गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३०॥ -----


ज्ञानद कतहुँ रहे नहीं रहे न सुबुध सुजान । 
ज्ञान आप जिन चाहिबे सोइ बतावैं ज्ञान ॥ ३३०१ ॥ 

भावार्थ : --  ज्ञान दाता अब नहीं है विद्वान् भी नहीं रहे, जिन्हें स्वयं ज्ञान  की आवष्यकता है वेज्ञान बताते हैं जिन्हें स्वयं विद्या की अवष्यकत है वे विद्वान् कहलाते हैं जिन्हें अनुशासन  की आवष्यकता  है वे शासन कर रहे हैं ॥ 

साँच अहइ मतिहीन कू बिरथा सब उपदेस । 
धुबिया बस के का करे दिगम्बरी के देस ॥ ३३०२ ॥
भावार्थ : -- सत्य है मूर्खों को उपदेस व्यर्थ होते हैं । बुद्धिहीन की बस्ती में उपदेसक बस के करेगा भी क्या ॥ 

पाठ पराया पढ़त भए चरित हीन सब कोए । 
कै कंचन के कामिनी बिषय जनावा दोए ॥ ३३०३ ॥ 
भावार्थ : - परायों की पढ़ाई पट्टी में आकर अपनों के साथ  पराए भी चरित्र हीन हो चले  । ऐसी पढ़ाई पढ़ कर  इन्हें दो ही विषयों की विशेषज्ञता प्राप्त हुई पैसे की या स्त्री की ॥ 

सत्ता से पैसा बहुंत आता है ये बिना पंख के पंछी बना देती है हवा में उड़ा देती है भई । 

राजू : -- हाँ ! हमारे देश में तो इसके पास जादू का पानी है ये पढ़े बिना ही डाक्टर इंजिनियर और न जाने क्या क्या बन देती है । अब लोग रोग से नहीं बल्कि उलटी सीधी औषधि खाने से और इधर के उधर की शल्य क्रिया  से मर रहे हैं । हमारे यहाँ की सड़के v शेप में टर्न होती है पूल पूछते हैं मैं कब गिरूँ.....? 

 धर्म चरन बिसारी के चरित हीन सहचारि । 
जब को जनिमन जामिया पलक देइ परिहारि ॥ ३३०४ ॥ 
भावार्थ : -- विवाह एक संस्था है संस्था में अधिकार व् कर्तव्य दोनों निहित होते हैं  चरित्र हीन के परस्पर सहगमन से धर्म चरण का निर्वहन नहीं होता । ऐसे सहगमन से उत्पन्न संतति  तत्काल ही त्याग दी जाती है  ऐसी संततियां के लिए उत्तरदायी कौन है ? समाज या देश या वह न्यायालय जो ऐसे सम्बन्धों की स्वीकृति का निर्णय करता आया है ॥ 

अनाचारि अपचरनि भए जन जन के प्रतिमान । 
अजहुँ जगत भर अपूरे कामग की संतान  ॥ ३३०५ ॥ 
भावार्थ : -  अब अनाचारी दुराचारी दुष्कर्मी लोगों के आदर्श हो चले हैं, तब फिर ऐसों के बच्चे सच्चे कैसे होंगे । अधुनातन विश्व अनैतिक सम्बन्धों से उत्पन्न संतानों से भर गया है,  देश-विदेश में ऐसी संतानों की संख्या अध्ययन का विषय हैं इनके क्रियाकलाप का समाज व् देश पर पड़ता प्रभाव शोध का विषय हैं ॥

निज कुल जात न जान सो कुलोदभव कहलात । 
बिधि बिरोधि जातक अजहुँ कहलावैं अभिजात ॥ ३३०६॥  
भावार्थ : - जिन्हें  अपने कुल का पता नहीं जात का पता नहीं पिता के पितरों का पता नहीं वे अब खानदानी कहलाते हैं । अनैतिक सम्बन्धों से उत्पन्न संताने अब अभिजात्य वर्ग कहलाने लगी है ।

कुलोदभव अथवा खानदानी किसे कहते हैं : --  पवित्रता , मर्यादा, शीलता, दान- धर्म, सत्कर्म आदि सद्गुणों से उत्तम कुल का उद्भव होता है ऐसे कुल में उत्पन्न संतान को कुलोद्भव कहते हैं ,  ऐसे कुल के समूह को अभिजात्य वर्ग कहते हैं ॥

अबिधिक जनित न जानिबे मात  पिता कुल जात ।
बयस बूढ भयसि तापर कुँअरु साह कहलात ॥ ३३०७ ॥ 
भावार्थ : -- अवैधानिक संताने अपने मात- पिता का नाम ज्ञात नहीं होता उन्हें अपने कुल व् जाति का भी ज्ञान नहीं होता । आयु व्यतीत होती जाती है बूढ़े हो जाते हैं तथापि ये कुंआरे ही कैसे रहते हैं भई ?

राजू : -- जादू के पानी से.....

जगत कल्याण हेतु किए गए कार्य विधि सम्मत व् विपरीत कार्य विधि विरुद्ध होते हैं ।

जोग पाद पिठाईं जो नहीं केहि के जोग । 
उपरितन भए को एक दुइ पचि मुइ केतक लोग ॥ ३३०८॥ 
भावार्थ : -- योग्य पदों पर उन्हें पीठासीन किया जो किसी योग्य नहीं है । यत् किंचित  का ऊँचा उठाने  व् कतिपय नेताओं के सम्मान करने में उनके नीचे दबकर कितने मरे,  कौन मरे,  कैसे मरे इसका आकलन करने  का समय किसके पास है ॥ 

बिनवत जग करि जोरि के सुनहु सब बिधि बिधान । 
जुगता को पद दीजिये, दारिदी को ग्यान ॥ ३३०९ ॥ 
भावार्थ : -- यह जगज्जन करबद्ध होकर कहता है: --  हे विश्व  के विधाता तू योग्य को ही पदारूढ़ित करने का विधान कर धन से मन से तन से दरिद्र को ज्ञान व् विद्या प्रदान कर  ॥ -- 
क्योंकि : -- 

विद्या ददाति विनयम विनयाद्याति पात्रताम् । 
पात्रता धनमाप्नोति धनाद धर्म: तत : सुखम् ॥ 

  बिद्या बिनु बिद्वान भए गुन बिनु भए गनमान । 
सत्ता निसदिन माँगती तिनके कर बलिदान ॥ ३३१० ॥ 
भावार्थ : -- जब विद्या विहीन विद्वान् व् गुण विहीन गणमान्य हो  जाएँ, तब  विद्या निसदिन उनके  हाथों जनसामान्य की बलि माँगती है ॥ 

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२९॥ -----

लोक प्रसासन नाउ के राजसी किए सिंगार । 
बिनसे संचित सम्पदा बिपदा के भरमार ॥३२९१॥ 
भावार्थ : --  वर्तमान में प्रचलित राजसी श्रृंगार किए लोकतंत्र में चयनित व्यक्ति सेवक बनकर कर राज करता हुवा राजा है जो न राज धर्म का निर्वहन करता है न सेवा धर्म का । यह लोगों के लिए छलावा सिद्ध हो रहा है । संचित धन-सम्पदा का  जितना दोहन इस  तंत्र ने किया उतना किसी ने नहीं किया समाप्त होती इस सम्पदा के साथ विपदाओं की व् समस्याओं की भी सर्वाधिकता है ॥

माया मद ते आँधरा बधिरा प्रभुता संग । 
साँचे बोल न देइया झूठे केर प्रसंग ॥ ३२९२॥ 
भावार्थ : --  माया व् प्रभूता  के मद से अंधा व् बहरा हुवा मृषा का प्रसंग कर यह सत्य को मौन कर देता है ॥

खाद अखादन खाइये नित नव नार सँजोग । 
तासों भइले रोगिले उपजावत नव रोग ॥ ३२९३॥ 
भावार्थ : -- छद्म लोकतंत्र अखाद्य खाद्यान के सेवन को प्रेरित करता है और नित नव नारी के प्रसंग इसके लिए व्यभिचार नहीं शिष्टाचार है ।  उससे नए नए रोगों का प्रादुर्भाव हुवा रोगग्रस्त समाज का निर्माण होता गया अब तो निरोग्य ढूंढने से भी नहीं मिलते ॥

जनमत केरे राज में जनमानस अधिकाए । 
जीवन जोवन आपना जीवन धन बिनसाए ॥ ३२९४ ॥ 
भावार्थ : - तथाकथित इस जनमत के तंत्र में मनुष्य की संख्या अत्यधिक हो गई ॥ बी प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन संधारण हेतु  जीवन धन का ही  ह्रास करने में संलिप्त है ॥  यदि जीवन धन का ही ह्रास से संधारण कैसे होगा ॥

इसलिए युद्धकाल में ह्रास होता जीवन  धन यदि कागजी टुकड़ों से मिले तो उसे प्राप्त करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए.....

जल अरु अन्न ते बढ़ के धन सम्पद नहि कोइ । 
सुभाषित बचन ते बढ़े कोउ रतन  नहि होइ ॥ ३२९५ ॥ 
भावार्थ : -- क्योंकि : -- जल  से बढ़कर कोई सम्पदा नहीं है अन्न से बढ़कर कोई धन नहीं है  सुभाषित वचनों से बढ़कर कोई रत्न नहीं है ॥ 

सुवारथ के परायना,  अर्थ केर सब नीति ।
नित नव नवल भेस  भरी सोई रीत कुरीति ॥ ३२९६ ॥
भावार्थ : -- अर्थ की नीतियां समस्त विश्व के कल्याण हेतु निरुपित की गई थी तथाकथित जनतांत्रिक व्यवस्था में  वह मैं और मेरा की संकुचित मानसिकता के वशीभूत होती गई ।  पूर्व में जो रीतियाँ कुरीतियां थीं  नित नवीन वेश धारण कर वह अब भी समाज के सम्मुख उपस्थित रहती है ॥

पाँखि बिनहि सब पाँखि भए उड़ उड़ चले अगास । 
देस प्रदेस दूषित किए करत जगत पर्यास ॥ ३२९७ ॥ 
भावार्थ : -- सुखसाधनों का उपयोग संसार को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों हेतु होना चाहिए ।  पंखहीन होकर लोग यदि पक्षी हो जाए ये भूचर न होकर गगनचर हो जाएँ  तब उनके घर घर न होकर घोंसलें ही होंगे। अधुनातन प्रदूषित वातावरण व्  जलवायु का असंतुलन इन जीव- संसाधनों के दुरूपयोग का परिणाम है ॥


धी रहे न ध्यान रहे, न गुन रहे न ग्यान । 
चारि आखरि जान किए रावन सा अभिमान ॥ ३२९८ ॥  
भावार्थ : -- उदर पूर्ति के लिए ग्रहण की गई शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान ही है । जन मानस में विवेक नहीं रहा   मनन शीलता के अभाव से सद्विचारों अभाव हो गया ।  मनुष्य गुणहीन होकर ज्ञान से विपन्न हो गया चार अक्षर को जानकर वह रावण के जैसा अभिमान करने लगा ॥

हमारे वृद्ध कहते लो रामायण पढ़कर सुना दो तब अभिमान तो ऐसा होता ओह ! हमारे जैसा वेदाचार्य  कहीं दुनिया में नहीं मिलेगा.....

पुरान पंथी जान के किए जिनका अपमान । 
ग्यान गोचर रूप में सो तो परम सुजान ॥ ३२९९॥ 
भावार्थ : -- पुराण पंथी जन के तथाकथित लोकतंत्रिक इस देश ने जिनका अपमान किया । ज्ञान से परिपूर्ण परम विद्वान् थे ।  ज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य गुणवान होता है  ॥

कलुषित सुख सम्पद संग मुख मुख भए सब  काहि । 
जा मुख सुनिए राम कथा, ता मुख मिलिया नाहि ॥ ३३०० ॥ 

भावार्थ : - पापमयी सुख सम्पदा  दस मुखी से भी परतस होकर अधिमुखी हो गए । अब  वह मुख नहीं मिलता जिससे भगवान की कथा सुनी जाए । माया की महिमा  इतनी हो गई कि कथावाचक अब तो संडास में बैठे को भी कथा सुनाने पहुँच जाते हैं ॥  

सत्य नया-पुराना नहीं होता सत्य सदैव सत्य होता है..... धर्म क्या ही ? सत्य है दया है  दान है और तप है..... 

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२८ ॥ -----

पुरबल कर कृपन ते यह संचित सम्पद पाए । 
गिन गिन के गन नाथ भए अरु बिन बिन के खाए ॥ ३२८१ ॥ 
भावार्थ : --  पूर्वजों की कृपणता से ही यह धन सम्पदा हमें संचित रूप में प्राप्त  हुई ।  कपोत-वृत्ति का अनुपालन करते अतिशय यत्न से यह राष्ट्र संगठित राष्ट्र बना । यदि वे भी हमारे जैसे होते तो हम कैसे होते ? हम होते ही नहीं होते तो दरिद्र होते । कोई इसे विघटित करते हुवे विभाजित करेगा तब  कितना बुरा लगेगा

बिलकुल बावन पत्ते के जैसे.....

देख जोख धन बरतिये पाल पोष सब काय । 
 संचित निधि संचित रहे अरु नव नव उपजाए ॥ ३२८२ ॥ 
भावार्थ : -- धन को यत्न पूर्वक व्यय करना चाहिए ।  ऐसे व्यय करना चाहिए जिसमें सभी निकाय परिपुष्ट हों संतुलित हो । संचित निधि संचित ही रहे सत्प्रयास से धन के स्त्रोतों का वर्द्धन कर नई नई निधियां उपजाएं ॥


जीउ जोग भए अल्पतस संसाधन अधिकाए । 
मानस तेरा जीउना जीवन नित बिनसाए ॥ ३२८३ ॥ 

भावार्थ : -- जीवन हेतु ( जीवन के लिए आवश्यक  हेतु : जैसे जल अन्न आदि ) अल्पतस हो गए और सुख- सुविधाएं अत्यधिक हो जाए तब संतुलन कैसे होगा ?  संसाधनों की अधिकता ने जीवन को  न्यूनतम कर दिया,  पृथ्वी में कुछ अद्भुत है तो वह जीवन है,  मानव की जीवन चर्या पृथ्वी के जीवन को निरंतर नष्ट कर रही है ।  जनगणना के साथ पशु-पक्षियों की गणना भी तो करो ये पूर्व में कितने थे अब कितने हैं ।

नदी नीर बिहीन भई, बँधे सेतु पर सेतु । 

जी जब जोग न पाइये त साधन केहि हेतु ॥ ३२८४ ॥ 

भावार्थ : -- नदियां जल से विहीन हो गई जल है की वह मलीन हो गया  । और उसपर सेतु बंधे जा रहे हैं । जब जीवन यापन के आवश्यक हेतु की हीनता  संसाधनों को निरुद्देश्य कर देगी  । भारत सहित समस्त विश्व के सत्ताधारी प्राथमिकता निर्धारित  करने में असफल सिद्ध हो रहे हैं । प्रथमतस क्या चाहिए जल कि सेतु,? जीवन कि जीवन हेतु ? खेत चाहिए कि उद्योग ?  जब  इसका निर्णय जन मानस स्वयं करने लगेगा तब कदाचित ईश्वर इस छद्म लोकतंत्र के साम्राज्य से  भी ऊब जाएगा वह शासक नहीं शासन तंत्र को  परिवर्तन करने चल पड़ेगा.....

चारि दिवस का जीउना  जामें दोई रात । 
बसुहु बसा बसुधा हेतु होत  सकल उत्पात ॥ ३२८५ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य का जीवन चार दिवस का है । जिसमें दो रात्र भी सम्मिलित हैं जो शयन में व्यतीत हो जाती हैं । अब तक जितने उत्पात हुवे स्त्री, वसुधा और धन-सम्पदा  के लिए हुवे ॥ अब इससे न्यारा क्या होगा ॥ 



खाएँ पिएँ सोएं रहे अरु काज करें नहि कोए । 
जो ऐसेउ बिचारिये सो तो जड़मति होए ॥ ३२८६ ॥ 
भावार्थ : -- खाएं पिएँ आनंद मनाएं और कोई काम न करें जो शासन तंत्र ऐसी भोगवादिता का समर्थक हो,  मनुष्य के द्वारा केवल मनुष्य के लिए हो वह विध्वंसकारी तंत्र है ।

बुद्धिमंत केरी भुजा होत प्रलंबित भूरि । 
प्रहार सकै करियन सो तिन्ह सोंहि बहु दूरि ॥ ३२८७ ॥ 
----- ॥  पंचतंत्र ॥ -----
भावार्थ : --  बुद्धमन्त की भुजाएँ अतिशय प्रलंबित होती हैं जिसके द्वारा वह दूर तक वार करने में सक्षम होता है  ॥

अब के भारत का  किसान निर्धन क्यों है ? क्यों की  उसे किसानी करनी तो आ गई व्यापार करना नहीं आया.....

घोर अँधेरि नगरिया अरु जहँ चौपट राउ । 
सुबरनहू तहँ मेलिही पीतर केरे भाउ ॥ ३२८८ ॥ 
भावार्थ : -- जिस राष्ट्र का शासन प्रबंधन अकुशल हाथों में होता है  उस राष्ट्र का सोना भी पीतल के मोल बिकता है ॥

आन  देस का राहिला मैदा केर समान । 
भारत केरा ओदनहु, पाकत भए पकवान ॥ ३२८९॥ 
भावार्थ : - पड़ोसी देशों के  ३०० रूपए किलो वाले बेसन से कोई कोई पकवान बनने लगो तो उसका बीस रूपए किलो वाला नूडल बन जाता ही  है । भारत का ......किलो वाले चावल को पकाओ तो सुस्वादु पकौड़ियाँ व् अन्य सुस्वादु पकवान प्राप्त होते हैं  स्वाद तो किसी भी मोल में मिल जाए है न ॥

भारत देस तेउ इतर सहँगे अन्न बिसाए  । 
कच्चा पक्का खाए सो अपनी देह नसाए ॥ ३२९०॥ 
भावार्थ : -- भारत का अन्न बल व् बुद्धि वर्द्धक होता है जो पड़ोसी का सस्ता वाला अन्न बिसाता है । अधपका भोजन का सेवन कर पाने उदर को कचरा घर बनाता है शारीरिक शक्ति को क्षीण कर वह अपना स्वास्थ बिगाड़ता है  ।

राजू : -- हाँ तो पड़ोसी का सस्ते,  अधपके  भोजन से जो बुद्धि घुटने में आ गई है वह  एड़ी में स्लीप हो जाए इससे पहले



भारत का अन्न खाओ - बल बुद्धि बढ़ाओ
 कृषि के क्षेत्र में शहस्त्राब्दियों का अनुभव ---- टिंग टाँग

कार्य-कुशल व्यक्ति के लिए यश और धन का अभाव नहीं होता.....
 ------ ॥ अज्ञात ॥ -----

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...