धरम माहि प्रतीति रहे जगहितकारी नीति ।
प्रभुता कबहु न परिहरै जहाँ भली सब रीति ॥ ३२०१ ॥
भावार्थ : -- जिस देश में धर्म पर विश्वास दृढ रहे और नीतियां विश्व के लिए हितकारी हों जहाँ प्रथाएं व् परम्परा हानिप्रद न होकर स्वस्थ हो उस देश को प्रभुता त्याज्य नहीं करती ॥
रीझि बूझि पर आपनी बवहिं नवहिं निज काज ।
बिचार हीन के धारे बिनसे देस समाज ॥ ३२०२ ॥
भावार्थ : --अपनी समझ पर ही मन्त्र मुग्ध होने वाले स्वार्थ सिद्धि हेतु जहाँ तहाँ सिर झुकाने वाले निर्बुद्धि की बुद्धि से देश व् समाज विलुप्त होते हैं ॥
काली करालि करतूति अनभल के यह काल ।
बड़े जहँ तहँ काक बकुल दरसे नहींं मराल ॥ ३२०३ ॥
भावार्थ : -- यह काल काली कलुषित करतूतियों का है असज्जनता का है । ऐसे में कौंवे व् बगुले जैसे अविवेकी अधिक और हंस विवेक क्वचित हो जाते हैं ॥
हाड़ तोड़ को श्रम करे, किए को करतब काल ।
याके पड़ता सब लखे याके नहि पड़ताल ॥३२०४ ॥
भावार्थ : -- कोई हाड तोड़ परिश्रम करता है कोई काले कुकरम करता है । कुत्सित काल में परश्रमी आकलन पर सभी की दृष्टि होती है कुकर्मी की पड़ताल तक कोई नहीं करता ॥
भीत भीत बिदेस बसे करिअ सेष अवसेष ।
जोइ सिँहासन धारिया सोइ लुटावै देस ॥ ३२० ५ ॥
भावार्थ : -- हंस विवेक की किञ्चितता के कारण ही अद्यावधि भारत भीतर ही भीतर खंड खंड हो गया है ये खंड छोटे बड़े विदेश बन गए हैं कहीं इस्लाम का राज चलता है तो कहीं ईसाई का तो कहीं अन्यान्य का । सत्ताधारियों में तो जैसे देश को लूटने और लुटाने की होड़ लगी है ॥
यह नदी यह नग निर्झर देख लखे सब काल ।
बेद रचि घन बन मुनिगन चहुँ पुर फिरिहि ब्याल ॥३२०६॥
भावार्थ : -- भारत की इन नदियों ने इन झरनों के इन पर्वतों ने सभी काल देखे हुवे हैं । वह वैदिक काल भी जब घने वनों से आच्छादित यह देश मुनिगण द्वारा वेदों की रचना में लयलीन था हिंसक पशु इसके चारों ओर विचरण किया करते थे ॥
सुरग अवतरित सुर सरित यह गिरि राज बिसाल ।
जहां बिराजित सिउ संभु कंठ गहे अहि माल ॥ ३२०७ ॥
भावार्थ : -- स्वर्ग से अवतरित यह सुरसरित यह हिमालय का विशाल क्षेत्र । जहाँ कंठ में अहिमाल ग्रहण किये भगवान शिव शम्भु विराजित हैं ॥
मूर्धाभिषेक सरूप येह कलस केदार ।
प्राच रूप प्राग् अभिमत जुग जुग धरे सँभार ॥ ३२०८॥
भावार्थ : -- भारत वर्ष का मूर्द्धन्याभिषेक स्वरूप यह केदारनाथ धाम है । जिसने प्राग चिन्हों सहित प्राचीन काल से चले आ रहे धार्मिक मत को युगों युगों से संजो रखा है ॥ कोई धार्मिक मत जहाँ होगा मतावलम्बी वहां नहीं होंगे तो कहाँ होंगे ।
पुराकल्प कृत पुरी यह जगत बिदित जग नाथ ।
अस्थापित हरि मूर्ति जगनमई के साथ ॥ ३२०९ ॥
भावार्थ : - धर्मावलम्बियों को मर्यादित करती जगत प्रसिद्ध यह जगन्नाथ पुरी है जो आद्य काल की कृति है । जहाँ जगन्मयी के साथ भगवान जगन्नाथ विराजित हैं इसकी मर्यादा भंग करने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है ॥
भारत बरस का द्वार यह द्वारिका धाम ।
धर्मोपदेस दय यहॉँ बिराजित घन स्याम ॥ ३२१० ॥
भावार्थ : - भारत वर्ष के द्वार को दर्शाता यह द्वारिका धाम है काबा नहीं है । धर्म का उपदेश देने वाले भगवान कृष्ण यहां विराजमान हैं ।
जमन जूह एहि देस में भरे अधिकाधिकाए ।
सुर सदनिन तीरथ पुरिन तापर एकहू नाए ॥ ३२११ ॥
भावार्थ : - कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश में मुसलमानों का एक भी तीर्थ नहीं है ॥
दान धर्म सहुँ होइआ धर्म खेत निर्मान ।
धरमात्मन होत पबित जाइ तेहि अस्थान ॥ ३२१२ ॥
भावार्थ : - दान पुण्य के आचरण से ही तीर्थ निर्मित होते हैं । तीर्थ का सेवन कर पुण्य पुरुष पवित्र होते हैं ।पापाचारी के सेवन से तीर्थ स्थान नष्ट- भष्ट होते हैं ॥
थापत संभु रामेसर, गयउ सिंधु कर पार ।
जीति सुबरन दीप प्रभो बहुरत देइ उदार ॥ ३२१३ -क॥
भावार्थ : - इस देश में भगवान के भी भगवान हैं । भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में अपने इष्टशिव शंकर जी को स्थापित किया, तत्पश्चात समुद्र पार कर पड़ोसी का सर्वनाश किया और स्वर्णमयी लंका पर विजय प्राप्त की ॥ उदारता पूर्वक उसे लौटा भी दिया । यह सन्देश देते हुवे कि भारत बुराइयों पर विजय प्राप्त करता है देशों पर नहीं.....
स्वाध्ययन सत्योधन धरम करम करताए ।
संतापित तापस चरन बिहनै सुख बरधाए ॥ ३२१३-ख ॥
----- ॥ विदूर नीति ॥ -----
भावार्थ : - आवृत्ति पूर्वक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म व् संतप्त तपस्या से अंत में सुख की वृद्धि होती है ॥
न्याय संगत बितर्कन बिधि सम्मत परमान ।
साखी दिरिस अवमति दिए नेति जोग अवज्ञान ॥ ३२१४॥
भावार्थ : -- न्याय संगत तर्क, विधि- सम्मत साक्ष्य, साक्षाद्दृश्य को तिरोहित कर दिया गया निर्णय अवज्ञा के योग्य होता है.....
धर्माधारित संहिता यह श्रुति वेद पुरान ।
भारत की संतान के अभिलेखित परमान ॥ ३२१५॥
भावार्थ : -- ये श्रुति, वेद, उपनिषद, पुराणादी संहिताएं वैदिक धर्म का प्रमाणिक आधार है भारत के वंशजों का अभिलेखित साक्ष्य हैं ॥ यहां इस्लाम स्वयं को भारत का मूल सिद्ध करने पर तुला है ॥
धर्माधारित संहिता भारत के एहि नीवँ ।
अन्यान्य दरसाइया लिखे ए देस के सीवँ ॥३२१६॥
भावार्थ : -- ये धर्माधारित संहिताएं राष्ट्र के रूप में भारत का निरूपण करती हैं । अन्य देशों के सह इनमें इस देश की सीमाओं का भी उल्लेख है । अन्य धार्मिक संप्रदाय के अनुयायि अपनी सीमाओं का साक्ष्य प्रस्तुत करें ॥
देखे लोचन साखिता यह सरजू के तीर ।
भव तारन कलिमल हरन प्रगसे जग रघुबीर ॥ ३२१७॥
भावार्थ : -- यह सरयू नदी उस समय की प्रत्यक्ष साक्षी है जब संसार से पार उतारने कलयुग के पापों को हरण करने भगवान श्री राम ने जन्म लिया ॥
चित्रकूट यह दंडक बन रगुबर कथा सुनाए ।
निसिचर हीन कर महि कस लंका दीप ढहाए ॥ ३२१८॥
भावार्थ : -- यह चित्रकूट यह दंडक वन रघुवंश मणि की गाथा सुनाते प्रतीत होते हैं कि कैसे भगवान ने भूमि को निशाचरों से विहीनं कर लंका को ढहाया था ॥
बानर केरि संरचना सागर बध यह सेतु ।
बोहिग सैल बिसाल भए पारग रबि कुल केतु ॥३२१९॥
भावार्थ : -- समुद्र में आबद्ध वानर कृत यह सुदृढ़ सेतु यह प्रमाणित करता है कि किस प्रकार तैरते हुव विशाल पाषाण जलयान बन गए और भगवान श्री राम समुद्र पार कर गए ॥
बूड़हिं आनहि बोरहीं पाहन गुन यह होंहि ।
देखिहु कतहुँ औरु तिरत त कहहु सो जग सोहि ॥ ३२२०॥
भावार्थ : - पत्थर और मूर्ख का यह अवगुण है कि वह स्वयं तो डूबता ही है दूसरों को भी डूबा देता है ॥ से समुद्र की महिमा कहें या विज्ञान का चमत्कार कहें अथवा ईश्वर की कृपा कहें कि भारत में पाषाण भी तैरते हैं पाषाणों को तैरते हुवे और कहीं देखा है देखा है तो कहाँ देखा है ?
अपने अपने धर्म में आस्था के अधिकार को धार्मिक आस्था का अधिकार कहते हैं वैदिक धर्मावलम्बियों से यह अधिकार छीना जा रहा है । अन्य सम्प्रदायों के इष्ट का जहाँ जन्म हुवा वहां यदि कोई मंदिर बने तो कैसा लगेगा ?
प्रभुता कबहु न परिहरै जहाँ भली सब रीति ॥ ३२०१ ॥
भावार्थ : -- जिस देश में धर्म पर विश्वास दृढ रहे और नीतियां विश्व के लिए हितकारी हों जहाँ प्रथाएं व् परम्परा हानिप्रद न होकर स्वस्थ हो उस देश को प्रभुता त्याज्य नहीं करती ॥
रीझि बूझि पर आपनी बवहिं नवहिं निज काज ।
बिचार हीन के धारे बिनसे देस समाज ॥ ३२०२ ॥
भावार्थ : --अपनी समझ पर ही मन्त्र मुग्ध होने वाले स्वार्थ सिद्धि हेतु जहाँ तहाँ सिर झुकाने वाले निर्बुद्धि की बुद्धि से देश व् समाज विलुप्त होते हैं ॥
काली करालि करतूति अनभल के यह काल ।
बड़े जहँ तहँ काक बकुल दरसे नहींं मराल ॥ ३२०३ ॥
भावार्थ : -- यह काल काली कलुषित करतूतियों का है असज्जनता का है । ऐसे में कौंवे व् बगुले जैसे अविवेकी अधिक और हंस विवेक क्वचित हो जाते हैं ॥
हाड़ तोड़ को श्रम करे, किए को करतब काल ।
याके पड़ता सब लखे याके नहि पड़ताल ॥३२०४ ॥
भावार्थ : -- कोई हाड तोड़ परिश्रम करता है कोई काले कुकरम करता है । कुत्सित काल में परश्रमी आकलन पर सभी की दृष्टि होती है कुकर्मी की पड़ताल तक कोई नहीं करता ॥
भीत भीत बिदेस बसे करिअ सेष अवसेष ।
जोइ सिँहासन धारिया सोइ लुटावै देस ॥ ३२० ५ ॥
भावार्थ : -- हंस विवेक की किञ्चितता के कारण ही अद्यावधि भारत भीतर ही भीतर खंड खंड हो गया है ये खंड छोटे बड़े विदेश बन गए हैं कहीं इस्लाम का राज चलता है तो कहीं ईसाई का तो कहीं अन्यान्य का । सत्ताधारियों में तो जैसे देश को लूटने और लुटाने की होड़ लगी है ॥
यह नदी यह नग निर्झर देख लखे सब काल ।
बेद रचि घन बन मुनिगन चहुँ पुर फिरिहि ब्याल ॥३२०६॥
भावार्थ : -- भारत की इन नदियों ने इन झरनों के इन पर्वतों ने सभी काल देखे हुवे हैं । वह वैदिक काल भी जब घने वनों से आच्छादित यह देश मुनिगण द्वारा वेदों की रचना में लयलीन था हिंसक पशु इसके चारों ओर विचरण किया करते थे ॥
सुरग अवतरित सुर सरित यह गिरि राज बिसाल ।
जहां बिराजित सिउ संभु कंठ गहे अहि माल ॥ ३२०७ ॥
भावार्थ : -- स्वर्ग से अवतरित यह सुरसरित यह हिमालय का विशाल क्षेत्र । जहाँ कंठ में अहिमाल ग्रहण किये भगवान शिव शम्भु विराजित हैं ॥
मूर्धाभिषेक सरूप येह कलस केदार ।
प्राच रूप प्राग् अभिमत जुग जुग धरे सँभार ॥ ३२०८॥
भावार्थ : -- भारत वर्ष का मूर्द्धन्याभिषेक स्वरूप यह केदारनाथ धाम है । जिसने प्राग चिन्हों सहित प्राचीन काल से चले आ रहे धार्मिक मत को युगों युगों से संजो रखा है ॥ कोई धार्मिक मत जहाँ होगा मतावलम्बी वहां नहीं होंगे तो कहाँ होंगे ।
पुराकल्प कृत पुरी यह जगत बिदित जग नाथ ।
अस्थापित हरि मूर्ति जगनमई के साथ ॥ ३२०९ ॥
भावार्थ : - धर्मावलम्बियों को मर्यादित करती जगत प्रसिद्ध यह जगन्नाथ पुरी है जो आद्य काल की कृति है । जहाँ जगन्मयी के साथ भगवान जगन्नाथ विराजित हैं इसकी मर्यादा भंग करने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है ॥
भारत बरस का द्वार यह द्वारिका धाम ।
धर्मोपदेस दय यहॉँ बिराजित घन स्याम ॥ ३२१० ॥
भावार्थ : - भारत वर्ष के द्वार को दर्शाता यह द्वारिका धाम है काबा नहीं है । धर्म का उपदेश देने वाले भगवान कृष्ण यहां विराजमान हैं ।
जमन जूह एहि देस में भरे अधिकाधिकाए ।
सुर सदनिन तीरथ पुरिन तापर एकहू नाए ॥ ३२११ ॥
भावार्थ : - कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश में मुसलमानों का एक भी तीर्थ नहीं है ॥
दान धर्म सहुँ होइआ धर्म खेत निर्मान ।
धरमात्मन होत पबित जाइ तेहि अस्थान ॥ ३२१२ ॥
भावार्थ : - दान पुण्य के आचरण से ही तीर्थ निर्मित होते हैं । तीर्थ का सेवन कर पुण्य पुरुष पवित्र होते हैं ।पापाचारी के सेवन से तीर्थ स्थान नष्ट- भष्ट होते हैं ॥
थापत संभु रामेसर, गयउ सिंधु कर पार ।
जीति सुबरन दीप प्रभो बहुरत देइ उदार ॥ ३२१३ -क॥
भावार्थ : - इस देश में भगवान के भी भगवान हैं । भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में अपने इष्टशिव शंकर जी को स्थापित किया, तत्पश्चात समुद्र पार कर पड़ोसी का सर्वनाश किया और स्वर्णमयी लंका पर विजय प्राप्त की ॥ उदारता पूर्वक उसे लौटा भी दिया । यह सन्देश देते हुवे कि भारत बुराइयों पर विजय प्राप्त करता है देशों पर नहीं.....
स्वाध्ययन सत्योधन धरम करम करताए ।
संतापित तापस चरन बिहनै सुख बरधाए ॥ ३२१३-ख ॥
----- ॥ विदूर नीति ॥ -----
भावार्थ : - आवृत्ति पूर्वक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म व् संतप्त तपस्या से अंत में सुख की वृद्धि होती है ॥
न्याय संगत बितर्कन बिधि सम्मत परमान ।
साखी दिरिस अवमति दिए नेति जोग अवज्ञान ॥ ३२१४॥
भावार्थ : -- न्याय संगत तर्क, विधि- सम्मत साक्ष्य, साक्षाद्दृश्य को तिरोहित कर दिया गया निर्णय अवज्ञा के योग्य होता है.....
धर्माधारित संहिता यह श्रुति वेद पुरान ।
भारत की संतान के अभिलेखित परमान ॥ ३२१५॥
भावार्थ : -- ये श्रुति, वेद, उपनिषद, पुराणादी संहिताएं वैदिक धर्म का प्रमाणिक आधार है भारत के वंशजों का अभिलेखित साक्ष्य हैं ॥ यहां इस्लाम स्वयं को भारत का मूल सिद्ध करने पर तुला है ॥
धर्माधारित संहिता भारत के एहि नीवँ ।
अन्यान्य दरसाइया लिखे ए देस के सीवँ ॥३२१६॥
भावार्थ : -- ये धर्माधारित संहिताएं राष्ट्र के रूप में भारत का निरूपण करती हैं । अन्य देशों के सह इनमें इस देश की सीमाओं का भी उल्लेख है । अन्य धार्मिक संप्रदाय के अनुयायि अपनी सीमाओं का साक्ष्य प्रस्तुत करें ॥
देखे लोचन साखिता यह सरजू के तीर ।
भव तारन कलिमल हरन प्रगसे जग रघुबीर ॥ ३२१७॥
भावार्थ : -- यह सरयू नदी उस समय की प्रत्यक्ष साक्षी है जब संसार से पार उतारने कलयुग के पापों को हरण करने भगवान श्री राम ने जन्म लिया ॥
चित्रकूट यह दंडक बन रगुबर कथा सुनाए ।
निसिचर हीन कर महि कस लंका दीप ढहाए ॥ ३२१८॥
भावार्थ : -- यह चित्रकूट यह दंडक वन रघुवंश मणि की गाथा सुनाते प्रतीत होते हैं कि कैसे भगवान ने भूमि को निशाचरों से विहीनं कर लंका को ढहाया था ॥
बानर केरि संरचना सागर बध यह सेतु ।
बोहिग सैल बिसाल भए पारग रबि कुल केतु ॥३२१९॥
भावार्थ : -- समुद्र में आबद्ध वानर कृत यह सुदृढ़ सेतु यह प्रमाणित करता है कि किस प्रकार तैरते हुव विशाल पाषाण जलयान बन गए और भगवान श्री राम समुद्र पार कर गए ॥
बूड़हिं आनहि बोरहीं पाहन गुन यह होंहि ।
देखिहु कतहुँ औरु तिरत त कहहु सो जग सोहि ॥ ३२२०॥
भावार्थ : - पत्थर और मूर्ख का यह अवगुण है कि वह स्वयं तो डूबता ही है दूसरों को भी डूबा देता है ॥ से समुद्र की महिमा कहें या विज्ञान का चमत्कार कहें अथवा ईश्वर की कृपा कहें कि भारत में पाषाण भी तैरते हैं पाषाणों को तैरते हुवे और कहीं देखा है देखा है तो कहाँ देखा है ?
अपने अपने धर्म में आस्था के अधिकार को धार्मिक आस्था का अधिकार कहते हैं वैदिक धर्मावलम्बियों से यह अधिकार छीना जा रहा है । अन्य सम्प्रदायों के इष्ट का जहाँ जन्म हुवा वहां यदि कोई मंदिर बने तो कैसा लगेगा ?
UTTAM
जवाब देंहटाएं