गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३१६ ॥ -----

रे मानस  तू मती कर बढ़ा बढ़ी की होड़ । 
दुनिया अगुसर होइहीं ताकू पीछे छोड़ ॥३१६१ ॥ 
भावार्थ :- हे मनुष्य तू बढ़ा - बढी की प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित मत कर । ऐसे प्रोत्साहन से ये दुनिया  तुझे  पीछे छोड़ कर स्वयं आगे बढ़ जाएगी ॥ 

दुइ बात जग होइ रही कै दिन अरु कै  रात । 
को जगा को सोए रहा को गत को आयात ॥ ३१६२ ॥ 
भावार्थ : -- संसार में दो बातें सदेव होती रही या तो दिन या रात  । कोई जगता रहा कोई सोता रहा कोई आता कोई जाता रहा ॥  

देखत देखत दिन गया निसि भी देखत जाए । 
जीउति काल दुराए के मरनी नियरे लाए ॥३१ ६३ ॥ 
भावार्थ : -- देखते देखते दिन व्यतीत हो गया रात भी व्यतीत हो जाएगी । ये रिक्त होते दिन-रात जीवन से दूर होकर मृत्यु को लक्षित हो रहे हैं ॥ 

जो तासों पिछुवाइया, करे संग दे हाथ । 
बढ़ते को पूकारिये चलो हमारे साथ ॥ ३१६४ ॥ 
भावार्थ : - जो तुमसे पीछे हो गए हों हाथ बढ़ा कर उन्हें अपने संग करो । जो तुमसे आगे निकल गए उन्हें हाँक लगा कर साथ चलने को कहो ॥ 

जब लग जीता जागता तब लग सब दए कान । 
आगिन केरि कौन सुने  छोड़ चले समसान ॥३१६५ ॥ 
भावार्थ : - जब तक जीवन है तुम्हारी कथा तब तक ही सुनी जाएगी ॥ मरणी पाछे  सब श्मसान में छोड़कर भाग जाते हैं आगे की फिर कोई नहीं सुनता है ॥ 

प्राण रहे न देह रहे रहे नहीं मुख बानि । 
मिर्तक पूनर जनम की का सो कहे कहानि ॥३१६६ ॥ 
भावार्थ : -- प्राण नहीं रहते तब काया भी नहीं रहती और मुख में वाणी भी विलोपित हो जाती है । फिर मृतक पुनर्जन्म की कथा कहे भी तो कैसे कहे किससे कहे ॥ 

जोडू मल जी चल बसा, स्वजन लगाए काड़ि । 
चलती बिरियाँ जोड़ गए घोड़ा गया न गाड़ि ॥३१ ६७ ॥ 
भावार्थ : -- जोडू मल जी मर गया मरते ही लोगों ने काड़ी ( माचिस ) लगा दी ॥ चलते समय न जोडू का जोड़ गया न घोड़े गए न गाड्डी गई ॥ 

चलता पथ जब उठि के गया कुकरमी दास । 
बाँस उठाए पडा मिला परनाले के पास ॥ ३१६८॥ 
भावार्थ : -- चलता चलता कुकर्मी दास भी उठ गया । कित्ते नहीं गया खोजा तो बांस मारता परनाले के पास पड़ा मिला ॥ 

आकासबानी हुई कि गए महात्मा चंद । 
नाचघर के संग संग मदिरालय हुए बंद ॥३१६९ ॥ 
भावार्थ : -- आकाशवाणी हुई ! क्यूँ हुई ? महात्मा चंद चल बसे इसलिए हुई । थे तब सब चालू थे जाते ही बंद हो गए ॥ 

जाकी नीयत रिति रहे भरे रहे जब पेट । 
बिलखत ऊपर चालिया धरम कर्म सब मेट ॥३१७०॥ 
भावार्थ : -- जिसकी जीवनचर्या असाधारण होती हैं और विचार दूषित होते हैं वह धर्म -कर्म का मटियामेट किए ऊपर देख कर चलता  है उसे पहले अपनी जाति अपना समाज दूसरे अपना  देश समझ में नहीं आता , फिर एक समय ऐसा आता है जब उसे यह दुनिया ही समझ में नहीं आती ॥ 


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