जीवन मरनी पाख दुइ घरि भर का घमसान ।
मरनी संगत हारि के पहुँचिहि सब समसान ॥ ३१२१ ॥
भावार्थ : -- जीवन और मृत्य दो पक्ष हैं दोनों में अल्पकाल का ही संग्राम होता है । इस संग्राम में मृत्यु के हाथों जीवन का पराजित होना निश्चित है सभी को श्मशान पहुंचना है ॥
जिअना तो सब जानिआ मरन न जाने कोइ ।
जो को मरनी जानिआ जिअना जानिहि सोइ ॥३१२२॥
भावार्थ : -- जीना तो सभी जानते हैं मरना कोई नहीं जानता । जिसे मरण ज्ञात हो गया वस्तुत: जीवन उसी को ही ज्ञान हुवा खाना पीना और आनंद में रहना यह जीवन नहीं है ॥
देइ बिनु लगे रहे जब लेइ लेइ में लोग ।
पलछिन घाटत जाइहीं जीवन धन के जोग ॥३१२३॥
भावार्थ : -- जब लोग लेने में ही लगे रहेंगें देंगे कुछ नहीं अर्थात जब जीव त्याग की अपेक्षा सुख भोग में कर्म की अपेक्षा अर्थ में अधिक प्रवृत्त रहेगा तब जीवन के आधारभूत संकलन घटते घटते समाप्त हो जाएंगे ॥
परिश्रम कर बिनु सब किछु चाहीं ।
जग में जीवन जनमिया तिनका तिनका जोड़ ।
जेतक जिउती जोइया तेतक जइयो छोड़ ॥ ३१२४ ॥
कण कण के संयुग्मन से ही इस संसार में जीवन का प्रादुर्भाव हुवा । यह जीवंत रहे इस हेतु हम जितना इससे लें उतना ही इसे देकर जाएं ॥
छन भंगूरा जगत यह छन भंगूरी काए ।
जनम मरन के मध्य में जीवन है छल छाए ॥३१२५ ॥
भावार्थ : -- यह संसार ही जब छन भंगुर है धरती एक क्षण को भी काया इसके सम्मुख कहाँ ठहरती है । जनम यदि सत्य है तो मरण उससे भी बड़ा सत्य है व् मध्य में जीवन है जो असत्य है, असत्य सदैव पराजित होता है ॥
धरती अपने अक्ष पर एक क्षण को भी ठहर गई तो समझो दुनिया गई.....ठहराऊँ ?
काल भया सो आजु था आजु भया पुनि काल ।
काल काल फिर होइगा दसा काल का जाल ॥ ३१२६ ॥
भावार्थ : -- जो भूत है वह कभी वर्तमान था जो वर्तमान है लो वह भूत हो गया । वर्तमान को मृतकर भविष्य को भी भूत ही होना है ॥ अर्थात ये कल नहीं है ये तुम्हारा काल है ॥
मरन संजुग होए रहो जोगवना सब जोए ।
काल काल को जोगता काल करो मति कोए ॥३१२७ ॥
भावार्थ : - एक विशेष सूचना : -- यात्रीगण कृपया सभी आवश्यक साजो -सामग्री संकलित कर मरण-यात्रा को तैयार रहें । कल कल न करें, क्योंकि कल तो मृत्यु की प्रतीक्षा में है कल में तो तुम्हारा अंत काल है ।।
अजहुँ त जीता जागता पलक जान का होए ।
होवनहारी काल सों निरभै रहे न कोए ॥३१२८॥
भावार्थ : -- अभी तो भला-चंगा है पलक में क्या होवेगा कौन जाने । इसलिए अपने कल से अपने काल से सदैव भयभीत रहें ॥
मरा मरा कह रोइया मरा नहीं यहँ कोइ ।
मरता बहुर न जनमिआ, मरा जगत में सोइ ॥३१२९ ॥
भावार्थ : -- हाय मर गया कह कह के अपने परिजनों को सभी रोया करते हैं किन्तु मरता कोई नहीं । मरे हुवे का पुनर्जन्म न हो तभी वास्तविक मरण है ।
जेतक खादन खाइये तेतक दे उपजाएँ ।
सोइ जगत का जोगना लिया देत जो जाए ॥ ३१३० ॥
भावार्थ : -- जितना खाएं उतना उपजाएँ, जितना पाएं उतना दाएं
जो जितना खाए उतना उपजाए संसार का संरक्षक वह है जो लिया को देता जाए ॥
मरनी संगत हारि के पहुँचिहि सब समसान ॥ ३१२१ ॥
भावार्थ : -- जीवन और मृत्य दो पक्ष हैं दोनों में अल्पकाल का ही संग्राम होता है । इस संग्राम में मृत्यु के हाथों जीवन का पराजित होना निश्चित है सभी को श्मशान पहुंचना है ॥
जिअना तो सब जानिआ मरन न जाने कोइ ।
जो को मरनी जानिआ जिअना जानिहि सोइ ॥३१२२॥
भावार्थ : -- जीना तो सभी जानते हैं मरना कोई नहीं जानता । जिसे मरण ज्ञात हो गया वस्तुत: जीवन उसी को ही ज्ञान हुवा खाना पीना और आनंद में रहना यह जीवन नहीं है ॥
देइ बिनु लगे रहे जब लेइ लेइ में लोग ।
पलछिन घाटत जाइहीं जीवन धन के जोग ॥३१२३॥
भावार्थ : -- जब लोग लेने में ही लगे रहेंगें देंगे कुछ नहीं अर्थात जब जीव त्याग की अपेक्षा सुख भोग में कर्म की अपेक्षा अर्थ में अधिक प्रवृत्त रहेगा तब जीवन के आधारभूत संकलन घटते घटते समाप्त हो जाएंगे ॥
परिश्रम कर बिनु सब किछु चाहीं ।
जग में जीवन जनमिया तिनका तिनका जोड़ ।
जेतक जिउती जोइया तेतक जइयो छोड़ ॥ ३१२४ ॥
कण कण के संयुग्मन से ही इस संसार में जीवन का प्रादुर्भाव हुवा । यह जीवंत रहे इस हेतु हम जितना इससे लें उतना ही इसे देकर जाएं ॥
छन भंगूरा जगत यह छन भंगूरी काए ।
जनम मरन के मध्य में जीवन है छल छाए ॥३१२५ ॥
भावार्थ : -- यह संसार ही जब छन भंगुर है धरती एक क्षण को भी काया इसके सम्मुख कहाँ ठहरती है । जनम यदि सत्य है तो मरण उससे भी बड़ा सत्य है व् मध्य में जीवन है जो असत्य है, असत्य सदैव पराजित होता है ॥
धरती अपने अक्ष पर एक क्षण को भी ठहर गई तो समझो दुनिया गई.....ठहराऊँ ?
काल भया सो आजु था आजु भया पुनि काल ।
काल काल फिर होइगा दसा काल का जाल ॥ ३१२६ ॥
भावार्थ : -- जो भूत है वह कभी वर्तमान था जो वर्तमान है लो वह भूत हो गया । वर्तमान को मृतकर भविष्य को भी भूत ही होना है ॥ अर्थात ये कल नहीं है ये तुम्हारा काल है ॥
मरन संजुग होए रहो जोगवना सब जोए ।
काल काल को जोगता काल करो मति कोए ॥३१२७ ॥
भावार्थ : - एक विशेष सूचना : -- यात्रीगण कृपया सभी आवश्यक साजो -सामग्री संकलित कर मरण-यात्रा को तैयार रहें । कल कल न करें, क्योंकि कल तो मृत्यु की प्रतीक्षा में है कल में तो तुम्हारा अंत काल है ।।
अजहुँ त जीता जागता पलक जान का होए ।
होवनहारी काल सों निरभै रहे न कोए ॥३१२८॥
भावार्थ : -- अभी तो भला-चंगा है पलक में क्या होवेगा कौन जाने । इसलिए अपने कल से अपने काल से सदैव भयभीत रहें ॥
मरा मरा कह रोइया मरा नहीं यहँ कोइ ।
मरता बहुर न जनमिआ, मरा जगत में सोइ ॥३१२९ ॥
भावार्थ : -- हाय मर गया कह कह के अपने परिजनों को सभी रोया करते हैं किन्तु मरता कोई नहीं । मरे हुवे का पुनर्जन्म न हो तभी वास्तविक मरण है ।
जेतक खादन खाइये तेतक दे उपजाएँ ।
सोइ जगत का जोगना लिया देत जो जाए ॥ ३१३० ॥
भावार्थ : -- जितना खाएं उतना उपजाएँ, जितना पाएं उतना दाएं
जो जितना खाए उतना उपजाए संसार का संरक्षक वह है जो लिया को देता जाए ॥
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