राम अवध के अधिराज राम अवध के पौर ।
बकुल भगत को चाहिये पूजे आपनि ठौर ॥३२३१ ॥
भावार्थ : -- भगवान श्रीराम अयोध्या के राजा हैं अयोध्या में ही उनका जन्म हुवा ( ऐसा भारत के धर्म ग्रंथों में उल्लेखित है ) । बगुले भक्तों ( परिवादी ) का धर्म जब यह कहता है कि वह अपने इष्ट देव की जन्म भूमि को पूजे किसी अन्य की नहीं.....तो उन्हें अपने इष्ट देव की जन्म भूमि को ही पूजना चाहिए ॥
छायाँ दिए फलफूल दिए सो तो गए सब भूल ।
बिरवा बसे बिरावना बिनसे बाकी मूल ॥ ३२३२ ॥
भावार्थ : -- ये प्रवासी लुटेरे जिस वृक्ष पर बसेरा करते हैं जिससे ये पोषण ग्रहण करते हैं उसी की जड़ काटने में लगे रहते हैं अत: इनसे बचकर रहना चाहिए, इन्हें अधिक अधिकार नहीं देना चाहिए, इनकी घर-वापसी के लिए तत्पर रहना चाहिए ॥
कारण की आज हमें इन डाकू लुटेरों के वंशजों से मंदिर बनाने के लिए पूछना पड़ता है
कल हमें घर बनाने के लिए पूछना पड़ेगा तो परसों साँस लेने के लिए.....
आह जबते आन पड़े परिपन्थी के पाँव ।
हरिया बन खन संग भए बिनसत सब जल ठाउँ ॥ ३२३३ ॥
भावार्थ : -- इन प्रवासियों के आगमन से पूर्व भारत का कितना स्थल मरुस्थल था अब कितना है इसका परिकलन करें तो यह सिद्ध हो जाता है कि जबसे इस देश में इन चोर लुटेरे के पांव पड़े हैं तब से यह सुजलाम सुफलाम सस्य श्यामलम् देश मरुस्थल में परिवर्तित होता चला गया ॥
जाति बरन के संग को समाज अरु समुदाइ ।
संप्रदाय के अर्थ को धर्म केर अनुयाइ ॥ ३२३४ ॥
भावार्थ : -- जाति व् वर्ण समूह से ही समाज व् समुदाय निर्मित हुवे हैं । सम्प्रदाय का अर्थ है किसी धार्मिक मत के अनुयाइयों का समूह ।
कहु समाज केहि बोलिए सम्प्रदाय में कौन ।
धरम कीन्ह पुकारिये संविधान है मौन ॥३२३५॥
भावार्थ : -- एक राष्ट्र को सम्प्रदाय व् समाज के मध्य का अंतर ज्ञात रहना चाहिए यह उसके संविधान में वर्णित व् परिभाषित होना चाहिए जो नहीं है । भारत के संविधान ने धर्म को परिभाषित किए बिना उसे निरपेक्ष कर दिया जिसके कारण आज विश्व में भारतियों की संख्या के साथ भारतीय सभ्यता व् संस्कृति भी विलुप्त हो रही है ॥
धार्मिक स्थलों पर अन्य धर्म स्थलों के निर्माण से भारतीयता विलुप्तप्राय हो जाएगी.....क्या भारतीयों को सांस्कृतिक सुरक्षा का अधिकार नहीं है.....?
नागर सों को नागरी देसज सों को देस ।
अनयानय परबासिया बसेउ आन परदेस ॥३२३६॥
भावार्थ : -- नगर वासियों से ही नगर निर्मित होते हैं और राष्ट्र में जन्मे जातकों से ही राष्ट्र निर्मित होते हैं । अन्य देशों के उपनत अथवा उनके वंशज प्रवासी कहलाते हैं नागरिक नहीं, प्रवासी कभी देशवासी नहीं होते ॥
भारत के संविधान ने प्रवासी व् देशवासियों को सांस्थानिक के समतुल्य संज्ञापित किया.....मानो यह भारत का नहीं दुनिया का संविधान है.....
जग में परधर्मवलमनि बहुलित बहुतक होइँ ।
अल्पतस भयउ भारती चिंता करे न कोइ ॥३२३६ ॥
भावार्थ : -- भारतीय धर्मों से अन्यथा धार्मिक मतावलम्बियों की संख्या बढ़ते बढ़ते विस्फोट का रूप ले चुकी है । और भारत में प्रवर्तित धार्मिक मतों के अनुयायियों की संख्या विश्व में दिन प्रति दिन अल्प हो रही है इसकी चिता किसी को नहीं है ॥
विद्यमान समय में विश्व को गण की अपेक्षा गुण की अधिक आवश्यकता है अत: गुणवान बनें.....
जनम जात जन हेतु ही होत मूल अधिकार ।
जासों पराधीन तेउ रखें देस संभार ॥३२३७ ॥
भावार्थ : -- किसी संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार देशज के लिए होने चाहिए । उसका प्रयोग राष्ट्र की मौलिकता का संरक्षण करते हुवे उसे पराधीनता से सुरक्षित करने में हो ॥
हिलगी भाल सरीर भित टूट रहे जस बान ।
धँसि बिष पीरा देइआ तैसिहु लोग बिरान ॥३२३८॥
भावार्थ : -- टूटे हुवे बाण का भाल जिसप्रकार सरीर से लगता है और धंस कर विष फैलाते हुवे पीड़ा देता है उसी पका ये पराए देश के निवासी भी देश वासी बनकर बसे रहते हैं और बुराई प्रस्तारित कर देश को हिंसा जनित पीड़ा देते हैं ॥
जाहि देस द्वार परा ताहि राम ते दूरि ।
सुरसरि कबहुँ न दरसिया पिआ पयस भर पूरि ॥ ३२ ३९ ॥
भावार्थ : -- पराए देशों के ये निवासी जिस राम के देश की द्वारी पर पड़े हैं उसी से बैर किए हैं । प्रणाम की तो क्या कहें इन्होने इस देश की गंगा जैसी पवित्र नदियों का दर्शन तक नहीं किया इनका पानी पेट भर भर कर पिया ।
अपने भाग सुभाग किए सीवाँ रेखा लेख ।
देस बासि गह बासिया खैंच दरिद की रेख ॥ ३२४० ॥
भावार्थ : --इस देश को वारंवार विभाजित कर इसकी सीमाओं को संकुचित करते हुवे ये मलेच्छ अपने भाग्य में सौभाग्य लिखते गए और देशवासियों के घरों में दारिद्र की रेखा खींचती चली गई ॥
बकुल भगत को चाहिये पूजे आपनि ठौर ॥३२३१ ॥
भावार्थ : -- भगवान श्रीराम अयोध्या के राजा हैं अयोध्या में ही उनका जन्म हुवा ( ऐसा भारत के धर्म ग्रंथों में उल्लेखित है ) । बगुले भक्तों ( परिवादी ) का धर्म जब यह कहता है कि वह अपने इष्ट देव की जन्म भूमि को पूजे किसी अन्य की नहीं.....तो उन्हें अपने इष्ट देव की जन्म भूमि को ही पूजना चाहिए ॥
छायाँ दिए फलफूल दिए सो तो गए सब भूल ।
बिरवा बसे बिरावना बिनसे बाकी मूल ॥ ३२३२ ॥
भावार्थ : -- ये प्रवासी लुटेरे जिस वृक्ष पर बसेरा करते हैं जिससे ये पोषण ग्रहण करते हैं उसी की जड़ काटने में लगे रहते हैं अत: इनसे बचकर रहना चाहिए, इन्हें अधिक अधिकार नहीं देना चाहिए, इनकी घर-वापसी के लिए तत्पर रहना चाहिए ॥
कारण की आज हमें इन डाकू लुटेरों के वंशजों से मंदिर बनाने के लिए पूछना पड़ता है
कल हमें घर बनाने के लिए पूछना पड़ेगा तो परसों साँस लेने के लिए.....
आह जबते आन पड़े परिपन्थी के पाँव ।
हरिया बन खन संग भए बिनसत सब जल ठाउँ ॥ ३२३३ ॥
भावार्थ : -- इन प्रवासियों के आगमन से पूर्व भारत का कितना स्थल मरुस्थल था अब कितना है इसका परिकलन करें तो यह सिद्ध हो जाता है कि जबसे इस देश में इन चोर लुटेरे के पांव पड़े हैं तब से यह सुजलाम सुफलाम सस्य श्यामलम् देश मरुस्थल में परिवर्तित होता चला गया ॥
जाति बरन के संग को समाज अरु समुदाइ ।
संप्रदाय के अर्थ को धर्म केर अनुयाइ ॥ ३२३४ ॥
भावार्थ : -- जाति व् वर्ण समूह से ही समाज व् समुदाय निर्मित हुवे हैं । सम्प्रदाय का अर्थ है किसी धार्मिक मत के अनुयाइयों का समूह ।
कहु समाज केहि बोलिए सम्प्रदाय में कौन ।
धरम कीन्ह पुकारिये संविधान है मौन ॥३२३५॥
भावार्थ : -- एक राष्ट्र को सम्प्रदाय व् समाज के मध्य का अंतर ज्ञात रहना चाहिए यह उसके संविधान में वर्णित व् परिभाषित होना चाहिए जो नहीं है । भारत के संविधान ने धर्म को परिभाषित किए बिना उसे निरपेक्ष कर दिया जिसके कारण आज विश्व में भारतियों की संख्या के साथ भारतीय सभ्यता व् संस्कृति भी विलुप्त हो रही है ॥
धार्मिक स्थलों पर अन्य धर्म स्थलों के निर्माण से भारतीयता विलुप्तप्राय हो जाएगी.....क्या भारतीयों को सांस्कृतिक सुरक्षा का अधिकार नहीं है.....?
नागर सों को नागरी देसज सों को देस ।
अनयानय परबासिया बसेउ आन परदेस ॥३२३६॥
भावार्थ : -- नगर वासियों से ही नगर निर्मित होते हैं और राष्ट्र में जन्मे जातकों से ही राष्ट्र निर्मित होते हैं । अन्य देशों के उपनत अथवा उनके वंशज प्रवासी कहलाते हैं नागरिक नहीं, प्रवासी कभी देशवासी नहीं होते ॥
भारत के संविधान ने प्रवासी व् देशवासियों को सांस्थानिक के समतुल्य संज्ञापित किया.....मानो यह भारत का नहीं दुनिया का संविधान है.....
जग में परधर्मवलमनि बहुलित बहुतक होइँ ।
अल्पतस भयउ भारती चिंता करे न कोइ ॥३२३६ ॥
भावार्थ : -- भारतीय धर्मों से अन्यथा धार्मिक मतावलम्बियों की संख्या बढ़ते बढ़ते विस्फोट का रूप ले चुकी है । और भारत में प्रवर्तित धार्मिक मतों के अनुयायियों की संख्या विश्व में दिन प्रति दिन अल्प हो रही है इसकी चिता किसी को नहीं है ॥
विद्यमान समय में विश्व को गण की अपेक्षा गुण की अधिक आवश्यकता है अत: गुणवान बनें.....
जनम जात जन हेतु ही होत मूल अधिकार ।
जासों पराधीन तेउ रखें देस संभार ॥३२३७ ॥
भावार्थ : -- किसी संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार देशज के लिए होने चाहिए । उसका प्रयोग राष्ट्र की मौलिकता का संरक्षण करते हुवे उसे पराधीनता से सुरक्षित करने में हो ॥
हिलगी भाल सरीर भित टूट रहे जस बान ।
धँसि बिष पीरा देइआ तैसिहु लोग बिरान ॥३२३८॥
भावार्थ : -- टूटे हुवे बाण का भाल जिसप्रकार सरीर से लगता है और धंस कर विष फैलाते हुवे पीड़ा देता है उसी पका ये पराए देश के निवासी भी देश वासी बनकर बसे रहते हैं और बुराई प्रस्तारित कर देश को हिंसा जनित पीड़ा देते हैं ॥
जाहि देस द्वार परा ताहि राम ते दूरि ।
सुरसरि कबहुँ न दरसिया पिआ पयस भर पूरि ॥ ३२ ३९ ॥
भावार्थ : -- पराए देशों के ये निवासी जिस राम के देश की द्वारी पर पड़े हैं उसी से बैर किए हैं । प्रणाम की तो क्या कहें इन्होने इस देश की गंगा जैसी पवित्र नदियों का दर्शन तक नहीं किया इनका पानी पेट भर भर कर पिया ।
अपने भाग सुभाग किए सीवाँ रेखा लेख ।
देस बासि गह बासिया खैंच दरिद की रेख ॥ ३२४० ॥
भावार्थ : --इस देश को वारंवार विभाजित कर इसकी सीमाओं को संकुचित करते हुवे ये मलेच्छ अपने भाग्य में सौभाग्य लिखते गए और देशवासियों के घरों में दारिद्र की रेखा खींचती चली गई ॥
MARUSTHALKARAN KEVAL PRADESHONKA HI NAHIN, APITU MANASIKTAKA BHI HUA HAI, JO BAHUT HI SHLAGHNIYA HAI !!!
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