।

पंडत पढ़ परबोधिया अपने बेद पुरान । 
पराया घर ते उपजै तब तिनकी संतान ॥ ३३३२ ॥ 
भावार्थ : -- पंडित जी धन के लालच में व्यास जी की छोड़ के जब अपने वेद- पुराण पढ़कर ज्ञान देने लगते हैं  तब उनकी संताने क्रूर म्लेच्छ के गर्भ और वीर्य से उत्पन्न होती है ॥

पराया घर ते उपजै पंडत की संतान । 
पुन्य पराए पहार बन, दूरे बेद पुरान ॥ ३३३३ ॥ 
भावार्थ : -- जब पंडितों ब्राम्हणों की संतानों को क्रूर म्लेच्छ जनम देने लगते हैं तब पूण्य पहाड़ों में जा बसते हैं और वेड पूर्ण अफ्रीका के जंगलों में छिप जाते हैं ॥ इसलिए सत्ता सत्ता और पैसा पैसा मति करो ॥

अँधा पथ परबोध फिर बायस पढ़े पुरान ।
ऊंची पीठी पैठ के हंसनु देवे ज्ञान ॥ ३३३४॥
भावार्थ : -- तब अंधे पथ प्रदर्शक हो जाते है और कौंवे ऊँचे आसन पर बैठ कर हंसों को ज्ञान देते हैं ॥
क्या ज्ञान देते हैं ?
 यही की हंस हो तो हंस ही रहिओ, आधे तीतर आधे बटेर मति बनियो, अन्यथा मैं तुमसे श्रेष्ठ कहलाऊँगा फिर मैं ज्ञान दूँगा तुम लोगे समझे

राजू : -- न न इनको जर्मनी में समझाओ तब समझेंगे.....

जीवाधार हेतु गहउ अनुसासित आहारु । 
बहुरि बहुंतहि सोच समुझ करिहौ सौचाचार ॥ ३३३५ ॥  
भावार्थ : -- एक अनुशासित दिनचर्या हेतु हम एक अनुशासित आहार लें ।  हमारा आहार प्रत्यक्ष व् अप्रत्यक्ष किसी को भी जीवन के अधिकार से वंचित न करे यह सात्विक व् संतुलित हो। हमें पथ्यापथ्य का  विचार कर भोजन ग्रहण करना चाहिए । संसार के संचालन में सहायता के लिए विधाता ने मनुष्य को रचा , इसका उद्देश्य सत्कार्य करना है प्रधान मंत्री के जैसे नहीं कि जिसका एक ही काम हो खाना और हगना.....वो भी वायुयान की पटरी पर । भोजन पश्चात कृत्याकृत्य का विचार कर शौच कर्म करें। कल प्रधान मंत्री पीठ पीछे कोई दो तीन शौचकूप टाँगे टी. वी पर हाँक लगा रह थे.....फ्री में संडास बनवा लो.....एक ने कहा बनवा तो लें किन्तु सफ़ा कौन करेगा.....किसी क्षुत्-क्षाम को क्षुद्र बनने के लिए विवश न कर अपने शौच कूप का शोधन हम स्वयं करें ॥

सकुचित जाकर मानसा ताकर करि अनुहारि । 
धर्म  बरन त्याजत भए श्रुति बिरोधि नर नारि ॥ ३३३६ ॥ 
भावार्थ : -- "मैं और मेरा " की संकीर्ण मानसिकता का अनुकरण कर भारतीयों न अपना धर्म अपना वर्ण त्याग दिया वे अपने सदग्रंथों के विरोधी हो गए यह विरोध राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हुवा  है ॥ 

ब्रम्हन धर्म कर मूरति ब्रम्हहि वाके मूल । 
जो ब्रम्हन नहि होइआ बिनसिहि देस समूल ॥ ३३३७ ॥ 
भावार्थ : -- ब्राम्हण धर्म की साक्षात मूरति है ब्राम्हण धर्म का मूल है । ब्राम्हण अल्प से अल्पतर हो गए यह देश नष्ट व् भष्ट होता चला गया ॥ 

पसु पाँखि तरु पादप सम  होत मनुज के जाति । 

जग माहि एहि  ग्यान बिनु, पसरी बहुंतक भ्राँति ॥ ३३३८ ॥ 
भावार्थ : -- उन्नत पशु, उन्नत बीज उच्च कोटि के अनाज जैसे  मनुष्य की जाति भी उन्नत व् उच्च कोटि की होती है । इस अनुसंधान के  विपरीत होकर मानव जाति के सम्बन्ध में बहुंत सी भ्रांतियाँ फैली और फैलाई गई । 
प्राग समउ सुघड़पन जबु कतहुँ न देइँ दिखाए । 
भारत मैं ता सोंहि तब  एकु संस्कृति जनाए ॥ ३३३९ ॥ 
भावार्थ : -- प्राचीन -काल में सभ्यता जब दर्शनातीत थी तब सभ्य व् शिष्ट भारत खण्ड में एक सुसंस्कृति का प्रादुर्भाव हुवा जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है.....

बरन समूह सों संपन्न  सुर सम्पद कर जोग । 
सरित रूप प्रगसित भई देउ गिरा कहँ लोग ॥ ३३४० ॥ 
भावार्थ : - इस संस्कृति के संग वर्ण समूह से संपन्न हस्त कमल में स्वरों की सम्पदा संकलित किए सूत्र रूप में एक समृद्ध भाषा देव गिरा प्रकट हुई, जो प्राचीनतम् भाषा के पद पर प्रतिष्ठित होकर सस्कृत नाम से प्रसिद्ध है ॥ 













सोमवार, 9 मई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३२ ॥ -----

सुबारथ अरु परमारथ, अरथ गहे दुइ सार । 
एक ते जग साकार है, दूजे तेउ बिकार ॥ ३३२१ ॥ 
भावार्थ : --अर्थ की दो गति हैं स्वार्थ एवं परमार्थ । उपयोग करने पर अर्थ के दो विपरीत परिणाम प्राप्त होते हैं । परमार्थ के परिणाम स्वरूप  संसार साकार हो जाता है जिससे ईश्वर सगुण रूप में प्रकट होते हैं । स्वार्थ के परिणाम स्वरूप संसार में विकृति आ जाती है जिससे ईश्वर निर्गुण रूप में प्राप्त होते हैं ॥

 जहां अर्थ परमार्थ हेतु है वहां ईश्वर प्रकट होते हैं

जो अरथ परमारथ मद करे जगत के काज । 
निसदिन श्रीधर होइया तासों देस समाज ॥ ३३२२ ॥ 
भावार्थ : --  अर्थ जब परमार्थ के मद में व्यय होकर संसार के कल्याण परक कार्यों में संलग्न रहता है तब उससे देश समाज सहित संसार शोभा संपन्न होकर नित्य ही रूपवंत होता जाता है ॥

स्वारथ परत अर्थ कर जोवन भरे विकार । 
सुरति रहे बस आपनी भूर परे संसार ॥ ३३२३ ॥ 
भावार्थ : --  स्वार्थ परायण अर्थ पति का अर्थ संग्रह स्वहित हेतु होता है जो विकृति को उत्पन्न करता है । संसार को विस्मृत कर इसे स्वयं का ही स्मरण रहता है ॥

भोजन बासन बासना यहु जीवन के हेत । 
अजहुँ सरलतम रूप में लहि जन साधन सेत ॥ ३३२४॥ 
भावार्थ : -- भोजन वस्त्र और वास यह जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं । मुद्रा  रूपी साधन से इसे प्राप्त करना मानव-जाति  के लिए सरल हो गया ॥ पशु-पक्षियों को जिसके लिए संघर्ष करना पड़ता है ॥ 

त्याग केरा छालना जिउ धन छनता जात । 
बुरा बुर तीरे रहे भला भला छनि आत ॥ ३३२५ ॥ 
भावार्थ : -- पशु पक्षियों के जीवन-संघर्ष को यत् किंचित करने के लिएजीवन के पथ पर हम त्याग की छलनी लेते चलें । इस छलनी के प्रयोग से बुरा धन किनारे रह जाता है छन छन कर भला धन ही आता है ॥ 


भला जोगवन जोइयो भल ते होत भलाए । 
बुरा जुगते  बुरा होत आपन हो कि पराए  ॥ ३३२६ ॥  
भावार्थ : -- धन दो प्रकार का  होता है भला और बुरा । भला धन भला ही करेगा, बुरा बुरा ही करेगा अपना भी और दूसरों का भी,  इसलिए भले धन का ही उपार्जन करें ॥

अम्बर डम्बर देख के कहत सुखी सब ताहि । 
सुख मिले संतोख ते धन सम्पद ते नाहि ॥ ३३२७॥ 
भावार्थ : -- भले धन की अधिकता भी असंतोष को व्युत्पन्न करती है । जीवन के आवश्यक हेतु को न्यूनतम  कर यत किंचित धन से ही संतुष्ट रहना चाहिए कारण कि संतोष में ही सुख निहित है । आडम्बरियों  के आडम्बर का  दर्शन कर सब उसे सुखी कहते अवश्य हैं पर वे सुखी रहते नहीं है ॥


संतोषस्त्रिसु कर्तव्य:स्वदारे भोजने धने । 
त्रिषु चैव न कर्तव्य: स्वाध्याये जपदानयो ॥ 

भावार्थ : -- स्त्री संतति स्वजन भोजन धन में संतोष करना उत्तम है । स्वाध्याय, पूजन-वंदन जप-कीर्तन व्  दान-धर्म  में कभी संतोष नहीं करना चाहिए ॥

मानस करम उद्यम रबि जीवन जोग समूंद । 
गहे सो घन गेह गगन, बरखे बरखा बूँद ॥ ३३२८ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य कर्म श्रम उद्यम से धनार्जन करता है । यदि जीवन का आधरभूत धन समुद्र के समान है तब श्रम  उद्यम तपस चरणी सूर्य के समान हो वाडवाग्नि के समान नहीं । सूर्य समुद्र  से केवल मोतियों को चुनता है वाडवानल भक्ष्याभक्ष्य कर पूरे समुद्र को ही अवशोषित कर लेता है ।  उपार्जित धन जब घन बने  और घर गगन बने तब वह घमंड न कर बून्द बने और वर्षा बनकर  दान-धर्म करे उसका संग्रह न करे ।

स्थितिरुच्चै: पयोदानां पयोधीनामध: स्थिति: । 
भावार्थ : -- निरंतर वर्षा का दान करने से बादलों की स्थिति ऊपर  होती है जल का संग्रह कर केवल गर्जना  करने से स्थिति नीचे हो जाती है ॥

दुराचरन का राजना भरिया भरम अंदेस । 
भलमन साईं बिसराएँ खल न कायँ कलेस ॥ ३३२९ ॥ 
भावार्थ : -- जब निंदित आचरणों कुत्सित कर्म का राज होता है तब संसार भ्रम, संदेह से व्याप्त हो जाता है जो ज्ञान को आच्छादित कर उसे अज्ञानतस कर देता है ॥ तब सज्जनता प्रशमित और दुर्जनता लब्ध -प्रतिष्ठित होती  जाती है ॥

सदगुन सुखकर सम्पदा, दुर्गुन दुःख की खान । 
जाहि बिबस जग होइया ताहि अधिकतम जान ॥ ३३३० ॥ 
 भावार्थ : -- सुख व् दुःख गुणों के कारण भूत हैं  ।  सद्गुण सुख की सम्पदा है, दुर्गुण दुखों के भंडार होते हैं । संसार यदि सद्गुणों के वशीभूत है तब सुख की अधिकता होगी, यदि वह दुर्गुण के अधीन हो  तब दुःख अधिक होगा ॥










रविवार, 1 मई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३१ ॥ -----


विद्याधर मग चालिया मिली मझारी लूट । 
लूटन माहि गहि मनिआ  गई हाथ से छूट ॥ ३३११ ॥ 
भावार्थ : -- विद्या ( ज्ञान ) सन्मार्ग को निर्दिष्ट करती है , विद्या के चरम बिंदु की प्राप्ति से ईश्वर की प्राप्ति होती है  । विद्या धारण कर फिर जब कोई इस मार्ग में चल निकलता है तब  बीच-बीच में उसे लूट मिलती है फिर यदि वह लूटने में संलिप्त हो जाए तब उसकी विद्या कहीं पीछे छूट जाती है । 

हनुमन अति लघु रूप धरि  प्रबसिहि पड़ौसि देस । 
जहँ बड़ न जाए सके तहँ  लघुबर करिहि प्रबेस ॥ ३३१२ ॥ 
भावार्थ : -- महावीर हनुमान मषक रूप धारण कर पड़ोसी देश में  प्रविष्ट हुवे । जहाँ बड़ों-बड़ों की प्रविष्टि नहीं हो पाती वहां छोटों का प्रवेश हो जाता है ॥ 

सम्पद काल  में भूषना विपदा काल सहाए । 
बिरधा काल धरी ढकी बिदुता केर सुभाए ॥ ३३१३ ॥ 
------ ॥ अरस्तु ॥ -----
भावार्थ : -- सम्पद काल में यह आभूषण स्वरूप है विपदा काल में सहायक है वृद्धावस्था में यह संचित सम्पत्ति है विद्वता की ऐसी प्रकृति है ॥

संजम सम को सैन नहि विद्या सम नहि नैन । 
रहियो पहरे आपने नैन धरे दिन रैन ॥ ३३१४ ॥ 
भावार्थ : -- संयम जैसी  कोई सेना नहीं विद्या जैसी कोई दृष्टि नहीं ।   ऐसी  दृष्टि के निरीक्षण में ऐसी सेना के द्वारा  हम अपनी रक्षा स्वयं कर सकते हैं ॥

करे करम के साथ है मानस केरा मोल । 
कर नहि पार गिराइया ताही पाषन बोल ॥ ३३१५॥ 
भावार्थ : -- स्वर्ण का मूल्य उसकी शुद्धता पर आधारित होता है मनुष्य का मूल्य उसके सत्कर्म पर आधारित होता है ।  किंचित सतकर्म मनुष्य को सहँगा बनाते है कुकर्म से वह साधारण पत्थर के जैसे मूल्यहीन हो जाता है ॥

ज्ञान से मनुष्य सत्कर्म में प्रवृत्त होता है विद्या विद्वान् से, शिक्षा शिक्षक से प्राप्त होती है ज्ञान गुरु से प्राप्त होता है

येन खट्वां समारूढ: परितप्येत कर्मणा । 
आदावेव न तत् कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥ 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ ----- 
भावार्थ : -- जगत का प्रपंच क्षणभंगुर है तो उसके सम्मुख इस जीवन का क्या ठिकाना।अत: वे  कार्य पहले कर लेने चाहिए जिन्हें न करने पर बाद में खटिया में पड़कर पश्चाताप करना पड़े ॥ 


कपटी ढोंगी पाखनी महात्मन भर भेष  । 
सीख मिले घर आपना तापर गयउ बिदेस ॥ ३३१६  ॥ 
भावार्थ : - हमारे देश के महात्मा  कोई संत-महात्मा नहीं थे सत्ता प्राप्ति  के लिए उन्हें महात्मा बनाया गया था देश में शिक्षा उपलब्ध थी तथापि उसे विदेशों में ग्रहण की गई ,  महात्मा लोग ऐसा करते हैं क्या ? उद्योग पतियों के हॉउस में रहे महात्मा लोग ऐसे रहते हैं क्या ? ॥ 

राजू : -- हाँ तो क्या यहां योग्य शिक्षक नहीं थे या नहीं हैं  , विदेशों में उपचार कराते हैं क्या यहां योग्य चिकित्सक  नहीं थे या नहीं हैं । 

देस होलि जलाए कहा स्वदेसी अपनाएँ । 
महमंत्री पड़िया रहा पढ़वन देस पराए ॥ ३३१७॥ 
भावार्थ : -- जब देश विदेशी वस्तुओं की होली जलकर स्वदेशी अपनाने क संदेश दे रहा था । तब देश के प्रधानमंत्री जी विदेशी शिक्षा ग्रहण करने व्यस्त थे महात्मा लोग ऐसे को प्रधानमंत्री बनाते हैं क्या ? 

राजू : -- हाँ गोद तो बिलकुल भी नहीं लेते..... चाणक्य के देश से अरथ सास्तर पढ़ने गई थी महारानी.....

जीवन जियधन सों चरे  ताहि बिनु जिए न कोइ । 
भोजन बासन बासना श्रम बिनु साध न होइ ॥ ३३१८॥ 
भावार्थ : -- जीवन जल व् अन्न  से संचालित होता है जल अन्न रूपी यह धन जीवन की प्रथम व् परम आवश्यकता है,  इस धन के आधार कर प्राणी जगत जीवंत है ॥ भोजन वस्त्र आवास रूप में यह श्रम से ही साध्य होता है ॥ 

इस धन के द्वारा जीवन का संधारण करने के लिए मनुष्य नाना भाँति की कलाएँ करता है, यही कलाएँ विद्या कहलाती हैं ॥  

समय पुरब श्रम करम बिनु धन धामन की लाह । 
पाप करम निपजाइया किए समरथ सब काहु ॥ ३३१९ ॥ 
भावार्थ : -- यथोचित श्रम और कर्म किए बिना समय से पूर्व भाग्य से अधिक धन धाम की अभिलाषा ने पापकर्मों को उपजाया, इन पाप कर्मों ने पापियों को भी समर्थ बना दिया ॥ 

समरथ दोष  नहीं गोसाईं । पावक सुरसरि रबिकर नाई ॥ 

जीवन धन का जोउना  चतुर भदर में अर्थ । 
 पर हुँते परमारथ है आपनि हुँत स्वारथ ॥ ३३२० ॥ 
भावार्थ : - चूँकि जल व् अन्न जीवन का आधार स्वरूप है एतएव यह वास्तविक धन है । सृष्टि द्वारा मनुष्य हेतु अधिकृत चार पदार्थों में जिसे अर्थ कहा गया ।  परहित हेतु हो तो अर्थ एक  उत्कृष्ट पदार्थ है  है स्वयं हेतु हो तो यह निकृष्ट है ॥ 

जीव जगत के लिए जीवन धन का प्रतिरूप भोजन वस्त्र आवास की व्यवस्था अर्थ व्यवस्था कहलाई । अर्थ को सुव्यवस्थित करने हेतु मुद्रा एक  उत्तम साधन सिद्ध हुई । अर्थ की अव्यवस्था मुद्रा के अवमूल्यन का प्रमुख कारण है 

 जल  के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती ।  जीवन के संधारण  में जल व् अन्न का प्रथम स्थान है ततपश्चात अन्य का, अतएव  यही वास्तविक अर्थ है ॥ 



----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...