परे देस परबासिया होत बिमुख निज ईस ।
एक आध ते पूरन भए बहुरि कोटि पच्चीस ॥ ३२ ७१ ॥
भावार्थ : -- अपने ईश्वर से विमुख होकर दास के वेश में आते हैं ये प्रवासी । देश को लूटते हैं फिर उसपर अत्याचार करते ये शताब्दियों तक राज कर फिर उसपर अत्याचार हैं । उसे विभाजित करते हैं और कहीं नहीं जाते..... पहले आधे रहते हैं फिर एक हो जाते हैं फिर करोड़ों में व्याप्त होकर संख्यावादी लोकतंत्र से देश को पुनश्च नियंत्रित करते हैं......
आन परे परबासिया, भए सब उलटे जाप ।
पाप करम भयऊ धर्म धर्म कर्म भए पाप ॥ ३२७२ ॥
भावार्थ : -- जबस प्रवासी आ पड़े तब से सभी जप उलटे हो गए राम नहीं कहते अब लोग मरा पुकारते हैं पाप कर्म बी धर्म हो गए धर्म पाप हो गया पीने-खाने वाले सम्मानित व् व्रताचरणी अपमानित होने लगे । कृषिकर्म अब निकृष्ट हो गया लुहारी जुहारी उत्तम हो गए ।
बाँबी जैसे देस भए लागे कोष बिमौट ।
दल रहे न दलपत रहे कोट रहे नहि कोट ॥ ३२७३॥
भावार्थ : -- कोष में जब दीमक लग जाते हैं तब राष्ट्र दीमक का टीला बन जाता है । फिर न तो दल रहता न दलपति दुर्ग भी दुर्ग नहीं रहता अर्थात संगठित राष्ट्र विघटित होने लगता है परिणाम में विभाजन प्राप्त होता है...... कारण ?
बाबि सरिस जो देस किए तामें बसिहि भुजंग ।
सीस उठाई बिष देत ब्यापिहि सकल अंग ॥ ३२ ७४ ॥
भावार्थ : -- राष्ट्र जब दीमक का टीला बन जाता है तब उसमें भुजंग का वास होने लगता है । ये भुजंग फन फैलाते विष उगलते हुवे राज्य के प्रबंधन अंगों पर व्याप्त हो जाते हैं और संगठित राष्ट्र विघटित होने लगता है ॥
कारण कि विपरीत स्वभाव के जीव एक साथ नहीं रह सकते जहां रहते हैं वहां जंगल राज होता है ॥
सुख साधन धन धाम ते भरे मिले जो देस ।
परबसिया तहँ जा पड़ें भर भर दासा भेस ॥ ३२७५॥
भावार्थ - जो देश सुखकर साधन व् धन धाम से परिपूर्ण होता है ये प्रवासी दास बनकर वहीँ पड़े रहते हैं ये स्वयं कुमार्गी होते हैं इनके सानिध्य में सन्मार्गी भी कुमार्गी हो जाते हैं । काल जनित कष्ट कभी न कभी सभी पर आता है ये उसे सह नहीं पाते
खोखला हो गया है तुम्हारा राष्ट्र - थोथ चंने बजते मधूर हैं थोड़े दिन और बजा लो
जित देख तित भुजग बसे, होत धर्म ते हींन ।
बिघन बीन बजाई बिनु भुजग न होत अधीन ॥३२७६॥
भावार्थ : -- यदि चारों ओर भुजंग बसे दिखाई देने लगें इसका अर्थ है हम धर्म से विहीन हो गए हैं । विध्न की बीन ये भुजंग वश में नहीं आते ॥ अब या तो हम धर्मी हो जाएँ अन्यथा युद्ध का होना तय है ||
परबसिया का लूटना परबसिया की खोरि ।
परबसिया का राजना जेत कहो सो थोरि ॥ ३२७७ ॥
भावार्थ -- प्रवासियों का लूटना प्रवासियों की खोरी ( पान-खान ) प्रवासियों का शासन काल व् तत्समय का अत्याचार यह एक अकथ कहानी है ॥
सत्ता केरे स्वार्थि चिंता करे न कोइ ।
देस दुआरा आपना चिंता आपनि होइ ॥ ३२७८॥
भावार्थ -- सत्ता के लालचियों को केवल अपनी चिंता होती ही ओर किसी की नहीं । राष्ट्र हमारा है उसकी चिंता भी हमें ही करनी होगी ।।
बन बन दिए जब मनि रतन खेत कनक उपजाए ।
आन पड़ें परबासिया, पकी पकाई खाएँ ॥ ३२ ७९ ॥
भावार्थ : -- वन जब वनोपज न देकर मणि रत्न देते हैं खेत अन्न न उपजा कर स्वर्ण उपजाते हैं ।
पकी पकाई खाने को तब ये खंजन आते हैं ॥
देस निबसिया खेत में भए कोल्हु के बैल ।
परबसिया कन पाइया पहन राजसी चैल ॥३२८० ॥
भावार्थ ; - देश के मूल निवासी खेतों में कोल्हू के बैल बने अन्न उपजाते हैं । ये खंजन ( प्रवासी) उत्तम उत्तम वस्त्र धारण किए शीतल वातावरण में बैठे उस अन्न के अधिकारी हो जाते हें ॥ तनिक अपने अपने देश में देखिये तो इन प्रवासियों का वास्तविक उत्पादन में कितना योगदान है, कर में कितना योगदान है । नहीं है तो इनसे खेत में हल चलवाओ ॥
अपने पहरे जागिये नहि परि रहियो सोए ।
ना जाने छिन एकै मैं किसका पहरा होए ॥
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- सोए न पड़े रहें जागते रहें, राज्य अपना है राज भी अपना ही हो । सोए रहे तो न जाने किसका राज हो जाए ॥