अपने देस बिसारिया अपने देसाचार ।
धर्महु दुत्कृत होइहि त रहिहि कवनि आधार ॥ ३२२१ ॥
भावार्थ : -- अधुनातन भारत के आचार-विचार, आहार-विहार इस देश में ही तिरष्कृत होने लगे हैं । यदि यहाँ प्रवर्तित धर्मों को भी दुत्कारा जाएगा तब वे कहाँ अवस्थित होंगे ?
अपने तीज तिहार सों अपने देसाचार।
सुरसदन सदा सोहिआ अपने देस द्वार ॥ ३२२२ ॥
भावार्थ : -- अपने आचार- व्यवहार, अपने तीज त्यौहार, अपने देवालय अपने देश में ही अच्छे लगते हैं । धर्म का प्रसार हो उपासना पद्धतियों का नहीं.....
अधर्मी जनम जगत कर पापन के परिनाम ।
दान धरम सतकर्म सों अवतरे कोउ राम ॥ ३२२३ ॥
भावार्थ : -- दुष्ट का जन्म जन मानस के पापों का परिणाम है राम जैसे ईश्वर का अवतरण उसके दान-धर्म व सत्कर्मों की परिणिति है ॥
जगज जीवन जेन्ह के जन्में जेहि निबासु ।
सुर सदन तीरथ पुरी कहत तेहि के तासु ॥ ३२२४॥
भावार्थ : -- जिस धर्मानुयायी के इष्ट देव ने जहाँ जन्म लिया है वह स्थान उसी का तीर्थ स्थान अथवा सुर सदन कहलाता है किसी अन्य का नहीं ॥
आन देस जा बासिया जाके देस बिरान ।
जहँ जहँ तीर्थ पुरिन तहँ करष बढ़ावै जान ॥ ३२२५ ॥
भावार्थ : -- फिर किसी अन्य देश का वंशज किसी अन्य देश में जा बसता हो और जहां जहां उसके तीर्थ स्थान हैं वहां वह व्यर्थ ही विवाद उपस्थित करता हो तब उसका क्या किया जाए ?
बिराने एहि देस बसे बनि बनि डाकू चोर ।
मंदिर मंदिर लूटि के करे राज बरजोर ॥ ३२२६ ॥
भावार्थ : --एतिहास साक्षी है कि इन प्रवासियों के पूर्वज डाकू चोर बनकर भारत आए, यहाँ के मंदिरों को लूटा और बलपूर्वक राज करने लगे लोगों को ॥
धर्म करम के नाउ धरि कृत नित नौ पाषंड ।
अखंडित देस तासंग भयऊ खंडहि खंड ॥३२२७ ॥
भावार्थ : -- धर्म का पाखण्ड कर राष्ट्रों को खंड खंड करनाइनका उद्देश्य है वह लूटपाट से हो अथवा आतंक से । यह अखंडित भरत भी इनके इसीधार्मिक पाखंड से खंड खंड हो गया ॥
शहवते-परस्ती में हुवा मुल्हिद मैं इस क़दर..,
अब न ख़ुदा का खौफ़ है न अंजाम की परवाह.....
मुल्क रियाज़त से बना करते हैं सियासत से नहीं.....
मुल्ला अरुन सिखा सरिस देवें बांग बिहान ।
अजहुँ त जमनिया हुँत भए महजिद बस्तु समान ॥ ३२२८ ॥
भावार्थ : -- मुल्ला मुर्गे जैसे हो गए उनकी अजान तो जैसे बांग हो गई । मुसलमानों के लिए मस्जिद केवलमात्र एक वस्तु के सदृश्य हो गई ।
आए ब्याज भेस भरी करि करि सींवा पार ।
बस्तु धरत एहि देस पर करे तहाँ अधिकार ॥ ३२२९ ॥
भावार्थ : -- सीमाओं का अतिक्रमण कर कपट वेश धारण किए म्लेच्छ भारत में आए और आते रहे । मस्जिद अथव गिरिजाघर रूपी वस्तु को जहाँ तहाँ रखते हुए ये इस देश पर आधिपत्य निरूपित करते गए इस प्रकार विश्व में इनका प्रभुत्व स्थापित होता चला गया ॥
आन भूमि भगनाए के रचे देस पर देस ।
अजहुँ त भारत सेष ते हॉट जाएँ अवशेष ॥ ३२३० ॥
भावाथ : -- दूसरों की भूमि भवन पर बलात आधिपत्य स्थापित कर उसे विभाजित करते हुवे इनके देश पर देश बनते गए ऐसे अपाराधिक ( यौद्धिक नहीं ) साम्राज्य वाद के कारण भारत व भारतीय अब शेष से अवशेष होते जा रहें है, जो चिंतनीय है ॥
अपने तीज तिहार सों अपने देसाचार।
सुरसदन सदा सोहिआ अपने देस द्वार ॥ ३२२२ ॥
भावार्थ : -- अपने आचार- व्यवहार, अपने तीज त्यौहार, अपने देवालय अपने देश में ही अच्छे लगते हैं । धर्म का प्रसार हो उपासना पद्धतियों का नहीं.....
अधर्मी जनम जगत कर पापन के परिनाम ।
दान धरम सतकर्म सों अवतरे कोउ राम ॥ ३२२३ ॥
भावार्थ : -- दुष्ट का जन्म जन मानस के पापों का परिणाम है राम जैसे ईश्वर का अवतरण उसके दान-धर्म व सत्कर्मों की परिणिति है ॥
जगज जीवन जेन्ह के जन्में जेहि निबासु ।
सुर सदन तीरथ पुरी कहत तेहि के तासु ॥ ३२२४॥
भावार्थ : -- जिस धर्मानुयायी के इष्ट देव ने जहाँ जन्म लिया है वह स्थान उसी का तीर्थ स्थान अथवा सुर सदन कहलाता है किसी अन्य का नहीं ॥
आन देस जा बासिया जाके देस बिरान ।
जहँ जहँ तीर्थ पुरिन तहँ करष बढ़ावै जान ॥ ३२२५ ॥
भावार्थ : -- फिर किसी अन्य देश का वंशज किसी अन्य देश में जा बसता हो और जहां जहां उसके तीर्थ स्थान हैं वहां वह व्यर्थ ही विवाद उपस्थित करता हो तब उसका क्या किया जाए ?
बिराने एहि देस बसे बनि बनि डाकू चोर ।
मंदिर मंदिर लूटि के करे राज बरजोर ॥ ३२२६ ॥
भावार्थ : --एतिहास साक्षी है कि इन प्रवासियों के पूर्वज डाकू चोर बनकर भारत आए, यहाँ के मंदिरों को लूटा और बलपूर्वक राज करने लगे लोगों को ॥
धर्म करम के नाउ धरि कृत नित नौ पाषंड ।
अखंडित देस तासंग भयऊ खंडहि खंड ॥३२२७ ॥
भावार्थ : -- धर्म का पाखण्ड कर राष्ट्रों को खंड खंड करनाइनका उद्देश्य है वह लूटपाट से हो अथवा आतंक से । यह अखंडित भरत भी इनके इसीधार्मिक पाखंड से खंड खंड हो गया ॥
शहवते-परस्ती में हुवा मुल्हिद मैं इस क़दर..,
अब न ख़ुदा का खौफ़ है न अंजाम की परवाह.....
मुल्क रियाज़त से बना करते हैं सियासत से नहीं.....
मुल्ला अरुन सिखा सरिस देवें बांग बिहान ।
अजहुँ त जमनिया हुँत भए महजिद बस्तु समान ॥ ३२२८ ॥
भावार्थ : -- मुल्ला मुर्गे जैसे हो गए उनकी अजान तो जैसे बांग हो गई । मुसलमानों के लिए मस्जिद केवलमात्र एक वस्तु के सदृश्य हो गई ।
आए ब्याज भेस भरी करि करि सींवा पार ।
बस्तु धरत एहि देस पर करे तहाँ अधिकार ॥ ३२२९ ॥
भावार्थ : -- सीमाओं का अतिक्रमण कर कपट वेश धारण किए म्लेच्छ भारत में आए और आते रहे । मस्जिद अथव गिरिजाघर रूपी वस्तु को जहाँ तहाँ रखते हुए ये इस देश पर आधिपत्य निरूपित करते गए इस प्रकार विश्व में इनका प्रभुत्व स्थापित होता चला गया ॥
आन भूमि भगनाए के रचे देस पर देस ।
अजहुँ त भारत सेष ते हॉट जाएँ अवशेष ॥ ३२३० ॥
भावाथ : -- दूसरों की भूमि भवन पर बलात आधिपत्य स्थापित कर उसे विभाजित करते हुवे इनके देश पर देश बनते गए ऐसे अपाराधिक ( यौद्धिक नहीं ) साम्राज्य वाद के कारण भारत व भारतीय अब शेष से अवशेष होते जा रहें है, जो चिंतनीय है ॥
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