पंथ कतहूँ न जाइया पंथी आवहि जाहिं ।
बालपन आयत दरसिहि बिरधा गत दरसाहि ॥३१५१॥
भावार्थ : -- गतिशीलता पंथी में होती है पंथ में नहीं । गतायात पंथी का स्वभाव है पथ का नहीं । बाल्यावस्था में पंथी आता व् वृद्धावस्था में जाता दिखाई देता है ॥
पाँच पलक का पाउना सहसहि जोग सँजोए ।
धोबा का गदहा ज्यूँ चला भार कू ढोए ॥ ३१५२॥
भवार्थ : - घड़ी भर का आगंतुक और अनेकानेक वस्तुएं । ऐसा यात्री धोबी के गधे जैसा होता है जो अन्य के उपयोग हेतु भार ढोता चलता है ॥
आगे आगे जाय था पीछे पड़ा बिकास ।
चली काल की चाकरी मिलिआ खड़ा बिनास ॥ ३१ ५३ ॥
भावार्थ : -- एक जणा आगे आगे जाय था बिकास का भूत उसके पीच्छे पड़ गया । समय ने फिर ऐसा खेल खेला थोड़ा और आग्गे जाने पर उसे विनाश खड़ा मिला वो खाट पे पड़ा मिला ॥
कबहुँ चलता पीठ पीछु दीठ घुमाई देख ।
दरसे ललाम लाल सो पाप कहत करि रेख ॥ ३१५४॥
भावार्थ : -- जीवन की यात्रा तय करते कभी अपने अतीत पर भी दृष्टि पात कर लेना । यदि पथ कहीं अथवा सर्वत्र रक्त से रंजीत दिखे तो उसे अपने पाप को रेखांकित करता हुवा आलेख समझना ॥
मन मानस सँकोच रहे हरिदै रहे उदार ।
पाप किए कर भार गहे धरम किए त हरुबार ॥ ३१५५ ॥
भावार्थ : -- संकोचित मनो-मस्तिष्क पाप को प्रेरित करता है उदार हृदय धर्म को । मनोनिग्रह व् उदारशीलता से अधिकाधिक धर्म होता है । पाप यात्री के भार को बढ़ा देता है धर्म उसके भार को हल्का करता है ॥
यह मन ही है जो संसार के दुखों का कारण है......
अपना चलन भुलाए के चला चलन को और ।
अंत काल पछताइया पहुँच पराई पौर ॥ ३१५६॥
भावार्थ : -- जो अपना चलन बिसरा कर पराए चलन में चलता है । अंतकाल में वह पराई ड्योढ़ी को प्राप्त होकर पश्चाताप ही करता है ॥ अंग्रेज अंगेरज्जी से ब्याह करता रहा मुसल्ले से हिन्दू को सिखाता तू हिंदी से ब्याह मत कर । मुसल्ला अपनी ढक के रखता दूसरे की उघाड़ता फिरता.....
अपने चलन बिसुर चले , आन कही अनुहार ।
पुर्बल जहँ ते चालिआ पहुंचे सोए द्वार ॥ ३१५७ ॥
भावार्थ : -- दूसरों की कही में आकर जो अपने धर्म का अपने चलन का तिरस्कार करता है । जहां से चला था वह वहीं पहुँच जाता है । जीवन की यात्रा तय करने हेतु उसे किसी न किसी धर्म की आवश्यकता होगी ही होगी ॥
धर्म संविधान के अनुसार नहीं चलता धर्म तत्संबंधित ग्रंथों के आधार पर चलता है.....
दस पांच लोगों की सुविधाओं के लिए बनाया गया पचास साठ साल पुराना भारत का संविधान तय करेगा की तुम हिन्दू हो कि मुस्लिम हो की ईसाई हो, फिर धर्म ग्रन्थ क्या करेंगे.....
फलाँराम कहाए चहे बोया बिआ बबूल ।
बिरवा तैसा होइया जैसा वाका मूल ॥ ३१ ५८ ॥
भावार्थ : - बबुल का बोया हुवा बिरवा अब फलाराम कहलाना चाहता है । पेड़ वैसा ही होगा जैसी उसकी जड़ें होंगी जड़ कैसी होंगी जैसा बीज होगा ॥
फूल बोए फूलहि फरे सूल बोए तो सूल ।
साधो धरे न होइआ फलबर नाउ बबूल ॥ ३१५९ ॥
भावार्थ : - मार्ग में फूल बोएंगे तो फूल ही प्राप्त होंगे सूल बोएगे तो सूल ही प्राप्त होंगे । बबूल का नाम आम रखने से वह आम नहीं होता । कहने वाले कहते हैं फल सभी एक होते हैं, होते हैं क्या.....?
सूल पीर दे पेलिआ फूल चरन सहलाए ।
फलाराम जहँ मेलिआ सबके छुधा मिटाए ॥३१६० ॥
भावार्थ : - कंटक मार्ग को बाधित कर पीड़ा ही देता है । पुष्प उस पीड़ा को हरण कर चरण को सुख प्रदान करता है । जहाँ कहीं कोई फलवाला मिल जाए तो वह सबकी क्षुधा हरण करता चलता है ॥ इसलिए फलफूल वाले बनो सूल वाले मत बनो । दयालू बनो सत्यवादी बनो दानी बनो त्यागी बनो मर्यादित रहो.....
बालपन आयत दरसिहि बिरधा गत दरसाहि ॥३१५१॥
भावार्थ : -- गतिशीलता पंथी में होती है पंथ में नहीं । गतायात पंथी का स्वभाव है पथ का नहीं । बाल्यावस्था में पंथी आता व् वृद्धावस्था में जाता दिखाई देता है ॥
पाँच पलक का पाउना सहसहि जोग सँजोए ।
धोबा का गदहा ज्यूँ चला भार कू ढोए ॥ ३१५२॥
भवार्थ : - घड़ी भर का आगंतुक और अनेकानेक वस्तुएं । ऐसा यात्री धोबी के गधे जैसा होता है जो अन्य के उपयोग हेतु भार ढोता चलता है ॥
आगे आगे जाय था पीछे पड़ा बिकास ।
चली काल की चाकरी मिलिआ खड़ा बिनास ॥ ३१ ५३ ॥
भावार्थ : -- एक जणा आगे आगे जाय था बिकास का भूत उसके पीच्छे पड़ गया । समय ने फिर ऐसा खेल खेला थोड़ा और आग्गे जाने पर उसे विनाश खड़ा मिला वो खाट पे पड़ा मिला ॥
कबहुँ चलता पीठ पीछु दीठ घुमाई देख ।
दरसे ललाम लाल सो पाप कहत करि रेख ॥ ३१५४॥
भावार्थ : -- जीवन की यात्रा तय करते कभी अपने अतीत पर भी दृष्टि पात कर लेना । यदि पथ कहीं अथवा सर्वत्र रक्त से रंजीत दिखे तो उसे अपने पाप को रेखांकित करता हुवा आलेख समझना ॥
मन मानस सँकोच रहे हरिदै रहे उदार ।
पाप किए कर भार गहे धरम किए त हरुबार ॥ ३१५५ ॥
भावार्थ : -- संकोचित मनो-मस्तिष्क पाप को प्रेरित करता है उदार हृदय धर्म को । मनोनिग्रह व् उदारशीलता से अधिकाधिक धर्म होता है । पाप यात्री के भार को बढ़ा देता है धर्म उसके भार को हल्का करता है ॥
यह मन ही है जो संसार के दुखों का कारण है......
अपना चलन भुलाए के चला चलन को और ।
अंत काल पछताइया पहुँच पराई पौर ॥ ३१५६॥
भावार्थ : -- जो अपना चलन बिसरा कर पराए चलन में चलता है । अंतकाल में वह पराई ड्योढ़ी को प्राप्त होकर पश्चाताप ही करता है ॥ अंग्रेज अंगेरज्जी से ब्याह करता रहा मुसल्ले से हिन्दू को सिखाता तू हिंदी से ब्याह मत कर । मुसल्ला अपनी ढक के रखता दूसरे की उघाड़ता फिरता.....
अपने चलन बिसुर चले , आन कही अनुहार ।
पुर्बल जहँ ते चालिआ पहुंचे सोए द्वार ॥ ३१५७ ॥
भावार्थ : -- दूसरों की कही में आकर जो अपने धर्म का अपने चलन का तिरस्कार करता है । जहां से चला था वह वहीं पहुँच जाता है । जीवन की यात्रा तय करने हेतु उसे किसी न किसी धर्म की आवश्यकता होगी ही होगी ॥
धर्म संविधान के अनुसार नहीं चलता धर्म तत्संबंधित ग्रंथों के आधार पर चलता है.....
दस पांच लोगों की सुविधाओं के लिए बनाया गया पचास साठ साल पुराना भारत का संविधान तय करेगा की तुम हिन्दू हो कि मुस्लिम हो की ईसाई हो, फिर धर्म ग्रन्थ क्या करेंगे.....
फलाँराम कहाए चहे बोया बिआ बबूल ।
बिरवा तैसा होइया जैसा वाका मूल ॥ ३१ ५८ ॥
भावार्थ : - बबुल का बोया हुवा बिरवा अब फलाराम कहलाना चाहता है । पेड़ वैसा ही होगा जैसी उसकी जड़ें होंगी जड़ कैसी होंगी जैसा बीज होगा ॥
फूल बोए फूलहि फरे सूल बोए तो सूल ।
साधो धरे न होइआ फलबर नाउ बबूल ॥ ३१५९ ॥
भावार्थ : - मार्ग में फूल बोएंगे तो फूल ही प्राप्त होंगे सूल बोएगे तो सूल ही प्राप्त होंगे । बबूल का नाम आम रखने से वह आम नहीं होता । कहने वाले कहते हैं फल सभी एक होते हैं, होते हैं क्या.....?
सूल पीर दे पेलिआ फूल चरन सहलाए ।
फलाराम जहँ मेलिआ सबके छुधा मिटाए ॥३१६० ॥
भावार्थ : - कंटक मार्ग को बाधित कर पीड़ा ही देता है । पुष्प उस पीड़ा को हरण कर चरण को सुख प्रदान करता है । जहाँ कहीं कोई फलवाला मिल जाए तो वह सबकी क्षुधा हरण करता चलता है ॥ इसलिए फलफूल वाले बनो सूल वाले मत बनो । दयालू बनो सत्यवादी बनो दानी बनो त्यागी बनो मर्यादित रहो.....
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