ज्ञानद कतहुँ रहे नहीं रहे न सुबुध सुजान ।
ज्ञान आप जिन चाहिबे सोइ बतावैं ज्ञान ॥ ३३०१ ॥
भावार्थ : -- ज्ञान दाता अब नहीं है विद्वान् भी नहीं रहे, जिन्हें स्वयं ज्ञान की आवष्यकता है वेज्ञान बताते हैं जिन्हें स्वयं विद्या की अवष्यकत है वे विद्वान् कहलाते हैं जिन्हें अनुशासन की आवष्यकता है वे शासन कर रहे हैं ॥
साँच अहइ मतिहीन कू बिरथा सब उपदेस ।
धुबिया बस के का करे दिगम्बरी के देस ॥ ३३०२ ॥
भावार्थ : -- सत्य है मूर्खों को उपदेस व्यर्थ होते हैं । बुद्धिहीन की बस्ती में उपदेसक बस के करेगा भी क्या ॥
पाठ पराया पढ़त भए चरित हीन सब कोए ।
कै कंचन के कामिनी बिषय जनावा दोए ॥ ३३०३ ॥
भावार्थ : - परायों की पढ़ाई पट्टी में आकर अपनों के साथ पराए भी चरित्र हीन हो चले । ऐसी पढ़ाई पढ़ कर इन्हें दो ही विषयों की विशेषज्ञता प्राप्त हुई पैसे की या स्त्री की ॥
सत्ता से पैसा बहुंत आता है ये बिना पंख के पंछी बना देती है हवा में उड़ा देती है भई ।
राजू : -- हाँ ! हमारे देश में तो इसके पास जादू का पानी है ये पढ़े बिना ही डाक्टर इंजिनियर और न जाने क्या क्या बन देती है । अब लोग रोग से नहीं बल्कि उलटी सीधी औषधि खाने से और इधर के उधर की शल्य क्रिया से मर रहे हैं । हमारे यहाँ की सड़के v शेप में टर्न होती है पूल पूछते हैं मैं कब गिरूँ.....?
धर्म चरन बिसारी के चरित हीन सहचारि ।
जब को जनिमन जामिया पलक देइ परिहारि ॥ ३३०४ ॥
भावार्थ : -- विवाह एक संस्था है संस्था में अधिकार व् कर्तव्य दोनों निहित होते हैं चरित्र हीन के परस्पर सहगमन से धर्म चरण का निर्वहन नहीं होता । ऐसे सहगमन से उत्पन्न संतति तत्काल ही त्याग दी जाती है ऐसी संततियां के लिए उत्तरदायी कौन है ? समाज या देश या वह न्यायालय जो ऐसे सम्बन्धों की स्वीकृति का निर्णय करता आया है ॥
अनाचारि अपचरनि भए जन जन के प्रतिमान ।
अजहुँ जगत भर अपूरे कामग की संतान ॥ ३३०५ ॥
भावार्थ : - अब अनाचारी दुराचारी दुष्कर्मी लोगों के आदर्श हो चले हैं, तब फिर ऐसों के बच्चे सच्चे कैसे होंगे । अधुनातन विश्व अनैतिक सम्बन्धों से उत्पन्न संतानों से भर गया है, देश-विदेश में ऐसी संतानों की संख्या अध्ययन का विषय हैं इनके क्रियाकलाप का समाज व् देश पर पड़ता प्रभाव शोध का विषय हैं ॥
निज कुल जात न जान सो कुलोदभव कहलात ।
बिधि बिरोधि जातक अजहुँ कहलावैं अभिजात ॥ ३३०६॥
भावार्थ : - जिन्हें अपने कुल का पता नहीं जात का पता नहीं पिता के पितरों का पता नहीं वे अब खानदानी कहलाते हैं । अनैतिक सम्बन्धों से उत्पन्न संताने अब अभिजात्य वर्ग कहलाने लगी है ।
कुलोदभव अथवा खानदानी किसे कहते हैं : -- पवित्रता , मर्यादा, शीलता, दान- धर्म, सत्कर्म आदि सद्गुणों से उत्तम कुल का उद्भव होता है ऐसे कुल में उत्पन्न संतान को कुलोद्भव कहते हैं , ऐसे कुल के समूह को अभिजात्य वर्ग कहते हैं ॥
अबिधिक जनित न जानिबे मात पिता कुल जात ।
बयस बूढ भयसि तापर कुँअरु साह कहलात ॥ ३३०७ ॥
भावार्थ : -- अवैधानिक संताने अपने मात- पिता का नाम ज्ञात नहीं होता उन्हें अपने कुल व् जाति का भी ज्ञान नहीं होता । आयु व्यतीत होती जाती है बूढ़े हो जाते हैं तथापि ये कुंआरे ही कैसे रहते हैं भई ?
राजू : -- जादू के पानी से.....
जगत कल्याण हेतु किए गए कार्य विधि सम्मत व् विपरीत कार्य विधि विरुद्ध होते हैं ।
जोग पाद पिठाईं जो नहीं केहि के जोग ।
उपरितन भए को एक दुइ पचि मुइ केतक लोग ॥ ३३०८॥
भावार्थ : -- योग्य पदों पर उन्हें पीठासीन किया जो किसी योग्य नहीं है । यत् किंचित का ऊँचा उठाने व् कतिपय नेताओं के सम्मान करने में उनके नीचे दबकर कितने मरे, कौन मरे, कैसे मरे इसका आकलन करने का समय किसके पास है ॥
बिनवत जग करि जोरि के सुनहु सब बिधि बिधान ।
जुगता को पद दीजिये, दारिदी को ग्यान ॥ ३३०९ ॥
भावार्थ : -- यह जगज्जन करबद्ध होकर कहता है: -- हे विश्व के विधाता तू योग्य को ही पदारूढ़ित करने का विधान कर धन से मन से तन से दरिद्र को ज्ञान व् विद्या प्रदान कर ॥ --
क्योंकि : --
विद्या ददाति विनयम विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रता धनमाप्नोति धनाद धर्म: तत : सुखम् ॥
बिद्या बिनु बिद्वान भए गुन बिनु भए गनमान ।
सत्ता निसदिन माँगती तिनके कर बलिदान ॥ ३३१० ॥
भावार्थ : -- जब विद्या विहीन विद्वान् व् गुण विहीन गणमान्य हो जाएँ, तब विद्या निसदिन उनके हाथों जनसामान्य की बलि माँगती है ॥
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