असन बसन भूषन भवन जाके माई बाप ।
आन की का बोलिये समझि न आपन आप ॥ ३१७१॥
भावार्थ : -- भोजन भवन वस्त्राभूषण ही जिसके माई बाप हों । वह अपने आप को भी कुछ नहीं समझता दूसरों की तो कहें क्या ॥
घमंड भरे ग्यान जब रचे कछुक बिग्यान ।
ता समुख भगवान कहत कहे " कौन भगवान ?"॥३१७२॥
भावार्थ : -- घमंड से भरा ज्ञान जब कुछ विज्ञान रच लेता है उसे भगवान समझ में नहीं आते ॥
भगवान ने ही यह सोचा कि इस गोल गोल पृथ्वी से कोई न गिरे इसके लिए क्या करूँ , चलो इसमें एक आकर्षण भर दूँ .....
यह आकर्षण गुरुत्वाकर्षण के नाम से प्रसिद्ध हुवा.....
संविधान कर नाउ दिए, लिखि कछु चारि बिधान ।
बिग्यान संग अबूझे समुझ न आए ग्यान ॥३१७३॥
भावार्थ : -- अँगरेजी में संविधान लिखने के पश्चात विधि का विधान ( ज्ञान-विज्ञानं) समझ नहीं आता ॥
अंग्रेजी केअक्षर पढने के पश्चात चतुर्वेदी को वेद-पुराण समझ नहीं आते औरों की तो कहें क्या.....
सिंहासन के लालसी जिन्हनि कहे बिरान ।
संविधान जब लिखि रहे भयऊ सोए बिधान ॥३१७४॥
भावार्थ : -- सत्ता के लालचियों ने पराई विधि कहकर जिसका बहिष्कार किया । संविधान लिखते समय वही विधियां विधान हो गईं ॥
संविधान अनुहार के भए सब बुद्धि बिहीन ।
नेम बिसारे आपने रहे पराए अधीन ॥ ३१७५ ॥
भावार्थ : - संविधान का अंधानुकरण कर भारतीय बुद्धि विहीन हो गए । अपने नियमों का बहिष्कार कर ये परायों के ही अधीन रहे ॥
धरम बिपरीत चलनि करि पंथी बिनु भए पंथ ।
पराए पहार बन दुरे ग्रंथी बिनु सद ग्रंथ ॥ ३१७६॥
भावार्थ : -- चाल- चलन धर्म के विपरीत हो गए जिसने धर्म को अनुयायियों से विहीन कर दिया लोग सत्यनिष्ठ नहीं रहे वे दयाहीन होकर लेने में ही लगे रहते । विद्वानों से विहीन सद्ग्रन्थ परिपंथ से भयभीत होकर अफ्रीका के जंगलों में छुप गए ॥
इस पाखंड वाद ने भारत में कहीं बन छोड़े हों तो छुपे.....
सतपंथी बिथुराए जब सहचर भए परिपंथ ।
सभीत पराए बिहड़ बन दुरे पुरान सुग्रंथ ॥ ३१७७ ॥
भावार्थ : -- सन्मार्गी से पृथक डाकू-लुटेरे ही जब सहचर हो जाएं । तब मार्गदर्शक रूपी सद्ग्रन्थ भयभीत हो बीहड़ वनों में छुप जाते हैं ॥
सोइ महला मोहल्ला सोए मेम्बरि मेज ।
मुसलमान जिउता रहा मुवे नहीं अँगरेज ॥ ३१७८॥
भावार्थ : -- वही महल है वही मोहल्ले है मेम्बरी मेज भी वही है न तो मुसलमान मरे न अंग्रेज मरे लोग मर मर गए ॥
बिरावने कर गहे जब अधिकाधिक अधिकार ।
चले कँधे धर आपने करतब केरे भार ॥ ३१ ७९ ॥
भावार्थ : -- जिस देश में पराए अधिकार से संपन्न होते हैं उस देश के अपने ही वंशज विपन्न होकर कर्त्तव्यों का भार ढोते चलते हैं ॥
लूट खसोट राज रजे आध देस अधियाए ।
सेष कोहु अवशेष किए बढ़े अधिकाधिकाए ॥ ३१८० ॥
बोलो कौन.....?
आन की का बोलिये समझि न आपन आप ॥ ३१७१॥
भावार्थ : -- भोजन भवन वस्त्राभूषण ही जिसके माई बाप हों । वह अपने आप को भी कुछ नहीं समझता दूसरों की तो कहें क्या ॥
घमंड भरे ग्यान जब रचे कछुक बिग्यान ।
ता समुख भगवान कहत कहे " कौन भगवान ?"॥३१७२॥
भावार्थ : -- घमंड से भरा ज्ञान जब कुछ विज्ञान रच लेता है उसे भगवान समझ में नहीं आते ॥
भगवान ने ही यह सोचा कि इस गोल गोल पृथ्वी से कोई न गिरे इसके लिए क्या करूँ , चलो इसमें एक आकर्षण भर दूँ .....
यह आकर्षण गुरुत्वाकर्षण के नाम से प्रसिद्ध हुवा.....
संविधान कर नाउ दिए, लिखि कछु चारि बिधान ।
बिग्यान संग अबूझे समुझ न आए ग्यान ॥३१७३॥
भावार्थ : -- अँगरेजी में संविधान लिखने के पश्चात विधि का विधान ( ज्ञान-विज्ञानं) समझ नहीं आता ॥
अंग्रेजी केअक्षर पढने के पश्चात चतुर्वेदी को वेद-पुराण समझ नहीं आते औरों की तो कहें क्या.....
सिंहासन के लालसी जिन्हनि कहे बिरान ।
संविधान जब लिखि रहे भयऊ सोए बिधान ॥३१७४॥
भावार्थ : -- सत्ता के लालचियों ने पराई विधि कहकर जिसका बहिष्कार किया । संविधान लिखते समय वही विधियां विधान हो गईं ॥
संविधान अनुहार के भए सब बुद्धि बिहीन ।
नेम बिसारे आपने रहे पराए अधीन ॥ ३१७५ ॥
भावार्थ : - संविधान का अंधानुकरण कर भारतीय बुद्धि विहीन हो गए । अपने नियमों का बहिष्कार कर ये परायों के ही अधीन रहे ॥
धरम बिपरीत चलनि करि पंथी बिनु भए पंथ ।
पराए पहार बन दुरे ग्रंथी बिनु सद ग्रंथ ॥ ३१७६॥
भावार्थ : -- चाल- चलन धर्म के विपरीत हो गए जिसने धर्म को अनुयायियों से विहीन कर दिया लोग सत्यनिष्ठ नहीं रहे वे दयाहीन होकर लेने में ही लगे रहते । विद्वानों से विहीन सद्ग्रन्थ परिपंथ से भयभीत होकर अफ्रीका के जंगलों में छुप गए ॥
इस पाखंड वाद ने भारत में कहीं बन छोड़े हों तो छुपे.....
सतपंथी बिथुराए जब सहचर भए परिपंथ ।
सभीत पराए बिहड़ बन दुरे पुरान सुग्रंथ ॥ ३१७७ ॥
भावार्थ : -- सन्मार्गी से पृथक डाकू-लुटेरे ही जब सहचर हो जाएं । तब मार्गदर्शक रूपी सद्ग्रन्थ भयभीत हो बीहड़ वनों में छुप जाते हैं ॥
सोइ महला मोहल्ला सोए मेम्बरि मेज ।
मुसलमान जिउता रहा मुवे नहीं अँगरेज ॥ ३१७८॥
भावार्थ : -- वही महल है वही मोहल्ले है मेम्बरी मेज भी वही है न तो मुसलमान मरे न अंग्रेज मरे लोग मर मर गए ॥
बिरावने कर गहे जब अधिकाधिक अधिकार ।
चले कँधे धर आपने करतब केरे भार ॥ ३१ ७९ ॥
भावार्थ : -- जिस देश में पराए अधिकार से संपन्न होते हैं उस देश के अपने ही वंशज विपन्न होकर कर्त्तव्यों का भार ढोते चलते हैं ॥
लूट खसोट राज रजे आध देस अधियाए ।
सेष कोहु अवशेष किए बढ़े अधिकाधिकाए ॥ ३१८० ॥
बोलो कौन.....?
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