सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२४-२५ ॥ -----

न्याय केरा अधिकरन जहाँ जाए तहँ पाए । 
हे रे हेरा देख्या मिला न कतहुँ न्याय ॥ ३२४१ ॥ 
भावार्थ : -- न्याय के  अधिकरण जहाँ गए वहाँ मिले। जब न्याय ढूंढ कर देखा तो वह कहीं नहीं मिला ॥

यह जग निरा स्वारथी  देखे अपना लाह । 
बलबन के सब होइया निर्बल के को नाह ॥ ३२४२ ॥ 
भावार्थ : -- यह विश्व नितांत स्वार्थी है जो केवल अपना ही लाभ देखता है । बलवान के सब हैं,  निर्बल का यहां कोई  नहीं है ॥

राम किसन कर देस यह जाने सब रन नीति । 
धर्मातिचारी ऊपर जीत यहां की रीति ॥३२४३ ॥ 
भावार्थ : -- इस देश को कोई निर्बल समझने की भूल न करे । यह देश राम और कृष्ण का देश है  । इसे रण की सभी नीतियां आती हैं । धर्म व् न्याय के अतिक्रमणकारियों पर विजय प्राप्त करना इसकी रीति है ॥

जुझाउनी बाज अहहीं थोड़ बहुँत सब पाहि । 
सो कारी रन करिअ का जिन्ह  बजाउ न आहि ॥ ३२४४ ॥ 
भावार्थ : -  जुझाऊ बाजे  न्यूनाधिक सभी के पास हैं । वह योद्धा युद्ध क्या करेंगे जिन्हें ये बाजे  बजाने ही नहीं आते केवल सजाने आते हैं ॥

जो अरि चोट चपेट किए कहत ताहि हथियार । 
जो रहैं धरे के धरे  सो तो होत कबार ॥ ३२ ४५ ॥ 
भावार्थ : -- राष्ट्र व् उसके वासियों की रक्षा हेतु शत्रु को चोटिल करने में जिसका प्रयोग हो वह  लोहा भी आयुध कहलाता है । जो  इधर उधर सड़ा रहता हो पड़ा रहता हो वह आयुध आयुध न होकर लोहा हो जाता है  ॥

भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज । 
रावन हो कि रामराज, जमन कि आँगलि राज ।३२४६ । 
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज जमन राज हो या फिर अंगेरजी राज,  सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥

अजहुँ त हाथ पसार के माँग रहे हैं न्याय । 
 न तरु खेत करि मेलिबो,  और न कोउ उपाय ॥ ३२ ४७ ॥ 
भावार्थ : -- अभी यह समय हाथ पसारे न्याय मांग रहा है । दे दो ! अन्यथा संग्राम के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न होगा ॥

है धर्म संग्राम येह, नहि कायर का  काम । 
सीस माँगे सीस दियो चाम माँगे त चाम ॥ ३२४८ ॥ 
भावार्थ : -- यह धर्म संग्राम होगा इसमें कायरों का कुछ काम न होगा । ये सीस मांगेगा सीस देना पड़ेगा, चाम मांगेगा चाम देना पड़ेगा ॥

मैं रन खेत बुहारिया जामें बोया धर्म । 
उपजत जूँ  नीपजेगा, मेंटेगा सब मर्म ॥ ३२४९ ॥ 
भावार्थ : -- मैने खेत में बुहारी देकर ( खेत तैयार करके ) धर्म बोया है । यह व्युतपन्न होकर ज्युहीं मूल को प्राप्त होगा त्यूंहीं संसार दुःख व् पीड़ा से मुक्त हो जाएगा ॥

अधुनै पलकन्हि पट दिए, सुतया अँखड़ी मूँद । 
जगत जोत जग जाएगा पड़े समय की बूँद ॥ ३२५ ०॥ 
भावार्थ : -  यह धर्म रूपी बीज यद्यपि अभी सुसुप्त अवस्था में है, समय की बूँद पड़ते ही यह जागती हुई ज्योति के साथ ही जब यह जागृत हो जाएगा ॥

यहां निबासी कौन है कौन इहाँ परबासि । 
रन भूमि के तीर खड़ा पूछेगा मुठि कासि ॥ ३२५१ ॥ 


भावार्थ : -- इस देश के निवासी कौन हैं ? प्रवासी कौन है ? रण-भूमि के मुहाने पर खड़े होकर यह प्रश्न करते हुवे उसकी मुट्ठियाँ कसी होंगी ॥  

करे करम का लेखनी लिखे भाग के लेख ॥
तेरे सिर तलबारि अरि, देख सके तो देख ॥ ३२५२ ।
भावार्थ : -- किए कर्मों की लेखनी से ही यह हस्त भाग्य के लेख लिखता है । रे संसार के शत्रु  तेरी लेखनी तेरे भाग्य में शीश पर तलवार लिख रही है देख सके तो देख ॥ 

आया जो घर छोड़ के बहोरि सो फिरि जाए ॥
धरम केर संग्राम में न त रहु सीस बिनाए ॥ ३२५३ ॥
भावार्थ : --  जो अपना घर छोड़ आया है वह लौट जाए । अन्यथा इस धर्म- संग्राम में वे शीश से रहित हो जाएगा॥  

यान तब तक यान है जब तक उसका कप्तान है.....

खेत कमाया कर्म हुँत बिया धरम का बीउ ।
मर्म बचन लिख जाएगा रेखत सबकी सीउँ ॥ ३२५४ ॥
भावार्थ : -- रण कर्म हेतु खेत तैयार हो गया,  धर्म के बीज की बोवनी भी हो गई । यह मर्म-वचन लिख कर अपनी अपनी सीमाओं में रहने का आदेश दे जाएगा ॥  

अजहुँ पलकन्हि पट दिये सुतिया अँखड़ी मूँद ।
जगत जोत जग जाएगा पड़त समय की बूँद ॥ ॥ 

हित करिया बस आपना किया न कासों हेत ।
सूर बीर के हाथ चढ़ कटेगा सोए खेत ॥ ३२५५॥
भावार्थ : -- जिसने केवल स्वयं के प्रयोजनों को सिद्ध किया । जिसको  किसी पर दया  नहीं आई जिसने किसी से प्रेम नहीं किया, किसी का कल्याण नहीं किया । सूर वीर के हत्थे चढ़ खेत में वही कटेगा  ॥ 

मैं पूछा रे काल कूँ करन चला संग्राम ॥
तू करता तू कारना करिया मेरा नाम ॥ ३२५६॥
भावार्थ : - मैं ने पूछा हे काल ! तुम युद्ध क्यूँ चाहते हो ? काल ने उत्तर दिया रण- कर्त्ता  तुम ही हो कारण भी तुम ही हो मैं निमित्त मात्र हूँ तुमने नाम मेरा कर दिया युद्ध में नहीं तुम चाहते हो । 

कारन जहाँ जन्माया  जोधन जनिआ तहहिं। 
तुम कारन मति जामियो जोधन होउ न कहहिं ॥ ३२५७॥ 

भावार्थ : -- कार्य बिना कारण के नहीं होता । कारणों की व्युतपत्ती से ही युद्ध उत्पन्न होता है  । तुम कारण उत्पन्न मत करो युद्ध कहीं नहीं होगा । 

जो मुख साँचा बोलिये अगजग बैरी होए । 
पड़िया लोहा लेवना औरु उपाय न कोए ॥ ३२ ५८॥ 
भावार्थ : --यदि कोई सत्य कहे तो संसार उसका विरोधी हो जाता हैं । ऐसी स्थिति में लोहा लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहता ॥ 


बँधे कसाई खूँट जो सीस देत जिअ जाहि । 
रोक  सके तो रोक ले जो को बिघन न चाहि ॥ ३२५९ ॥ 
भावार्थ : -- जो कसाई के खूंटे बंध के शीश और चर्म का बलिदान कर रहे हैं । युद्ध न चाहने वाले शान्ति प्रिय लोग नृसंस हत्या करते उन क्रूर नपुंसक  कसाइयों को रोके ॥ 

पाल पराया पोषिया बासन दिया पड़ोस । 
सींउ पारगत झूझिया वका को न दोष ॥ ३२६० ॥ 
भावार्थ : - जिन परायों ने इस देश को लूट उन्हें पाल पोष कर मुस्टंडे कर दिया और बसने को पड़ोस भी दे दिया । मर्यादाओं का उल्लंघन कर नित्य विध्वंश हेतु उतारू रहने वालों को रोक सको तो रोको ॥ 













शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२३॥ -----

राम अवध के अधिराज राम अवध के पौर । 
बकुल भगत को चाहिये पूजे आपनि ठौर ॥३२३१ ॥ 
भावार्थ : -- भगवान श्रीराम अयोध्या के राजा हैं अयोध्या में ही उनका जन्म हुवा ( ऐसा भारत के धर्म ग्रंथों में उल्लेखित है ) ।  बगुले भक्तों ( परिवादी ) का धर्म जब यह कहता है कि वह अपने इष्ट देव की जन्म भूमि को पूजे किसी अन्य की नहीं.....तो उन्हें अपने इष्ट देव की जन्म भूमि को ही पूजना चाहिए ॥ 

छायाँ दिए फलफूल दिए सो तो गए सब भूल । 
बिरवा बसे बिरावना बिनसे बाकी मूल ॥ ३२३२ ॥ 
भावार्थ : -- ये प्रवासी लुटेरे जिस वृक्ष पर बसेरा करते हैं जिससे ये पोषण ग्रहण करते हैं उसी की जड़ काटने में लगे रहते हैं अत: इनसे बचकर रहना चाहिए, इन्हें अधिक अधिकार नहीं देना चाहिए, इनकी घर-वापसी के लिए तत्पर रहना चाहिए ॥ 

कारण की आज हमें इन डाकू लुटेरों के वंशजों से मंदिर बनाने के लिए पूछना पड़ता है 
कल हमें घर बनाने के लिए पूछना पड़ेगा तो परसों साँस लेने के लिए.....

आह जबते आन पड़े परिपन्थी के पाँव । 
हरिया बन खन संग भए बिनसत सब जल ठाउँ  ॥ ३२३३ ॥ 
भावार्थ : -- इन प्रवासियों के आगमन से पूर्व भारत का कितना स्थल मरुस्थल था अब कितना है इसका परिकलन करें तो यह सिद्ध हो जाता है कि जबसे इस देश में इन  चोर लुटेरे के पांव पड़े हैं तब से यह       सुजलाम सुफलाम सस्य श्यामलम् देश मरुस्थल में परिवर्तित होता चला गया ॥ 

जाति बरन के संग को समाज अरु समुदाइ । 
संप्रदाय के अर्थ को धर्म केर अनुयाइ ॥ ३२३४ ॥ 
भावार्थ : -- जाति व् वर्ण समूह से ही समाज व् समुदाय निर्मित हुवे हैं । सम्प्रदाय का अर्थ है किसी धार्मिक मत के अनुयाइयों का समूह । 

कहु समाज केहि बोलिए सम्प्रदाय में कौन । 
धरम कीन्ह पुकारिये संविधान है मौन ॥३२३५॥ 

भावार्थ : -- एक राष्ट्र को सम्प्रदाय व् समाज के मध्य का अंतर ज्ञात रहना चाहिए यह  उसके संविधान में वर्णित व् परिभाषित होना चाहिए जो नहीं है । भारत के संविधान ने धर्म को परिभाषित किए बिना उसे  निरपेक्ष कर दिया जिसके कारण आज विश्व में भारतियों की संख्या के साथ भारतीय सभ्यता व् संस्कृति भी विलुप्त हो रही है ॥ 

 धार्मिक स्थलों पर अन्य धर्म स्थलों के निर्माण से भारतीयता विलुप्तप्राय हो जाएगी.....क्या भारतीयों को सांस्कृतिक सुरक्षा का अधिकार नहीं है.....? 

नागर सों को नागरी देसज सों को देस । 
अनयानय परबासिया बसेउ आन परदेस ॥३२३६॥ 
भावार्थ : -- नगर वासियों से ही नगर निर्मित होते हैं और राष्ट्र में जन्मे जातकों से ही राष्ट्र निर्मित होते हैं । अन्य देशों के उपनत अथवा उनके वंशज प्रवासी कहलाते हैं नागरिक नहीं, प्रवासी कभी देशवासी नहीं होते ॥ 

भारत के संविधान ने प्रवासी व् देशवासियों को सांस्थानिक के समतुल्य संज्ञापित किया.....मानो यह भारत का नहीं दुनिया का संविधान है..... 

जग में परधर्मवलमनि बहुलित बहुतक होइँ । 
अल्पतस भयउ  भारती चिंता करे न कोइ ॥३२३६ ॥ 
भावार्थ : -- भारतीय धर्मों से अन्यथा धार्मिक मतावलम्बियों की संख्या बढ़ते बढ़ते विस्फोट का रूप ले चुकी है । और भारत में प्रवर्तित धार्मिक मतों के अनुयायियों की संख्या विश्व में दिन प्रति दिन अल्प हो रही है इसकी चिता किसी को नहीं है ॥ 

विद्यमान समय में विश्व को गण की अपेक्षा गुण की अधिक आवश्यकता है अत: गुणवान बनें.....


जनम जात जन हेतु ही होत मूल अधिकार । 
जासों पराधीन तेउ रखें देस संभार ॥३२३७ ॥ 
भावार्थ : -- किसी संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार देशज के लिए होने चाहिए । उसका प्रयोग राष्ट्र की मौलिकता का संरक्षण करते हुवे उसे पराधीनता से सुरक्षित करने में हो ॥ 

हिलगी भाल सरीर भित टूट रहे जस बान ।
धँसि  बिष पीरा देइआ  तैसिहु लोग बिरान ॥३२३८॥ 
भावार्थ : -- टूटे हुवे बाण का भाल जिसप्रकार सरीर से लगता है और धंस कर विष फैलाते हुवे पीड़ा देता है उसी पका ये पराए देश के निवासी भी देश वासी बनकर बसे रहते हैं और बुराई प्रस्तारित कर देश को हिंसा जनित पीड़ा देते हैं ॥

जाहि देस द्वार परा ताहि राम ते दूरि । 
सुरसरि कबहुँ न दरसिया पिआ पयस भर पूरि ॥ ३२ ३९ ॥ 
भावार्थ : -- पराए देशों के ये निवासी जिस राम के देश की द्वारी पर पड़े हैं उसी से बैर किए हैं । प्रणाम की तो क्या कहें इन्होने इस देश की गंगा जैसी पवित्र नदियों का दर्शन तक नहीं किया इनका पानी पेट भर भर कर पिया ।

अपने भाग सुभाग किए सीवाँ रेखा लेख  । 
देस बासि गह बासिया खैंच दरिद की रेख ॥ ३२४० ॥ 
भावार्थ : --इस देश को वारंवार विभाजित  कर इसकी सीमाओं को संकुचित करते हुवे ये मलेच्छ अपने भाग्य में सौभाग्य लिखते गए और देशवासियों के घरों में दारिद्र की रेखा खींचती चली गई ॥ 

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

----- मिनिस्टर राजू १८२ -----


" ये मुसल्ले फारस की खाडी में मस्जिद क्यों नहीं बनाते " 
राजू : -- हाँ तो बनाने के लिए पैसे न हो तो मेरे से ले लें..... 

" आह जैसे राजू के पास तो बहोत पैसे है " 
राजू : -- वैल..... पी एम से तो कम हैं, मैं उतना झूठ बोल नहीं सकता न इसलिए..... 

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२२ ॥ -----

अपने देस बिसारिया अपने देसाचार । 
धर्महु दुत्कृत होइहि त रहिहि कवनि आधार ॥ ३२२१ ॥ 
भावार्थ : -- अधुनातन भारत के आचार-विचार, आहार-विहार इस देश में ही तिरष्कृत होने लगे हैं । यदि यहाँ प्रवर्तित धर्मों को भी दुत्कारा जाएगा तब वे कहाँ अवस्थित होंगे ?

अपने तीज तिहार  सों अपने देसाचार। 
सुरसदन सदा सोहिआ अपने देस द्वार ॥ ३२२२ ॥ 
भावार्थ : -- अपने आचार- व्यवहार, अपने तीज त्यौहार, अपने देवालय अपने देश में ही अच्छे लगते हैं । धर्म का प्रसार हो उपासना पद्धतियों का नहीं.....

अधर्मी जनम जगत कर पापन के परिनाम । 
दान धरम सतकर्म सों अवतरे कोउ राम ॥ ३२२३ ॥ 
भावार्थ : -- दुष्ट का जन्म जन मानस के पापों का परिणाम है  राम जैसे ईश्वर का अवतरण उसके दान-धर्म व सत्कर्मों की परिणिति है ॥

जगज जीवन जेन्ह के जन्में जेहि निबासु । 
सुर सदन तीरथ पुरी कहत तेहि के तासु ॥ ३२२४॥ 
भावार्थ : --  जिस धर्मानुयायी के इष्ट देव ने जहाँ जन्म लिया है वह स्थान उसी का तीर्थ स्थान अथवा सुर सदन कहलाता है किसी अन्य का नहीं ॥

आन देस जा बासिया जाके देस बिरान । 
जहँ जहँ तीर्थ पुरिन तहँ करष बढ़ावै जान ॥ ३२२५ ॥ 
भावार्थ : --  फिर किसी अन्य देश का वंशज किसी अन्य  देश में जा बसता हो और जहां जहां उसके तीर्थ स्थान हैं वहां वह व्यर्थ ही विवाद उपस्थित करता हो तब उसका क्या किया जाए ?

बिराने एहि  देस बसे बनि बनि डाकू चोर । 
मंदिर मंदिर लूटि के करे राज बरजोर ॥ ३२२६ ॥ 
भावार्थ : --एतिहास साक्षी है कि इन प्रवासियों के पूर्वज डाकू चोर बनकर भारत  आए, यहाँ के मंदिरों को लूटा और बलपूर्वक राज करने लगे लोगों को ॥

धर्म करम के नाउ धरि कृत नित नौ पाषंड । 
अखंडित देस तासंग भयऊ खंडहि खंड ॥३२२७ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म का पाखण्ड कर राष्ट्रों को खंड खंड करनाइनका उद्देश्य है वह  लूटपाट से हो अथवा आतंक से । यह अखंडित भरत भी इनके इसीधार्मिक पाखंड से खंड खंड हो गया ॥


शहवते-परस्ती में हुवा मुल्हिद मैं इस क़दर..,
अब न ख़ुदा का खौफ़ है न अंजाम की परवाह.....


मुल्क रियाज़त से बना करते हैं सियासत से नहीं.....

मुल्ला अरुन सिखा सरिस देवें बांग बिहान । 
अजहुँ त जमनिया हुँत भए महजिद बस्तु समान ॥ ३२२८ ॥ 
भावार्थ : -- मुल्ला मुर्गे जैसे हो गए उनकी अजान तो जैसे बांग हो गई । मुसलमानों के लिए मस्जिद केवलमात्र एक वस्तु के सदृश्य हो गई । 

आए ब्याज भेस भरी करि करि सींवा पार । 
बस्तु धरत एहि  देस पर करे तहाँ अधिकार ॥ ३२२९ ॥ 
भावार्थ : -- सीमाओं का अतिक्रमण कर कपट वेश धारण किए म्लेच्छ भारत में आए और आते रहे । मस्जिद अथव गिरिजाघर रूपी वस्तु को जहाँ तहाँ  रखते हुए ये इस देश पर आधिपत्य निरूपित करते गए इस प्रकार विश्व में इनका प्रभुत्व स्थापित होता चला गया ॥ 

आन भूमि भगनाए के रचे देस पर देस । 
अजहुँ त भारत सेष ते हॉट जाएँ अवशेष ॥ ३२३० ॥ 
भावाथ : -- दूसरों की भूमि भवन पर बलात आधिपत्य स्थापित कर उसे विभाजित करते हुवे इनके  देश पर देश बनते गए  ऐसे अपाराधिक ( यौद्धिक नहीं ) साम्राज्य वाद के कारण  भारत व भारतीय अब शेष से अवशेष होते  जा रहें है, जो चिंतनीय है ॥






----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...