गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

----- मिनिस्टर राजू १८५ -----

राजू एक संस्मरण सुनो : - पिछले दिनों एक मांगलिक कार्यक्रम में हमारी एक छठवीं फेल निकट संबंधी एक लाख का चलित दूरभाष हाथ में लेकर दूसरी छटवीं फेल से पूछतीं हैं ये फेसबुक- फेसबुक  कैसे खेलते है ? मैने कहा
मैं  बताऊँ मैं बताऊँ तो उत्तर मिला तेरे को क्या पता तू तो पैसे की दौड़ में बहुंत पीछे है अब बताओ इस संस्मरण से हमें क्या शिक्षा मिलती है.....

राजू : -- हम्म मास्टर जी !  हमें तीव्रगति से दौड़ना चाहिए और किसी का छायाचित्र  तो बिलकुल नहीं चुराना चाहिए.....

नहीं ! हमें बिना जाने बुझे किसी पर अनुचित टिप्पणी नहीं करनी चाहिए.....


रविवार, 21 अगस्त 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३८ ॥ -----


कुल में कुलप गाँवाधिप, बिस में रह बिसितेस । 
जन के पत राजन कहत राजिहि देस नरेस ॥ ३३८१॥ 
भावार्थ : -- वैदिक काल में प्रशासनिक ईकाई कुल, ग्राम, विश ( बीस गांव के समूह को विश कहते  व् राष्ट्र में विभक्त थीं । कुल का प्रमुख कुलप, कुल के समूह ग्राम अथवा गाँव कहलाने लगा जिसका प्रमुख को  ग्रामाधिपति, बीस गाँव के अधिपति को ग्रामीण विंशतीश कहते । गाँव जब समृद्ध वसति में परिणित हुवा तब वह जनपद होकर नगर कहलाने लगा जिसके अध्यक्ष  को राजन कहते ।  कालांतर में यही राजन राष्ट्र अथवा देश का नरेश कहलाने लगा ॥

कुल कैसे बना ?
भीतरी संस्कार ने गांठे सील आचार । 
जाहि सों कुल कुलिक रचे उद्भव कृत कुल धार ॥ ३३८२॥  
भावार्थ : -- घर भीतर का संसार जब संस्कारित हुवा तब उसने मानव मात्र में चरित्र का निर्माण किया जिससे जिससे स्वजनो का उद्भव हुवा, तत्पश्चात कुल धारक के  द्वारा कुल की संरचना हुई अब मानव स्थायी रूप में निवास करने लगा ।

स्त्री पुरुष के सम्बन्धों में जितनी अधिक पवित्रता होती है स्वजन भी उतने ही अधिक होते हैं.....

कछु रीति नीति नेम कृत  कछु परम्परित परिपाटि । 
बंधू बाँध बँधाई के कसे गाँठ बँट साँटि ॥ ३३८३ ॥ 
भावार्थ : -- कतिपय रीतियों, नियम, नीतियों एवं प्रथाओं के  परम्परागत अवलम्बन से आत्मीय सम्बन्ध  प्रगाढ़ होते चले गए,  त्याहारों ने तो इन संबंधों को मधुरता से भर दिया ॥ 


तन संचालन हुँत उदर जोवत जौं जल नाज । 
धन सम्पद सँजोवत तस कछु जन बनि काज ॥ ३३८४ ॥ 
भावार्थ : -- शरीर -संचालन हेतु उदर जिस प्रकार अन्न-जल का संग्रह  करता हैं । उसी प्रकार जन संचालन हेतु  कतिपय जन समूह वाणिज्य कर्म में प्रवृत्त होकर जीवन हेतु आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करने लगा ॥ 

गेह गेह गौपाल के करष भूमि सब गेहि । 
राज काज हेतु बलि कह निज मन ते कर देहि ॥ ३३८५॥  
भावार्थ  : --  घरों में गौपालन व् भूमि पर कृषि कार्य कर वणिजी कुलप प्रजा पालन के निमित्त स्वेच्छा से जो राजस्व देता उसे 'बलि' कहा जाता ।

अपूरति पूरावन हुँत करियब यातायात । 
अन्वयागत एहि  गुन सों उद्भय बनिजन जात ॥ ३३८६ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त व्यक्ति द्वारा अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वस्तु का क्रय-विक्रय करना, उनका यातायात करना उसका कार्य था । इस प्रकार वंशानुगत इस कार्य विशेष को करते हुवे वैश्य व्युत्पन्न हुवे ॥ 

धर्मार्थ कर  दान के राजन राजस देह । 
श्रमि कू श्रमधन देइया पाल पोष निज गेह ॥ ३३८७ ॥ 
भावार्थ : -- धमार्थ हेतु हस्त में दान, प्रजा पालन के निमित राजस्व , श्रमिकों को उनका श्रम धन देकर स्वयं सहित सबका पालन पोषण करना वैश्य के वेद विहित कर्त्तव्य थे ॥ 

चारि बरन करि बेद कहि प्रथम बदन भगवान । 

दूजा भुजा तिजहर उरु चातुर चरन समान ॥ ३३८८ ॥ 
भावार्थ : -- वेदों की जन संचालन व्यवस्था ने सभ्य मानव को चार वर्ग में विभक्त किया । ईश्वर को मानव शरीर की उपमिति देकर प्रथम वर्ग का उपमान ईश्वर के श्री मुख से किया, दूसरे व् तीसरे वर्ग की तुलना भुजा व् उदर भाग से व् चतुर्थ वर्ग की तुलना ईश्वर के चरण से की ॥ 

उरु अन्न जल बाहु बल मानस ज्ञान अगार । 

ता संग सकल देहि के बिय पद बोहिनहार ॥ ३३९० ॥ 
भावार्थ : -- उदर भाग में अन्न- जल का बाहु में बल का मन -मानस में ज्ञान का संग्रह होता है । इस प्रकार द्वि चरण ऐसे संग्रहन से युक्त देह के भारवाहक होते हैं ॥ 





इस प्रकार नाम भीतर के संसार का व् उपनाम बाहिर के संसार का द्योतक बना ।



धार्मिक उपासना पद्धति के अनुशरण से धर्म संप्रदाय व् जीविका अथवा जीवनोपार्जक कार्य का वंशानुगत अनुशरण करने से जातियाँ व्युत्पन्न हुई ।





बुधवार, 10 अगस्त 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३७ ॥ -----

यह धरति यह खग मण्डल गहे धातु कर माल । 
यन्त्र तंत्र संयत्र संग रचे रंत के जाल ॥ ३३७१ ॥ 
भावार्थ : -  इस देश ने जब पाषाणों से धातुएं निष्कासित कीं  तब यह विश्व रन्त -यन्त्र -तंत्र- संयत्र से युक्त होकर प्रगति पथ पर अग्रसर हुवा  अत: ऐसे देश के आदर्श स्मरणातीत न हों ॥ 

पठत जगत बिचार करे कछु बोधि प्रबोध । 
यह तन मल मलनाईया,  सोंधि ताहि कर सोध ॥ ३३७२ ॥ 
भावार्थ : -- कतिपय बुद्ध प्रबुद्धों की बुद्धि ने  विश्व का सम्यक चिन्तन व् अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि मलिनता से युक्त यह देह भी पाषाण स्वरूप है इसे भी परिष्कृत होकर शुद्ध होना चाहिए ॥ 

बसे भवन तन भयउ जन सुधिगन  करे विचार । 
बाहर के संसार एक भीतर के संसार ॥ ३३७३ ॥ 
भावार्थ : - प्रबुद्ध जनों की बुद्धि ने फिर यह विचार किया  आवासों में अधिवासित यह मानव अब जन की संज्ञा को प्राप्त हो गया अब इसका एक बाह्यजगत व् दूसरा अंतर्जगत हैं ॥ 

भीतर संस्कारित किए बाहर कर्म अधार । 
भूषण बसन सँवार पुनि दोनौं दिए सिंगार ॥ ३३७४ ॥ 
भावार्थ : - भीतर के संसार को  संस्कारों से व् बहार के संसार को विभिन्न प्रकार के कर्मों से संस्कारित किया ततपश्चात भूषा व् भाषा आदि को संयत कर दोनों संसार को व्यवस्थित किया और  उसे लेखाबद्ध करते चले  ॥ 

प्रथम अनूप ग्राम बसा  जनपद भए जनजूह । 
बसे नगर भए नागरी, गहे सैन्य समूह ॥ ३३७५ ॥ 
भावार्थ : -- भवनों में अधिवासित मानव समूह  प्रथमतस नदी तट के गांव से जनपद में परिवर्तित हुवा और   जन कहलाने लगा  ततपश्चात रक्षातंत्र  से युक्त जनपद नगर में रूपांतरित हुवे और अब वह नागरिक बन गया ॥

स्पष्टीकरण : -- बुद्धि ने विचार किया अब इस नगर को संचालित करने हेतु एक प्रबन्ध तंत्र की आवश्यकता है ॥

रचत नगर रचिता कहे प्रथम बेद यह मंत्र । 
कतहुँ राजा राज रहे कतहुँ प्रजा के तंत्र ॥ ३३७६॥ 
भावार्थ : - नगर-निर्माण  के पश्चात् वेद रचयिता ने प्रथम वेद में यह मन्त्र उद्घोषित किया कि वैदिक युग में राजतंत्रात्मक शासन के सह कतिपय जनपदों में प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली भी प्रचलित थी ॥

स्पष्टीकरण : -- नगर निर्माण के पश्चात् ही कोई शासन प्रणाली प्रचलित होती है इसका तात्पर्य यह  है की उत्तर वैदिक काल से पूर्व  ही नगर-निर्मित हो गए थे ॥



अन्वयागत रखिया रह गहे सबहि रन साज । 
कुलवंत कुल दीप सोइ चुनि भए राज धिराज ॥ ३३७७॥ 
भावार्थ : --  बाहिर के संसार में जो कुलीन कुल वंशानुगत जन समूह की रक्षा का  कार्य करता आया हो, कुल धारक को राजतांत्रिक शासन व्यवस्था का राजा बनाया जाता । इस प्रकार वंशानुगत कर्म के आधार पर जातिगत वर्ग  का आविर्भाव हुवा जिसे 'क्षत्रिय' कहा गया ।

मुखिया सहित  पति पद रच रचया मंत्रि  नरेस । 
जन संचालन जगत कर दिया तंत्र यह देस ॥ ३३७८ ॥ 
भावार्थ : -- इन ऐतहासिक तथ्यों से यह सिद्ध होता हैं कि  ग्राम कूटक, नगराध्यक्ष, मंत्री, राजा आदि पदों की रचना कर इस देश ने ही विश्व को जन संचालन शासन प्रणाली का उपहार दिया ॥

सभा समिति सँजोग करे रचे सदन सद जोग । 
एक सदस रहें सीलबर , दूज सदस चुनि लोग ॥ ३३७९ ॥ 
भावार्थ : -- वैदिक काल की शासन व्यवस्था ने सभा व् समिति के सदस्यों को समेकित कर एक सदन रचा ।  सभा श्रेष्ठ व् सभ्रांत जनों की संस्था थी, समिति चुने हुवे सदस्यों की संस्था थी जो जन सामान्य का प्रतिनिधित्व करती ॥

राजन कहत पुकारिया जन जन केर प्रधान । 
जो ता सम्मति देइ सो सदप कहत ईसान ॥ ३३८०॥ 
भावार्थ : -- जन के शासक  को राजन कहा जाता था ।  सभा व् समिति राजन की  परामर्श दात्री संस्थाएं थी जिस अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था ॥

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३६ ॥ -----

असाहित परसासी कहँ, आर्य एक पर जाति । 
 बेद बचन पुकार कहे सज्जन सील सभ्रांति ॥ ३३६१ ॥ 
भावार्थ : --भेद नीति का आश्रय लेकर असाहित्यक शासकों ने 'आर्य' शब्द को  एक अन्य  देश  की द्विजाति कहकर अर्थार्पित किया । वेद मन्त्रों में यह शब्द एक संबोधन मात्र है, जो भद्र पुरुषों के हेतु उच्चारित होता है जैसे श्रीमान,महोदय, पूज्यनीय, श्री, महानुभाव आदि आदि ।

पद्म पुराण में वर्णित है : -- 
जन्मना ब्राम्हणों ज्ञेय: संस्कारैर्द्विज उच्यते । 
( ४३ । १३४- ३८ ) 
भावार्थ : -- ब्राम्हणों के बालक को जन्म से ब्राम्हण समझना चाहिए । संस्कारों से उसकी 'द्विज' अथवा 'द्विजाति' संज्ञा होती है तथा विद्या पढकर वह 'विप्र' नाम धारण करता है ।

अधभरमनिअ पुकार के मूलक मूल उपारि ।
कतहुँ त पसुचारि लिखिया कतहुँ लिखे बैपारि ॥ ३३६२ ॥
भावार्थ : - मूलगत को निर्मूल कर विभाजित भारत के सत्ताधारियों ने आर्य को एक जाति  सिद्धकर उसे अर्धभ्रमणीय ( खानाबदोश, कुलहीन  ) पशुचारी प्रवृत्ति की जाति कहा जो व्यापार करते थे ॥ 

मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त जो मनुष्य अपनी अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वस्तु का क्रय-विक्रय करते हों वह पशुचारी प्रवृत्ति के कैसे हो सकते है..... ?


अचलाधिक कर तलहटी विन्ध्याचल के पास । 
पूर्बापर सागर लगे द्विजप करेँ निवास ॥ ३३६३॥ 
भावार्थ : - विध्याचल से लेकर हिमालय के तटवर्ती क्षेत्र व् पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक का क्षेत्र आर्यो का निवास स्थल था शेष भूभाग बिहड़ वनों से आच्छादित था ॥

कतहुँ त परन कुटिरु बसैं, जगोपबित अभिजात । 
कतहुँ भील बन भाँवरे त कतहुँ कोल किरात ॥ ३३६३ ॥ 
भावार्थ : -- वैदिक काल का प्रारम्भिक परिदृश्य यह था कि कहीं पर्ण-कुटिया रचकर यज्ञ आदि कर्मकांड से पवित्र हुवा अभिजात्य वर्ग निवासरत था कहीं भ्रमणकारी भील तो कहीं कोल किरात जाति दृष्टिगोचर होती जिन्हें विभाजित भारत में उजड्ड, अशिष्ट, उद्दंड, अनपढ़, असभ्य व् आदिजाति के रूप में परिभाषित किया गया ॥ 

रिसि मुनि तपसि बस्यो बन लिख्यो बेद पुरान । 
पीठासीन ब्रम्हन जिन, बाँचत देइँ ग्यान ॥ ३३६४ ॥ 
भावार्थ : -- वैदिक काल ही वह काल था जिसमें वननिवासित ऋषि मुनि व् तपस्वियों ने वेदादि धर्म ग्रंथों की रचना की, व्यास पीठ पर विराज कर ब्राम्हण देव जिन ग्रन्थों का व्याख्यान कर जनमानस को ज्ञानवान करते हैं यह वही वेद-पुराण हैं ॥ 

स्पष्टीकरण : - इस लिए व्यास पीठ पर  केवल  ब्राम्हण के श्रीमुख से ही ज्ञान ग्रहण करें, स्वयं आलेखित ज्ञान को भी ब्राम्हण के श्रीमुख से ही सुनें, कारण की ब्राम्हण धर्मार्थ हेतु और अन्य स्वार्थ हेतु उपदेश करते हैं ॥ 

वक्ता किसे बनावें.....? जो विरक्त, वैष्णव, ब्राम्हण, विषय विषद् , भावितात्मनः , धीर व् अत्यंत नि:ष्पृह हो 

भाजन सोंहि अगन बसे बसे श्रीस सब गेह । 
भूषन बसन बसाए पुनि रहँ अनगढ़ सब देह ॥ ३३६५ ॥ 
भावार्थ : -- ( अंग्रेजों के कालक्रम को ही यदि सटीक मानें तो ) धातुओं का परिष्करण हुवा वस्त्रों के संग आभूषणों के अधिवास से मानव देह शोभा से तो संपन्न हो गई । अग्नि का प्राकट्य हुवा ता संगत भाजनों के अधिवास से गृह स्वामी के संग सम्पदा भी गृह में निवास करने लगी, किन्तु मनुष्य के धातु का परिष्करण न होने के कारण मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त होकर भी वह मूर्ख व् असभ्य ही रहा ॥


करतब कर पुनि पाइये यह उपधारन धार । 
बनचरनी अपावन मन सोधन करे विचार ॥३३६६ ॥ 
भावार्थ : -- कर्म करो तत्पश्चात ही फल का सेवन करो  सम्यक चिंतन के पश्चात् यह बुद्धि आई किन्तु ज्ञान नहीं आया । मनुष्य का पशुवत स्वभाव जब यथावत रहा तब उसने वनचारी अपवित्र मन को पवित्र करने का विचार किया ॥ 

पाहन परिसुधित भए जब धातु कुसल यह देस । 
भाजन में भोजन बसे तन भए भूषन भेस ॥ ३३६७ ॥ 
भावार्थ : -- पाषाण को परिष्कृत कर जब इस देश ने धातु का शोधन किया तभी विश्व  को भाजन में भोजन करना आया । तदनंतर वस्त्राभूषण से वह परिचित हुवा ॥ इस प्रकार विश्व को पाषाण युग से आधुनिक युग में पहुंचाया ॥ 

मानस जब जग जनम लिए पाहन भए सब कोए । 
धाता धात न होइया जब लग देह न धोए ॥ ३३६८॥ 
भावार्थ : -- विश्व में जब मानव जाति का आविर्भाव  हुवा तब वह पाषाण स्वरूप की थी । जिस प्रकार पाषाण के परिमार्जन से धातुएं प्राप्त हुईं उसी प्रकार मानव देह के परिमार्जन से वर्ण प्राप्त हुवे । इस परिमार्जन के पश्चात ही पालन पोषण करने वाले मातृत्व व् पितृत्व भाव प्राप्त हुवा  जो पशु व् पाशविक प्रवृत्ति के मनुष्य में न्यूनतम पाया जाता है  । 

 परिमार्जन के कारण ही अन्य देशजों के अपेक्षाकृत  भारतियों में वात्सल्य भाव अत्यधिक होता है.....

धात लहे अरु मल गहे जब लग बिलग न होए । 
पाहन पाहन हो रहे निज गुन कहे न कोए ॥ ३३६९॥ 
भावार्थ : - पाषाण जब तक मलिनता से पृथक नहीं होता तब तक वह अपना धात्विक गुण प्रकट नही करता और पाषाण का पाषाण ही रहता है । 

जब लग धात न धोइया तब लग रह पाषान । 
लोहिताए लोहू भया उदया नवल बिहान ॥ ३३७० ॥ 
भावार्थ : - जब तक मनुष्य का परिशोधन नहीं होता तब तक वह पाषाण ही है । जब वह परिमार्जित होकर लोहिताए, लौह,  स्वर्ण,  रजत आदि धातुओं में परिणित होकर ही वह नवयुग में प्रवेश करता है । 

----- मिनिस्टर राजू १८४ -----

पता है राजू अब ये अंग्रेज के बच्चे भी आर्यों के आगमन की फैली भ्रांतियों जैसी भ्रांतियां फैलाकर दुनिया भर में क्या कहते फिरते हैं..... ?

राजू : -- क्या कहते फिरते हैं मास्टर जी.....?

" हम भारत से आए थे"

राजू : -- हाँ मास्टर जी ! अब हम लोंग को भी श्रीमान, श्रीमान नहीं बोलना चाहिए । अन्यथा ये कल को कह देंगे ये तो अंदमान निकोबार से आए थे और कारोबार करते थे.....




शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३५ ॥ -----

चतुरारध सहस बरस तीनि अरध परजंत । 
धरनिहि भीत समाए भए सुघरपना कर अंत ॥ ३३५१ ॥  
भावार्थ : --  इस सभ्यता का अस्तित्व लगभग साढे चार सहस्त्राब्दी  पूर्व से  साढ़े तीन सहस्त्राब्दी पूर्व तक रहा । ततपश्चात भूमि में समाहित होकर इसका अंत हो गया ॥ 

किछु कलिसाई लेखिआ भारत के इतिहास । 
सुकरात तिन्ह बिभाजित देस केर परसासि ॥३३५२-क॥ 
 केहि भूतिक आपद सों सुथर नगर बिन्यास | 
सुघरपना भुइँ भीत गए भए सब सत्यानास ॥३३५२-ख॥ 
  
भावार्थ : -- भारत का यह इतिहास कतिपय अंग्रेज ईसाइयों द्वारा लिखित व् विभाजित भारत के सत्ताधारियों द्वारा अनुमोदित है । जिनके अनुसार सिंधु घाटी की यह सुव्यवस्थित नागरीय सभ्यता वेदों की रचना से पूर्व की है जो किसी प्राकृतिक आपदा के कारण भूमि में समाहित हो गई और इसका विनाश हो गया ॥ 

कोउ पड़े अकाल कहँएँ कोउ बाढ़ भूचाल । 
भवन हो जन जीवन हो कवलित किए सब काल ॥ ३३५३ ॥ 
भावार्थ : -- सिंधु सभ्यता का पतन /विनाश का कारण किसी ने अकाल तो किसी ने बाढ़ किसी ने भूचाल कहा । सम्भवत: भूचाल के कारण इसका अंत हुवा । भवन हो चाहे जनजीवन सभी भूमि के गर्त में समा गए ऐसा भारत के इतिहास में वर्णित है ॥ 

प्रश्न यह है कि कुछ भी नहीं बचा क्या....?

सिंधु नगर बसइ भए कस कैसेउ भए बिहान । 
 प्रवान पूर पुरा थरी  भरम भरे अनुमान  ॥ ३३५४ ॥ 
भावार्थ : - सिंधु की नगरीय सभ्यता प्रारम्भ कैसे हुई फिर इसका व् अंत कैसे हुवा  । पुरा स्थली यद्यपि स्वयं में प्रमाण है  तद्यपि  इसके कारण भ्रमकारी अनुमानों पर आधारित हैं ॥ 

जीवन जोग जुगाए के जोइ गहे गह्बार । 
अपूरति भर जो पूरिया ताहि कहत बैपार ॥ ३३५५ ॥ 
भावार्थ : - मनुष्योचित जीवन हेतु से युक्त व्यक्ति द्वारा  अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए वस्तु का क्रय-विक्रय व्यापार कहलाता है ।  

जीवन जोग जुगाए के जोइ गहे गह्बार । 
अपूरति पूरावन हुँत सोइ करे बैपार ॥ ३३५६॥ 
भावार्थ : -- मनुष्योचित जीवन हेतु से सम्पन्न व्यक्ति ही अपूर्त आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए व्यापार करता है । 

भए ऐतक सुग्घड़ कहा आन देस के बासि | 
ता सोंहि ब्यबहार किएँ सैंधौ नगर निबासि || ३३५७ || 
क्या अन्य देशों के मनुष्य भी तब इतने ही सभ्य व् सम्पन्न हो गए थे जिनके सिंधु निवासी से व्यापारिक संबंध थे ?  

चार पदारथ जोग जो  करत भूरि उपजोग । 
रहब बहुरि सो धरमवत सुघर कहत सब लोग ॥ ३३५७ ॥  
भावार्थ : -- जो मनुष्य धर्मवत होते हुवे जीवन हेतु आवश्यक संसाधनों का न्यूनतम संधारण कर  उसका अधिकाधिक उपयोग करता हो लोग उसे ही सभ्य कहते है ॥ 

आँग्ल कर अवधारना नागर नगर निवासि । 
गाँव गवईं गँवारू सब अनगढ़ सब बनबासि ॥ ३३५८॥ 
भावार्थ : -- अंग्रेज ईसाईयों की यह अवधारणा है कि मनुष्य जब नगर का निवासी हो तभी वह सभ्य कहलाता है । ग्रामीण व् वनवासी असभ्य होते हैं । 

नगरु भवन कृत काँकरी जिमि घन बन तरु माल । 
बसबासहि नागरी कि जहँ तहँ बसइँ ब्याल ॥ ३३५९ ॥ 
भावार्थ : -- लोग तो कहते हैं कि  नगरों में कंकरों से निर्मित भवन हैं वह  घने बन के वृक्ष समूह जैसे हैं । इनमें निवासित ये सभ्य नागरिक यहाँ वहाँ विचरण करते दुष्ट निष्ठुर हिंसक जंतु हैं जो दंड से विहीन है  फिर केवल नगर में निवासित नागरिक सभेय कैसे हुवा..... ? 


आए बहुरि सो काल जब रचे बेद बिद बेद । 
भगित देस के सासि बर भेद नीति करि भेद ॥ ३३६० ॥ 
भावार्थ : -- तदनन्तर उस काल का आगमन हुवा जब वेदों की रचना हुई । भारत और भारतीयों में विभेद कर विभाजित देश के शासकों  ने अंग्रेजों वाली भेद नीति का प्रयोग किया ॥ 

















शनिवार, 23 जुलाई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३४ ॥ -----


प्राग समउ सुघड़पन जबु कतहुँ न देइँ दिखाए । 
भारत मैं ता सोंहि तब  एकु संस्कृति जनाए ॥ ३३३९ ॥ 
भावार्थ : -- प्राचीन -काल में सभ्यता जब दर्शनातीत थी तब सभ्य व् शिष्ट भारत खण्ड में एक सुसंस्कृति का प्रादुर्भाव हुवा जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है.....

बरन समूह सों संपन्न  सुर सम्पद कर जोग । 
सरित रूप प्रगसित भई देउ गिरा कहँ लोग ॥ ३३४० ॥ 
भावार्थ : - इस संस्कृति के संग वर्ण समूह से संपन्न हस्त कमल में स्वरों की सम्पदा संकलित किए सूत्र रूप में एक समृद्ध भाषा देव गिरा प्रकट हुई, जो प्राचीनतम् भाषा के पद पर प्रतिष्ठित होकर सस्कृत नाम से प्रसिद्ध है ॥ 

जूह समूह समोए के पुरबल रहँ बन बासि । 
 बसे नगर भए नागरी मानस रहैं सुपासि ॥ ३३४१ ॥ 
भावार्थ : -- छोटे छोटे झुंड व् समूह में समेकित जो मनुष्य वनों में अधिवासित था अब वह कर्मशील होकर समष्टि में रूपान्तरित हो गया और एक समृद्ध व् वसति में सुखपूर्वक निवास करने लगा ॥ 

बसन संग भूषन बसे भई श्रील सब देह ।
अगन संग भाजन बसे बसे श्रीस सब गेह ॥ ३३४२ ॥ 


भावार्थ : -- धातुओं का परिष्करण हुवा वस्त्रों के संग आभूषणों के अधिवास से मानव देह शोभा से संपन्न हो गई । अग्नि का प्राकट्य हुवा ता संगत भाजनों के अधिवास से गृह स्वामी के संग सम्पदा भी गृह में निवास करने लगी ॥

सिंधु सरिता सींउ लिखी मध्य भाग सुर  गंग । 
चली परसति बीर भूमि हिलगिहि सागर संग ॥ ३३४३ ॥ 


भावार्थ : -- सीमाएं सिंधु नदी से उल्लखित हुईं मध्य भाग देवनदी गंगा जी से उल्लखित हुवा । जो वीर- भूमि (वंगाल का प्राचीन नाम ) को स्पर्श करती सागर में समाहित होती है ॥

तरंगिनी के तीर बसा बसति बसति बसबास । 
करष भुइँ भंडार भरे जौ कन कनक कपास ॥ ३३४४ ॥ 

भावार्थ : -- इन तरंगिनियों के तटवर्ती क्षेत्रों में वह नगर और निवास का विस्तार करता गया ॥  भूमि कर्षकर वह गेहुँ जौ कपास उपजाने लगा इस प्रकार कृषि का आविष्कार हुवा ॥ 

मानस गेह जुगाइया करि करि जबु श्रम कर्म । 
धी  गुन धरे प्रगस भया धीर रूप में धर्म ॥ ३३४५॥ 
भावार्थ : -- नगर और निवास में निवासित मानव अब पशुता का त्याग कर  जीवन यापन के लिए श्रम और कर्म करने लगा । कर्म के साथ बुद्धि के आठ गुणों को धारण किए संतोष स्वरूप में धर्म का प्राकट्य हुवा ॥ पहले बुद्धि आई फिर ज्ञान आया क्या कहूं क्या न कहूँ, क्या करूँ क्या न करूँ, क्या खाऊँ क्या न खाऊँ की बुद्धि आई । ज्ञान यह कि ये पेड़ कहाँ से आए ये नदियाँ कहाँ से आई ।

जीवन जोग जुगाउते उदयित भया ग्यान  ।
दीठ निपात दसहुँ दिसा दरसा देय ध्यान ॥ ३३४६॥ 
भावार्थ : -- मनुष्योचित हेतु अर्थात भोजन वासन वसन के संकलन करते ही मनुष्य में ज्ञान का अभ्युदय हुवा जब उसने दृष्टिआक्षेप कर दिशाओं का ध्यान पूर्वक अवलोकन किया ॥ 

चेतस मनस बिचारिआ सर्जन सक्ति सँजोए । 
जीवाजीउ जनाए सो जगजीवन हैं कोए ॥ ३३४७ ॥ 
भावार्थ : - अब चैतन्य चित्त विचार करने लगा सृजन शक्तियों को संगृहीत किए कोई ईश्वर है जो इस चराचर का जनक है ॥ 

जटा जूट धर शिवंकर संकर विराजमान । 
जोगेस्वर सरूप में दरस दियो भगवान ॥ ३३४८ ॥ 
भावार्थ : -- और जटाजूटधर मंगलकर योगवेश्वर रूप धारी विराजवान शंकर जी में उसे परम पिता परमेश्वर दृष्टिगत हुवे ॥ 

ससि खेत सोंहि जल भुअन हबिगह अगन सँजोए । 
धर्म नीठ सब होइ के पूजिहि पसु तरु तोए ॥ ३३४९ ॥ 
भावार्थ : - अन्न, जल व् अग्नि संग्रहण हेतु कुंड का निर्माण किया । पशु,वृक्ष व् जल की वंदना धार्मिक आस्था की परिचायक थी ॥ 

स्पष्टीकरण : -- प्राग समय में अग्नि प्रज्वलित रखना अत्यधिक कठिन कार्य था । अत: इसके संकलन हेतु कुंड की रचना की गई कालांतर में सम्भवतःयही कुंड हवन कुंड में रूपांतरित हो गए ॥ 

स्वस्तिका चीन्ह बरे धरनिहि देई मान । 
नगराधिप रखिया करे रहहीं कर्म प्रधान ॥ ३३५० ॥  
भावार्थ : - स्वास्तिक चीन्ह का वरण कर भूमि को देवी की मान्यता दी गई । नगर का प्रबंधन कर्म प्रधान होकर नगरवासी के व् रक्षण नगराधीश के अधीन होता ॥ 

 अवरज हो कि बनिजन हो ब्राम्हन हो कि भूप । 
पुरबल समउ सरोबर तट  कृतएं सौच कृत् कूप ॥ 
भावार्थ : - ब्राम्हण हो क्षत्रिय हों वैश्य हों चाहे क्षुद्र ही क्यों न हों चाहे फिर भगवान ही क्यों न हों प्राचीन काल में 
सभी लोग प्रात-क्रिया सरोवर अथवा नदी के तट पर संपन्न करते थे । छोटे छोटे गड्डे बनाए जाते जिन्हें शौच- कूप कहा जाता फिर उसमें मल -मूत्र त्याग कर उसकी उत्तम गति के लिए उसे तत्काल ही मिटटी से पाट दिया जाता । 

राजू : -- मल कब ढोया गया ? जब शुष्क शौच कूप बने ?ये किसने बनाए ? किसके राज में इनका सर्वाधिक उपयोग हुवा.....ये तो अपने शौच के विज्ञापनों में अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाला भारत शासन ही बता सकता है .....  


----- मिनिस्टर राजू १८३ -----

राजू इस समय देश-प्रदेश में स्थान-स्थान पर वृक्षारोपण-उत्सव: मनाया जा रहा है.....

राजू : -- ये कौन सा वाला उत्सव है मास्टर जी..... ?

अरे वोई वाला जिसमें लगे लगाए पेड़ों को लगा के फोटो खिंचवाते है और फिर पले पलाए पेड़ों को काट काट के अपने कक्ष सजवाते हैं.....?


गुरुवार, 19 मई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३३ ॥ -----,

करम कमाई आपनी, जो सब जनम सहाए ।
धन कमाए का लाहिये, जीमें बैठ पराए ॥ ३३३१ ॥ 
भावार्थ : -- सत्कमों का उपार्जन ही वास्तविक उपार्जन है जो मरणोपरांत साथ जाता है और सभी जन्मों में  सहायक होता है । कुकर्म से जीव निम्न योनि को प्राप्त होता है सत्कर्म से  वह उस योनि में सुख पूर्वक निवास करता है । मरणोपरांत कर्मों के उपार्जन का उपभोग वह स्वयं करता है  उसकी धन-सम्पति का उपभोग कोई और ही करते हैं, एतएव धन सम्पति के संकलन से कुछ लाभ नहीं होता  ।


पति चल बसे उद्योग यहीं रह गए जिसे पराए जीम रहे हैं पंडित चल बसे रोटी और बेटी पराए खा गए ।

पंडत पढ़ परबोधिया अपने बेद पुरान । 
पराया घर ते उपजै तब तिनकी संतान ॥ ३३३२ ॥ 
भावार्थ : -- पंडित जी धन के लालच में व्यास जी की छोड़ के जब अपने वेद- पुराण पढ़कर ज्ञान देने लगते हैं  तब उनकी संताने क्रूर म्लेच्छ के गर्भ और वीर्य से उत्पन्न होती है ॥

पराया घर ते उपजै पंडत की संतान । 
पुन्य पराए पहार बन, दूरे बेद पुरान ॥ ३३३३ ॥ 
भावार्थ : -- जब पंडितों ब्राम्हणों की संतानों को क्रूर म्लेच्छ जनम देने लगते हैं तब पूण्य पहाड़ों में जा बसते हैं और वेड पूर्ण अफ्रीका के जंगलों में छिप जाते हैं ॥ इसलिए सत्ता सत्ता और पैसा पैसा मति करो ॥

अँधा पथ परबोध फिर बायस पढ़े पुरान ।
ऊंची पीठी पैठ के हंसनु देवे ज्ञान ॥ ३३३४॥
भावार्थ : -- तब अंधे पथ प्रदर्शक हो जाते है और कौंवे ऊँचे आसन पर बैठ कर हंसों को ज्ञान देते हैं ॥
क्या ज्ञान देते हैं ?
 यही की हंस हो तो हंस ही रहिओ, आधे तीतर आधे बटेर मति बनियो, अन्यथा मैं तुमसे श्रेष्ठ कहलाऊँगा फिर मैं ज्ञान दूँगा तुम लोगे समझे

राजू : -- न न इनको जर्मनी में समझाओ तब समझेंगे.....

जीवाधार हेतु गहउ अनुसासित आहारु । 
बहुरि बहुंतहि सोच समुझ करिहौ सौचाचार ॥ ३३३५ ॥  
भावार्थ : -- एक अनुशासित दिनचर्या हेतु हम एक अनुशासित आहार लें ।  हमारा आहार प्रत्यक्ष व् अप्रत्यक्ष किसी को भी जीवन के अधिकार से वंचित न करे यह सात्विक व् संतुलित हो। हमें पथ्यापथ्य का  विचार कर भोजन ग्रहण करना चाहिए । संसार के संचालन में सहायता के लिए विधाता ने मनुष्य को रचा , इसका उद्देश्य सत्कार्य करना है प्रधान मंत्री के जैसे नहीं कि जिसका एक ही काम हो खाना और हगना.....वो भी वायुयान की पटरी पर । भोजन पश्चात कृत्याकृत्य का विचार कर शौच कर्म करें। कल प्रधान मंत्री पीठ पीछे कोई दो तीन शौचकूप टाँगे टी. वी पर हाँक लगा रह थे.....फ्री में संडास बनवा लो.....एक ने कहा बनवा तो लें किन्तु सफ़ा कौन करेगा.....किसी क्षुत्-क्षाम को क्षुद्र बनने के लिए विवश न कर अपने शौच कूप का शोधन हम स्वयं करें ॥

सकुचित जाकर मानसा ताकर करि अनुहारि । 
धर्म  बरन त्याजत भए श्रुति बिरोधि नर नारि ॥ ३३३६ ॥ 
भावार्थ : -- "मैं और मेरा " की संकीर्ण मानसिकता का अनुकरण कर भारतीयों न अपना धर्म अपना वर्ण त्याग दिया वे अपने सदग्रंथों के विरोधी हो गए यह विरोध राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हुवा  है ॥ 

ब्रम्हन धर्म कर मूरति ब्रम्हहि वाके मूल । 
जो ब्रम्हन नहि होइआ बिनसिहि देस समूल ॥ ३३३७ ॥ 
भावार्थ : -- ब्राम्हण धर्म की साक्षात मूरति है ब्राम्हण धर्म का मूल है । ब्राम्हण अल्प से अल्पतर हो गए यह देश नष्ट व् भष्ट होता चला गया ॥ 

पसु पाँखि तरु पादप सम  होत मनुज के जाति । 

जग माहि एहि  ग्यान बिनु, पसरी बहुंतक भ्राँति ॥ ३३३८ ॥ 
भावार्थ : -- उन्नत पशु, उन्नत बीज उच्च कोटि के अनाज जैसे  मनुष्य की जाति भी उन्नत व् उच्च कोटि की होती है । इस अनुसंधान के  विपरीत होकर मानव जाति के सम्बन्ध में बहुंत सी भ्रांतियाँ फैली और फैलाई गई । 
प्राग समउ सुघड़पन जबु कतहुँ न देइँ दिखाए । 
भारत मैं ता सोंहि तब  एकु संस्कृति जनाए ॥ ३३३९ ॥ 
भावार्थ : -- प्राचीन -काल में सभ्यता जब दर्शनातीत थी तब सभ्य व् शिष्ट भारत खण्ड में एक सुसंस्कृति का प्रादुर्भाव हुवा जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है.....

बरन समूह सों संपन्न  सुर सम्पद कर जोग । 
सरित रूप प्रगसित भई देउ गिरा कहँ लोग ॥ ३३४० ॥ 
भावार्थ : - इस संस्कृति के संग वर्ण समूह से संपन्न हस्त कमल में स्वरों की सम्पदा संकलित किए सूत्र रूप में एक समृद्ध भाषा देव गिरा प्रकट हुई, जो प्राचीनतम् भाषा के पद पर प्रतिष्ठित होकर सस्कृत नाम से प्रसिद्ध है ॥ 













सोमवार, 9 मई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३२ ॥ -----

सुबारथ अरु परमारथ, अरथ गहे दुइ सार । 
एक ते जग साकार है, दूजे तेउ बिकार ॥ ३३२१ ॥ 
भावार्थ : --अर्थ की दो गति हैं स्वार्थ एवं परमार्थ । उपयोग करने पर अर्थ के दो विपरीत परिणाम प्राप्त होते हैं । परमार्थ के परिणाम स्वरूप  संसार साकार हो जाता है जिससे ईश्वर सगुण रूप में प्रकट होते हैं । स्वार्थ के परिणाम स्वरूप संसार में विकृति आ जाती है जिससे ईश्वर निर्गुण रूप में प्राप्त होते हैं ॥

 जहां अर्थ परमार्थ हेतु है वहां ईश्वर प्रकट होते हैं

जो अरथ परमारथ मद करे जगत के काज । 
निसदिन श्रीधर होइया तासों देस समाज ॥ ३३२२ ॥ 
भावार्थ : --  अर्थ जब परमार्थ के मद में व्यय होकर संसार के कल्याण परक कार्यों में संलग्न रहता है तब उससे देश समाज सहित संसार शोभा संपन्न होकर नित्य ही रूपवंत होता जाता है ॥

स्वारथ परत अर्थ कर जोवन भरे विकार । 
सुरति रहे बस आपनी भूर परे संसार ॥ ३३२३ ॥ 
भावार्थ : --  स्वार्थ परायण अर्थ पति का अर्थ संग्रह स्वहित हेतु होता है जो विकृति को उत्पन्न करता है । संसार को विस्मृत कर इसे स्वयं का ही स्मरण रहता है ॥

भोजन बासन बासना यहु जीवन के हेत । 
अजहुँ सरलतम रूप में लहि जन साधन सेत ॥ ३३२४॥ 
भावार्थ : -- भोजन वस्त्र और वास यह जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं । मुद्रा  रूपी साधन से इसे प्राप्त करना मानव-जाति  के लिए सरल हो गया ॥ पशु-पक्षियों को जिसके लिए संघर्ष करना पड़ता है ॥ 

त्याग केरा छालना जिउ धन छनता जात । 
बुरा बुर तीरे रहे भला भला छनि आत ॥ ३३२५ ॥ 
भावार्थ : -- पशु पक्षियों के जीवन-संघर्ष को यत् किंचित करने के लिएजीवन के पथ पर हम त्याग की छलनी लेते चलें । इस छलनी के प्रयोग से बुरा धन किनारे रह जाता है छन छन कर भला धन ही आता है ॥ 


भला जोगवन जोइयो भल ते होत भलाए । 
बुरा जुगते  बुरा होत आपन हो कि पराए  ॥ ३३२६ ॥  
भावार्थ : -- धन दो प्रकार का  होता है भला और बुरा । भला धन भला ही करेगा, बुरा बुरा ही करेगा अपना भी और दूसरों का भी,  इसलिए भले धन का ही उपार्जन करें ॥

अम्बर डम्बर देख के कहत सुखी सब ताहि । 
सुख मिले संतोख ते धन सम्पद ते नाहि ॥ ३३२७॥ 
भावार्थ : -- भले धन की अधिकता भी असंतोष को व्युत्पन्न करती है । जीवन के आवश्यक हेतु को न्यूनतम  कर यत किंचित धन से ही संतुष्ट रहना चाहिए कारण कि संतोष में ही सुख निहित है । आडम्बरियों  के आडम्बर का  दर्शन कर सब उसे सुखी कहते अवश्य हैं पर वे सुखी रहते नहीं है ॥


संतोषस्त्रिसु कर्तव्य:स्वदारे भोजने धने । 
त्रिषु चैव न कर्तव्य: स्वाध्याये जपदानयो ॥ 

भावार्थ : -- स्त्री संतति स्वजन भोजन धन में संतोष करना उत्तम है । स्वाध्याय, पूजन-वंदन जप-कीर्तन व्  दान-धर्म  में कभी संतोष नहीं करना चाहिए ॥

मानस करम उद्यम रबि जीवन जोग समूंद । 
गहे सो घन गेह गगन, बरखे बरखा बूँद ॥ ३३२८ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य कर्म श्रम उद्यम से धनार्जन करता है । यदि जीवन का आधरभूत धन समुद्र के समान है तब श्रम  उद्यम तपस चरणी सूर्य के समान हो वाडवाग्नि के समान नहीं । सूर्य समुद्र  से केवल मोतियों को चुनता है वाडवानल भक्ष्याभक्ष्य कर पूरे समुद्र को ही अवशोषित कर लेता है ।  उपार्जित धन जब घन बने  और घर गगन बने तब वह घमंड न कर बून्द बने और वर्षा बनकर  दान-धर्म करे उसका संग्रह न करे ।

स्थितिरुच्चै: पयोदानां पयोधीनामध: स्थिति: । 
भावार्थ : -- निरंतर वर्षा का दान करने से बादलों की स्थिति ऊपर  होती है जल का संग्रह कर केवल गर्जना  करने से स्थिति नीचे हो जाती है ॥

दुराचरन का राजना भरिया भरम अंदेस । 
भलमन साईं बिसराएँ खल न कायँ कलेस ॥ ३३२९ ॥ 
भावार्थ : -- जब निंदित आचरणों कुत्सित कर्म का राज होता है तब संसार भ्रम, संदेह से व्याप्त हो जाता है जो ज्ञान को आच्छादित कर उसे अज्ञानतस कर देता है ॥ तब सज्जनता प्रशमित और दुर्जनता लब्ध -प्रतिष्ठित होती  जाती है ॥

सदगुन सुखकर सम्पदा, दुर्गुन दुःख की खान । 
जाहि बिबस जग होइया ताहि अधिकतम जान ॥ ३३३० ॥ 
 भावार्थ : -- सुख व् दुःख गुणों के कारण भूत हैं  ।  सद्गुण सुख की सम्पदा है, दुर्गुण दुखों के भंडार होते हैं । संसार यदि सद्गुणों के वशीभूत है तब सुख की अधिकता होगी, यदि वह दुर्गुण के अधीन हो  तब दुःख अधिक होगा ॥










रविवार, 1 मई 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३१ ॥ -----


विद्याधर मग चालिया मिली मझारी लूट । 
लूटन माहि गहि मनिआ  गई हाथ से छूट ॥ ३३११ ॥ 
भावार्थ : -- विद्या ( ज्ञान ) सन्मार्ग को निर्दिष्ट करती है , विद्या के चरम बिंदु की प्राप्ति से ईश्वर की प्राप्ति होती है  । विद्या धारण कर फिर जब कोई इस मार्ग में चल निकलता है तब  बीच-बीच में उसे लूट मिलती है फिर यदि वह लूटने में संलिप्त हो जाए तब उसकी विद्या कहीं पीछे छूट जाती है । 

हनुमन अति लघु रूप धरि  प्रबसिहि पड़ौसि देस । 
जहँ बड़ न जाए सके तहँ  लघुबर करिहि प्रबेस ॥ ३३१२ ॥ 
भावार्थ : -- महावीर हनुमान मषक रूप धारण कर पड़ोसी देश में  प्रविष्ट हुवे । जहाँ बड़ों-बड़ों की प्रविष्टि नहीं हो पाती वहां छोटों का प्रवेश हो जाता है ॥ 

सम्पद काल  में भूषना विपदा काल सहाए । 
बिरधा काल धरी ढकी बिदुता केर सुभाए ॥ ३३१३ ॥ 
------ ॥ अरस्तु ॥ -----
भावार्थ : -- सम्पद काल में यह आभूषण स्वरूप है विपदा काल में सहायक है वृद्धावस्था में यह संचित सम्पत्ति है विद्वता की ऐसी प्रकृति है ॥

संजम सम को सैन नहि विद्या सम नहि नैन । 
रहियो पहरे आपने नैन धरे दिन रैन ॥ ३३१४ ॥ 
भावार्थ : -- संयम जैसी  कोई सेना नहीं विद्या जैसी कोई दृष्टि नहीं ।   ऐसी  दृष्टि के निरीक्षण में ऐसी सेना के द्वारा  हम अपनी रक्षा स्वयं कर सकते हैं ॥

करे करम के साथ है मानस केरा मोल । 
कर नहि पार गिराइया ताही पाषन बोल ॥ ३३१५॥ 
भावार्थ : -- स्वर्ण का मूल्य उसकी शुद्धता पर आधारित होता है मनुष्य का मूल्य उसके सत्कर्म पर आधारित होता है ।  किंचित सतकर्म मनुष्य को सहँगा बनाते है कुकर्म से वह साधारण पत्थर के जैसे मूल्यहीन हो जाता है ॥

ज्ञान से मनुष्य सत्कर्म में प्रवृत्त होता है विद्या विद्वान् से, शिक्षा शिक्षक से प्राप्त होती है ज्ञान गुरु से प्राप्त होता है

येन खट्वां समारूढ: परितप्येत कर्मणा । 
आदावेव न तत् कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥ 
 ----- ॥ विदुर नीति ॥ ----- 
भावार्थ : -- जगत का प्रपंच क्षणभंगुर है तो उसके सम्मुख इस जीवन का क्या ठिकाना।अत: वे  कार्य पहले कर लेने चाहिए जिन्हें न करने पर बाद में खटिया में पड़कर पश्चाताप करना पड़े ॥ 


कपटी ढोंगी पाखनी महात्मन भर भेष  । 
सीख मिले घर आपना तापर गयउ बिदेस ॥ ३३१६  ॥ 
भावार्थ : - हमारे देश के महात्मा  कोई संत-महात्मा नहीं थे सत्ता प्राप्ति  के लिए उन्हें महात्मा बनाया गया था देश में शिक्षा उपलब्ध थी तथापि उसे विदेशों में ग्रहण की गई ,  महात्मा लोग ऐसा करते हैं क्या ? उद्योग पतियों के हॉउस में रहे महात्मा लोग ऐसे रहते हैं क्या ? ॥ 

राजू : -- हाँ तो क्या यहां योग्य शिक्षक नहीं थे या नहीं हैं  , विदेशों में उपचार कराते हैं क्या यहां योग्य चिकित्सक  नहीं थे या नहीं हैं । 

देस होलि जलाए कहा स्वदेसी अपनाएँ । 
महमंत्री पड़िया रहा पढ़वन देस पराए ॥ ३३१७॥ 
भावार्थ : -- जब देश विदेशी वस्तुओं की होली जलकर स्वदेशी अपनाने क संदेश दे रहा था । तब देश के प्रधानमंत्री जी विदेशी शिक्षा ग्रहण करने व्यस्त थे महात्मा लोग ऐसे को प्रधानमंत्री बनाते हैं क्या ? 

राजू : -- हाँ गोद तो बिलकुल भी नहीं लेते..... चाणक्य के देश से अरथ सास्तर पढ़ने गई थी महारानी.....

जीवन जियधन सों चरे  ताहि बिनु जिए न कोइ । 
भोजन बासन बासना श्रम बिनु साध न होइ ॥ ३३१८॥ 
भावार्थ : -- जीवन जल व् अन्न  से संचालित होता है जल अन्न रूपी यह धन जीवन की प्रथम व् परम आवश्यकता है,  इस धन के आधार कर प्राणी जगत जीवंत है ॥ भोजन वस्त्र आवास रूप में यह श्रम से ही साध्य होता है ॥ 

इस धन के द्वारा जीवन का संधारण करने के लिए मनुष्य नाना भाँति की कलाएँ करता है, यही कलाएँ विद्या कहलाती हैं ॥  

समय पुरब श्रम करम बिनु धन धामन की लाह । 
पाप करम निपजाइया किए समरथ सब काहु ॥ ३३१९ ॥ 
भावार्थ : -- यथोचित श्रम और कर्म किए बिना समय से पूर्व भाग्य से अधिक धन धाम की अभिलाषा ने पापकर्मों को उपजाया, इन पाप कर्मों ने पापियों को भी समर्थ बना दिया ॥ 

समरथ दोष  नहीं गोसाईं । पावक सुरसरि रबिकर नाई ॥ 

जीवन धन का जोउना  चतुर भदर में अर्थ । 
 पर हुँते परमारथ है आपनि हुँत स्वारथ ॥ ३३२० ॥ 
भावार्थ : - चूँकि जल व् अन्न जीवन का आधार स्वरूप है एतएव यह वास्तविक धन है । सृष्टि द्वारा मनुष्य हेतु अधिकृत चार पदार्थों में जिसे अर्थ कहा गया ।  परहित हेतु हो तो अर्थ एक  उत्कृष्ट पदार्थ है  है स्वयं हेतु हो तो यह निकृष्ट है ॥ 

जीव जगत के लिए जीवन धन का प्रतिरूप भोजन वस्त्र आवास की व्यवस्था अर्थ व्यवस्था कहलाई । अर्थ को सुव्यवस्थित करने हेतु मुद्रा एक  उत्तम साधन सिद्ध हुई । अर्थ की अव्यवस्था मुद्रा के अवमूल्यन का प्रमुख कारण है 

 जल  के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती ।  जीवन के संधारण  में जल व् अन्न का प्रथम स्थान है ततपश्चात अन्य का, अतएव  यही वास्तविक अर्थ है ॥ 



गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३३०॥ -----


ज्ञानद कतहुँ रहे नहीं रहे न सुबुध सुजान । 
ज्ञान आप जिन चाहिबे सोइ बतावैं ज्ञान ॥ ३३०१ ॥ 

भावार्थ : --  ज्ञान दाता अब नहीं है विद्वान् भी नहीं रहे, जिन्हें स्वयं ज्ञान  की आवष्यकता है वेज्ञान बताते हैं जिन्हें स्वयं विद्या की अवष्यकत है वे विद्वान् कहलाते हैं जिन्हें अनुशासन  की आवष्यकता  है वे शासन कर रहे हैं ॥ 

साँच अहइ मतिहीन कू बिरथा सब उपदेस । 
धुबिया बस के का करे दिगम्बरी के देस ॥ ३३०२ ॥
भावार्थ : -- सत्य है मूर्खों को उपदेस व्यर्थ होते हैं । बुद्धिहीन की बस्ती में उपदेसक बस के करेगा भी क्या ॥ 

पाठ पराया पढ़त भए चरित हीन सब कोए । 
कै कंचन के कामिनी बिषय जनावा दोए ॥ ३३०३ ॥ 
भावार्थ : - परायों की पढ़ाई पट्टी में आकर अपनों के साथ  पराए भी चरित्र हीन हो चले  । ऐसी पढ़ाई पढ़ कर  इन्हें दो ही विषयों की विशेषज्ञता प्राप्त हुई पैसे की या स्त्री की ॥ 

सत्ता से पैसा बहुंत आता है ये बिना पंख के पंछी बना देती है हवा में उड़ा देती है भई । 

राजू : -- हाँ ! हमारे देश में तो इसके पास जादू का पानी है ये पढ़े बिना ही डाक्टर इंजिनियर और न जाने क्या क्या बन देती है । अब लोग रोग से नहीं बल्कि उलटी सीधी औषधि खाने से और इधर के उधर की शल्य क्रिया  से मर रहे हैं । हमारे यहाँ की सड़के v शेप में टर्न होती है पूल पूछते हैं मैं कब गिरूँ.....? 

 धर्म चरन बिसारी के चरित हीन सहचारि । 
जब को जनिमन जामिया पलक देइ परिहारि ॥ ३३०४ ॥ 
भावार्थ : -- विवाह एक संस्था है संस्था में अधिकार व् कर्तव्य दोनों निहित होते हैं  चरित्र हीन के परस्पर सहगमन से धर्म चरण का निर्वहन नहीं होता । ऐसे सहगमन से उत्पन्न संतति  तत्काल ही त्याग दी जाती है  ऐसी संततियां के लिए उत्तरदायी कौन है ? समाज या देश या वह न्यायालय जो ऐसे सम्बन्धों की स्वीकृति का निर्णय करता आया है ॥ 

अनाचारि अपचरनि भए जन जन के प्रतिमान । 
अजहुँ जगत भर अपूरे कामग की संतान  ॥ ३३०५ ॥ 
भावार्थ : -  अब अनाचारी दुराचारी दुष्कर्मी लोगों के आदर्श हो चले हैं, तब फिर ऐसों के बच्चे सच्चे कैसे होंगे । अधुनातन विश्व अनैतिक सम्बन्धों से उत्पन्न संतानों से भर गया है,  देश-विदेश में ऐसी संतानों की संख्या अध्ययन का विषय हैं इनके क्रियाकलाप का समाज व् देश पर पड़ता प्रभाव शोध का विषय हैं ॥

निज कुल जात न जान सो कुलोदभव कहलात । 
बिधि बिरोधि जातक अजहुँ कहलावैं अभिजात ॥ ३३०६॥  
भावार्थ : - जिन्हें  अपने कुल का पता नहीं जात का पता नहीं पिता के पितरों का पता नहीं वे अब खानदानी कहलाते हैं । अनैतिक सम्बन्धों से उत्पन्न संताने अब अभिजात्य वर्ग कहलाने लगी है ।

कुलोदभव अथवा खानदानी किसे कहते हैं : --  पवित्रता , मर्यादा, शीलता, दान- धर्म, सत्कर्म आदि सद्गुणों से उत्तम कुल का उद्भव होता है ऐसे कुल में उत्पन्न संतान को कुलोद्भव कहते हैं ,  ऐसे कुल के समूह को अभिजात्य वर्ग कहते हैं ॥

अबिधिक जनित न जानिबे मात  पिता कुल जात ।
बयस बूढ भयसि तापर कुँअरु साह कहलात ॥ ३३०७ ॥ 
भावार्थ : -- अवैधानिक संताने अपने मात- पिता का नाम ज्ञात नहीं होता उन्हें अपने कुल व् जाति का भी ज्ञान नहीं होता । आयु व्यतीत होती जाती है बूढ़े हो जाते हैं तथापि ये कुंआरे ही कैसे रहते हैं भई ?

राजू : -- जादू के पानी से.....

जगत कल्याण हेतु किए गए कार्य विधि सम्मत व् विपरीत कार्य विधि विरुद्ध होते हैं ।

जोग पाद पिठाईं जो नहीं केहि के जोग । 
उपरितन भए को एक दुइ पचि मुइ केतक लोग ॥ ३३०८॥ 
भावार्थ : -- योग्य पदों पर उन्हें पीठासीन किया जो किसी योग्य नहीं है । यत् किंचित  का ऊँचा उठाने  व् कतिपय नेताओं के सम्मान करने में उनके नीचे दबकर कितने मरे,  कौन मरे,  कैसे मरे इसका आकलन करने  का समय किसके पास है ॥ 

बिनवत जग करि जोरि के सुनहु सब बिधि बिधान । 
जुगता को पद दीजिये, दारिदी को ग्यान ॥ ३३०९ ॥ 
भावार्थ : -- यह जगज्जन करबद्ध होकर कहता है: --  हे विश्व  के विधाता तू योग्य को ही पदारूढ़ित करने का विधान कर धन से मन से तन से दरिद्र को ज्ञान व् विद्या प्रदान कर  ॥ -- 
क्योंकि : -- 

विद्या ददाति विनयम विनयाद्याति पात्रताम् । 
पात्रता धनमाप्नोति धनाद धर्म: तत : सुखम् ॥ 

  बिद्या बिनु बिद्वान भए गुन बिनु भए गनमान । 
सत्ता निसदिन माँगती तिनके कर बलिदान ॥ ३३१० ॥ 
भावार्थ : -- जब विद्या विहीन विद्वान् व् गुण विहीन गणमान्य हो  जाएँ, तब  विद्या निसदिन उनके  हाथों जनसामान्य की बलि माँगती है ॥ 

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२९॥ -----

लोक प्रसासन नाउ के राजसी किए सिंगार । 
बिनसे संचित सम्पदा बिपदा के भरमार ॥३२९१॥ 
भावार्थ : --  वर्तमान में प्रचलित राजसी श्रृंगार किए लोकतंत्र में चयनित व्यक्ति सेवक बनकर कर राज करता हुवा राजा है जो न राज धर्म का निर्वहन करता है न सेवा धर्म का । यह लोगों के लिए छलावा सिद्ध हो रहा है । संचित धन-सम्पदा का  जितना दोहन इस  तंत्र ने किया उतना किसी ने नहीं किया समाप्त होती इस सम्पदा के साथ विपदाओं की व् समस्याओं की भी सर्वाधिकता है ॥

माया मद ते आँधरा बधिरा प्रभुता संग । 
साँचे बोल न देइया झूठे केर प्रसंग ॥ ३२९२॥ 
भावार्थ : --  माया व् प्रभूता  के मद से अंधा व् बहरा हुवा मृषा का प्रसंग कर यह सत्य को मौन कर देता है ॥

खाद अखादन खाइये नित नव नार सँजोग । 
तासों भइले रोगिले उपजावत नव रोग ॥ ३२९३॥ 
भावार्थ : -- छद्म लोकतंत्र अखाद्य खाद्यान के सेवन को प्रेरित करता है और नित नव नारी के प्रसंग इसके लिए व्यभिचार नहीं शिष्टाचार है ।  उससे नए नए रोगों का प्रादुर्भाव हुवा रोगग्रस्त समाज का निर्माण होता गया अब तो निरोग्य ढूंढने से भी नहीं मिलते ॥

जनमत केरे राज में जनमानस अधिकाए । 
जीवन जोवन आपना जीवन धन बिनसाए ॥ ३२९४ ॥ 
भावार्थ : - तथाकथित इस जनमत के तंत्र में मनुष्य की संख्या अत्यधिक हो गई ॥ बी प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन संधारण हेतु  जीवन धन का ही  ह्रास करने में संलिप्त है ॥  यदि जीवन धन का ही ह्रास से संधारण कैसे होगा ॥

इसलिए युद्धकाल में ह्रास होता जीवन  धन यदि कागजी टुकड़ों से मिले तो उसे प्राप्त करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए.....

जल अरु अन्न ते बढ़ के धन सम्पद नहि कोइ । 
सुभाषित बचन ते बढ़े कोउ रतन  नहि होइ ॥ ३२९५ ॥ 
भावार्थ : -- क्योंकि : -- जल  से बढ़कर कोई सम्पदा नहीं है अन्न से बढ़कर कोई धन नहीं है  सुभाषित वचनों से बढ़कर कोई रत्न नहीं है ॥ 

सुवारथ के परायना,  अर्थ केर सब नीति ।
नित नव नवल भेस  भरी सोई रीत कुरीति ॥ ३२९६ ॥
भावार्थ : -- अर्थ की नीतियां समस्त विश्व के कल्याण हेतु निरुपित की गई थी तथाकथित जनतांत्रिक व्यवस्था में  वह मैं और मेरा की संकुचित मानसिकता के वशीभूत होती गई ।  पूर्व में जो रीतियाँ कुरीतियां थीं  नित नवीन वेश धारण कर वह अब भी समाज के सम्मुख उपस्थित रहती है ॥

पाँखि बिनहि सब पाँखि भए उड़ उड़ चले अगास । 
देस प्रदेस दूषित किए करत जगत पर्यास ॥ ३२९७ ॥ 
भावार्थ : -- सुखसाधनों का उपयोग संसार को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों हेतु होना चाहिए ।  पंखहीन होकर लोग यदि पक्षी हो जाए ये भूचर न होकर गगनचर हो जाएँ  तब उनके घर घर न होकर घोंसलें ही होंगे। अधुनातन प्रदूषित वातावरण व्  जलवायु का असंतुलन इन जीव- संसाधनों के दुरूपयोग का परिणाम है ॥


धी रहे न ध्यान रहे, न गुन रहे न ग्यान । 
चारि आखरि जान किए रावन सा अभिमान ॥ ३२९८ ॥  
भावार्थ : -- उदर पूर्ति के लिए ग्रहण की गई शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान ही है । जन मानस में विवेक नहीं रहा   मनन शीलता के अभाव से सद्विचारों अभाव हो गया ।  मनुष्य गुणहीन होकर ज्ञान से विपन्न हो गया चार अक्षर को जानकर वह रावण के जैसा अभिमान करने लगा ॥

हमारे वृद्ध कहते लो रामायण पढ़कर सुना दो तब अभिमान तो ऐसा होता ओह ! हमारे जैसा वेदाचार्य  कहीं दुनिया में नहीं मिलेगा.....

पुरान पंथी जान के किए जिनका अपमान । 
ग्यान गोचर रूप में सो तो परम सुजान ॥ ३२९९॥ 
भावार्थ : -- पुराण पंथी जन के तथाकथित लोकतंत्रिक इस देश ने जिनका अपमान किया । ज्ञान से परिपूर्ण परम विद्वान् थे ।  ज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य गुणवान होता है  ॥

कलुषित सुख सम्पद संग मुख मुख भए सब  काहि । 
जा मुख सुनिए राम कथा, ता मुख मिलिया नाहि ॥ ३३०० ॥ 

भावार्थ : - पापमयी सुख सम्पदा  दस मुखी से भी परतस होकर अधिमुखी हो गए । अब  वह मुख नहीं मिलता जिससे भगवान की कथा सुनी जाए । माया की महिमा  इतनी हो गई कि कथावाचक अब तो संडास में बैठे को भी कथा सुनाने पहुँच जाते हैं ॥  

सत्य नया-पुराना नहीं होता सत्य सदैव सत्य होता है..... धर्म क्या ही ? सत्य है दया है  दान है और तप है..... 

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२८ ॥ -----

पुरबल कर कृपन ते यह संचित सम्पद पाए । 
गिन गिन के गन नाथ भए अरु बिन बिन के खाए ॥ ३२८१ ॥ 
भावार्थ : --  पूर्वजों की कृपणता से ही यह धन सम्पदा हमें संचित रूप में प्राप्त  हुई ।  कपोत-वृत्ति का अनुपालन करते अतिशय यत्न से यह राष्ट्र संगठित राष्ट्र बना । यदि वे भी हमारे जैसे होते तो हम कैसे होते ? हम होते ही नहीं होते तो दरिद्र होते । कोई इसे विघटित करते हुवे विभाजित करेगा तब  कितना बुरा लगेगा

बिलकुल बावन पत्ते के जैसे.....

देख जोख धन बरतिये पाल पोष सब काय । 
 संचित निधि संचित रहे अरु नव नव उपजाए ॥ ३२८२ ॥ 
भावार्थ : -- धन को यत्न पूर्वक व्यय करना चाहिए ।  ऐसे व्यय करना चाहिए जिसमें सभी निकाय परिपुष्ट हों संतुलित हो । संचित निधि संचित ही रहे सत्प्रयास से धन के स्त्रोतों का वर्द्धन कर नई नई निधियां उपजाएं ॥


जीउ जोग भए अल्पतस संसाधन अधिकाए । 
मानस तेरा जीउना जीवन नित बिनसाए ॥ ३२८३ ॥ 

भावार्थ : -- जीवन हेतु ( जीवन के लिए आवश्यक  हेतु : जैसे जल अन्न आदि ) अल्पतस हो गए और सुख- सुविधाएं अत्यधिक हो जाए तब संतुलन कैसे होगा ?  संसाधनों की अधिकता ने जीवन को  न्यूनतम कर दिया,  पृथ्वी में कुछ अद्भुत है तो वह जीवन है,  मानव की जीवन चर्या पृथ्वी के जीवन को निरंतर नष्ट कर रही है ।  जनगणना के साथ पशु-पक्षियों की गणना भी तो करो ये पूर्व में कितने थे अब कितने हैं ।

नदी नीर बिहीन भई, बँधे सेतु पर सेतु । 

जी जब जोग न पाइये त साधन केहि हेतु ॥ ३२८४ ॥ 

भावार्थ : -- नदियां जल से विहीन हो गई जल है की वह मलीन हो गया  । और उसपर सेतु बंधे जा रहे हैं । जब जीवन यापन के आवश्यक हेतु की हीनता  संसाधनों को निरुद्देश्य कर देगी  । भारत सहित समस्त विश्व के सत्ताधारी प्राथमिकता निर्धारित  करने में असफल सिद्ध हो रहे हैं । प्रथमतस क्या चाहिए जल कि सेतु,? जीवन कि जीवन हेतु ? खेत चाहिए कि उद्योग ?  जब  इसका निर्णय जन मानस स्वयं करने लगेगा तब कदाचित ईश्वर इस छद्म लोकतंत्र के साम्राज्य से  भी ऊब जाएगा वह शासक नहीं शासन तंत्र को  परिवर्तन करने चल पड़ेगा.....

चारि दिवस का जीउना  जामें दोई रात । 
बसुहु बसा बसुधा हेतु होत  सकल उत्पात ॥ ३२८५ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य का जीवन चार दिवस का है । जिसमें दो रात्र भी सम्मिलित हैं जो शयन में व्यतीत हो जाती हैं । अब तक जितने उत्पात हुवे स्त्री, वसुधा और धन-सम्पदा  के लिए हुवे ॥ अब इससे न्यारा क्या होगा ॥ 



खाएँ पिएँ सोएं रहे अरु काज करें नहि कोए । 
जो ऐसेउ बिचारिये सो तो जड़मति होए ॥ ३२८६ ॥ 
भावार्थ : -- खाएं पिएँ आनंद मनाएं और कोई काम न करें जो शासन तंत्र ऐसी भोगवादिता का समर्थक हो,  मनुष्य के द्वारा केवल मनुष्य के लिए हो वह विध्वंसकारी तंत्र है ।

बुद्धिमंत केरी भुजा होत प्रलंबित भूरि । 
प्रहार सकै करियन सो तिन्ह सोंहि बहु दूरि ॥ ३२८७ ॥ 
----- ॥  पंचतंत्र ॥ -----
भावार्थ : --  बुद्धमन्त की भुजाएँ अतिशय प्रलंबित होती हैं जिसके द्वारा वह दूर तक वार करने में सक्षम होता है  ॥

अब के भारत का  किसान निर्धन क्यों है ? क्यों की  उसे किसानी करनी तो आ गई व्यापार करना नहीं आया.....

घोर अँधेरि नगरिया अरु जहँ चौपट राउ । 
सुबरनहू तहँ मेलिही पीतर केरे भाउ ॥ ३२८८ ॥ 
भावार्थ : -- जिस राष्ट्र का शासन प्रबंधन अकुशल हाथों में होता है  उस राष्ट्र का सोना भी पीतल के मोल बिकता है ॥

आन  देस का राहिला मैदा केर समान । 
भारत केरा ओदनहु, पाकत भए पकवान ॥ ३२८९॥ 
भावार्थ : - पड़ोसी देशों के  ३०० रूपए किलो वाले बेसन से कोई कोई पकवान बनने लगो तो उसका बीस रूपए किलो वाला नूडल बन जाता ही  है । भारत का ......किलो वाले चावल को पकाओ तो सुस्वादु पकौड़ियाँ व् अन्य सुस्वादु पकवान प्राप्त होते हैं  स्वाद तो किसी भी मोल में मिल जाए है न ॥

भारत देस तेउ इतर सहँगे अन्न बिसाए  । 
कच्चा पक्का खाए सो अपनी देह नसाए ॥ ३२९०॥ 
भावार्थ : -- भारत का अन्न बल व् बुद्धि वर्द्धक होता है जो पड़ोसी का सस्ता वाला अन्न बिसाता है । अधपका भोजन का सेवन कर पाने उदर को कचरा घर बनाता है शारीरिक शक्ति को क्षीण कर वह अपना स्वास्थ बिगाड़ता है  ।

राजू : -- हाँ तो पड़ोसी का सस्ते,  अधपके  भोजन से जो बुद्धि घुटने में आ गई है वह  एड़ी में स्लीप हो जाए इससे पहले



भारत का अन्न खाओ - बल बुद्धि बढ़ाओ
 कृषि के क्षेत्र में शहस्त्राब्दियों का अनुभव ---- टिंग टाँग

कार्य-कुशल व्यक्ति के लिए यश और धन का अभाव नहीं होता.....
 ------ ॥ अज्ञात ॥ -----

मंगलवार, 29 मार्च 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२७॥ -----


परे देस परबासिया होत बिमुख निज ईस । 
एक आध ते पूरन भए बहुरि कोटि पच्चीस ॥ ३२ ७१ ॥ 
भावार्थ : -- अपने ईश्वर से विमुख होकर दास के वेश में आते हैं ये प्रवासी ।  देश को लूटते हैं फिर उसपर अत्याचार करते ये शताब्दियों तक राज कर फिर उसपर अत्याचार हैं । उसे विभाजित करते हैं और कहीं  नहीं जाते..... पहले आधे रहते हैं फिर एक हो जाते हैं फिर करोड़ों में व्याप्त होकर संख्यावादी  लोकतंत्र से देश को पुनश्च नियंत्रित करते हैं......

आन परे परबासिया, भए सब उलटे जाप । 
पाप करम भयऊ धर्म धर्म कर्म भए पाप ॥ ३२७२ ॥ 
भावार्थ : -- जबस प्रवासी आ पड़े तब से सभी जप उलटे हो गए राम नहीं कहते अब लोग मरा पुकारते हैं पाप कर्म बी धर्म हो गए धर्म पाप हो गया पीने-खाने वाले  सम्मानित व् व्रताचरणी अपमानित होने लगे । कृषिकर्म अब निकृष्ट हो गया लुहारी जुहारी उत्तम हो गए ।


बाँबी जैसे देस भए लागे कोष बिमौट । 
दल  रहे न दलपत रहे कोट रहे नहि कोट ॥ ३२७३॥ 
भावार्थ : --  कोष में जब दीमक लग जाते हैं तब  राष्ट्र दीमक का  टीला बन जाता है  । फिर न तो दल रहता न दलपति दुर्ग भी दुर्ग नहीं रहता अर्थात संगठित राष्ट्र विघटित होने लगता है परिणाम में विभाजन प्राप्त होता है...... कारण ?

बाबि सरिस जो देस किए तामें बसिहि भुजंग । 
सीस उठाई बिष देत ब्यापिहि सकल अंग ॥ ३२ ७४ ॥ 
भावार्थ : --  राष्ट्र  जब दीमक का टीला बन जाता है  तब उसमें भुजंग का वास होने लगता है  । ये भुजंग फन फैलाते विष उगलते हुवे राज्य के प्रबंधन अंगों पर व्याप्त हो जाते हैं और संगठित राष्ट्र विघटित होने लगता है ॥
कारण कि विपरीत स्वभाव के जीव  एक साथ नहीं रह सकते जहां रहते हैं वहां जंगल राज होता है ॥

सुख साधन धन धाम ते भरे मिले जो देस । 
परबसिया तहँ जा पड़ें भर भर दासा भेस ॥ ३२७५॥ 
भावार्थ  - जो देश सुखकर साधन व् धन धाम से  परिपूर्ण होता है  ये  प्रवासी दास बनकर वहीँ पड़े रहते हैं ये स्वयं कुमार्गी होते हैं इनके सानिध्य में सन्मार्गी भी कुमार्गी हो जाते हैं । काल जनित कष्ट कभी न कभी सभी पर आता है ये उसे  सह नहीं पाते

खोखला हो गया है तुम्हारा राष्ट्र - थोथ चंने बजते  मधूर हैं थोड़े दिन और बजा लो

 जित देख तित भुजग बसे,  होत धर्म ते हींन । 
बिघन बीन बजाई  बिनु भुजग न होत अधीन ॥३२७६॥ 
भावार्थ : -- यदि चारों ओर भुजंग बसे दिखाई देने लगें इसका अर्थ है हम धर्म से विहीन हो गए हैं । विध्न की बीन ये भुजंग वश में नहीं आते ॥ अब या तो हम धर्मी हो जाएँ अन्यथा युद्ध का होना तय है ||

परबसिया का लूटना परबसिया की खोरि । 
परबसिया का राजना जेत कहो सो थोरि ॥ ३२७७ ॥ 
भावार्थ  -- प्रवासियों  का लूटना प्रवासियों की खोरी ( पान-खान )  प्रवासियों का शासन काल व् तत्समय का अत्याचार यह एक अकथ कहानी है ॥

सत्ता केरे स्वार्थि चिंता  करे न कोइ । 
देस दुआरा आपना चिंता आपनि होइ ॥ ३२७८॥ 
भावार्थ  -- सत्ता के लालचियों को केवल अपनी चिंता होती ही ओर किसी की नहीं । राष्ट्र हमारा है उसकी  चिंता भी हमें ही करनी होगी ।।

बन बन दिए जब मनि रतन खेत कनक उपजाए । 
आन पड़ें परबासिया, पकी पकाई खाएँ ॥ ३२ ७९ ॥  
भावार्थ : -- वन जब वनोपज न देकर मणि रत्न देते हैं खेत अन्न न उपजा कर  स्वर्ण उपजाते हैं  ।
                            पकी पकाई खाने को  तब  ये खंजन आते हैं ॥

देस निबसिया खेत में भए कोल्हु के बैल । 
परबसिया कन पाइया पहन राजसी चैल ॥३२८० ॥ 
भावार्थ ; - देश के मूल निवासी खेतों में कोल्हू के बैल बने अन्न उपजाते हैं । ये खंजन ( प्रवासी) उत्तम उत्तम वस्त्र धारण किए शीतल वातावरण में बैठे उस अन्न के अधिकारी हो जाते हें ॥ तनिक अपने अपने देश में देखिये तो इन प्रवासियों का वास्तविक उत्पादन में कितना योगदान है, कर में कितना योगदान है । नहीं है  तो इनसे खेत में हल चलवाओ ॥

अपने पहरे जागिये नहि परि रहियो सोए । 
ना जाने  छिन एकै मैं किसका पहरा होए ॥ 
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- सोए न पड़े रहें जागते रहें,  राज्य अपना है राज भी अपना ही हो । सोए रहे तो  न जाने किसका राज हो जाए ॥














बुधवार, 16 मार्च 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२६ ॥

बसे देस बवनाए जो , रहि सो अपने ठाट ।
एक एक कह सबहि  कछु करिया बारह बाट ॥ ३२६१ ॥ 
भावार्थ : -- जो पराए हैं और वासी बने इस देश में बसे हैं इनके कारण जब से इस देश का एकीकरण हुवा तब से इस देश की  सस्कृति छिन्न भिन्न हो गई और यह सर्वतस् नष्ट-भ्रष्ट हो गया । " हम सब एक हैं" हमारे  रक्त का रंग एक है" ईश्वर अल्ला एक है" " क्या काला  क्या सफ़ेद सब एक हैं"  इनमें कोई भेद नहींहै । गौमाता का तो क्या ये भ्रूण का भी भक्षण करते हैं और कहते हैं हमारा खान-पान एक है, बेबे ( बहन )  कब बीबी  बन जाती है पता नहीं चलता और  कहते हमारी संस्कृति एक है ॥ है ? 

 ऐसा कुत्सित एकीकरण कर इन्होने इस देश का बारह बाट कर दिया.....

बारह बाट : -- मोह, दीनता, भय, ह्रास, हानि, ग्लानि, क्षुधा, तृषा, क्षोभ, व्यथा, मृत्यु और अपकीर्ति ये बारह बाट हैं

बिगड़ा था घर आपना कुलाचार परिहाए । 
तापर लूट मचाए के पड़िया आन  पराए ॥ ३२६२ ॥ 
भावार्थ : -  कुलगत रीति-नीति का  परित्याग कर कोई गृह यदि पुरस्तात्  कुमार्गगामी हो उसपर बिगड़ैल  परिपंथ  वहां आकर अधिकार संपन्न हो जाए  तब सन्मार्गी की भी कुमार्गी होने की संभावना बनी रहती है ॥

यह देस सो देस जहां रहँ सब जीअ सुखारि । 
राम रमे बन बन तहाँ कुञ्ज कुञ्ज गिरधारि ॥ ३२६३॥ 
भावार्थ : -- यह देश वह देश है जहाँ संसार के सभी जीवंतकों को जीवन का अधिकार है । यहां वन वन में भगवान श्री राम का व कुञ्ज कुञ्ज में गिरधारी का वास हुवा ॥ 

खेत करन कस होइया धारत धारिहि धुर कस धारि । 
जेहि देस परबोधिया कहत केहि तल बारि ॥ ३२ ६४ ॥ 
 भावार्थ : -- कोई स्थान सीमाबद्ध कैसे होता है इसकी सुरक्षा कौन करता है सेना क्या होती है । शस्त्र शास्त्र क्या है यह भारत द्वारा विदित हुवा । 

देस  दुरग कोष दल पति मात सुहरिदै संग । 

केहि राज प्रबंधन के जे सब साधक अंग ॥ ३२६५ ।। 
भावार्थ : -- राज्य , दुर्ग, कोष, दल, पति, अमात्य व् साथ में सुहृदय । राज्य  प्रबंधन के ये साधक अंग हैं ॥ 


कतहुँ सुलिखित लेख कतहुँ चित्रवत चित्र बिन्यास । 
रन करम सों ए  देस के भरे परे इतिहास ॥३२६६ ॥ 

भावार्थ : - कही न सुलिखित लेख हैं कहीं अद्भुत चित्र- विन्यास हैं । जो यह उल्लेखित करते हैं कि भारत का इतिहास युद्ध संकुलता से भरा हुवा है जितने युद्ध इस देश में हुवे उतने कहीं नहीं हुवे ॥ 



सीख सीख एहि देस के  भयउ छतर छत्तीस । 
देस दासा होइ रहे ता  सहुँ अवनत सीस ॥ ३२६७ ॥ 
भावार्थ : -- इस देश के इतिहास से सीख लेकर छत्तीसों राष्ट्र बने । शताब्दियों की दासता के कारण उन रंगरूटों के  सम्मुख इसका शीश झुका रहा ॥ 

पति पताकिनी  होत  का हरिदय कवन सनेहि । 
अब हम ता सों जानिहैं कहत पताका केहि ॥ ३२६८ ॥ 
भावार्थ : -- पति कैसे बनाते हैं, पताकिनी कहाँ से आती है हृदय का स्नेहि किसे होना चाहिए ॥  इन अनपढ़ नेताओं के कारण अब यह सब हमें इन छत्र -छत्तीसों से सीखना पड़ता है इन्हें पढ़ना आता तो अपने देश का इतिहस पढ़कर संविधान लिखते । इसको पताका बोलते हैं अब यह वे हमें बताते हैं ॥ 

ई देखो बम......तुहार बम तुहरे ही सिर पर फोड़ न दें तो हमरे नाम बदल दीजो । 

प्रथम प्रक्षेपण पुरुष  = अस्वत्थामा 

भाग भाग कर देस के भागमभागा होइ । 
गयो गयो सब कोइ कहँ गया न कतहूँ कोइ ॥ ३२६९ ॥ 
भावार्थ : -- जब इस अखण्ड देश को खण्ड खण्ड करते विभाजित किया गया । तब एक भागम-  भाग  सी हुई थी । सबने कहा प्रवासी भाग गए पर गया कोई नहीं ॥  यह देश वारंवार विभाजित होता गया, सत्ता के  लालचियों ने कारण अब तक स्पष्ट नहीं किया.....

आन बसे परबासिया किए एहि देस अधीन । 
राजा सो कस होइआ अहँ जो राज बिहीन ॥ ३२७० ॥ 
भावार्थ : -- राष्ट्र  के बिना राज प्रबंधन के साधक अंगों की कल्पना नहीं की जा सकती । जो प्रवासी हों किसी देश में जा बसे हों कालान्तर में जिन्होंने छल से लूट से उस देश को अधीन कर उसपर अत्याचार किया वे राष्ट्रिक कैसे हो सकते हैं । जब वे राष्ट्रिक नहीं हो सकते तो फिर वे किसी राष्ट्र के स्वामी कैसे हुवे ? क्यों हुवे ?

कलह न जानब छोट करि  कलह कठिन परिनाम । 
लगति अगनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम ॥ 
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- लड़ाई को अनदेखा नहीं करना । लड़ाई का परिणाम बहुंत भयंकर होता है ।  निर्धन की झोपड़ी में लगी आग बड़े बड़े धनिकों के धन धाम को भस्म कर देती है.....











सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

----- ॥ दोहा-दशम ३२४-२५ ॥ -----

न्याय केरा अधिकरन जहाँ जाए तहँ पाए । 
हे रे हेरा देख्या मिला न कतहुँ न्याय ॥ ३२४१ ॥ 
भावार्थ : -- न्याय के  अधिकरण जहाँ गए वहाँ मिले। जब न्याय ढूंढ कर देखा तो वह कहीं नहीं मिला ॥

यह जग निरा स्वारथी  देखे अपना लाह । 
बलबन के सब होइया निर्बल के को नाह ॥ ३२४२ ॥ 
भावार्थ : -- यह विश्व नितांत स्वार्थी है जो केवल अपना ही लाभ देखता है । बलवान के सब हैं,  निर्बल का यहां कोई  नहीं है ॥

राम किसन कर देस यह जाने सब रन नीति । 
धर्मातिचारी ऊपर जीत यहां की रीति ॥३२४३ ॥ 
भावार्थ : -- इस देश को कोई निर्बल समझने की भूल न करे । यह देश राम और कृष्ण का देश है  । इसे रण की सभी नीतियां आती हैं । धर्म व् न्याय के अतिक्रमणकारियों पर विजय प्राप्त करना इसकी रीति है ॥

जुझाउनी बाज अहहीं थोड़ बहुँत सब पाहि । 
सो कारी रन करिअ का जिन्ह  बजाउ न आहि ॥ ३२४४ ॥ 
भावार्थ : -  जुझाऊ बाजे  न्यूनाधिक सभी के पास हैं । वह योद्धा युद्ध क्या करेंगे जिन्हें ये बाजे  बजाने ही नहीं आते केवल सजाने आते हैं ॥

जो अरि चोट चपेट किए कहत ताहि हथियार । 
जो रहैं धरे के धरे  सो तो होत कबार ॥ ३२ ४५ ॥ 
भावार्थ : -- राष्ट्र व् उसके वासियों की रक्षा हेतु शत्रु को चोटिल करने में जिसका प्रयोग हो वह  लोहा भी आयुध कहलाता है । जो  इधर उधर सड़ा रहता हो पड़ा रहता हो वह आयुध आयुध न होकर लोहा हो जाता है  ॥

भारत खंड ने देखे, बड़े बड़े साम्राज । 
रावन हो कि रामराज, जमन कि आँगलि राज ।३२४६ । 
भावार्थ : -- यह भारत खंड है साहेब । इसने बड़े बड़े साम्राज्य देखें है चाहे वह रावण राज हो या राम राज जमन राज हो या फिर अंगेरजी राज,  सामरिक विषयों में इससे अधिक अनुभवी न कोई हुवा न होगा ॥

अजहुँ त हाथ पसार के माँग रहे हैं न्याय । 
 न तरु खेत करि मेलिबो,  और न कोउ उपाय ॥ ३२ ४७ ॥ 
भावार्थ : -- अभी यह समय हाथ पसारे न्याय मांग रहा है । दे दो ! अन्यथा संग्राम के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न होगा ॥

है धर्म संग्राम येह, नहि कायर का  काम । 
सीस माँगे सीस दियो चाम माँगे त चाम ॥ ३२४८ ॥ 
भावार्थ : -- यह धर्म संग्राम होगा इसमें कायरों का कुछ काम न होगा । ये सीस मांगेगा सीस देना पड़ेगा, चाम मांगेगा चाम देना पड़ेगा ॥

मैं रन खेत बुहारिया जामें बोया धर्म । 
उपजत जूँ  नीपजेगा, मेंटेगा सब मर्म ॥ ३२४९ ॥ 
भावार्थ : -- मैने खेत में बुहारी देकर ( खेत तैयार करके ) धर्म बोया है । यह व्युतपन्न होकर ज्युहीं मूल को प्राप्त होगा त्यूंहीं संसार दुःख व् पीड़ा से मुक्त हो जाएगा ॥

अधुनै पलकन्हि पट दिए, सुतया अँखड़ी मूँद । 
जगत जोत जग जाएगा पड़े समय की बूँद ॥ ३२५ ०॥ 
भावार्थ : -  यह धर्म रूपी बीज यद्यपि अभी सुसुप्त अवस्था में है, समय की बूँद पड़ते ही यह जागती हुई ज्योति के साथ ही जब यह जागृत हो जाएगा ॥

यहां निबासी कौन है कौन इहाँ परबासि । 
रन भूमि के तीर खड़ा पूछेगा मुठि कासि ॥ ३२५१ ॥ 


भावार्थ : -- इस देश के निवासी कौन हैं ? प्रवासी कौन है ? रण-भूमि के मुहाने पर खड़े होकर यह प्रश्न करते हुवे उसकी मुट्ठियाँ कसी होंगी ॥  

करे करम का लेखनी लिखे भाग के लेख ॥
तेरे सिर तलबारि अरि, देख सके तो देख ॥ ३२५२ ।
भावार्थ : -- किए कर्मों की लेखनी से ही यह हस्त भाग्य के लेख लिखता है । रे संसार के शत्रु  तेरी लेखनी तेरे भाग्य में शीश पर तलवार लिख रही है देख सके तो देख ॥ 

आया जो घर छोड़ के बहोरि सो फिरि जाए ॥
धरम केर संग्राम में न त रहु सीस बिनाए ॥ ३२५३ ॥
भावार्थ : --  जो अपना घर छोड़ आया है वह लौट जाए । अन्यथा इस धर्म- संग्राम में वे शीश से रहित हो जाएगा॥  

यान तब तक यान है जब तक उसका कप्तान है.....

खेत कमाया कर्म हुँत बिया धरम का बीउ ।
मर्म बचन लिख जाएगा रेखत सबकी सीउँ ॥ ३२५४ ॥
भावार्थ : -- रण कर्म हेतु खेत तैयार हो गया,  धर्म के बीज की बोवनी भी हो गई । यह मर्म-वचन लिख कर अपनी अपनी सीमाओं में रहने का आदेश दे जाएगा ॥  

अजहुँ पलकन्हि पट दिये सुतिया अँखड़ी मूँद ।
जगत जोत जग जाएगा पड़त समय की बूँद ॥ ॥ 

हित करिया बस आपना किया न कासों हेत ।
सूर बीर के हाथ चढ़ कटेगा सोए खेत ॥ ३२५५॥
भावार्थ : -- जिसने केवल स्वयं के प्रयोजनों को सिद्ध किया । जिसको  किसी पर दया  नहीं आई जिसने किसी से प्रेम नहीं किया, किसी का कल्याण नहीं किया । सूर वीर के हत्थे चढ़ खेत में वही कटेगा  ॥ 

मैं पूछा रे काल कूँ करन चला संग्राम ॥
तू करता तू कारना करिया मेरा नाम ॥ ३२५६॥
भावार्थ : - मैं ने पूछा हे काल ! तुम युद्ध क्यूँ चाहते हो ? काल ने उत्तर दिया रण- कर्त्ता  तुम ही हो कारण भी तुम ही हो मैं निमित्त मात्र हूँ तुमने नाम मेरा कर दिया युद्ध में नहीं तुम चाहते हो । 

कारन जहाँ जन्माया  जोधन जनिआ तहहिं। 
तुम कारन मति जामियो जोधन होउ न कहहिं ॥ ३२५७॥ 

भावार्थ : -- कार्य बिना कारण के नहीं होता । कारणों की व्युतपत्ती से ही युद्ध उत्पन्न होता है  । तुम कारण उत्पन्न मत करो युद्ध कहीं नहीं होगा । 

जो मुख साँचा बोलिये अगजग बैरी होए । 
पड़िया लोहा लेवना औरु उपाय न कोए ॥ ३२ ५८॥ 
भावार्थ : --यदि कोई सत्य कहे तो संसार उसका विरोधी हो जाता हैं । ऐसी स्थिति में लोहा लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहता ॥ 


बँधे कसाई खूँट जो सीस देत जिअ जाहि । 
रोक  सके तो रोक ले जो को बिघन न चाहि ॥ ३२५९ ॥ 
भावार्थ : -- जो कसाई के खूंटे बंध के शीश और चर्म का बलिदान कर रहे हैं । युद्ध न चाहने वाले शान्ति प्रिय लोग नृसंस हत्या करते उन क्रूर नपुंसक  कसाइयों को रोके ॥ 

पाल पराया पोषिया बासन दिया पड़ोस । 
सींउ पारगत झूझिया वका को न दोष ॥ ३२६० ॥ 
भावार्थ : - जिन परायों ने इस देश को लूट उन्हें पाल पोष कर मुस्टंडे कर दिया और बसने को पड़ोस भी दे दिया । मर्यादाओं का उल्लंघन कर नित्य विध्वंश हेतु उतारू रहने वालों को रोक सको तो रोको ॥ 













----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...