लोक प्रसासन नाउ के राजसी किए सिंगार ।
बिनसे संचित सम्पदा बिपदा के भरमार ॥३२९१॥
भावार्थ : -- वर्तमान में प्रचलित राजसी श्रृंगार किए लोकतंत्र में चयनित व्यक्ति सेवक बनकर कर राज करता हुवा राजा है जो न राज धर्म का निर्वहन करता है न सेवा धर्म का । यह लोगों के लिए छलावा सिद्ध हो रहा है । संचित धन-सम्पदा का जितना दोहन इस तंत्र ने किया उतना किसी ने नहीं किया समाप्त होती इस सम्पदा के साथ विपदाओं की व् समस्याओं की भी सर्वाधिकता है ॥
माया मद ते आँधरा बधिरा प्रभुता संग ।
साँचे बोल न देइया झूठे केर प्रसंग ॥ ३२९२॥
भावार्थ : -- माया व् प्रभूता के मद से अंधा व् बहरा हुवा मृषा का प्रसंग कर यह सत्य को मौन कर देता है ॥
खाद अखादन खाइये नित नव नार सँजोग ।
तासों भइले रोगिले उपजावत नव रोग ॥ ३२९३॥
भावार्थ : -- छद्म लोकतंत्र अखाद्य खाद्यान के सेवन को प्रेरित करता है और नित नव नारी के प्रसंग इसके लिए व्यभिचार नहीं शिष्टाचार है । उससे नए नए रोगों का प्रादुर्भाव हुवा रोगग्रस्त समाज का निर्माण होता गया अब तो निरोग्य ढूंढने से भी नहीं मिलते ॥
जनमत केरे राज में जनमानस अधिकाए ।
जीवन जोवन आपना जीवन धन बिनसाए ॥ ३२९४ ॥
भावार्थ : - तथाकथित इस जनमत के तंत्र में मनुष्य की संख्या अत्यधिक हो गई ॥ बी प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन संधारण हेतु जीवन धन का ही ह्रास करने में संलिप्त है ॥ यदि जीवन धन का ही ह्रास से संधारण कैसे होगा ॥
इसलिए युद्धकाल में ह्रास होता जीवन धन यदि कागजी टुकड़ों से मिले तो उसे प्राप्त करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए.....
जल अरु अन्न ते बढ़ के धन सम्पद नहि कोइ ।
सुभाषित बचन ते बढ़े कोउ रतन नहि होइ ॥ ३२९५ ॥
भावार्थ : -- क्योंकि : -- जल से बढ़कर कोई सम्पदा नहीं है अन्न से बढ़कर कोई धन नहीं है सुभाषित वचनों से बढ़कर कोई रत्न नहीं है ॥
सुवारथ के परायना, अर्थ केर सब नीति ।
नित नव नवल भेस भरी सोई रीत कुरीति ॥ ३२९६ ॥
भावार्थ : -- अर्थ की नीतियां समस्त विश्व के कल्याण हेतु निरुपित की गई थी तथाकथित जनतांत्रिक व्यवस्था में वह मैं और मेरा की संकुचित मानसिकता के वशीभूत होती गई । पूर्व में जो रीतियाँ कुरीतियां थीं नित नवीन वेश धारण कर वह अब भी समाज के सम्मुख उपस्थित रहती है ॥
पाँखि बिनहि सब पाँखि भए उड़ उड़ चले अगास ।
देस प्रदेस दूषित किए करत जगत पर्यास ॥ ३२९७ ॥
भावार्थ : -- सुखसाधनों का उपयोग संसार को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों हेतु होना चाहिए । पंखहीन होकर लोग यदि पक्षी हो जाए ये भूचर न होकर गगनचर हो जाएँ तब उनके घर घर न होकर घोंसलें ही होंगे। अधुनातन प्रदूषित वातावरण व् जलवायु का असंतुलन इन जीव- संसाधनों के दुरूपयोग का परिणाम है ॥
धी रहे न ध्यान रहे, न गुन रहे न ग्यान ।
चारि आखरि जान किए रावन सा अभिमान ॥ ३२९८ ॥
भावार्थ : -- उदर पूर्ति के लिए ग्रहण की गई शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान ही है । जन मानस में विवेक नहीं रहा मनन शीलता के अभाव से सद्विचारों अभाव हो गया । मनुष्य गुणहीन होकर ज्ञान से विपन्न हो गया चार अक्षर को जानकर वह रावण के जैसा अभिमान करने लगा ॥
हमारे वृद्ध कहते लो रामायण पढ़कर सुना दो तब अभिमान तो ऐसा होता ओह ! हमारे जैसा वेदाचार्य कहीं दुनिया में नहीं मिलेगा.....
पुरान पंथी जान के किए जिनका अपमान ।
ग्यान गोचर रूप में सो तो परम सुजान ॥ ३२९९॥
भावार्थ : -- पुराण पंथी जन के तथाकथित लोकतंत्रिक इस देश ने जिनका अपमान किया । ज्ञान से परिपूर्ण परम विद्वान् थे । ज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य गुणवान होता है ॥
कलुषित सुख सम्पद संग मुख मुख भए सब काहि ।
जा मुख सुनिए राम कथा, ता मुख मिलिया नाहि ॥ ३३०० ॥
भावार्थ : - पापमयी सुख सम्पदा दस मुखी से भी परतस होकर अधिमुखी हो गए । अब वह मुख नहीं मिलता जिससे भगवान की कथा सुनी जाए । माया की महिमा इतनी हो गई कि कथावाचक अब तो संडास में बैठे को भी कथा सुनाने पहुँच जाते हैं ॥
सत्य नया-पुराना नहीं होता सत्य सदैव सत्य होता है..... धर्म क्या ही ? सत्य है दया है दान है और तप है.....
बिनसे संचित सम्पदा बिपदा के भरमार ॥३२९१॥
भावार्थ : -- वर्तमान में प्रचलित राजसी श्रृंगार किए लोकतंत्र में चयनित व्यक्ति सेवक बनकर कर राज करता हुवा राजा है जो न राज धर्म का निर्वहन करता है न सेवा धर्म का । यह लोगों के लिए छलावा सिद्ध हो रहा है । संचित धन-सम्पदा का जितना दोहन इस तंत्र ने किया उतना किसी ने नहीं किया समाप्त होती इस सम्पदा के साथ विपदाओं की व् समस्याओं की भी सर्वाधिकता है ॥
माया मद ते आँधरा बधिरा प्रभुता संग ।
साँचे बोल न देइया झूठे केर प्रसंग ॥ ३२९२॥
भावार्थ : -- माया व् प्रभूता के मद से अंधा व् बहरा हुवा मृषा का प्रसंग कर यह सत्य को मौन कर देता है ॥
खाद अखादन खाइये नित नव नार सँजोग ।
तासों भइले रोगिले उपजावत नव रोग ॥ ३२९३॥
भावार्थ : -- छद्म लोकतंत्र अखाद्य खाद्यान के सेवन को प्रेरित करता है और नित नव नारी के प्रसंग इसके लिए व्यभिचार नहीं शिष्टाचार है । उससे नए नए रोगों का प्रादुर्भाव हुवा रोगग्रस्त समाज का निर्माण होता गया अब तो निरोग्य ढूंढने से भी नहीं मिलते ॥
जनमत केरे राज में जनमानस अधिकाए ।
जीवन जोवन आपना जीवन धन बिनसाए ॥ ३२९४ ॥
भावार्थ : - तथाकथित इस जनमत के तंत्र में मनुष्य की संख्या अत्यधिक हो गई ॥ बी प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन संधारण हेतु जीवन धन का ही ह्रास करने में संलिप्त है ॥ यदि जीवन धन का ही ह्रास से संधारण कैसे होगा ॥
इसलिए युद्धकाल में ह्रास होता जीवन धन यदि कागजी टुकड़ों से मिले तो उसे प्राप्त करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए.....
जल अरु अन्न ते बढ़ के धन सम्पद नहि कोइ ।
सुभाषित बचन ते बढ़े कोउ रतन नहि होइ ॥ ३२९५ ॥
भावार्थ : -- क्योंकि : -- जल से बढ़कर कोई सम्पदा नहीं है अन्न से बढ़कर कोई धन नहीं है सुभाषित वचनों से बढ़कर कोई रत्न नहीं है ॥
सुवारथ के परायना, अर्थ केर सब नीति ।
नित नव नवल भेस भरी सोई रीत कुरीति ॥ ३२९६ ॥
भावार्थ : -- अर्थ की नीतियां समस्त विश्व के कल्याण हेतु निरुपित की गई थी तथाकथित जनतांत्रिक व्यवस्था में वह मैं और मेरा की संकुचित मानसिकता के वशीभूत होती गई । पूर्व में जो रीतियाँ कुरीतियां थीं नित नवीन वेश धारण कर वह अब भी समाज के सम्मुख उपस्थित रहती है ॥
पाँखि बिनहि सब पाँखि भए उड़ उड़ चले अगास ।
देस प्रदेस दूषित किए करत जगत पर्यास ॥ ३२९७ ॥
भावार्थ : -- सुखसाधनों का उपयोग संसार को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों हेतु होना चाहिए । पंखहीन होकर लोग यदि पक्षी हो जाए ये भूचर न होकर गगनचर हो जाएँ तब उनके घर घर न होकर घोंसलें ही होंगे। अधुनातन प्रदूषित वातावरण व् जलवायु का असंतुलन इन जीव- संसाधनों के दुरूपयोग का परिणाम है ॥
धी रहे न ध्यान रहे, न गुन रहे न ग्यान ।
चारि आखरि जान किए रावन सा अभिमान ॥ ३२९८ ॥
भावार्थ : -- उदर पूर्ति के लिए ग्रहण की गई शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान ही है । जन मानस में विवेक नहीं रहा मनन शीलता के अभाव से सद्विचारों अभाव हो गया । मनुष्य गुणहीन होकर ज्ञान से विपन्न हो गया चार अक्षर को जानकर वह रावण के जैसा अभिमान करने लगा ॥
हमारे वृद्ध कहते लो रामायण पढ़कर सुना दो तब अभिमान तो ऐसा होता ओह ! हमारे जैसा वेदाचार्य कहीं दुनिया में नहीं मिलेगा.....
पुरान पंथी जान के किए जिनका अपमान ।
ग्यान गोचर रूप में सो तो परम सुजान ॥ ३२९९॥
भावार्थ : -- पुराण पंथी जन के तथाकथित लोकतंत्रिक इस देश ने जिनका अपमान किया । ज्ञान से परिपूर्ण परम विद्वान् थे । ज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य गुणवान होता है ॥
कलुषित सुख सम्पद संग मुख मुख भए सब काहि ।
जा मुख सुनिए राम कथा, ता मुख मिलिया नाहि ॥ ३३०० ॥
भावार्थ : - पापमयी सुख सम्पदा दस मुखी से भी परतस होकर अधिमुखी हो गए । अब वह मुख नहीं मिलता जिससे भगवान की कथा सुनी जाए । माया की महिमा इतनी हो गई कि कथावाचक अब तो संडास में बैठे को भी कथा सुनाने पहुँच जाते हैं ॥
सत्य नया-पुराना नहीं होता सत्य सदैव सत्य होता है..... धर्म क्या ही ? सत्य है दया है दान है और तप है.....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें