करम कमाई आपनी, जो सब जनम सहाए ।
धन कमाए का लाहिये, जीमें बैठ पराए ॥ ३३३१ ॥
भावार्थ : -- सत्कमों का उपार्जन ही वास्तविक उपार्जन है जो मरणोपरांत साथ जाता है और सभी जन्मों में सहायक होता है । कुकर्म से जीव निम्न योनि को प्राप्त होता है सत्कर्म से वह उस योनि में सुख पूर्वक निवास करता है । मरणोपरांत कर्मों के उपार्जन का उपभोग वह स्वयं करता है उसकी धन-सम्पति का उपभोग कोई और ही करते हैं, एतएव धन सम्पति के संकलन से कुछ लाभ नहीं होता ।
पति चल बसे उद्योग यहीं रह गए जिसे पराए जीम रहे हैं पंडित चल बसे रोटी और बेटी पराए खा गए ।
पंडत पढ़ परबोधिया अपने बेद पुरान ।
पराया घर ते उपजै तब तिनकी संतान ॥ ३३३२ ॥
भावार्थ : -- पंडित जी धन के लालच में व्यास जी की छोड़ के जब अपने वेद- पुराण पढ़कर ज्ञान देने लगते हैं तब उनकी संताने क्रूर म्लेच्छ के गर्भ और वीर्य से उत्पन्न होती है ॥
पराया घर ते उपजै पंडत की संतान ।
पुन्य पराए पहार बन, दूरे बेद पुरान ॥ ३३३३ ॥
भावार्थ : -- जब पंडितों ब्राम्हणों की संतानों को क्रूर म्लेच्छ जनम देने लगते हैं तब पूण्य पहाड़ों में जा बसते हैं और वेड पूर्ण अफ्रीका के जंगलों में छिप जाते हैं ॥ इसलिए सत्ता सत्ता और पैसा पैसा मति करो ॥
अँधा पथ परबोध फिर बायस पढ़े पुरान ।
ऊंची पीठी पैठ के हंसनु देवे ज्ञान ॥ ३३३४॥
भावार्थ : -- तब अंधे पथ प्रदर्शक हो जाते है और कौंवे ऊँचे आसन पर बैठ कर हंसों को ज्ञान देते हैं ॥
क्या ज्ञान देते हैं ?
यही की हंस हो तो हंस ही रहिओ, आधे तीतर आधे बटेर मति बनियो, अन्यथा मैं तुमसे श्रेष्ठ कहलाऊँगा फिर मैं ज्ञान दूँगा तुम लोगे समझे
राजू : -- न न इनको जर्मनी में समझाओ तब समझेंगे.....
जीवाधार हेतु गहउ अनुसासित आहारु ।
बहुरि बहुंतहि सोच समुझ करिहौ सौचाचार ॥ ३३३५ ॥
भावार्थ : -- एक अनुशासित दिनचर्या हेतु हम एक अनुशासित आहार लें । हमारा आहार प्रत्यक्ष व् अप्रत्यक्ष किसी को भी जीवन के अधिकार से वंचित न करे यह सात्विक व् संतुलित हो। हमें पथ्यापथ्य का विचार कर भोजन ग्रहण करना चाहिए । संसार के संचालन में सहायता के लिए विधाता ने मनुष्य को रचा , इसका उद्देश्य सत्कार्य करना है प्रधान मंत्री के जैसे नहीं कि जिसका एक ही काम हो खाना और हगना.....वो भी वायुयान की पटरी पर । भोजन पश्चात कृत्याकृत्य का विचार कर शौच कर्म करें। कल प्रधान मंत्री पीठ पीछे कोई दो तीन शौचकूप टाँगे टी. वी पर हाँक लगा रह थे.....फ्री में संडास बनवा लो.....एक ने कहा बनवा तो लें किन्तु सफ़ा कौन करेगा.....किसी क्षुत्-क्षाम को क्षुद्र बनने के लिए विवश न कर अपने शौच कूप का शोधन हम स्वयं करें ॥
सकुचित जाकर मानसा ताकर करि अनुहारि ।
धर्म बरन त्याजत भए श्रुति बिरोधि नर नारि ॥ ३३३६ ॥
भावार्थ : -- "मैं और मेरा " की संकीर्ण मानसिकता का अनुकरण कर भारतीयों न अपना धर्म अपना वर्ण त्याग दिया वे अपने सदग्रंथों के विरोधी हो गए यह विरोध राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हुवा है ॥
ब्रम्हन धर्म कर मूरति ब्रम्हहि वाके मूल ।
जो ब्रम्हन नहि होइआ बिनसिहि देस समूल ॥ ३३३७ ॥
भावार्थ : -- ब्राम्हण धर्म की साक्षात मूरति है ब्राम्हण धर्म का मूल है । ब्राम्हण अल्प से अल्पतर हो गए यह देश नष्ट व् भष्ट होता चला गया ॥
पसु पाँखि तरु पादप सम होत मनुज के जाति ।
जग माहि एहि ग्यान बिनु, पसरी बहुंतक भ्राँति ॥ ३३३८ ॥
भावार्थ : -- उन्नत पशु, उन्नत बीज उच्च कोटि के अनाज जैसे मनुष्य की जाति भी उन्नत व् उच्च कोटि की होती है । इस अनुसंधान के विपरीत होकर मानव जाति के सम्बन्ध में बहुंत सी भ्रांतियाँ फैली और फैलाई गई ।
प्राग समउ सुघड़पन जबु कतहुँ न देइँ दिखाए ।
भारत मैं ता सोंहि तब एकु संस्कृति जनाए ॥ ३३३९ ॥
भावार्थ : -- प्राचीन -काल में सभ्यता जब दर्शनातीत थी तब सभ्य व् शिष्ट भारत खण्ड में एक सुसंस्कृति का प्रादुर्भाव हुवा जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है.....
बरन समूह सों संपन्न सुर सम्पद कर जोग ।
सरित रूप प्रगसित भई देउ गिरा कहँ लोग ॥ ३३४० ॥
भावार्थ : - इस संस्कृति के संग वर्ण समूह से संपन्न हस्त कमल में स्वरों की सम्पदा संकलित किए सूत्र रूप में एक समृद्ध भाषा देव गिरा प्रकट हुई, जो प्राचीनतम् भाषा के पद पर प्रतिष्ठित होकर सस्कृत नाम से प्रसिद्ध है ॥
धन कमाए का लाहिये, जीमें बैठ पराए ॥ ३३३१ ॥
भावार्थ : -- सत्कमों का उपार्जन ही वास्तविक उपार्जन है जो मरणोपरांत साथ जाता है और सभी जन्मों में सहायक होता है । कुकर्म से जीव निम्न योनि को प्राप्त होता है सत्कर्म से वह उस योनि में सुख पूर्वक निवास करता है । मरणोपरांत कर्मों के उपार्जन का उपभोग वह स्वयं करता है उसकी धन-सम्पति का उपभोग कोई और ही करते हैं, एतएव धन सम्पति के संकलन से कुछ लाभ नहीं होता ।
पति चल बसे उद्योग यहीं रह गए जिसे पराए जीम रहे हैं पंडित चल बसे रोटी और बेटी पराए खा गए ।
पंडत पढ़ परबोधिया अपने बेद पुरान ।
पराया घर ते उपजै तब तिनकी संतान ॥ ३३३२ ॥
भावार्थ : -- पंडित जी धन के लालच में व्यास जी की छोड़ के जब अपने वेद- पुराण पढ़कर ज्ञान देने लगते हैं तब उनकी संताने क्रूर म्लेच्छ के गर्भ और वीर्य से उत्पन्न होती है ॥
पराया घर ते उपजै पंडत की संतान ।
पुन्य पराए पहार बन, दूरे बेद पुरान ॥ ३३३३ ॥
भावार्थ : -- जब पंडितों ब्राम्हणों की संतानों को क्रूर म्लेच्छ जनम देने लगते हैं तब पूण्य पहाड़ों में जा बसते हैं और वेड पूर्ण अफ्रीका के जंगलों में छिप जाते हैं ॥ इसलिए सत्ता सत्ता और पैसा पैसा मति करो ॥
अँधा पथ परबोध फिर बायस पढ़े पुरान ।
ऊंची पीठी पैठ के हंसनु देवे ज्ञान ॥ ३३३४॥
भावार्थ : -- तब अंधे पथ प्रदर्शक हो जाते है और कौंवे ऊँचे आसन पर बैठ कर हंसों को ज्ञान देते हैं ॥
क्या ज्ञान देते हैं ?
यही की हंस हो तो हंस ही रहिओ, आधे तीतर आधे बटेर मति बनियो, अन्यथा मैं तुमसे श्रेष्ठ कहलाऊँगा फिर मैं ज्ञान दूँगा तुम लोगे समझे
राजू : -- न न इनको जर्मनी में समझाओ तब समझेंगे.....
जीवाधार हेतु गहउ अनुसासित आहारु ।
बहुरि बहुंतहि सोच समुझ करिहौ सौचाचार ॥ ३३३५ ॥
भावार्थ : -- एक अनुशासित दिनचर्या हेतु हम एक अनुशासित आहार लें । हमारा आहार प्रत्यक्ष व् अप्रत्यक्ष किसी को भी जीवन के अधिकार से वंचित न करे यह सात्विक व् संतुलित हो। हमें पथ्यापथ्य का विचार कर भोजन ग्रहण करना चाहिए । संसार के संचालन में सहायता के लिए विधाता ने मनुष्य को रचा , इसका उद्देश्य सत्कार्य करना है प्रधान मंत्री के जैसे नहीं कि जिसका एक ही काम हो खाना और हगना.....वो भी वायुयान की पटरी पर । भोजन पश्चात कृत्याकृत्य का विचार कर शौच कर्म करें। कल प्रधान मंत्री पीठ पीछे कोई दो तीन शौचकूप टाँगे टी. वी पर हाँक लगा रह थे.....फ्री में संडास बनवा लो.....एक ने कहा बनवा तो लें किन्तु सफ़ा कौन करेगा.....किसी क्षुत्-क्षाम को क्षुद्र बनने के लिए विवश न कर अपने शौच कूप का शोधन हम स्वयं करें ॥
सकुचित जाकर मानसा ताकर करि अनुहारि ।
धर्म बरन त्याजत भए श्रुति बिरोधि नर नारि ॥ ३३३६ ॥
भावार्थ : -- "मैं और मेरा " की संकीर्ण मानसिकता का अनुकरण कर भारतीयों न अपना धर्म अपना वर्ण त्याग दिया वे अपने सदग्रंथों के विरोधी हो गए यह विरोध राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हुवा है ॥
ब्रम्हन धर्म कर मूरति ब्रम्हहि वाके मूल ।
जो ब्रम्हन नहि होइआ बिनसिहि देस समूल ॥ ३३३७ ॥
भावार्थ : -- ब्राम्हण धर्म की साक्षात मूरति है ब्राम्हण धर्म का मूल है । ब्राम्हण अल्प से अल्पतर हो गए यह देश नष्ट व् भष्ट होता चला गया ॥
पसु पाँखि तरु पादप सम होत मनुज के जाति ।
जग माहि एहि ग्यान बिनु, पसरी बहुंतक भ्राँति ॥ ३३३८ ॥
भावार्थ : -- उन्नत पशु, उन्नत बीज उच्च कोटि के अनाज जैसे मनुष्य की जाति भी उन्नत व् उच्च कोटि की होती है । इस अनुसंधान के विपरीत होकर मानव जाति के सम्बन्ध में बहुंत सी भ्रांतियाँ फैली और फैलाई गई ।
प्राग समउ सुघड़पन जबु कतहुँ न देइँ दिखाए ।
भारत मैं ता सोंहि तब एकु संस्कृति जनाए ॥ ३३३९ ॥
भावार्थ : -- प्राचीन -काल में सभ्यता जब दर्शनातीत थी तब सभ्य व् शिष्ट भारत खण्ड में एक सुसंस्कृति का प्रादुर्भाव हुवा जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है.....
बरन समूह सों संपन्न सुर सम्पद कर जोग ।
सरित रूप प्रगसित भई देउ गिरा कहँ लोग ॥ ३३४० ॥
भावार्थ : - इस संस्कृति के संग वर्ण समूह से संपन्न हस्त कमल में स्वरों की सम्पदा संकलित किए सूत्र रूप में एक समृद्ध भाषा देव गिरा प्रकट हुई, जो प्राचीनतम् भाषा के पद पर प्रतिष्ठित होकर सस्कृत नाम से प्रसिद्ध है ॥