मंगलवार, 5 जनवरी 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३१७ ॥ -----

असन बसन भूषन भवन जाके माई बाप । 
आन की का बोलिये समझि न आपन आप ॥ ३१७१॥ 
भावार्थ : -- भोजन भवन वस्त्राभूषण ही जिसके माई बाप हों । वह अपने आप को भी कुछ नहीं समझता दूसरों की तो कहें क्या ॥ 

घमंड भरे ग्यान जब रचे कछुक बिग्यान । 
ता समुख भगवान कहत कहे " कौन भगवान  ?"॥३१७२॥  
भावार्थ : -- घमंड से भरा ज्ञान जब कुछ विज्ञान रच लेता है उसे भगवान समझ में नहीं आते ॥ 
भगवान ने ही यह सोचा कि इस गोल गोल पृथ्वी से कोई न गिरे इसके लिए क्या करूँ , चलो इसमें एक आकर्षण भर दूँ .....
यह आकर्षण गुरुत्वाकर्षण के नाम से प्रसिद्ध हुवा.....

संविधान कर नाउ दिए, लिखि कछु चारि बिधान । 
बिग्यान संग अबूझे समुझ न आए ग्यान ॥३१७३॥ 
भावार्थ : -- अँगरेजी में संविधान लिखने के पश्चात विधि का विधान ( ज्ञान-विज्ञानं) समझ नहीं आता ॥

अंग्रेजी केअक्षर पढने के पश्चात चतुर्वेदी को वेद-पुराण समझ नहीं आते औरों की तो कहें क्या.....

सिंहासन के लालसी जिन्हनि कहे बिरान । 
संविधान जब लिखि रहे भयऊ सोए बिधान ॥३१७४॥ 
भावार्थ : -- सत्ता के लालचियों ने पराई विधि कहकर जिसका बहिष्कार किया । संविधान लिखते समय वही विधियां विधान हो गईं ॥

संविधान अनुहार के भए सब बुद्धि बिहीन । 
नेम बिसारे आपने रहे पराए अधीन ॥ ३१७५ ॥ 
भावार्थ : - संविधान का अंधानुकरण कर भारतीय बुद्धि विहीन हो गए ।  अपने नियमों का बहिष्कार कर ये परायों के ही अधीन रहे ॥

धरम बिपरीत चलनि करि पंथी बिनु भए पंथ । 
पराए पहार बन दुरे ग्रंथी बिनु सद ग्रंथ ॥ ३१७६॥ 
भावार्थ : -- चाल- चलन धर्म के विपरीत हो गए जिसने धर्म को अनुयायियों से विहीन कर दिया लोग सत्यनिष्ठ नहीं रहे वे दयाहीन होकर लेने में ही लगे रहते  ।  विद्वानों से विहीन सद्ग्रन्थ  परिपंथ से भयभीत होकर अफ्रीका के जंगलों में छुप गए ॥

 इस पाखंड वाद ने भारत में कहीं बन छोड़े हों तो छुपे.....

सतपंथी बिथुराए जब सहचर भए परिपंथ । 
सभीत पराए बिहड़ बन दुरे पुरान सुग्रंथ ॥ ३१७७ ॥ 
भावार्थ : -- सन्मार्गी से पृथक डाकू-लुटेरे ही जब सहचर हो जाएं । तब मार्गदर्शक रूपी सद्ग्रन्थ भयभीत हो बीहड़ वनों में छुप जाते हैं ॥

सोइ महला मोहल्ला सोए मेम्बरि मेज । 
मुसलमान जिउता रहा मुवे नहीं अँगरेज ॥ ३१७८॥ 
भावार्थ : -- वही महल है वही मोहल्ले है मेम्बरी मेज भी वही है न तो मुसलमान मरे न अंग्रेज मरे लोग मर मर गए ॥

बिरावने कर गहे जब अधिकाधिक अधिकार । 
चले कँधे धर आपने करतब केरे भार ॥ ३१ ७९ ॥ 
भावार्थ : -- जिस  देश में पराए अधिकार से संपन्न होते हैं उस देश के अपने ही वंशज विपन्न होकर कर्त्तव्यों का भार ढोते चलते हैं ॥

लूट खसोट राज रजे आध देस अधियाए । 
सेष कोहु अवशेष किए बढ़े अधिकाधिकाए ॥ ३१८० ॥ 
बोलो  कौन.....?
























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