बसे देस बवनाए जो , रहि सो अपने ठाट ।
एक एक कह सबहि कछु करिया बारह बाट ॥ ३२६१ ॥
भावार्थ : -- जो पराए हैं और वासी बने इस देश में बसे हैं इनके कारण जब से इस देश का एकीकरण हुवा तब से इस देश की सस्कृति छिन्न भिन्न हो गई और यह सर्वतस् नष्ट-भ्रष्ट हो गया । " हम सब एक हैं" हमारे रक्त का रंग एक है" ईश्वर अल्ला एक है" " क्या काला क्या सफ़ेद सब एक हैं" इनमें कोई भेद नहींहै । गौमाता का तो क्या ये भ्रूण का भी भक्षण करते हैं और कहते हैं हमारा खान-पान एक है, बेबे ( बहन ) कब बीबी बन जाती है पता नहीं चलता और कहते हमारी संस्कृति एक है ॥ है ?
ऐसा कुत्सित एकीकरण कर इन्होने इस देश का बारह बाट कर दिया.....
बारह बाट : -- मोह, दीनता, भय, ह्रास, हानि, ग्लानि, क्षुधा, तृषा, क्षोभ, व्यथा, मृत्यु और अपकीर्ति ये बारह बाट हैं
बिगड़ा था घर आपना कुलाचार परिहाए ।
तापर लूट मचाए के पड़िया आन पराए ॥ ३२६२ ॥
भावार्थ : - कुलगत रीति-नीति का परित्याग कर कोई गृह यदि पुरस्तात् कुमार्गगामी हो उसपर बिगड़ैल परिपंथ वहां आकर अधिकार संपन्न हो जाए तब सन्मार्गी की भी कुमार्गी होने की संभावना बनी रहती है ॥
यह देस सो देस जहां रहँ सब जीअ सुखारि ।
राम रमे बन बन तहाँ कुञ्ज कुञ्ज गिरधारि ॥ ३२६३॥
भावार्थ : -- यह देश वह देश है जहाँ संसार के सभी जीवंतकों को जीवन का अधिकार है । यहां वन वन में भगवान श्री राम का व कुञ्ज कुञ्ज में गिरधारी का वास हुवा ॥
खेत करन कस होइया धारत धारिहि धुर कस धारि ।
जेहि देस परबोधिया कहत केहि तल बारि ॥ ३२ ६४ ॥
भावार्थ : -- कोई स्थान सीमाबद्ध कैसे होता है इसकी सुरक्षा कौन करता है सेना क्या होती है । शस्त्र शास्त्र क्या है यह भारत द्वारा विदित हुवा ।
देस दुरग कोष दल पति मात सुहरिदै संग ।
केहि राज प्रबंधन के जे सब साधक अंग ॥ ३२६५ ।।
भावार्थ : -- राज्य , दुर्ग, कोष, दल, पति, अमात्य व् साथ में सुहृदय । राज्य प्रबंधन के ये साधक अंग हैं ॥
कतहुँ सुलिखित लेख कतहुँ चित्रवत चित्र बिन्यास ।
रन करम सों ए देस के भरे परे इतिहास ॥३२६६ ॥
भावार्थ : - कही न सुलिखित लेख हैं कहीं अद्भुत चित्र- विन्यास हैं । जो यह उल्लेखित करते हैं कि भारत का इतिहास युद्ध संकुलता से भरा हुवा है जितने युद्ध इस देश में हुवे उतने कहीं नहीं हुवे ॥
सीख सीख एहि देस के भयउ छतर छत्तीस ।
देस दासा होइ रहे ता सहुँ अवनत सीस ॥ ३२६७ ॥
भावार्थ : -- इस देश के इतिहास से सीख लेकर छत्तीसों राष्ट्र बने । शताब्दियों की दासता के कारण उन रंगरूटों के सम्मुख इसका शीश झुका रहा ॥
पति पताकिनी होत का हरिदय कवन सनेहि ।
अब हम ता सों जानिहैं कहत पताका केहि ॥ ३२६८ ॥
भावार्थ : -- पति कैसे बनाते हैं, पताकिनी कहाँ से आती है हृदय का स्नेहि किसे होना चाहिए ॥ इन अनपढ़ नेताओं के कारण अब यह सब हमें इन छत्र -छत्तीसों से सीखना पड़ता है इन्हें पढ़ना आता तो अपने देश का इतिहस पढ़कर संविधान लिखते । इसको पताका बोलते हैं अब यह वे हमें बताते हैं ॥
ई देखो बम......तुहार बम तुहरे ही सिर पर फोड़ न दें तो हमरे नाम बदल दीजो ।
प्रथम प्रक्षेपण पुरुष = अस्वत्थामा
भाग भाग कर देस के भागमभागा होइ ।
गयो गयो सब कोइ कहँ गया न कतहूँ कोइ ॥ ३२६९ ॥
भावार्थ : -- जब इस अखण्ड देश को खण्ड खण्ड करते विभाजित किया गया । तब एक भागम- भाग सी हुई थी । सबने कहा प्रवासी भाग गए पर गया कोई नहीं ॥ यह देश वारंवार विभाजित होता गया, सत्ता के लालचियों ने कारण अब तक स्पष्ट नहीं किया.....
आन बसे परबासिया किए एहि देस अधीन ।
राजा सो कस होइआ अहँ जो राज बिहीन ॥ ३२७० ॥
भावार्थ : -- राष्ट्र के बिना राज प्रबंधन के साधक अंगों की कल्पना नहीं की जा सकती । जो प्रवासी हों किसी देश में जा बसे हों कालान्तर में जिन्होंने छल से लूट से उस देश को अधीन कर उसपर अत्याचार किया वे राष्ट्रिक कैसे हो सकते हैं । जब वे राष्ट्रिक नहीं हो सकते तो फिर वे किसी राष्ट्र के स्वामी कैसे हुवे ? क्यों हुवे ?
कलह न जानब छोट करि कलह कठिन परिनाम ।
लगति अगनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम ॥
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- लड़ाई को अनदेखा नहीं करना । लड़ाई का परिणाम बहुंत भयंकर होता है । निर्धन की झोपड़ी में लगी आग बड़े बड़े धनिकों के धन धाम को भस्म कर देती है.....