पुरबल कर कृपन ते यह संचित सम्पद पाए ।
गिन गिन के गन नाथ भए अरु बिन बिन के खाए ॥ ३२८१ ॥
भावार्थ : -- पूर्वजों की कृपणता से ही यह धन सम्पदा हमें संचित रूप में प्राप्त हुई । कपोत-वृत्ति का अनुपालन करते अतिशय यत्न से यह राष्ट्र संगठित राष्ट्र बना । यदि वे भी हमारे जैसे होते तो हम कैसे होते ? हम होते ही नहीं होते तो दरिद्र होते । कोई इसे विघटित करते हुवे विभाजित करेगा तब कितना बुरा लगेगा
बिलकुल बावन पत्ते के जैसे.....
देख जोख धन बरतिये पाल पोष सब काय ।
संचित निधि संचित रहे अरु नव नव उपजाए ॥ ३२८२ ॥
भावार्थ : -- धन को यत्न पूर्वक व्यय करना चाहिए । ऐसे व्यय करना चाहिए जिसमें सभी निकाय परिपुष्ट हों संतुलित हो । संचित निधि संचित ही रहे सत्प्रयास से धन के स्त्रोतों का वर्द्धन कर नई नई निधियां उपजाएं ॥
जीउ जोग भए अल्पतस संसाधन अधिकाए ।
मानस तेरा जीउना जीवन नित बिनसाए ॥ ३२८३ ॥
भावार्थ : -- जीवन हेतु ( जीवन के लिए आवश्यक हेतु : जैसे जल अन्न आदि ) अल्पतस हो गए और सुख- सुविधाएं अत्यधिक हो जाए तब संतुलन कैसे होगा ? संसाधनों की अधिकता ने जीवन को न्यूनतम कर दिया, पृथ्वी में कुछ अद्भुत है तो वह जीवन है, मानव की जीवन चर्या पृथ्वी के जीवन को निरंतर नष्ट कर रही है । जनगणना के साथ पशु-पक्षियों की गणना भी तो करो ये पूर्व में कितने थे अब कितने हैं ।
नदी नीर बिहीन भई, बँधे सेतु पर सेतु ।
जी जब जोग न पाइये त साधन केहि हेतु ॥ ३२८४ ॥
भावार्थ : -- नदियां जल से विहीन हो गई जल है की वह मलीन हो गया । और उसपर सेतु बंधे जा रहे हैं । जब जीवन यापन के आवश्यक हेतु की हीनता संसाधनों को निरुद्देश्य कर देगी । भारत सहित समस्त विश्व के सत्ताधारी प्राथमिकता निर्धारित करने में असफल सिद्ध हो रहे हैं । प्रथमतस क्या चाहिए जल कि सेतु,? जीवन कि जीवन हेतु ? खेत चाहिए कि उद्योग ? जब इसका निर्णय जन मानस स्वयं करने लगेगा तब कदाचित ईश्वर इस छद्म लोकतंत्र के साम्राज्य से भी ऊब जाएगा वह शासक नहीं शासन तंत्र को परिवर्तन करने चल पड़ेगा.....
चारि दिवस का जीउना जामें दोई रात ।
बसुहु बसा बसुधा हेतु होत सकल उत्पात ॥ ३२८५ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य का जीवन चार दिवस का है । जिसमें दो रात्र भी सम्मिलित हैं जो शयन में व्यतीत हो जाती हैं । अब तक जितने उत्पात हुवे स्त्री, वसुधा और धन-सम्पदा के लिए हुवे ॥ अब इससे न्यारा क्या होगा ॥
खाएँ पिएँ सोएं रहे अरु काज करें नहि कोए ।
जो ऐसेउ बिचारिये सो तो जड़मति होए ॥ ३२८६ ॥
भावार्थ : -- खाएं पिएँ आनंद मनाएं और कोई काम न करें जो शासन तंत्र ऐसी भोगवादिता का समर्थक हो, मनुष्य के द्वारा केवल मनुष्य के लिए हो वह विध्वंसकारी तंत्र है ।
बुद्धिमंत केरी भुजा होत प्रलंबित भूरि ।
प्रहार सकै करियन सो तिन्ह सोंहि बहु दूरि ॥ ३२८७ ॥
----- ॥ पंचतंत्र ॥ -----
भावार्थ : -- बुद्धमन्त की भुजाएँ अतिशय प्रलंबित होती हैं जिसके द्वारा वह दूर तक वार करने में सक्षम होता है ॥
अब के भारत का किसान निर्धन क्यों है ? क्यों की उसे किसानी करनी तो आ गई व्यापार करना नहीं आया.....
घोर अँधेरि नगरिया अरु जहँ चौपट राउ ।
सुबरनहू तहँ मेलिही पीतर केरे भाउ ॥ ३२८८ ॥
भावार्थ : -- जिस राष्ट्र का शासन प्रबंधन अकुशल हाथों में होता है उस राष्ट्र का सोना भी पीतल के मोल बिकता है ॥
आन देस का राहिला मैदा केर समान ।
भारत केरा ओदनहु, पाकत भए पकवान ॥ ३२८९॥
भावार्थ : - पड़ोसी देशों के ३०० रूपए किलो वाले बेसन से कोई कोई पकवान बनने लगो तो उसका बीस रूपए किलो वाला नूडल बन जाता ही है । भारत का ......किलो वाले चावल को पकाओ तो सुस्वादु पकौड़ियाँ व् अन्य सुस्वादु पकवान प्राप्त होते हैं स्वाद तो किसी भी मोल में मिल जाए है न ॥
भारत देस तेउ इतर सहँगे अन्न बिसाए ।
कच्चा पक्का खाए सो अपनी देह नसाए ॥ ३२९०॥
भावार्थ : -- भारत का अन्न बल व् बुद्धि वर्द्धक होता है जो पड़ोसी का सस्ता वाला अन्न बिसाता है । अधपका भोजन का सेवन कर पाने उदर को कचरा घर बनाता है शारीरिक शक्ति को क्षीण कर वह अपना स्वास्थ बिगाड़ता है ।
राजू : -- हाँ तो पड़ोसी का सस्ते, अधपके भोजन से जो बुद्धि घुटने में आ गई है वह एड़ी में स्लीप हो जाए इससे पहले
भारत का अन्न खाओ - बल बुद्धि बढ़ाओ
कृषि के क्षेत्र में शहस्त्राब्दियों का अनुभव ---- टिंग टाँग
कार्य-कुशल व्यक्ति के लिए यश और धन का अभाव नहीं होता.....
------ ॥ अज्ञात ॥ -----
गिन गिन के गन नाथ भए अरु बिन बिन के खाए ॥ ३२८१ ॥
भावार्थ : -- पूर्वजों की कृपणता से ही यह धन सम्पदा हमें संचित रूप में प्राप्त हुई । कपोत-वृत्ति का अनुपालन करते अतिशय यत्न से यह राष्ट्र संगठित राष्ट्र बना । यदि वे भी हमारे जैसे होते तो हम कैसे होते ? हम होते ही नहीं होते तो दरिद्र होते । कोई इसे विघटित करते हुवे विभाजित करेगा तब कितना बुरा लगेगा
बिलकुल बावन पत्ते के जैसे.....
देख जोख धन बरतिये पाल पोष सब काय ।
संचित निधि संचित रहे अरु नव नव उपजाए ॥ ३२८२ ॥
भावार्थ : -- धन को यत्न पूर्वक व्यय करना चाहिए । ऐसे व्यय करना चाहिए जिसमें सभी निकाय परिपुष्ट हों संतुलित हो । संचित निधि संचित ही रहे सत्प्रयास से धन के स्त्रोतों का वर्द्धन कर नई नई निधियां उपजाएं ॥
जीउ जोग भए अल्पतस संसाधन अधिकाए ।
मानस तेरा जीउना जीवन नित बिनसाए ॥ ३२८३ ॥
भावार्थ : -- जीवन हेतु ( जीवन के लिए आवश्यक हेतु : जैसे जल अन्न आदि ) अल्पतस हो गए और सुख- सुविधाएं अत्यधिक हो जाए तब संतुलन कैसे होगा ? संसाधनों की अधिकता ने जीवन को न्यूनतम कर दिया, पृथ्वी में कुछ अद्भुत है तो वह जीवन है, मानव की जीवन चर्या पृथ्वी के जीवन को निरंतर नष्ट कर रही है । जनगणना के साथ पशु-पक्षियों की गणना भी तो करो ये पूर्व में कितने थे अब कितने हैं ।
नदी नीर बिहीन भई, बँधे सेतु पर सेतु ।
जी जब जोग न पाइये त साधन केहि हेतु ॥ ३२८४ ॥
भावार्थ : -- नदियां जल से विहीन हो गई जल है की वह मलीन हो गया । और उसपर सेतु बंधे जा रहे हैं । जब जीवन यापन के आवश्यक हेतु की हीनता संसाधनों को निरुद्देश्य कर देगी । भारत सहित समस्त विश्व के सत्ताधारी प्राथमिकता निर्धारित करने में असफल सिद्ध हो रहे हैं । प्रथमतस क्या चाहिए जल कि सेतु,? जीवन कि जीवन हेतु ? खेत चाहिए कि उद्योग ? जब इसका निर्णय जन मानस स्वयं करने लगेगा तब कदाचित ईश्वर इस छद्म लोकतंत्र के साम्राज्य से भी ऊब जाएगा वह शासक नहीं शासन तंत्र को परिवर्तन करने चल पड़ेगा.....
चारि दिवस का जीउना जामें दोई रात ।
बसुहु बसा बसुधा हेतु होत सकल उत्पात ॥ ३२८५ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य का जीवन चार दिवस का है । जिसमें दो रात्र भी सम्मिलित हैं जो शयन में व्यतीत हो जाती हैं । अब तक जितने उत्पात हुवे स्त्री, वसुधा और धन-सम्पदा के लिए हुवे ॥ अब इससे न्यारा क्या होगा ॥
खाएँ पिएँ सोएं रहे अरु काज करें नहि कोए ।
जो ऐसेउ बिचारिये सो तो जड़मति होए ॥ ३२८६ ॥
भावार्थ : -- खाएं पिएँ आनंद मनाएं और कोई काम न करें जो शासन तंत्र ऐसी भोगवादिता का समर्थक हो, मनुष्य के द्वारा केवल मनुष्य के लिए हो वह विध्वंसकारी तंत्र है ।
बुद्धिमंत केरी भुजा होत प्रलंबित भूरि ।
प्रहार सकै करियन सो तिन्ह सोंहि बहु दूरि ॥ ३२८७ ॥
----- ॥ पंचतंत्र ॥ -----
भावार्थ : -- बुद्धमन्त की भुजाएँ अतिशय प्रलंबित होती हैं जिसके द्वारा वह दूर तक वार करने में सक्षम होता है ॥
अब के भारत का किसान निर्धन क्यों है ? क्यों की उसे किसानी करनी तो आ गई व्यापार करना नहीं आया.....
घोर अँधेरि नगरिया अरु जहँ चौपट राउ ।
सुबरनहू तहँ मेलिही पीतर केरे भाउ ॥ ३२८८ ॥
भावार्थ : -- जिस राष्ट्र का शासन प्रबंधन अकुशल हाथों में होता है उस राष्ट्र का सोना भी पीतल के मोल बिकता है ॥
आन देस का राहिला मैदा केर समान ।
भारत केरा ओदनहु, पाकत भए पकवान ॥ ३२८९॥
भावार्थ : - पड़ोसी देशों के ३०० रूपए किलो वाले बेसन से कोई कोई पकवान बनने लगो तो उसका बीस रूपए किलो वाला नूडल बन जाता ही है । भारत का ......किलो वाले चावल को पकाओ तो सुस्वादु पकौड़ियाँ व् अन्य सुस्वादु पकवान प्राप्त होते हैं स्वाद तो किसी भी मोल में मिल जाए है न ॥
भारत देस तेउ इतर सहँगे अन्न बिसाए ।
कच्चा पक्का खाए सो अपनी देह नसाए ॥ ३२९०॥
भावार्थ : -- भारत का अन्न बल व् बुद्धि वर्द्धक होता है जो पड़ोसी का सस्ता वाला अन्न बिसाता है । अधपका भोजन का सेवन कर पाने उदर को कचरा घर बनाता है शारीरिक शक्ति को क्षीण कर वह अपना स्वास्थ बिगाड़ता है ।
राजू : -- हाँ तो पड़ोसी का सस्ते, अधपके भोजन से जो बुद्धि घुटने में आ गई है वह एड़ी में स्लीप हो जाए इससे पहले
भारत का अन्न खाओ - बल बुद्धि बढ़ाओ
कृषि के क्षेत्र में शहस्त्राब्दियों का अनुभव ---- टिंग टाँग
कार्य-कुशल व्यक्ति के लिए यश और धन का अभाव नहीं होता.....
------ ॥ अज्ञात ॥ -----
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