शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३१८- ३१९॥ -----

मैले मैले जल पवन मैले नदी पहार ।
मैले जब मन मानसा मैले सब संसार ॥ ३१८१ ॥
भावार्थ : --  जब मनुष्य का अंतरमन दूषित हो जाता है तब क्या जल- वायु क्या नदी-पहाड़ समस्त संसार ही दूषित हो जाता है ॥

बन रहे न उपबन रहें खेती रहे न खेत । 
मरू देस दरसाई के बिथुरे चहुँ पुर रेत ॥ ३१ ८२ ॥ 
भावार्थ : -- ऐसे दूषित वातावरण में वन रहते न उपवन  खेती रहती है  न खेत ।  चारों और केवल रेत- ही रेत  बिखरी होती है । हरियाली केवल चलचित्रों में ही दिखाई देती है,  देश के मानचित्र पर हरी-भरी भूमि को मरुस्थल दर्शाता हुवा एक सन्नाटा पसरा होता है ॥

 तपसी भयऊ बिनहि तप राजि बिनहि बन राजि । 
राजा भयऊ राज बिनु चहुँ पुर छाए ब्याज  ॥३१८३॥ 
भावार्थ : -- तब फिर जैसे तप किए बिना ही लोग तपस्वी कहलाने लगते हैं वृक्ष समूह से रहित स्थल वन-स्थली कहलाने लगता है । वैसे ही राज्य से रहित होकर लोग राजा कहलाने लगते हैं चारों और छल- कपट दुराचरण का ही वातावरण व्याप्त हो जाता है और अधिनायक तंत्र,  लोकतंत्र कहलाने लगता है.....

रयनिहि जग उजियार के कोयरी भई छार । 
धरा बदन मलिनाए रही पग पग पंथ गुहार ॥३१८४॥ 
भावार्थ : -- रयनी में संसार को जगमग कर कोयली राख हो चली है । बी तो मुख मलीन किए पग पग पर यह धरती प्रार्थना कर रही है कि  मुझे प्रलय को न विवश करो बस करो ॥ 


 देवारी जिन जानिआ सो तो बरती होरि । 
संचित सम्पद जर रही लगी अगन बर जोरि ॥३१८५॥ 
भावार्थ : -- जिसे दिवाली समझ रहे हो वह दिवाला निकालती जलती हुई होलिका है । संचित सम्पदा  में भीषण आग लगी है और सब कुछ जल कर भस्म हुवे जा रहा है ॥

संचित धन सँभारे जो व्ययित को उपजाए । 
होनहार की दीठ में बुद्धिमंत  कहलाए ॥ ३१ ८६ ॥ 
भावार्थ : -- जो संचित धन की सहेज कर व्ययकृत धन का उत्पादन करता हो  । आने वाली पीढ़ी की दृष्टि में वह बुद्धिमान होगा इसलिए मूर्ख मत बनो ॥

पति मरि मरि उठि चली गए रही जात उद्योग । 
कलूटी कलुषाई कू भुगत रहे हैं लोग ॥ ३१ ८७ ॥ 
भावार्थ : -- पति चले जाते हैं उद्योग यहीं रह जाते हैं ।  उनकी प्रदूषिता को यह संसार भुगतता है जो किसी नरक की यातना के सदृश होती है ॥

 मेरा मेरा करी किए तिन का तेरा कोइ । 
तेर मेर में मरी गए कछु न केहि का होइ ॥ ३१ ८८ ॥ 
भावार्थ : - मेरा मेरा करते हुवे तीन का तेरा किया । इस तेर मेर में दुनिया मर गई किसी का कुछ न हुवा ॥

भवन गए न अभूषन गए गया न एकहू चीर । 
जापर ऐतक मोहिआ गया न सोउ सरीर ॥ ३१ ८९ ॥  
भावार्थ : -- जिसके लिए लड़ मरे वो भवन गए न आभूषण गए एक कपडा तो जाता वो एक कपड़ा भी न गया । जिसपर इतने आसक्त रहे वह शरीर भी यहीं रह गया ॥

हाट हाट हटबारिया हाँके लेउ बिसाए । 
असन बसन भूषन भवन मनुहारी मन भाए ॥ ३१ ९० ॥ 
भावार्थ : : बाट बाट पर हाट लगाए जगत का व्यवहारी  ले लोsssss ले लोsssss पुकारता  रहा । भवीले भवन ले लो चमकीले भूषण ले लो चमकीले वसन ले लो मनभावन भोजन ले लोsssss ॥

हाट हाट जग जोउना लेवें कोइ बिसाए । 
आए थे क्या लाए थे जाए लेइ का जाए ॥ ३१९१ ॥ 
भावार्थ : -- हाट हाट में सुख के सभी साधन मिल रहें है कोई ले जा सके तो ले जाए । किन्तु एक बात बताएँ आए थे तब कुछ न लाए थे सो  पास में दाम नहीं था ,  अत: जाते क्या ले जाते ॥

बाट बाट  पुन मेलिआ कलजुग केरे हाट । 
बनिजत का ले जाइये गाँठी गहे न साट ॥ ३१९२॥ 
भावार्थ : -- यह कलयुग की हेचरी है यहां पग पग पुण्य मिला करते हैं । जब गाँठ में सत्कमों की साँट न हो तो फिर विक्रय कर क्या ले जाएंगे ?  फ़ोकट तो कुछ मिलता नहीं.....

गाँठ साँठी किया नहीं लिया नहीं कछु मोल । 
निस दिन मरता जीउता पड़िया अधमी खोल ॥३१ ९३ ॥   
भावार्थ : -- गाँठ में कुछ बांधा नहीं जगत का व्यवहारी सहँगे में सुख के साधन देता रहा किन्तु मैं कुछ नहीं ले पाया । इसलिए नितप्रति जीते मरते आज इस निकृष्ट देह को प्राप्त हूँ ॥

आत्मा पुराने वस्त्र त्याग कर नए वस्त्र ग्रहण करती है 
_____ ॥ भगवान श्री कृष्ण ॥ -----
पंचपरिधान बारम्बार नहीं मिला करते.....

आया था संसार में देषण को बहु रूप । 
दादुर बन पड़िया रहा काया को  कर कूप ॥ ३१९४॥ 
भावार्थ : -- विश्व - दर्शन हेतु मैने यह देह धारण की थी । किन्तु विषयों की आसक्त में मैं कूपमंडूक बना रहा विश्व तो क्या मुझे कूप के ही पूरे दर्शन न हुवे ।  देह से बहिर्गत होकर ही विश्व दर्शित होता है.....

आया है संसार में ले भगवन का नाम । 
चलता पंथ करता चल जग हित के दो काम ॥ ३१ ९५ ॥ 
भावार्थ : -- यदि संसार में आए हो तो ईश्वर का नाम लेते हुवे सत पंथ पर चलते रहना और अपनी गांठ को साँट किए हितकारी कार्य करते रहना.....

कर्म हीन पद चाहिता कर्म हार कर चाह । 
जे बिनहि कर नाम चहे जे चाहें कछु नाह ॥ ३१ ९६॥ 
भावार्थ : - अकर्मण्य को पद की लिप्सा होती है, कर्मनिष्ठ को काम की ॥ कर्महीन बिना परिश्रम की प्रसिद्धि चाहते हैं कर्मठ कुछ नहीं चाहते ॥ 

अपने जीवन हेतु जो औरन को बिसराए । 
देह कूप बहिर्गत सो जग दरसन नहि पाए ॥ ३१९७ ॥  
भावार्थ : -- उदर की परायणता में जो दूसरों का तिरष्कार करता है ऐसे कूप मंडूक को विश्व के दर्शन नहीं होते 

करनी कर कठिन थी सो कथ कथ बयस गवाएँ । 
कहने  को बस रह गया अब कछु करा न जाए ॥ ३१९८॥ 
भावार्थ : -- करनी बहुंत कठिन थी इसलिए कह कह कर समय गवां दिया । अतएव पहले कर लेवे फिर कहें अन्यथा  कहने को यही रह जाएगा कि अब काया से कुछ नहीं होता ॥ 

रोवन जीवन बहुंत था जोवन को बहु थोड़ । 
पछतावा करि पाछु मरि गया जगत को छोड़॥ ३१९९ ॥ 
भावार्थ : -- पश्चाताप को समय बहुंत मिलेगा जीवन-संधारण  हेतु अल्पहि मिलेगा । मैं जीवन पर्यन्त केवल पश्चाताप  करते हुवे इस उत्तम देह को छोड़ कर चला गया और अधम को प्राप्त हो गया तुम ऐसा मत करना ॥ 


मैं मरिया जग बोलिया रे उड़ि गया पखेर । 
पाप के भारभूत सों गिरे न लगिया बेर ॥ ३२०० -क॥ 
भावार्थ : -- जब मेरा अंत हुवा तब लोग बोले पंछी उड़ गया । पाप का भार कुछ ऐसा था कि उसके बोझ से मैं अधम गति को प्राप्त होकर सीधे नरक में जा गिरा ॥ 

मोरल ऑफ द स्टोरी 
बयसपना सत्काज सब करि करि गाँठि लगाएँ । 
पीछु पछताइब कहिए न, हा किछु करि नहि पाए ॥ ३२०० - ख ॥ 
भावार्थ : --   किसी मूर्ख ने एक बुद्धिमता के वचन कहे थे कि निर्धन जन्म होना पाप नहीं है निर्धन मरना पाप है ।  शक्ति व् सामर्थ्य रहते सत्कृत्यों के धन से धनवान होकर अपना उद्धार कर लेना चाहिए, रोते नहीं बैठे रहना चाहिए । पीछे पश्चाताप कर यह कहना न पड़े कि हम क्या नहीं कर सकते थे किन्तु हमने कुछ नहीं किया ॥ 

भाग धेय जब आपना देवन हाथ बढ़ाए । 
जग दुआरे दरसिआ को बैठा आस लगाए ॥३२०० ॥ 
भावार्थ : -- अपना  भागधेय देने जब कोई हाथ बढ़ेगा तब उसे द्वार पर जगत के प्रथम दर्शन होंगे ।







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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...