रे मानस तू मती कर बढ़ा बढ़ी की होड़ ।
दुनिया अगुसर होइहीं ताकू पीछे छोड़ ॥३१६१ ॥
भावार्थ :- हे मनुष्य तू बढ़ा - बढी की प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित मत कर । ऐसे प्रोत्साहन से ये दुनिया तुझे पीछे छोड़ कर स्वयं आगे बढ़ जाएगी ॥
दुइ बात जग होइ रही कै दिन अरु कै रात ।
को जगा को सोए रहा को गत को आयात ॥ ३१६२ ॥
भावार्थ : -- संसार में दो बातें सदेव होती रही या तो दिन या रात । कोई जगता रहा कोई सोता रहा कोई आता कोई जाता रहा ॥
देखत देखत दिन गया निसि भी देखत जाए ।
जीउति काल दुराए के मरनी नियरे लाए ॥३१ ६३ ॥
भावार्थ : -- देखते देखते दिन व्यतीत हो गया रात भी व्यतीत हो जाएगी । ये रिक्त होते दिन-रात जीवन से दूर होकर मृत्यु को लक्षित हो रहे हैं ॥
जो तासों पिछुवाइया, करे संग दे हाथ ।
बढ़ते को पूकारिये चलो हमारे साथ ॥ ३१६४ ॥
भावार्थ : - जो तुमसे पीछे हो गए हों हाथ बढ़ा कर उन्हें अपने संग करो । जो तुमसे आगे निकल गए उन्हें हाँक लगा कर साथ चलने को कहो ॥
जब लग जीता जागता तब लग सब दए कान ।
आगिन केरि कौन सुने छोड़ चले समसान ॥३१६५ ॥
भावार्थ : - जब तक जीवन है तुम्हारी कथा तब तक ही सुनी जाएगी ॥ मरणी पाछे सब श्मसान में छोड़कर भाग जाते हैं आगे की फिर कोई नहीं सुनता है ॥
प्राण रहे न देह रहे रहे नहीं मुख बानि ।
मिर्तक पूनर जनम की का सो कहे कहानि ॥३१६६ ॥
भावार्थ : -- प्राण नहीं रहते तब काया भी नहीं रहती और मुख में वाणी भी विलोपित हो जाती है । फिर मृतक पुनर्जन्म की कथा कहे भी तो कैसे कहे किससे कहे ॥
जोडू मल जी चल बसा, स्वजन लगाए काड़ि ।
चलती बिरियाँ जोड़ गए घोड़ा गया न गाड़ि ॥३१ ६७ ॥
भावार्थ : -- जोडू मल जी मर गया मरते ही लोगों ने काड़ी ( माचिस ) लगा दी ॥ चलते समय न जोडू का जोड़ गया न घोड़े गए न गाड्डी गई ॥
चलता पथ जब उठि के गया कुकरमी दास ।
बाँस उठाए पडा मिला परनाले के पास ॥ ३१६८॥
भावार्थ : -- चलता चलता कुकर्मी दास भी उठ गया । कित्ते नहीं गया खोजा तो बांस मारता परनाले के पास पड़ा मिला ॥
आकासबानी हुई कि गए महात्मा चंद ।
नाचघर के संग संग मदिरालय हुए बंद ॥३१६९ ॥
भावार्थ : -- आकाशवाणी हुई ! क्यूँ हुई ? महात्मा चंद चल बसे इसलिए हुई । थे तब सब चालू थे जाते ही बंद हो गए ॥
जाकी नीयत रिति रहे भरे रहे जब पेट ।
बिलखत ऊपर चालिया धरम कर्म सब मेट ॥३१७०॥
भावार्थ : -- जिसकी जीवनचर्या असाधारण होती हैं और विचार दूषित होते हैं वह धर्म -कर्म का मटियामेट किए ऊपर देख कर चलता है उसे पहले अपनी जाति अपना समाज दूसरे अपना देश समझ में नहीं आता , फिर एक समय ऐसा आता है जब उसे यह दुनिया ही समझ में नहीं आती ॥
दुनिया अगुसर होइहीं ताकू पीछे छोड़ ॥३१६१ ॥
भावार्थ :- हे मनुष्य तू बढ़ा - बढी की प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित मत कर । ऐसे प्रोत्साहन से ये दुनिया तुझे पीछे छोड़ कर स्वयं आगे बढ़ जाएगी ॥
दुइ बात जग होइ रही कै दिन अरु कै रात ।
को जगा को सोए रहा को गत को आयात ॥ ३१६२ ॥
भावार्थ : -- संसार में दो बातें सदेव होती रही या तो दिन या रात । कोई जगता रहा कोई सोता रहा कोई आता कोई जाता रहा ॥
देखत देखत दिन गया निसि भी देखत जाए ।
जीउति काल दुराए के मरनी नियरे लाए ॥३१ ६३ ॥
भावार्थ : -- देखते देखते दिन व्यतीत हो गया रात भी व्यतीत हो जाएगी । ये रिक्त होते दिन-रात जीवन से दूर होकर मृत्यु को लक्षित हो रहे हैं ॥
जो तासों पिछुवाइया, करे संग दे हाथ ।
बढ़ते को पूकारिये चलो हमारे साथ ॥ ३१६४ ॥
भावार्थ : - जो तुमसे पीछे हो गए हों हाथ बढ़ा कर उन्हें अपने संग करो । जो तुमसे आगे निकल गए उन्हें हाँक लगा कर साथ चलने को कहो ॥
जब लग जीता जागता तब लग सब दए कान ।
आगिन केरि कौन सुने छोड़ चले समसान ॥३१६५ ॥
भावार्थ : - जब तक जीवन है तुम्हारी कथा तब तक ही सुनी जाएगी ॥ मरणी पाछे सब श्मसान में छोड़कर भाग जाते हैं आगे की फिर कोई नहीं सुनता है ॥
प्राण रहे न देह रहे रहे नहीं मुख बानि ।
मिर्तक पूनर जनम की का सो कहे कहानि ॥३१६६ ॥
भावार्थ : -- प्राण नहीं रहते तब काया भी नहीं रहती और मुख में वाणी भी विलोपित हो जाती है । फिर मृतक पुनर्जन्म की कथा कहे भी तो कैसे कहे किससे कहे ॥
जोडू मल जी चल बसा, स्वजन लगाए काड़ि ।
चलती बिरियाँ जोड़ गए घोड़ा गया न गाड़ि ॥३१ ६७ ॥
भावार्थ : -- जोडू मल जी मर गया मरते ही लोगों ने काड़ी ( माचिस ) लगा दी ॥ चलते समय न जोडू का जोड़ गया न घोड़े गए न गाड्डी गई ॥
चलता पथ जब उठि के गया कुकरमी दास ।
बाँस उठाए पडा मिला परनाले के पास ॥ ३१६८॥
भावार्थ : -- चलता चलता कुकर्मी दास भी उठ गया । कित्ते नहीं गया खोजा तो बांस मारता परनाले के पास पड़ा मिला ॥
आकासबानी हुई कि गए महात्मा चंद ।
नाचघर के संग संग मदिरालय हुए बंद ॥३१६९ ॥
भावार्थ : -- आकाशवाणी हुई ! क्यूँ हुई ? महात्मा चंद चल बसे इसलिए हुई । थे तब सब चालू थे जाते ही बंद हो गए ॥
जाकी नीयत रिति रहे भरे रहे जब पेट ।
बिलखत ऊपर चालिया धरम कर्म सब मेट ॥३१७०॥
भावार्थ : -- जिसकी जीवनचर्या असाधारण होती हैं और विचार दूषित होते हैं वह धर्म -कर्म का मटियामेट किए ऊपर देख कर चलता है उसे पहले अपनी जाति अपना समाज दूसरे अपना देश समझ में नहीं आता , फिर एक समय ऐसा आता है जब उसे यह दुनिया ही समझ में नहीं आती ॥
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