न्याय केरा अधिकरन जहाँ जाए तहँ पाए ।
हे रे हेरा देख्या मिला न कतहुँ न्याय ॥ ३२४१ ॥
भावार्थ : -- न्याय के अधिकरण जहाँ गए वहाँ मिले। जब न्याय ढूंढ कर देखा तो वह कहीं नहीं मिला ॥
यह जग निरा स्वारथी देखे अपना लाह ।
बलबन के सब होइया निर्बल के को नाह ॥ ३२४२ ॥
भावार्थ : -- यह विश्व नितांत स्वार्थी है जो केवल अपना ही लाभ देखता है । बलवान के सब हैं, निर्बल का यहां कोई नहीं है ॥
राम किसन कर देस यह जाने सब रन नीति ।
धर्मातिचारी ऊपर जीत यहां की रीति ॥३२४३ ॥
भावार्थ : -- इस देश को कोई निर्बल समझने की भूल न करे । यह देश राम और कृष्ण का देश है । इसे रण की सभी नीतियां आती हैं । धर्म व् न्याय के अतिक्रमणकारियों पर विजय प्राप्त करना इसकी रीति है ॥
जुझाउनी बाज अहहीं थोड़ बहुँत सब पाहि ।
सो कारी रन करिअ का जिन्ह बजाउ न आहि ॥ ३२४४ ॥
भावार्थ : - जुझाऊ बाजे न्यूनाधिक सभी के पास हैं । वह योद्धा युद्ध क्या करेंगे जिन्हें ये बाजे बजाने ही नहीं आते केवल सजाने आते हैं ॥
जो अरि चोट चपेट किए कहत ताहि हथियार ।
जो रहैं धरे के धरे सो तो होत कबार ॥ ३२ ४५ ॥
भावार्थ : -- राष्ट्र व् उसके वासियों की रक्षा हेतु शत्रु को चोटिल करने में जिसका प्रयोग हो वह लोहा भी आयुध कहलाता है । जो इधर उधर सड़ा रहता हो पड़ा रहता हो वह आयुध आयुध न होकर लोहा हो जाता है ॥
भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज ।
रावन हो कि रामराज, जमन कि आँगलि राज ।३२४६ ।
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज जमन राज हो या फिर अंगेरजी राज, सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥
अजहुँ त हाथ पसार के माँग रहे हैं न्याय ।
न तरु खेत करि मेलिबो, और न कोउ उपाय ॥ ३२ ४७ ॥
भावार्थ : -- अभी यह समय हाथ पसारे न्याय मांग रहा है । दे दो ! अन्यथा संग्राम के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न होगा ॥
है धर्म संग्राम येह, नहि कायर का काम ।
सीस माँगे सीस दियो चाम माँगे त चाम ॥ ३२४८ ॥
भावार्थ : -- यह धर्म संग्राम होगा इसमें कायरों का कुछ काम न होगा । ये सीस मांगेगा सीस देना पड़ेगा, चाम मांगेगा चाम देना पड़ेगा ॥
मैं रन खेत बुहारिया जामें बोया धर्म ।
उपजत जूँ नीपजेगा, मेंटेगा सब मर्म ॥ ३२४९ ॥
भावार्थ : -- मैने खेत में बुहारी देकर ( खेत तैयार करके ) धर्म बोया है । यह व्युतपन्न होकर ज्युहीं मूल को प्राप्त होगा त्यूंहीं संसार दुःख व् पीड़ा से मुक्त हो जाएगा ॥
अधुनै पलकन्हि पट दिए, सुतया अँखड़ी मूँद ।
जगत जोत जग जाएगा पड़े समय की बूँद ॥ ३२५ ०॥
भावार्थ : - यह धर्म रूपी बीज यद्यपि अभी सुसुप्त अवस्था में है, समय की बूँद पड़ते ही यह जागती हुई ज्योति के साथ ही जब यह जागृत हो जाएगा ॥
यहां निबासी कौन है कौन इहाँ परबासि ।
रन भूमि के तीर खड़ा पूछेगा मुठि कासि ॥ ३२५१ ॥
भावार्थ : -- इस देश के निवासी कौन हैं ? प्रवासी कौन है ? रण-भूमि के मुहाने पर खड़े होकर यह प्रश्न करते हुवे उसकी मुट्ठियाँ कसी होंगी ॥
करे करम का लेखनी लिखे भाग के लेख ॥
तेरे सिर तलबारि अरि, देख सके तो देख ॥ ३२५२ ।
भावार्थ : -- किए कर्मों की लेखनी से ही यह हस्त भाग्य के लेख लिखता है । रे संसार के शत्रु तेरी लेखनी तेरे भाग्य में शीश पर तलवार लिख रही है देख सके तो देख ॥
आया जो घर छोड़ के बहोरि सो फिरि जाए ॥
धरम केर संग्राम में न त रहु सीस बिनाए ॥ ३२५३ ॥
भावार्थ : -- जो अपना घर छोड़ आया है वह लौट जाए । अन्यथा इस धर्म- संग्राम में वे शीश से रहित हो जाएगा॥
यान तब तक यान है जब तक उसका कप्तान है.....
खेत कमाया कर्म हुँत बिया धरम का बीउ ।
मर्म बचन लिख जाएगा रेखत सबकी सीउँ ॥ ३२५४ ॥
भावार्थ : -- रण कर्म हेतु खेत तैयार हो गया, धर्म के बीज की बोवनी भी हो गई । यह मर्म-वचन लिख कर अपनी अपनी सीमाओं में रहने का आदेश दे जाएगा ॥
अजहुँ पलकन्हि पट दिये सुतिया अँखड़ी मूँद ।
जगत जोत जग जाएगा पड़त समय की बूँद ॥ ॥
हित करिया बस आपना किया न कासों हेत ।
सूर बीर के हाथ चढ़ कटेगा सोए खेत ॥ ३२५५॥
भावार्थ : -- जिसने केवल स्वयं के प्रयोजनों को सिद्ध किया । जिसको किसी पर दया नहीं आई जिसने किसी से प्रेम नहीं किया, किसी का कल्याण नहीं किया । सूर वीर के हत्थे चढ़ खेत में वही कटेगा ॥
मैं पूछा रे काल कूँ करन चला संग्राम ॥
तू करता तू कारना करिया मेरा नाम ॥ ३२५६॥
भावार्थ : - मैं ने पूछा हे काल ! तुम युद्ध क्यूँ चाहते हो ? काल ने उत्तर दिया रण- कर्त्ता तुम ही हो कारण भी तुम ही हो मैं निमित्त मात्र हूँ तुमने नाम मेरा कर दिया युद्ध में नहीं तुम चाहते हो ।
कारन जहाँ जन्माया जोधन जनिआ तहहिं।
तुम कारन मति जामियो जोधन होउ न कहहिं ॥ ३२५७॥
भावार्थ : -- कार्य बिना कारण के नहीं होता । कारणों की व्युतपत्ती से ही युद्ध उत्पन्न होता है । तुम कारण उत्पन्न मत करो युद्ध कहीं नहीं होगा ।
जो मुख साँचा बोलिये अगजग बैरी होए ।
पड़िया लोहा लेवना औरु उपाय न कोए ॥ ३२ ५८॥
भावार्थ : --यदि कोई सत्य कहे तो संसार उसका विरोधी हो जाता हैं । ऐसी स्थिति में लोहा लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहता ॥
बँधे कसाई खूँट जो सीस देत जिअ जाहि ।
रोक सके तो रोक ले जो को बिघन न चाहि ॥ ३२५९ ॥
भावार्थ : -- जो कसाई के खूंटे बंध के शीश और चर्म का बलिदान कर रहे हैं । युद्ध न चाहने वाले शान्ति प्रिय लोग नृसंस हत्या करते उन क्रूर नपुंसक कसाइयों को रोके ॥
पाल पराया पोषिया बासन दिया पड़ोस ।
सींउ पारगत झूझिया वका को न दोष ॥ ३२६० ॥
भावार्थ : - जिन परायों ने इस देश को लूट उन्हें पाल पोष कर मुस्टंडे कर दिया और बसने को पड़ोस भी दे दिया । मर्यादाओं का उल्लंघन कर नित्य विध्वंश हेतु उतारू रहने वालों को रोक सको तो रोको ॥
हे रे हेरा देख्या मिला न कतहुँ न्याय ॥ ३२४१ ॥
भावार्थ : -- न्याय के अधिकरण जहाँ गए वहाँ मिले। जब न्याय ढूंढ कर देखा तो वह कहीं नहीं मिला ॥
यह जग निरा स्वारथी देखे अपना लाह ।
बलबन के सब होइया निर्बल के को नाह ॥ ३२४२ ॥
भावार्थ : -- यह विश्व नितांत स्वार्थी है जो केवल अपना ही लाभ देखता है । बलवान के सब हैं, निर्बल का यहां कोई नहीं है ॥
राम किसन कर देस यह जाने सब रन नीति ।
धर्मातिचारी ऊपर जीत यहां की रीति ॥३२४३ ॥
भावार्थ : -- इस देश को कोई निर्बल समझने की भूल न करे । यह देश राम और कृष्ण का देश है । इसे रण की सभी नीतियां आती हैं । धर्म व् न्याय के अतिक्रमणकारियों पर विजय प्राप्त करना इसकी रीति है ॥
जुझाउनी बाज अहहीं थोड़ बहुँत सब पाहि ।
सो कारी रन करिअ का जिन्ह बजाउ न आहि ॥ ३२४४ ॥
भावार्थ : - जुझाऊ बाजे न्यूनाधिक सभी के पास हैं । वह योद्धा युद्ध क्या करेंगे जिन्हें ये बाजे बजाने ही नहीं आते केवल सजाने आते हैं ॥
जो अरि चोट चपेट किए कहत ताहि हथियार ।
जो रहैं धरे के धरे सो तो होत कबार ॥ ३२ ४५ ॥
भावार्थ : -- राष्ट्र व् उसके वासियों की रक्षा हेतु शत्रु को चोटिल करने में जिसका प्रयोग हो वह लोहा भी आयुध कहलाता है । जो इधर उधर सड़ा रहता हो पड़ा रहता हो वह आयुध आयुध न होकर लोहा हो जाता है ॥
भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज ।
रावन हो कि रामराज, जमन कि आँगलि राज ।३२४६ ।
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज जमन राज हो या फिर अंगेरजी राज, सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥
अजहुँ त हाथ पसार के माँग रहे हैं न्याय ।
न तरु खेत करि मेलिबो, और न कोउ उपाय ॥ ३२ ४७ ॥
भावार्थ : -- अभी यह समय हाथ पसारे न्याय मांग रहा है । दे दो ! अन्यथा संग्राम के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न होगा ॥
है धर्म संग्राम येह, नहि कायर का काम ।
सीस माँगे सीस दियो चाम माँगे त चाम ॥ ३२४८ ॥
भावार्थ : -- यह धर्म संग्राम होगा इसमें कायरों का कुछ काम न होगा । ये सीस मांगेगा सीस देना पड़ेगा, चाम मांगेगा चाम देना पड़ेगा ॥
मैं रन खेत बुहारिया जामें बोया धर्म ।
उपजत जूँ नीपजेगा, मेंटेगा सब मर्म ॥ ३२४९ ॥
भावार्थ : -- मैने खेत में बुहारी देकर ( खेत तैयार करके ) धर्म बोया है । यह व्युतपन्न होकर ज्युहीं मूल को प्राप्त होगा त्यूंहीं संसार दुःख व् पीड़ा से मुक्त हो जाएगा ॥
अधुनै पलकन्हि पट दिए, सुतया अँखड़ी मूँद ।
जगत जोत जग जाएगा पड़े समय की बूँद ॥ ३२५ ०॥
भावार्थ : - यह धर्म रूपी बीज यद्यपि अभी सुसुप्त अवस्था में है, समय की बूँद पड़ते ही यह जागती हुई ज्योति के साथ ही जब यह जागृत हो जाएगा ॥
यहां निबासी कौन है कौन इहाँ परबासि ।
रन भूमि के तीर खड़ा पूछेगा मुठि कासि ॥ ३२५१ ॥
भावार्थ : -- इस देश के निवासी कौन हैं ? प्रवासी कौन है ? रण-भूमि के मुहाने पर खड़े होकर यह प्रश्न करते हुवे उसकी मुट्ठियाँ कसी होंगी ॥
करे करम का लेखनी लिखे भाग के लेख ॥
तेरे सिर तलबारि अरि, देख सके तो देख ॥ ३२५२ ।
भावार्थ : -- किए कर्मों की लेखनी से ही यह हस्त भाग्य के लेख लिखता है । रे संसार के शत्रु तेरी लेखनी तेरे भाग्य में शीश पर तलवार लिख रही है देख सके तो देख ॥
आया जो घर छोड़ के बहोरि सो फिरि जाए ॥
धरम केर संग्राम में न त रहु सीस बिनाए ॥ ३२५३ ॥
भावार्थ : -- जो अपना घर छोड़ आया है वह लौट जाए । अन्यथा इस धर्म- संग्राम में वे शीश से रहित हो जाएगा॥
यान तब तक यान है जब तक उसका कप्तान है.....
खेत कमाया कर्म हुँत बिया धरम का बीउ ।
मर्म बचन लिख जाएगा रेखत सबकी सीउँ ॥ ३२५४ ॥
भावार्थ : -- रण कर्म हेतु खेत तैयार हो गया, धर्म के बीज की बोवनी भी हो गई । यह मर्म-वचन लिख कर अपनी अपनी सीमाओं में रहने का आदेश दे जाएगा ॥
अजहुँ पलकन्हि पट दिये सुतिया अँखड़ी मूँद ।
जगत जोत जग जाएगा पड़त समय की बूँद ॥ ॥
हित करिया बस आपना किया न कासों हेत ।
सूर बीर के हाथ चढ़ कटेगा सोए खेत ॥ ३२५५॥
भावार्थ : -- जिसने केवल स्वयं के प्रयोजनों को सिद्ध किया । जिसको किसी पर दया नहीं आई जिसने किसी से प्रेम नहीं किया, किसी का कल्याण नहीं किया । सूर वीर के हत्थे चढ़ खेत में वही कटेगा ॥
मैं पूछा रे काल कूँ करन चला संग्राम ॥
तू करता तू कारना करिया मेरा नाम ॥ ३२५६॥
भावार्थ : - मैं ने पूछा हे काल ! तुम युद्ध क्यूँ चाहते हो ? काल ने उत्तर दिया रण- कर्त्ता तुम ही हो कारण भी तुम ही हो मैं निमित्त मात्र हूँ तुमने नाम मेरा कर दिया युद्ध में नहीं तुम चाहते हो ।
कारन जहाँ जन्माया जोधन जनिआ तहहिं।
तुम कारन मति जामियो जोधन होउ न कहहिं ॥ ३२५७॥
भावार्थ : -- कार्य बिना कारण के नहीं होता । कारणों की व्युतपत्ती से ही युद्ध उत्पन्न होता है । तुम कारण उत्पन्न मत करो युद्ध कहीं नहीं होगा ।
जो मुख साँचा बोलिये अगजग बैरी होए ।
पड़िया लोहा लेवना औरु उपाय न कोए ॥ ३२ ५८॥
भावार्थ : --यदि कोई सत्य कहे तो संसार उसका विरोधी हो जाता हैं । ऐसी स्थिति में लोहा लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहता ॥
बँधे कसाई खूँट जो सीस देत जिअ जाहि ।
रोक सके तो रोक ले जो को बिघन न चाहि ॥ ३२५९ ॥
भावार्थ : -- जो कसाई के खूंटे बंध के शीश और चर्म का बलिदान कर रहे हैं । युद्ध न चाहने वाले शान्ति प्रिय लोग नृसंस हत्या करते उन क्रूर नपुंसक कसाइयों को रोके ॥
पाल पराया पोषिया बासन दिया पड़ोस ।
सींउ पारगत झूझिया वका को न दोष ॥ ३२६० ॥
भावार्थ : - जिन परायों ने इस देश को लूट उन्हें पाल पोष कर मुस्टंडे कर दिया और बसने को पड़ोस भी दे दिया । मर्यादाओं का उल्लंघन कर नित्य विध्वंश हेतु उतारू रहने वालों को रोक सको तो रोको ॥
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