रविवार, 31 जनवरी 2016

----- मिनिस्टर राजू १८१ -----

राजू : -- मास्टर जी ! मेरी माँ प्राइम मिनिस्टर की माँ से भी गरीब है..,

" इस प्राइम मिनिस्टर जैसे बिगड़े हुवे ऐय्याश बेटे दस लाख की सूट तन से लगाते हैं और मिनटों में फेंक देते हैं
आड़ी टेडी गाड़िया पलक पावड़े बिछाई रहती हैं ये बिमान में सीडी लगा आसमान में हाथ हिलाते दिखते हैं और इनकी माँ गरीब की गरीब रहती है..,

राजू : - हाँ  जो अपने धन का सम्मान करते हैं न दुसरों के ऐसे ऐय्याश बेटों के कारण ही भारत की माएँ गरीब रहती हैं मास्टर जी ! में वैसा नहीं हूँ


 मैं इन मंत्रियों को पेंशन भी नहीं दूँगा.....खाट में सड़ेंगे ही फिर जेल की क्या आवश्यकता.....

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२०-३२१॥ -----

धरम माहि प्रतीति रहे जगहितकारी नीति । 
प्रभुता कबहु न परिहरै जहाँ भली सब रीति ॥ ३२०१ ॥ 
भावार्थ : -- जिस देश में धर्म पर विश्वास दृढ रहे और नीतियां विश्व के लिए हितकारी हों जहाँ प्रथाएं व् परम्परा हानिप्रद न होकर स्वस्थ हो उस देश को प्रभुता त्याज्य नहीं करती ॥ 

रीझि बूझि पर आपनी बवहिं नवहिं निज काज । 
बिचार हीन के धारे बिनसे देस समाज ॥ ३२०२ ॥ 
भावार्थ : --अपनी समझ पर ही मन्त्र मुग्ध होने वाले स्वार्थ सिद्धि हेतु जहाँ तहाँ सिर झुकाने वाले निर्बुद्धि की बुद्धि से देश व् समाज विलुप्त होते हैं ॥ 

काली करालि करतूति अनभल के यह काल । 
बड़े जहँ तहँ काक बकुल दरसे नहींं मराल ॥ ३२०३ ॥ 
भावार्थ : -- यह काल काली कलुषित करतूतियों का है असज्जनता का है । ऐसे में कौंवे व् बगुले जैसे अविवेकी अधिक और हंस विवेक क्वचित हो जाते हैं ॥ 

हाड़ तोड़ को श्रम करे, किए को करतब काल । 
याके पड़ता सब लखे याके नहि पड़ताल  ॥३२०४ ॥ 
भावार्थ : --  कोई हाड तोड़ परिश्रम करता है कोई काले कुकरम करता है । कुत्सित काल में परश्रमी    आकलन  पर सभी की दृष्टि होती है कुकर्मी की पड़ताल तक कोई नहीं करता ॥ 

भीत भीत बिदेस बसे करिअ सेष अवसेष । 
जोइ सिँहासन धारिया सोइ लुटावै देस ॥ ३२० ५ ॥  
भावार्थ : --  हंस विवेक की किञ्चितता के कारण ही अद्यावधि भारत भीतर ही भीतर खंड खंड हो गया है ये खंड छोटे बड़े  विदेश बन गए हैं कहीं इस्लाम का राज चलता है तो कहीं ईसाई का तो कहीं अन्यान्य का । सत्ताधारियों में तो जैसे देश को लूटने और लुटाने की होड़ लगी है ॥ 

यह नदी यह नग निर्झर देख लखे सब काल । 
बेद रचि घन बन मुनिगन चहुँ पुर फिरिहि ब्याल ॥३२०६॥ 
भावार्थ : -- भारत की इन नदियों ने इन झरनों के इन पर्वतों ने सभी काल देखे हुवे हैं । वह वैदिक काल भी जब घने वनों से आच्छादित यह देश मुनिगण द्वारा वेदों की रचना में लयलीन था हिंसक पशु इसके चारों ओर विचरण किया करते थे ॥ 

सुरग अवतरित सुर सरित यह गिरि राज बिसाल । 
जहां बिराजित सिउ संभु कंठ गहे अहि माल ॥ ३२०७ ॥ 
भावार्थ : -- स्वर्ग से अवतरित यह सुरसरित यह हिमालय का विशाल क्षेत्र । जहाँ कंठ में अहिमाल ग्रहण किये भगवान शिव शम्भु विराजित हैं ॥ 

मूर्धाभिषेक सरूप येह कलस केदार । 
प्राच रूप प्राग् अभिमत जुग जुग धरे सँभार ॥ ३२०८॥ 

भावार्थ : -- भारत  वर्ष का मूर्द्धन्याभिषेक स्वरूप यह केदारनाथ धाम है । जिसने प्राग चिन्हों सहित प्राचीन काल से चले आ रहे धार्मिक मत को युगों युगों से संजो रखा है ॥ कोई धार्मिक मत जहाँ होगा मतावलम्बी वहां नहीं होंगे तो कहाँ होंगे । 


पुराकल्प कृत पुरी यह जगत बिदित जग नाथ । 
अस्थापित हरि मूर्ति जगनमई के साथ ॥ ३२०९ ॥ 

भावार्थ : - धर्मावलम्बियों को मर्यादित करती जगत प्रसिद्ध यह जगन्नाथ पुरी है जो आद्य काल की कृति है । जहाँ जगन्मयी के साथ भगवान जगन्नाथ विराजित हैं  इसकी मर्यादा भंग करने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है ॥  


भारत बरस का द्वार यह द्वारिका धाम । 
धर्मोपदेस दय  यहॉँ बिराजित घन स्याम ॥ ३२१० ॥ 
भावार्थ : - भारत वर्ष के द्वार को दर्शाता यह द्वारिका धाम है काबा नहीं है  । धर्म का उपदेश देने वाले भगवान कृष्ण यहां विराजमान हैं ।

जमन जूह एहि  देस में भरे अधिकाधिकाए । 
सुर सदनिन तीरथ पुरिन तापर एकहू नाए ॥ ३२११ ॥ 

भावार्थ : - कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश में मुसलमानों का एक भी तीर्थ नहीं है ॥ 

दान धर्म सहुँ होइआ धर्म खेत निर्मान । 
धरमात्मन होत पबित जाइ तेहि अस्थान ॥ ३२१२ ॥ 
भावार्थ : -  दान पुण्य के आचरण से ही तीर्थ निर्मित होते हैं । तीर्थ का सेवन कर पुण्य पुरुष पवित्र होते हैं ।पापाचारी के सेवन से तीर्थ स्थान नष्ट- भष्ट होते हैं ॥ 

थापत संभु रामेसर, गयउ सिंधु कर पार । 
जीति  सुबरन दीप प्रभो बहुरत देइ उदार ॥ ३२१३ -क॥ 
भावार्थ : -  इस देश में भगवान के भी भगवान हैं । भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में अपने इष्टशिव शंकर  जी को स्थापित किया,  तत्पश्चात समुद्र पार कर  पड़ोसी का सर्वनाश किया और स्वर्णमयी लंका पर विजय प्राप्त की ॥ उदारता  पूर्वक उसे लौटा भी दिया । यह सन्देश देते हुवे कि भारत बुराइयों पर विजय प्राप्त करता है देशों पर नहीं.....

स्वाध्ययन सत्योधन धरम करम करताए ।
संतापित तापस चरन बिहनै सुख बरधाए ॥ ३२१३-ख ॥  

----- ॥ विदूर नीति ॥ -----
भावार्थ : - आवृत्ति पूर्वक अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म व् संतप्त तपस्या से अंत में सुख की वृद्धि होती है ॥ 

 न्याय संगत बितर्कन बिधि सम्मत परमान । 
साखी दिरिस अवमति दिए नेति जोग अवज्ञान ॥ ३२१४॥ 
भावार्थ : -- न्याय संगत तर्क, विधि- सम्मत साक्ष्य, साक्षाद्दृश्य को तिरोहित कर दिया गया निर्णय अवज्ञा के योग्य होता है.....

धर्माधारित संहिता यह श्रुति वेद पुरान । 
भारत की संतान के अभिलेखित परमान ॥ ३२१५॥ 
भावार्थ : -- ये श्रुति, वेद, उपनिषद, पुराणादी संहिताएं वैदिक धर्म का प्रमाणिक आधार है भारत के वंशजों का अभिलेखित साक्ष्य हैं ॥ यहां इस्लाम स्वयं को भारत का मूल सिद्ध करने पर तुला है ॥  

धर्माधारित संहिता भारत के एहि नीवँ । 
अन्यान्य दरसाइया लिखे ए देस के सीवँ ॥३२१६॥ 
भावार्थ : -- ये धर्माधारित संहिताएं राष्ट्र के रूप में भारत का निरूपण करती हैं । अन्य देशों के सह इनमें इस देश की सीमाओं का भी उल्लेख है । अन्य धार्मिक संप्रदाय के अनुयायि  अपनी सीमाओं का साक्ष्य प्रस्तुत करें ॥ 

देखे लोचन साखिता यह सरजू के तीर । 
भव तारन कलिमल हरन प्रगसे जग रघुबीर ॥ ३२१७॥ 
भावार्थ : -- यह सरयू नदी उस समय की प्रत्यक्ष साक्षी है जब संसार से पार उतारने कलयुग के पापों को हरण करने भगवान श्री राम ने जन्म लिया ॥ 

चित्रकूट यह दंडक बन रगुबर कथा सुनाए  । 
निसिचर हीन कर महि कस लंका दीप ढहाए  ॥ ३२१८॥ 
भावार्थ : -- यह चित्रकूट यह दंडक वन रघुवंश मणि की गाथा सुनाते प्रतीत होते हैं कि कैसे भगवान ने भूमि को निशाचरों से विहीनं कर लंका को ढहाया था ॥ 

बानर केरि संरचना सागर बध यह सेतु । 
बोहिग सैल बिसाल भए पारग रबि कुल केतु ॥३२१९॥ 
भावार्थ : -- समुद्र में आबद्ध वानर कृत यह सुदृढ़ सेतु  यह प्रमाणित करता है कि किस प्रकार तैरते हुव विशाल पाषाण जलयान बन गए और भगवान श्री राम समुद्र पार कर गए ॥

बूड़हिं आनहि बोरहीं पाहन गुन यह होंहि । 
देखिहु कतहुँ औरु तिरत त कहहु सो जग सोहि ॥ ३२२०॥ 
भावार्थ : - पत्थर और मूर्ख का यह अवगुण है कि वह स्वयं तो डूबता ही है दूसरों को भी डूबा देता है ॥  से समुद्र की महिमा कहें या विज्ञान का चमत्कार कहें अथवा ईश्वर की कृपा कहें कि  भारत में पाषाण भी तैरते हैं पाषाणों को तैरते हुवे और कहीं देखा है देखा है तो कहाँ देखा है ?

अपने अपने धर्म  में आस्था के अधिकार को धार्मिक आस्था का अधिकार कहते हैं  वैदिक धर्मावलम्बियों से यह अधिकार छीना जा रहा  है ।  अन्य सम्प्रदायों के इष्ट का जहाँ जन्म हुवा वहां यदि कोई मंदिर बने तो कैसा लगेगा ?










शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३१८- ३१९॥ -----

मैले मैले जल पवन मैले नदी पहार ।
मैले जब मन मानसा मैले सब संसार ॥ ३१८१ ॥
भावार्थ : --  जब मनुष्य का अंतरमन दूषित हो जाता है तब क्या जल- वायु क्या नदी-पहाड़ समस्त संसार ही दूषित हो जाता है ॥

बन रहे न उपबन रहें खेती रहे न खेत । 
मरू देस दरसाई के बिथुरे चहुँ पुर रेत ॥ ३१ ८२ ॥ 
भावार्थ : -- ऐसे दूषित वातावरण में वन रहते न उपवन  खेती रहती है  न खेत ।  चारों और केवल रेत- ही रेत  बिखरी होती है । हरियाली केवल चलचित्रों में ही दिखाई देती है,  देश के मानचित्र पर हरी-भरी भूमि को मरुस्थल दर्शाता हुवा एक सन्नाटा पसरा होता है ॥

 तपसी भयऊ बिनहि तप राजि बिनहि बन राजि । 
राजा भयऊ राज बिनु चहुँ पुर छाए ब्याज  ॥३१८३॥ 
भावार्थ : -- तब फिर जैसे तप किए बिना ही लोग तपस्वी कहलाने लगते हैं वृक्ष समूह से रहित स्थल वन-स्थली कहलाने लगता है । वैसे ही राज्य से रहित होकर लोग राजा कहलाने लगते हैं चारों और छल- कपट दुराचरण का ही वातावरण व्याप्त हो जाता है और अधिनायक तंत्र,  लोकतंत्र कहलाने लगता है.....

रयनिहि जग उजियार के कोयरी भई छार । 
धरा बदन मलिनाए रही पग पग पंथ गुहार ॥३१८४॥ 
भावार्थ : -- रयनी में संसार को जगमग कर कोयली राख हो चली है । बी तो मुख मलीन किए पग पग पर यह धरती प्रार्थना कर रही है कि  मुझे प्रलय को न विवश करो बस करो ॥ 


 देवारी जिन जानिआ सो तो बरती होरि । 
संचित सम्पद जर रही लगी अगन बर जोरि ॥३१८५॥ 
भावार्थ : -- जिसे दिवाली समझ रहे हो वह दिवाला निकालती जलती हुई होलिका है । संचित सम्पदा  में भीषण आग लगी है और सब कुछ जल कर भस्म हुवे जा रहा है ॥

संचित धन सँभारे जो व्ययित को उपजाए । 
होनहार की दीठ में बुद्धिमंत  कहलाए ॥ ३१ ८६ ॥ 
भावार्थ : -- जो संचित धन की सहेज कर व्ययकृत धन का उत्पादन करता हो  । आने वाली पीढ़ी की दृष्टि में वह बुद्धिमान होगा इसलिए मूर्ख मत बनो ॥

पति मरि मरि उठि चली गए रही जात उद्योग । 
कलूटी कलुषाई कू भुगत रहे हैं लोग ॥ ३१ ८७ ॥ 
भावार्थ : -- पति चले जाते हैं उद्योग यहीं रह जाते हैं ।  उनकी प्रदूषिता को यह संसार भुगतता है जो किसी नरक की यातना के सदृश होती है ॥

 मेरा मेरा करी किए तिन का तेरा कोइ । 
तेर मेर में मरी गए कछु न केहि का होइ ॥ ३१ ८८ ॥ 
भावार्थ : - मेरा मेरा करते हुवे तीन का तेरा किया । इस तेर मेर में दुनिया मर गई किसी का कुछ न हुवा ॥

भवन गए न अभूषन गए गया न एकहू चीर । 
जापर ऐतक मोहिआ गया न सोउ सरीर ॥ ३१ ८९ ॥  
भावार्थ : -- जिसके लिए लड़ मरे वो भवन गए न आभूषण गए एक कपडा तो जाता वो एक कपड़ा भी न गया । जिसपर इतने आसक्त रहे वह शरीर भी यहीं रह गया ॥

हाट हाट हटबारिया हाँके लेउ बिसाए । 
असन बसन भूषन भवन मनुहारी मन भाए ॥ ३१ ९० ॥ 
भावार्थ : : बाट बाट पर हाट लगाए जगत का व्यवहारी  ले लोsssss ले लोsssss पुकारता  रहा । भवीले भवन ले लो चमकीले भूषण ले लो चमकीले वसन ले लो मनभावन भोजन ले लोsssss ॥

हाट हाट जग जोउना लेवें कोइ बिसाए । 
आए थे क्या लाए थे जाए लेइ का जाए ॥ ३१९१ ॥ 
भावार्थ : -- हाट हाट में सुख के सभी साधन मिल रहें है कोई ले जा सके तो ले जाए । किन्तु एक बात बताएँ आए थे तब कुछ न लाए थे सो  पास में दाम नहीं था ,  अत: जाते क्या ले जाते ॥

बाट बाट  पुन मेलिआ कलजुग केरे हाट । 
बनिजत का ले जाइये गाँठी गहे न साट ॥ ३१९२॥ 
भावार्थ : -- यह कलयुग की हेचरी है यहां पग पग पुण्य मिला करते हैं । जब गाँठ में सत्कमों की साँट न हो तो फिर विक्रय कर क्या ले जाएंगे ?  फ़ोकट तो कुछ मिलता नहीं.....

गाँठ साँठी किया नहीं लिया नहीं कछु मोल । 
निस दिन मरता जीउता पड़िया अधमी खोल ॥३१ ९३ ॥   
भावार्थ : -- गाँठ में कुछ बांधा नहीं जगत का व्यवहारी सहँगे में सुख के साधन देता रहा किन्तु मैं कुछ नहीं ले पाया । इसलिए नितप्रति जीते मरते आज इस निकृष्ट देह को प्राप्त हूँ ॥

आत्मा पुराने वस्त्र त्याग कर नए वस्त्र ग्रहण करती है 
_____ ॥ भगवान श्री कृष्ण ॥ -----
पंचपरिधान बारम्बार नहीं मिला करते.....

आया था संसार में देषण को बहु रूप । 
दादुर बन पड़िया रहा काया को  कर कूप ॥ ३१९४॥ 
भावार्थ : -- विश्व - दर्शन हेतु मैने यह देह धारण की थी । किन्तु विषयों की आसक्त में मैं कूपमंडूक बना रहा विश्व तो क्या मुझे कूप के ही पूरे दर्शन न हुवे ।  देह से बहिर्गत होकर ही विश्व दर्शित होता है.....

आया है संसार में ले भगवन का नाम । 
चलता पंथ करता चल जग हित के दो काम ॥ ३१ ९५ ॥ 
भावार्थ : -- यदि संसार में आए हो तो ईश्वर का नाम लेते हुवे सत पंथ पर चलते रहना और अपनी गांठ को साँट किए हितकारी कार्य करते रहना.....

कर्म हीन पद चाहिता कर्म हार कर चाह । 
जे बिनहि कर नाम चहे जे चाहें कछु नाह ॥ ३१ ९६॥ 
भावार्थ : - अकर्मण्य को पद की लिप्सा होती है, कर्मनिष्ठ को काम की ॥ कर्महीन बिना परिश्रम की प्रसिद्धि चाहते हैं कर्मठ कुछ नहीं चाहते ॥ 

अपने जीवन हेतु जो औरन को बिसराए । 
देह कूप बहिर्गत सो जग दरसन नहि पाए ॥ ३१९७ ॥  
भावार्थ : -- उदर की परायणता में जो दूसरों का तिरष्कार करता है ऐसे कूप मंडूक को विश्व के दर्शन नहीं होते 

करनी कर कठिन थी सो कथ कथ बयस गवाएँ । 
कहने  को बस रह गया अब कछु करा न जाए ॥ ३१९८॥ 
भावार्थ : -- करनी बहुंत कठिन थी इसलिए कह कह कर समय गवां दिया । अतएव पहले कर लेवे फिर कहें अन्यथा  कहने को यही रह जाएगा कि अब काया से कुछ नहीं होता ॥ 

रोवन जीवन बहुंत था जोवन को बहु थोड़ । 
पछतावा करि पाछु मरि गया जगत को छोड़॥ ३१९९ ॥ 
भावार्थ : -- पश्चाताप को समय बहुंत मिलेगा जीवन-संधारण  हेतु अल्पहि मिलेगा । मैं जीवन पर्यन्त केवल पश्चाताप  करते हुवे इस उत्तम देह को छोड़ कर चला गया और अधम को प्राप्त हो गया तुम ऐसा मत करना ॥ 


मैं मरिया जग बोलिया रे उड़ि गया पखेर । 
पाप के भारभूत सों गिरे न लगिया बेर ॥ ३२०० -क॥ 
भावार्थ : -- जब मेरा अंत हुवा तब लोग बोले पंछी उड़ गया । पाप का भार कुछ ऐसा था कि उसके बोझ से मैं अधम गति को प्राप्त होकर सीधे नरक में जा गिरा ॥ 

मोरल ऑफ द स्टोरी 
बयसपना सत्काज सब करि करि गाँठि लगाएँ । 
पीछु पछताइब कहिए न, हा किछु करि नहि पाए ॥ ३२०० - ख ॥ 
भावार्थ : --   किसी मूर्ख ने एक बुद्धिमता के वचन कहे थे कि निर्धन जन्म होना पाप नहीं है निर्धन मरना पाप है ।  शक्ति व् सामर्थ्य रहते सत्कृत्यों के धन से धनवान होकर अपना उद्धार कर लेना चाहिए, रोते नहीं बैठे रहना चाहिए । पीछे पश्चाताप कर यह कहना न पड़े कि हम क्या नहीं कर सकते थे किन्तु हमने कुछ नहीं किया ॥ 

भाग धेय जब आपना देवन हाथ बढ़ाए । 
जग दुआरे दरसिआ को बैठा आस लगाए ॥३२०० ॥ 
भावार्थ : -- अपना  भागधेय देने जब कोई हाथ बढ़ेगा तब उसे द्वार पर जगत के प्रथम दर्शन होंगे ।







मंगलवार, 5 जनवरी 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३१७ ॥ -----

असन बसन भूषन भवन जाके माई बाप । 
आन की का बोलिये समझि न आपन आप ॥ ३१७१॥ 
भावार्थ : -- भोजन भवन वस्त्राभूषण ही जिसके माई बाप हों । वह अपने आप को भी कुछ नहीं समझता दूसरों की तो कहें क्या ॥ 

घमंड भरे ग्यान जब रचे कछुक बिग्यान । 
ता समुख भगवान कहत कहे " कौन भगवान  ?"॥३१७२॥  
भावार्थ : -- घमंड से भरा ज्ञान जब कुछ विज्ञान रच लेता है उसे भगवान समझ में नहीं आते ॥ 
भगवान ने ही यह सोचा कि इस गोल गोल पृथ्वी से कोई न गिरे इसके लिए क्या करूँ , चलो इसमें एक आकर्षण भर दूँ .....
यह आकर्षण गुरुत्वाकर्षण के नाम से प्रसिद्ध हुवा.....

संविधान कर नाउ दिए, लिखि कछु चारि बिधान । 
बिग्यान संग अबूझे समुझ न आए ग्यान ॥३१७३॥ 
भावार्थ : -- अँगरेजी में संविधान लिखने के पश्चात विधि का विधान ( ज्ञान-विज्ञानं) समझ नहीं आता ॥

अंग्रेजी केअक्षर पढने के पश्चात चतुर्वेदी को वेद-पुराण समझ नहीं आते औरों की तो कहें क्या.....

सिंहासन के लालसी जिन्हनि कहे बिरान । 
संविधान जब लिखि रहे भयऊ सोए बिधान ॥३१७४॥ 
भावार्थ : -- सत्ता के लालचियों ने पराई विधि कहकर जिसका बहिष्कार किया । संविधान लिखते समय वही विधियां विधान हो गईं ॥

संविधान अनुहार के भए सब बुद्धि बिहीन । 
नेम बिसारे आपने रहे पराए अधीन ॥ ३१७५ ॥ 
भावार्थ : - संविधान का अंधानुकरण कर भारतीय बुद्धि विहीन हो गए ।  अपने नियमों का बहिष्कार कर ये परायों के ही अधीन रहे ॥

धरम बिपरीत चलनि करि पंथी बिनु भए पंथ । 
पराए पहार बन दुरे ग्रंथी बिनु सद ग्रंथ ॥ ३१७६॥ 
भावार्थ : -- चाल- चलन धर्म के विपरीत हो गए जिसने धर्म को अनुयायियों से विहीन कर दिया लोग सत्यनिष्ठ नहीं रहे वे दयाहीन होकर लेने में ही लगे रहते  ।  विद्वानों से विहीन सद्ग्रन्थ  परिपंथ से भयभीत होकर अफ्रीका के जंगलों में छुप गए ॥

 इस पाखंड वाद ने भारत में कहीं बन छोड़े हों तो छुपे.....

सतपंथी बिथुराए जब सहचर भए परिपंथ । 
सभीत पराए बिहड़ बन दुरे पुरान सुग्रंथ ॥ ३१७७ ॥ 
भावार्थ : -- सन्मार्गी से पृथक डाकू-लुटेरे ही जब सहचर हो जाएं । तब मार्गदर्शक रूपी सद्ग्रन्थ भयभीत हो बीहड़ वनों में छुप जाते हैं ॥

सोइ महला मोहल्ला सोए मेम्बरि मेज । 
मुसलमान जिउता रहा मुवे नहीं अँगरेज ॥ ३१७८॥ 
भावार्थ : -- वही महल है वही मोहल्ले है मेम्बरी मेज भी वही है न तो मुसलमान मरे न अंग्रेज मरे लोग मर मर गए ॥

बिरावने कर गहे जब अधिकाधिक अधिकार । 
चले कँधे धर आपने करतब केरे भार ॥ ३१ ७९ ॥ 
भावार्थ : -- जिस  देश में पराए अधिकार से संपन्न होते हैं उस देश के अपने ही वंशज विपन्न होकर कर्त्तव्यों का भार ढोते चलते हैं ॥

लूट खसोट राज रजे आध देस अधियाए । 
सेष कोहु अवशेष किए बढ़े अधिकाधिकाए ॥ ३१८० ॥ 
बोलो  कौन.....?
























----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...